Wednesday, June 17, 2020

रुद्रप्रयाग-अलकनंदा और मंदाकिनी का मिलन - ज्ञान और भक्ति का संगम

रुद्र प्रयाग मतलब उत्तराखंड की दो नदियों अलकनंदा और मंदाकिनी का संगम। मंदाकनी नदी एकमात्र ऐसी नदी है जो अलकनंदा में दाहिनी तरफ से आकर मिलती है। वहीं मंदाकिनी अलकनंदा की सबसे बड़ी सहायक नदी भी है। यह केदारनाथ के पास मंदरांचल पर्वत श्रेणी से निकलती है। यह एक चपल नदी मानी जाती है।

अलकनंदा ज्ञान का प्रतीक मंदाकिनी भक्ति का हमलोगों ने रात आठ बजे अपने होटल वाले से संगम का रास्ता पूछा। उसने बताया एक किलोमीटर है। हमलोग चल पड़े संगम की तरफ। उसने कहा जल्दी लौट आइएगा। रात को साढ़े नौ बजे तक ही खाना मिल सकेगा। हमने बाजार में चलते हुए पहले अलकनंदा नदी का पुल पार किया। फिर बायीं तरफ चलते हुए संगम के रास्ते पर चल पड़े। काफी सीढियां उतरने के बाद हमलोग अलकनंदा और मंदाकिनी के संगम पर हैं। यहां लगे एक साइनबोर्ड पर बताया गया है कि अलकनंदा ज्ञान का प्रतीक है तो मंदाकिनी भक्ति का।



हम देख पा रहे हैं कि अलकनंदा यहां पर बड़े शांत भाव से बह रही है। ठीक वैसे ही जैसी ज्ञानी पुरुष शांत होता है। पर मंदाकिनी बड़े उत्साह से उछलती हुई आकर अलकनंदा में समाहित हो रही है। दोनों के संगम पर सुंदर सा छोटा सा घाट बना है। यहां पर अलकनंदा का एक मंदिर भी बना हुआ है। रात के अंधेरे में नदी के जलधारा की आवाज काफी तीव्र है। कुछ और सैलानी यहां पर मौजूद हैं।

अलकनंदा की बहु के रूप में पूजा - उत्तराखंड के लोग अलकनंदा को बहु के रुप में पूजते हैं तो मां गंगा को सास के रुप में। राज्य के लोककथाओं इनकी कहानियां आती हैं। रात के अंधेरे में भी दोनों नदियों के संगम को देखना अत्यंत सुखकर है। यहां से जाने की इच्छा नहीं हो रही है। पर ज्यादा देर की तो रात का भोजन नहीं मिलेगा। इसलिए वापसी के लिए चलना ही पड़ा।



नारद शिला और रुद्रावतार हमें अलकनंदा और मंदाकिनी के तट पर नारद शिला दिखाई देती है। बताया गया है कि नारद मुनि ने यहीं पर कठोर तप किया था। इस तप से उन्हें संगीत की तमाम विधाओं का ज्ञान मिला था। आपने देखा होगा कि नारद के हाथों में हमेशा वीणा होती है। वे संगीत के मर्मज्ञ हैं। नारद को रुद्रावतार भी माना जाता है। संगम से उपर की सीढ़ियां चढ़ने पर यहां पर रुद्रावतार नारद का एक मंदिर भी है। लोग इस मंदिर में श्रद्धा से शीश झुकाने पहुंचते हैं।



सेना का बड़ा केंद्र - रुद्र प्रयाग में भारतीय सेना का बड़ा केंद्र है। यहां पर हमें कैंटोनमेंट एरिया और सेना की कैंटीन दिखाई देती है। आते जाते हुए बस से हमें चिनार कैंटीन का बोर्ड नजर आता है। उत्तराखंड से चीन की सीमा करीब है। हमारे सेना के जवान इन सीमाओं पर मुस्तैद रहते हैं। वैसे तो भारत और चीन के बीच आईटीबीपी के जवानों की तैनाती होती है, पर सेना उन्हें पीछे से समर्थन देने के लिए तैयार रहती है।

मड़ुआ का आटा और बिस्कुट रुद्र प्रयाग की सड़कों पर चलते हुए हमें शाम को हिलांस का शोरुम नजर आता है। यह राज्य के स्थानीय उत्पादों की बिक्री और प्रदर्शन का का केंद्र है। रुद्रप्रयाग जिले में सहकारिता के तहत निर्मित या उत्पