Wednesday, July 22, 2020

महाभारत कालीन है महरौली का योगमाया मंदिर


आम तौर पर लोग दक्षिण दिल्ली के महरौली में कुतुबमीनार घूमने जाते हैं। पर इस महरौली में कई ऐतिहासिक महत्व के स्मारक स्थित हैं। ये स्मारक कुतुब मीनार के आसपास ही स्थित हैं। इन स्मारकों में योगमाया मंदिर, सूफी संत की मजार, भूल भुलैया, राजाओं की बावली, जहाज महल आदि प्रसिद्ध है। तो सबसे पहले बात योगमाया मंदिर की। 

कृष्ण की बहन थीं योगमाया  - जब आप कुतुब मीनार से पीछे पहुंचते हैं तो यहां पर महरौली का डीटीसी बस स्टैंड है। इसी बस स्टैंड से थोड़ा पहले दाहिनी तरफ की गली में प्रसिद्ध योगमाया मंदिर है। यह दिल्ली का एक प्राचीन हिंदू मंदिर है। यह मंदिर भगवान कृष्ण की बहन योगमाया को समर्पित है। मान्यता है कि इस मंदिर का निर्माण स्वंय कृष्ण ने किया था। वहीं एक मान्यता है इस मंदिर निर्माण महाभारत के युद्ध के बाद युधिष्ठिर ने किया था। 

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, देवी देवकी के सातवें गर्भ को योगमाया ने ही संकर्षण कर रोहिणी के गर्भ में पहुंचाया था, जिससे श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलरामजी का जन्म हुआ था। मान्यता है कि योगमाया ने ही श्रीकृष्ण के प्राणों की रक्षा थी।

सिद्ध पीठ है मंदिर -  नागर शैली में बने इस मंदिर को लोग महाभारत कालीन बताते हैं। इसे सिद्ध पीठ माना जाता है। यह ज्ञान पीठ और शक्ति पीठ का संयोजन कहा जाता है। यह शक्ति पीठ कभी किन्हीं कारणों से तंत्र विद्या का केंद्र था। इसलिए इस पीठ को योगपीठ भी कहा गया है। इस मंदिर की दीवारों पर आकर्षक भित्ति चित्र बनाए गए हैं। 

मंदिर के आसपास अवशेष जो खंडहरों मे निकलते हैं, इससे स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि ये खंडहरों मे कभी पृथ्वीराज चौहान का महल रहा होगा। अनंगपाल तालाब में श्रद्धालु स्नान करके योगमाया जी की पूजा अर्चना किया करते थे।



हमले का शिकार हुआ मंदिर - यह मंदिर मुहम्मद गजनवी के आक्रमण के समय नष्ट हो गया था। यह मंदिर दिल्ली के पुराने नगर लालकोट के परिधि में होता था। इसे बाद में राजपूत राजा हेमू ने पुनर्निमाण कराया था। महरौली के इस मंदिर ने दिल्ली को सात बार उजड़ते और बसते हुए देखा है। 

फूलवालों की सैर की शुरुआत होती है यह मंदिर हर साल होने वाले आयोजन फूलों वालों की सैर यानी सैर ए गुल फरोंशा का हिस्सा होता है। गंगा जमुनी तहजीब के प्रतीक इस त्योहार की शुरुआत इसी मंदिर से होती है। इस उत्सव की शुरुआत बहादुर शाह जफर ने की थी। यह आयोजन सैकड़ो साल से हो रहा था पर 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान ये आयोजन रूक गया था। सन 1962 में पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने फूल वालों के सैर की शुरुआत इसी मंदिर से की थी। 

क्रांति की योजना बनी थी -  सन 1857 के क्रांति की योजना भी इस योगमाया मंदिर परिसर में बैठकर बनाई गई थी। साल के दो नवरात्रि के समय मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। इस मंदिर का प्रबंधन आजकल श्री योगमाया मंदिर वेलफेयर मैनेजमेट सोसाइटी देखता है। 
   विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-        ( MAHRAULI, YOGMAYA TEMPLE, DELHI, FOOL WALON KI SAIR )

3 comments:

  1. राम राम जी सर, जानकारी के लिए धन्यवाद, श्रीमान जी हेमू राजपूत नहीं था. वह वैश्य बनिया था. रौनियार और दौसर वैश्य हेमू को अपनी जाति का बताते हैं.

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  2. धन्यवाद।, कहीं उसे हेमचंद भार्गव, ब्राह्मण भी बताते हैं।

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    1. सर जी, दौसर वैश्यों का गोत्र भार्गव है....

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