Thursday, July 30, 2020

महरौली - जमाली कमाली मसजिद और अनूठा जहाज महल

महरौली में राजाओं का बाउली के आसपास कई और ऐतिहासिक इमारते हैं। ये इलाका महरौली आर्केलोजिकल पार्क कहलता है। इस क्षेत्र में कुछ अनजान मकबरे भी हैं। इस क्षेत्र में टहलने के लिए सुंदर कच्चा रास्ता बना हुआ है। यहां पहुंचकर आपको लगता है मानो दिल्ली के बाहर किसी ग्रामीण क्षेत्र में पहुंच गए हों। इस इलाके में आजकल युवा टिककॉक वीडियो बनाते हुए नजर आते हैं।

वन क्षेत्र में पैदल चलते हुए आगे चलने पर आपको मैटकॉफ फॉली, बोट हाउस, कुली खां का मकबरा देखने को मिलता है। इसके आगे चलने पर आप जमाली कमाली मसजिद, शाहिद खान का मकबरा और अन्य मुगलकालीन मकबरे देख सकते हैं। महरौली का आर्किलोजिकल पार्क कुल 42 एकड़ में फैला हुआ है। इसमें पैदल घूमने के लिए आपके पास अच्छा खासा वक्त चाहिए।

जमाली कमाली मसजिद - जमाली कमाली मस्जिद और उसके साथ लगती मजार का संबंध कवि और संत शेख फजलुल्लाह से है। वे सिकंदर लोदी और हुमायूं के समकालीन थे। इस मसजिद का निर्माण 1528-29 में आरंभ हुआ था। संत की कब्र इसी मसजिद में बनी है। संत को जमाली नाम से भी जानते हैं। साथ ही कमाली की भी कब्र है। पर कमाली कौन थे उनके बारे में ठीक ठीक नहीं पता। आइए अब आगे चलते हैं...


कुछ ऐसा है महरौली का जहाज महल - महरौली के मुख्य बाजार में स्थित है जहाज महल। एक जहाज महल का नाम आपने मांडू मध्य प्रदेश में सुना होगा। पर एक जहाज महल दिल्ली में भी है। महरौली के इस जहाज महल का निर्माण हौज ए शम्शी में करावाया गया है। यह एक अवकाशकालीन गृह हुआ करता था। पर आजकल इसके आसपास घना बाजार है।


इस महल को दूर से देखकर लगता है मानो पानी में कोई जहाज चल रहा हो। जहाज महल के गुंबद बड़े खूबसूरत हैं। इसका निर्माण लोदी वंश के काल में 1452-1526 के बीच करवाया गया था। यह अवकाश में निवास करने के लिए एक धर्मशाला हुआ करती थी। 
जहाज महल की कलात्मकता देखने लायक है। खासकर इसके गुंबद बड़े नक्काशीदार और सुंदर बने हैं। इसे अलग अलग रंगों से रंगा भी गया था। कभी जहाज महल के आसपास हरित क्षेत्र था। पर अब जहाज महल के आसपास महरौली का घना बाजार है। पास में ही महरौली की सब्जी मंडी है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-        MAHRAULI, JAMALI KAMALI MASJID, RAJAON KI BAWLI, GANDHAK KI BAWLI, JAHAJ MAHAL)

Tuesday, July 28, 2020

महरौली में गंधक की बाउली और राजाओं की बाउली

महरौली के बस स्टैंड के पा स्थित भूल भुलैया। 

दक्षिण दिल्ली के महरौली की पहचान उसकी खूबसूरत और आकर्षक डिजाइन वाले बाउलियों के कारण भी है। दिल्ली में 200 से ज्यादा बाउलियों के होने का संदर्भ मिलता है। बाउली गहरा कुआं हुआ करती है। इसमें पानी तक पहुंचने के लिए सीढियां बनाई जाती हैं। इनमें से कई महरौली इलाके में हुआ करती थीं। पर इन बाउली को देखने से पहले जान लेते हैं भूल भुलैया के बारे में।

आदम खान का मकबरा या भूल-भुलैया - बस स्टैंड के पास एक स्मारक है जिसे लोग भुल भूलैया कहते हैं। वास्तव में यह अकबर के सेनापति आदम खान का मकबरा है। आदम खान वैसे तो अकबर रिश्ते में भाई लगता था। कहा जाता है कि एक बार आदम खान ने अकबर के चहेते किसी मंत्री की हत्या कर दी। इससे नाराज होकर अकबर ने आदम खान को मौत की सजा दे डाली। आदम खां की मां ने अकबर को दूध पिलाया था। इसलिए  वह अकबर के भाई के समान था। पर आदम खान को मौत की सजा पर अकबर अडिग रहा। पर आदम खान को मारे जाने के बाद अकबर ने उसकी याद में महरौली में इस मकबरे का निर्माण कराया। विशाल चबूतरे पर बने इस मकबरे में अक्सर लोग तफरीह करते हुए मिल जाएंगे। बाहर से इस मकबरे की बनावट षटकोणीय है। हर बाहरी दीवार पर तीन दरवाजे बनाए गए हैं। 
बहुत बुरे हाल में है गंधक की बाउली। 

गंधक का बाउली –  कुतुबुद्दीन ऐबक और गुलाम वंश के शासक इल्तुतमिश  के काल में गंधक की बाउली का निर्माण कराया गया था। तेरहवीं सदी में बनी इस बाउली को पानी में गंधक की अधिकता के कारण ये नाम मिला। उन्होंने ये बाउली सूफी संत कुतुबदीन बख्तियार काकी के सम्मान में बनवाई थी। इसके निर्माण में अनगढ़ पत्थरों का इस्तेमाल किया गया था। यह पांच मंजिला है। इस बाउली की गहराई काफी है। आज ये बाउली बुरे हाल में है। इसको चारों तरफ से घेर दिया गया है। अब आप इसमें नीचे नहीं उतर सकते।

राजाओं की बाउली – महरौली बस स्टैंड से आगे बायीं तरफ वन क्षेत्र में 50 मीटर से ज्यादा चलकर जाने पर आपको एक और विशाल बाउली देखने को मिलती है। इसका नाम राजाओं का बाउली है। यह अभी भी काफी अच्छे हाल में है। इसे आप चारों तरफ से घूमकर देख सकते हैं। इसका निर्माण 1506 में लोदी वंश के दौरान दौलत खान ने करवाया था। इसके प्रवेश द्वार के पास एक मसजिद है। यह बाउली तीन मंजिला है। इसमें उतरने के लिए सीढ़ियां बनी हुई है। इसमें आजकल भी पानी है। पर यह पानी साफ नहीं है।

कुछ लोगों कहना है कि यह राजाओं की नहीं बल्कि राजों ( राज मिस्त्री ) की बाउली है। क्योंकि इस बाउली को एक राज मिस्त्री ने धीरे धीरे बनवाया था तो उसके नाम ही इस बाउली का नाम पड़ गया। जो भी ये बाउली आज भी बड़ी अच्छी हालत में है। पर जरूरत है इसके पानी को स्वच्छ और निर्मल बनाए रखने की। ऐसा करने से इसका आकर्षण और बढ़ जाएगा। राजाओं की बाउली के सामने एक अनजान स्मारक भी है। यह भी बहुत अच्छी हालत में है।
तो बने रहिए हमारे साथ,  आगे बात करेंगे महरौली के कुछ और स्मारकों की... 


राजाओं की बाउली के सामने एक अनजान स्मारक। 

-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-      (MAHRAULI MONUMENTS, RAJAON KI BAWLI, GANDHAK KI BAWLI, STEP WELL ) 

Sunday, July 26, 2020

यहां पर शहीद हुए थे महान वीर बाबा बंदा बहादुर


सिख इतिहास में बंदा बहादुर का नाम स्वर्णाक्षरों में दर्ज है। महरौली में सूफी संत कुतुबद्दीन बख्तियार काकी  की मजार के पास ही गुरुद्वारा बंदा बहादुर स्थित है। इसका निर्माण महान योद्धा बंदा बहादुर की याद में कराया  गया है। इस स्थल का सिख इतिहास में खास महत्व है। बंदा बहादुर यहीं पर 16 जून 1716 को युद्ध लड़ते हुए शहीद हो गए थे। 

राजौरी में हुआ था जन्म -  बंदा बहादुर का जन्म 1670 में कश्मीर के पूंछ जिले में राजौरी के पास गांव में सोढ़ी ( राजपूत ) परिवार में हुआ था। बंदा बहादुर का बचपन का नाम लक्ष्मण देव था। बचपन में उन्होंने शिकार करना और युद्ध करना सीखा था। महज 15 साल की उम्र में उनसे एक हिरणी का शिकार हो गया जिसके बाद वे संत प्रवृति के हो गए। बाद में वे एक बैरागी संत के शरण में आकर माधोदास बैरागी हो गए थे। वे कुछ समय तक पंचवटी नासिक में भी रहे और योग ध्यान की शिक्षा ग्रहण की। इसके बाद वे नांदेड़ चले गए और यहां गोदावरी तट पर एक आश्रम की स्थापना की।

गुरुगोबिंद सिंह ने सिख धर्म में दीक्षित किया -  माधोदास बैरागी की नांदेड़ में गुरुगोबिंद सिंह जी से मुलाकात हुई। उन्हें नांदेड़ में गुरुगोबिंद सिंह जी ने सिख धर्म में दीक्षित किया और उनका नाम बंदा सिंह बहादुर रखा गया। गुरुजी ने उन्हें पंजाब का भार सौंपा। पंजाब में बंदा बहादुर ने मुगलों के खिलाफ कई युद्ध लड़े। उन्होंने खालसा राज की स्थापना की। बंदा बहादुर ने गुरुनानक देव जी और गुरुगोबिंद सिंह जी के नाम का सिक्का भी चलाया। उन्होंने शासन में कई सुधार किए। जमींदारी प्रथा समाप्त कर छोटे किसानों को दासता से मुक्त कराया। 

दिल्ली के महरौली में शहादत -  बाबा बंदा बहादुर को 1716 में छोटी सी फौज के साथ दिल्ली लाया गया। पहले उनकी फौज के लोगों को और बाद में 16 जून को महरौली में कुतुबद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह के पास उनकी बेरहमी से हत्या कर दी गई।  उन पर इस्लाम कबूल करने के दबाव था। पर उन्होंने दो विकल्पों में से मौत को चुना।  

प्रोफेसर हरबंश सिंह लिखते हैं कि बाबा बंदा बहादुर के अंतिम दौर की संघर्ष की कहानी बहुत ही दर्दनाक है। दिल्ली आने से पहले पंजाब में धारीवाल (गुरदासपुर) के पास गुरुदास नंगल में आठ महीने तक वे मुगलों की सेना अन्न जल के अभाव के बीच लड़ते रहे थे। गढ़ी गुरदास नंगल में भी उनकी याद में बाबा बंदा सिंह बहादुर गुरुद्वारा बना हुआ है।

सिख इतिहास में बंदा बहादुर का बड़ा सम्मान है। दिल्ली में उनके नाम पर कई स्मृतियां हैं। दिल्ली के बारापुला एलिवेटेड रोड का नाम भी बंदा बहादुर के नाम पर रखा गया है। पंजाब सरकार के प्रयास से दिल्ली के मंडी हाउस के पास उनकी एक विशाल प्रतिमा भी लगाई गई है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-        ( MAHRAULI, SHAHEED BANDA BAHADUR GURUDWAR, SAHEEDI STHAL )

Friday, July 24, 2020

सूफी संत कुतुबद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह पर

दक्षिण दिल्ली के महरौली में बस स्टैंड के पास से रास्ता पूछते हुए गलियों में प्रवेश करें। सूफी संत कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी चिश्ती परंपरा के संत थे। वे हजरत निजामुद्दीन औलिया से भी पहले हुए थे। उनका जन्म  1173 में हुआ था। उनका निधन 1235 में हुआ। चिश्ती परंपरा के वे महान संत और विद्वान थे। वे ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती के शिष्य और उनके अध्यात्मिक उत्तराधिकारी माने जाते हैं। उनके बारे में माना जाता है कि उन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप में चिश्ती तरीके की नींव रखी।

सूफी संत कुतुबद्दीन बख्तियार काकी के सबसे प्रसिद्ध शिष्य और आध्यात्मिक उत्तराधिकारी फरीदुद्दीन गंजशकर थे। उनके शिष्य हजरत निजामुद्दीन औलिया हुए। तो इस तरह चलती है सूफी संतों की परंपरा। मजार के द्वार पर एक शेर लिखा है -
इश्क के खंजर से मरते हैं अमीनुद्दीन जो। 
जिंदा रहते हैं हमेशा मिस्ले कुतुबद्दीन वो। 



चिश्ती परंपरा को दिल्ली पहुंचाया -  कुतुबद्दीन बख्तियार काकी से पहले भारत में चिश्ती तरीका राजस्थान के अजमेर और नागौर शहर तक ही सीमित था। कुतुबद्दीन बख्तियार काकी ने दिल्ली में चिश्ती परंपरा को स्थापित करने में एक प्रमुख भूमिका निभाई। मेहरौली में उनकी दरगाह दिल्ली की सबसे प्राचीन दरगाहों में से एक हैं। उनकी मजार पर हर साल  विशाल उर्स का आयोजन होता है। यह रबी-उल-अव्वल की चौदहवीं तारीख को मनाया जाता है। तब यहां देश भर से लाखों लोग पहुंचते हैं। 

शेरशाह ने बनवाया भव्य प्रवेश द्वार -  महान शासक सासाराम के शेरशाह सूरी ने संत की मजार के पास एक भव्य प्रवेश द्वार बनवाया था। जबकि बहादुर शाह प्रथम ने यहां मोती मस्जिद का निर्माण कराया। मोती मस्जिद में सुंदर नक्काशी देखी जा सकती है। इस मजार पर सभी धर्म के लोग चाहे वे हिंदू मुस्लिमसिख और ईसाई क्यों न हों मत्था टेकने पहुंचते हैं। खास तौर पर हर गुरुवार को यहां जायरीनों की भीड़ ज्यादा देखने को मिलती है। लोग मजार पर सुर्ख गुलाब के फूल चढ़ाते हैं।

कुतुबद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह पर सालों भर अकीदतमंदों की भीड़ उमड़ती है। यहां पर आपको रोज ही मेले जैसा माहौल नजर आएगा। दरगाह की ओर जाने वाली गली में दोनो तरफ दुकानें सजी हुई नजर आती हैं। न सिर्फ देश के कोने कोने से बल्कि दुनिया के कई मुल्कों से जायरीन यहां पर इबादत करने के लिए पहुंचते हैं। 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-        ( MAHRAULI, SUFI SANT KUTUBDIN BAKHTIYAR KAKI, URS, GREAT SAINT)

Wednesday, July 22, 2020

महाभारत कालीन है महरौली का योगमाया मंदिर


आम तौर पर लोग दक्षिण दिल्ली के महरौली में कुतुबमीनार घूमने जाते हैं। पर इस महरौली में कई ऐतिहासिक महत्व के स्मारक स्थित हैं। ये स्मारक कुतुब मीनार के आसपास ही स्थित हैं। इन स्मारकों में योगमाया मंदिर, सूफी संत की मजार, भूल भुलैया, राजाओं की बावली, जहाज महल आदि प्रसिद्ध है। तो सबसे पहले बात योगमाया मंदिर की। 

कृष्ण की बहन थीं योगमाया  - जब आप कुतुब मीनार से पीछे पहुंचते हैं तो यहां पर महरौली का डीटीसी बस स्टैंड है। इसी बस स्टैंड से थोड़ा पहले दाहिनी तरफ की गली में प्रसिद्ध योगमाया मंदिर है। यह दिल्ली का एक प्राचीन हिंदू मंदिर है। यह मंदिर भगवान कृष्ण की बहन योगमाया को समर्पित है। मान्यता है कि इस मंदिर का निर्माण स्वंय कृष्ण ने किया था। वहीं एक मान्यता है इस मंदिर निर्माण महाभारत के युद्ध के बाद युधिष्ठिर ने किया था। 

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, देवी देवकी के सातवें गर्भ को योगमाया ने ही संकर्षण कर रोहिणी के गर्भ में पहुंचाया था, जिससे श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलरामजी का जन्म हुआ था। मान्यता है कि योगमाया ने ही श्रीकृष्ण के प्राणों की रक्षा थी।

सिद्ध पीठ है मंदिर -  नागर शैली में बने इस मंदिर को लोग महाभारत कालीन बताते हैं। इसे सिद्ध पीठ माना जाता है। यह ज्ञान पीठ और शक्ति पीठ का संयोजन कहा जाता है। यह शक्ति पीठ कभी किन्हीं कारणों से तंत्र विद्या का केंद्र था। इसलिए इस पीठ को योगपीठ भी कहा गया है। इस मंदिर की दीवारों पर आकर्षक भित्ति चित्र बनाए गए हैं। 

मंदिर के आसपास अवशेष जो खंडहरों मे निकलते हैं, इससे स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि ये खंडहरों मे कभी पृथ्वीराज चौहान का महल रहा होगा। अनंगपाल तालाब में श्रद्धालु स्नान करके योगमाया जी की पूजा अर्चना किया करते थे।



हमले का शिकार हुआ मंदिर - यह मंदिर मुहम्मद गजनवी के आक्रमण के समय नष्ट हो गया था। यह मंदिर दिल्ली के पुराने नगर लालकोट के परिधि में होता था। इसे बाद में राजपूत राजा हेमू ने पुनर्निमाण कराया था। महरौली के इस मंदिर ने दिल्ली को सात बार उजड़ते और बसते हुए देखा है। 

फूलवालों की सैर की शुरुआत होती है यह मंदिर हर साल होने वाले आयोजन फूलों वालों की सैर यानी सैर ए गुल फरोंशा का हिस्सा होता है। गंगा जमुनी तहजीब के प्रतीक इस त्योहार की शुरुआत इसी मंदिर से होती है। इस उत्सव की शुरुआत बहादुर शाह जफर ने की थी। यह आयोजन सैकड़ो साल से हो रहा था पर 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान ये आयोजन रूक गया था। सन 1962 में पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने फूल वालों के सैर की शुरुआत इसी मंदिर से की थी। 

क्रांति की योजना बनी थी -  सन 1857 के क्रांति की योजना भी इस योगमाया मंदिर परिसर में बैठकर बनाई गई थी। साल के दो नवरात्रि के समय मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। इस मंदिर का प्रबंधन आजकल श्री योगमाया मंदिर वेलफेयर मैनेजमेट सोसाइटी देखता है। 
   विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-        ( MAHRAULI, YOGMAYA TEMPLE, DELHI, FOOL WALON KI SAIR )

Monday, July 20, 2020

राष्ट्रीय दलित प्रेरणा स्थल नोएडा – महान संतों से लें प्रेरणा


दिल्ली से सटे नोएडा में एक सुंदर दर्शनीय स्थल बन चुका है। यमुना नदी के किनारे बने विशाल हरे भरे पार्क में बने इस स्थल का नाम है राष्ट्रीय दलित प्रेरणा स्थल। इस पार्क के साथ विशाल हरित उद्यान का निर्माण कराया गया है। हरे भरे पेड़ों के संग टहलना यहां बड़ा सुखकर लगता है।

33 एकड़ में फैला विशाल पार्क - दलित प्रेरणा स्थल का उदघाटन 2011 में 14 अक्तूबर को उत्तर प्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री कुमारी मायावती ने किया था। यह 33 एकड़ जमीन पर फैला हुआ है। पार्क के निर्माण में 685 करोड़ रुपये का खर्च आया था। इस विशाल पार्क में देश के ऐसे महापुरुषों की विशाल मूर्तियां लगाई गई हैं जिन्होंने दलित और पिछड़े समाज के जीवन में प्रकाश लाने के लिए अपने जीवन में बड़े और प्रेरक कार्य किए। इनमें कई ऐसे लोग हैं जिनकी मुख्य धारा में चर्चा भी नहीं होती।

महापुरुषों की मूर्तियां-  दलित प्रेरणा स्थल में आप संत शिरोमणि रविदास, गौतम बुद्ध, संत कबीर, डाक्टर भीमराव आंबेडकर, कांशीराम, मायावती, छत्रपति शाहूजी महाराज, बिरसा मुंडा, ईवी रामास्वामी पेरियार, महात्मा ज्योतिबा फूले और श्रीनारायण गुरु की विशाल प्रतिमाएं देख सकते हैं। हालांकि इसमें कुमारी मायावती प्रतिमा लगाए जाने को लेकर विवाद हुआ था, क्योंकि अभी वे जीवित हैं। पर इस विवाद को छोड़ दें तो यह पार्क काफी विशाल और भव्य बना है। दिल्ली एनसीआर में रहने वालों के लिए ये पार्क के अनुपम देन है। क्योंकि भीड़ भाड़ से भरी, भागती दिल्ली के बीच आपको ये विशाल पार्क ऐसा हरा भरा स्थल प्रदान करता है जहां पर आप प्रदूषण मुक्त वातावरण में वक्त गुजार सकते हैं।

पार्क में जो प्रतिमाएं लगी हैं उनमें श्रीनारायण गुरु का संबध केरल से है। वे एकमात्र दक्षिण भारतीय संत हैं जिसकी प्रतिमा पार्क में लगी है। यहां पर इन महान संतों के बीच तमिल संत तिरुवल्लुर की प्रतिमा की कमी जरूर खलती है। महाराष्ट्र के संत नामदेव और बाबा गदगे की प्रतिमा भी यहां होती तो बेहतर होता। इन प्रतिमाओं के साथ उनके योगदान की भी जानकारी संक्षेप में संगमरर पट्टिका पर अंकित कराई जानी चाहिए।

स्वागत में खड़े 24 हाथी - पार्क में प्रवेश करने पर 24 हाथियों की विशाल प्रतिमा दिखाई देती है। सूंड उठाए ये हाथी स्वागत की मुद्रा में हैं। उनकी ऊंचाई 18 फीट है। साल 2102 के उत्तर प्रदेश चुनाव में इन हाथियों की प्रतिमा को लेकर भी विवाद हुआ था। तब थोड़े समय के लिए इन प्रतिमाओं पर पर्दा कर दिया गया था।

विशाल हरित उद्यान – पार्क में टहलने के लिए काफी लंबा वॉकिंग ट्रैक बना हुआ है। अगर आप पूरा पार्क घूमना चाहते हैं तो आपके पास दो घंटे से ज्यादा का वक्त होना चाहिए। ट्रैक के साथ बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण किया गया है। कई जगह तो ऐसे ट्रैक हैं जहां आपको प्रतीत होता है कि मानो आप किसी सघन वन से गुजर रहे हों। दिल्ली में इस तरह की अनुभूति बहुत कम जगह पर मिलती है।

कैसे पहुंचे - ये पार्क दिल्ली से नोएडा जाने पर डीएनडी फ्लाईओवर के ठीक बाद दाहिनी तरफ स्थित है। पार्क के एक तरफ यमुना नदी बहती है। पार्क की सीमा आगे ओखला बर्ड सेंक्चुरी से जाकर जुड़ जाती है। दलित प्रेरणा स्थल नोएडा के फिल्म सिटी के पास स्थित है। पार्क में कई प्रवेश द्वार हैं। पर आम जन को प्रवेश गेट नंबर पांच से मिलता है। गेट पास पार्किंग की सुविधा उपलब्ध है।
प्रवेश के लिए टिकट - आजकल इसमें प्रवेश के लिए 15 रुपये प्रति व्यक्ति का टिकट लिया जाता है। औसतन हर रोज एक हजार लोग इस पार्क में टिकट लेकर घूमने आते हैं। आंबेदकर जयंती के दिन दर्शकों की संख्या बढ़ जाती है।


खुलने का समय – गर्मियों में सुबह 11 से 6 बजे तक और सर्दियों में पार्क 11 से 5 बजे तक खुला रहता है। हर सोमवार को पार्क बंद रहता है। इसका प्रबंधन उत्तर प्रदेश का उद्यान विभाग देखता है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-        ( RASHTRIA DALIT PRERNA STHAL )

Saturday, July 18, 2020

जम्मू का रघुनाथ मंदिर- सजा है रामजी का दरबार


जम्मू मंदिरों का शहर है। यहां पर कई अत्यंत सुंदर मंदिर हैं। पर जम्मू शहर के बीचों बीच स्थित है रघुनाथ मंदिर। रघुनाथ मतलब रामजी का मंदिर। देश में गिने चुने ही रामजी के मंदिर हैं। इनमें से रघुनाथ मंदिर एक है। इस विशाल मंदिर में रामजी का पूरा दरबार सजा हुआ है। मंदिर अपनी कलात्मकता के लिए प्रसिद्ध है और ये जम्मू शहर की पहचान है। यह एक मंदिर समूह है जिसमें कुल सात मंदिर बनाए गए हैं।

रघुनाथ मंदिर का निर्माण 1857 में जम्मू के पहले डोगरा महाराजा महाराजा गुलाब सिंह द्वारा करवाया गया था। वास्तव में मंदिर का निर्माण 1835 में महाराजा गुलाब सिंह ने शुरू करवाया था। इसे 22 सालों बाद 1857 में उनके पुत्र महाराजा रणबीर सिंह ने पूरा करवाया। कहा जाता है कि इस मंदिर को बनवानेकी प्रेरणा महाराजा गुलाब सिंह को एक संत रामदास बैरागी से मिली थी। वे बड़े राम भक्त संत थे। उनकी प्रेरणा से यहां राम मंदिर का निर्माण कराया गया।

मंदिर के आंतरिक हिस्से में कई जगह सोने का सुंदर काम हुआ है। कहा जाता है कि इस मंदिर में 33 करोड़ देवी देवता वास करते हैं। मंदिर के गर्भ गृह में राम, सीता और लक्ष्मण की विशाल मूर्तियां हैं। मंदिर परिसर में रामायण और महाभारत के प्रमुख पात्रों की भी मूर्तियां स्थापित की गई हैं।

मंदिर परिसर में देश चारों धाम की प्रतिकृति का निर्माण कराया गया है। एक कक्ष में भगवान सत्यनारायण की प्रतिमा स्थापित की गई है। मंदिर की दीवारों पर आकर्षक पेंटिंग भी लगी हैं। इनमें बारहमासा का सुंदर चित्रण भी है।
मंदिर में दूर से पांच कलश नजर आते हैं। विशाल परिसर वाले मंदिर में तीन प्रमुख प्रवेश द्वार हैं। रघुनाथ मंदिर जम्मू में श्री रामनवमी का त्योहार बड़े पैमाने पर मनाया जाता है। जम्मू राजा के शासन काल में तो रामनवमी के दिन यहां छुट्टी कर दी जाती थी। तब शहर में राजा राम की झांकी निकाली जाती थी जिनके साथ सुरक्षाबल की टुकड़ियां चलती थीं।

खुलने का समय – मंदिर श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए सुबह 6 बजे से रात्रि 8.30 बजे तक खुला रहता है। दोपहर में मंदिर कुछ घंटे के लिए बंद भी होता है। साल 2002 में रघुनाथ मंदिर पर बड़ा आंतकवादी हमला हुआ था। तब परिसर में 20 श्रद्धालुओं की मौत हो गई थी। उसके बाद मंदिर की सुरक्षा व्यवस्था काफी कड़ी कर दी गई है। मंदिर परिसर में मोबाइल फोन, कैमरे आदि लेकर जाने की अनुमति नहीं है।

मंदिर परिसर में एक स्कूल और एक पुस्तकालय भी है। इस पुस्तकालय में कई भारतीय भाषाओं की दुर्लभ पांडुलिपियां मौजूद हैं। यहां संस्कृत की शारदा लिपि के कुछ ग्रंथ भी मौजूद हैं।

कैसे पहुंचे – रघुनाथ मंदिर की दूरी जम्मू रेलवे स्टेशन से तकरीबन चार किलोमीटर है। जम्मू के किसी भी हिस्से से यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है। मंदिर परिसर से चारों तरफ सुंदर बाजार है।

शाम को जम्मू पहुंचने के बाद होटल से निकलकर हमलोग सबसे पहले रघुनाथ मंदिर में दर्शन के लिए पहुंचे। पर मुख्य द्वार पर जाकर पता चला कि मंदिर जल्द ही बंद होने वाला है। गेट पर सुरक्षा कक्ष में मोबाइल फोन जमा करके हमलोग शीघ्रता से अंदर पहुंचे। दर्शन करके प्रसाद लेकर वापस लौटे। मैं 1993 में रघुनाथ मंदिर में आ चुका हूं सदभावना रेल यात्रा के दौरान।

दर्शन के बाद हमलोग बाहर निकले और स्थानीय लोगों से सलाह लेकर यात्री वैष्णो भोजनालय में रात्रि भोजन के लिए पहुंचे। यह मंदिर इलाके का स्थानीय लोगों के बीच लोकप्रिय शाकाहारी भोजनालय है।
एक दिन बाद 31 अक्तूबर को जम्मू कश्मीर से पूर्ण राज्य का तमगा हटकर केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा मिला है। लद्दाख नामक नए केंद्र शासित प्रदेश का सृजन हो रहा है। मतलब रात को जब हम सो रहे होंगे जम्मू कश्मीर के इतिहास में नए अध्याय का पृष्ठ पलटा जा रहा होगा। इससे पहले रात में हमलोग जम्मू के रघुनाथ मंदिर के आसपास के बाजार से ड्राई फ्रूट और गर्म सलवार सूट आदि की शॉपिंग करने में लगे थे।



हमारी ट्रेन सुबह 5 बजे जम्मू स्टेशन से है। इसलिए हमने होटल के मैनेजर की मदद से सुबह 4 बजे स्टेशन छोड़ने के लिए एक आटो रिक्शा बुक कर लिया है। आटो वाले ने हमें समय पर स्टेशन पहुंचा दिया। जम्मू रेलवे स्टेशन के पास वैष्णवी धाम, कालिका धाम और सरस्वती धाम तीन विशाल आवासीय कांप्लेक्स माता वैष्णो देवी ट्रस्ट की ओर से बनवाए गए हैं। इनमें भी वैष्णो देवी जाने वाले श्रद्धालु ठहर सकते हैं।




सुबह सुबह जम्मूतवी दुर्ग  एक्सप्रेस ( 12550 ) समय से चल पड़ी।  रास्ते में हर स्टेशन पर ट्रेन समय से पहले पहुंच जा रही थी।  जम्मू से थोड़ा आगे चलते ही पंजाब शुरू हो जाता है। पठानकोट और जालंधर छावनी स्टेशनों पर भी समय से पहले पहुंची। मैं पठानकोट में उतरकर प्लेटफार्म पर भी गया। पंजाब को महसूस कर वापस डिब्बे में आ गया। 

पठानकोट के बाद होशियारपुर फिर जालंधर जिले के गांव शुरू हो जाते हैं। रास्ते में आया एक छोटा सा स्टेशन काला बकरा। किसी जमाने में अमर उजाला में रहते हुए मैं इस गांव में आया था अपने स्थानीय संवाददाता से मिलने के लिए। वे भोगपुर से रिपोर्टिंग करते थे। इसके बाद ट्रेन जालंधर छावनी से गुजरी। दुर्ग एक्सप्रेस ने हमें दोपहर दो बजे के आसपास दिल्ली से सफदरजंग रेलवे स्टेशन पर उतार दिया। स्टेशन का मुख्य द्वार फूलों से सजा  हुआ था। एक बार फिर दिल्ली हमारा स्वागत कर रही थी।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-        ( JAMMU, RAHUNATH MANDIR, RAM TEMPLE, RAGHUNATH MARKET, JAMMU TAWI DURG EXP. )

Thursday, July 16, 2020

दूध से बनती है कलारी – जम्मू क्षेत्र का खास व्यंजन


सानासर लेक से हमलोग वापसी की राह पर चल पड़े हैं। वापसी में वही नत्था टॉप वाला रास्ता है। पटनी टॉप से आगे बढ़ने पर एक बार फिर हमारे चालक बिट्टू शर्मा जी के बेटे का होटल आया। वहां रुक कर उन्होंने बेटे का हाल चाल लिया और आगे चल पड़े। हमलोग वापसी में पहाड़ से मक्की का आटा खरीदना चाहते थे पर रास्ते में कोई चक्की खुली हुई नहीं मिली तो आटा नहीं ले सके। चेनानी के बाद एक फिर हमलोग समरोली में उसी तवी व्यू होटल में शाम के नास्ते के लिए रुक गए। इस बार हमने कलारी आर्डर किया। अब बात कलारी की...

जम्मू क्षेत्र का खास व्यंजन है कलारी।  कलारी का स्वाद दिन में पटनी टॉप के पास नाग मंदिर के पास भी हम ले चुके थे। दूर से देखने में यहां यह ब्रेड ऑमलेट जैसी नजर आती है। पर यह खालिस दूध से बनने वाला व्यंजन है।
तो आइए और जानते हैं कलारी के बारे में। कलारी बनाने के लिए दूध से निकाले गए मावा (खोया) को छोटी छोटी पूड़ियों के आकार का गढ़ लिया जाता है। फिर से दो से तीन दिनों तक सुखाया जाता है। इस सूखी हुई कलारी को को दुकानदार आर्डर मिलने पर तवे पर गर्म करते हैं। 


इसे ब्रेड की तरह काट दिया जाता है। इसके उपर नमकीन मसाले का छिड़काव किया जाता है। इस कलारी को धनिया पुदीना की चटनी के साथ खाया जाता है। जाते समय एक परिवार को जब मैंने कलारी खाते हुए देखा तो मुझे लगा कि वे ब्रेड आमलेट खा रहे हैं। पर बाद में मुझे इसकी असलियत पता चली।
फिर हमने सुबह में नाग मंदिर के पास एक दुकान में कलारी का स्वाद लिया। यह इतनी भा गई हमें कि वापसी शाम को तवी व्यू होटल में एक बार फिर कलारी आर्डर किया। 

ये कलारी से जम्मू से श्रीनगर मार्ग पर उधमपुर तक ही मिलती है। ये जम्मू क्षेत्र का व्यंजन है। कश्मीर घाटी में लोग इसे नहीं बनाते। आप भी कभी जम्मू हाईवे से श्रीनगर की ओर जाएं तो इस व्यंजन का स्वाद लें।

हाजी मुसलिम स्वीट शॉप -  वैसे तो जम्मू क्षेत्र हिंदू बहुल इलाका है। पर इस मार्ग पर कई मुस्लिम भाइयों की मिठाई की भी दुकानें हैं। मुझे रास्ते में पाकीजा स्वीट्स, जायका स्वीट्स, हाजी मुस्लिम स्वीट शॉप जैसी कई मिठाई की दुकानें दिखाई दे रही हैं जिसे मुस्लिम भाई लोग चलाते हैं।

अंधेरा होने लगा है। हमलोग ऊधमपुर से श्रीनगर मार्ग पर बढ़ रहे हैं। अब ये सड़क फोर लेन हो गई। रास्ते में एक सुरंग आई। थोड़ी देर में हमलोग जम्मू शहर की सीमा में प्रवेश कर चुके हैं। रात को हमें जाकर जिस होटल में रुकना है उसका नाम रघुनाथ होटल है। यह होटल रघुनाथ मंदिर के ही पास है।

हमने चालक महोदय की होटल के मैनेजर से बात करा दी ताकि वे हमें होटल तक सुगमता से छोड सकें। मंदिर के पास होटल गली में है। होटल का एक स्टाफ सड़क पर आया और उसने हमारा सामान होटल तक पहुंचाने में मदद की। रघुनाथ होटल भले ही गली में है पर उसका रिसेप्शन साफ सुथरा और आकर्षक है। हमें जो कमरा आवंटित किया गया वह भी करीने से सजा हुआ है। यहां पर कमरे में तेज वाईफाई उपलब्ध है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com         

( KALARI, MADE FROM MILK, JAMMU, DISH, HOTEL RAGHUNATH )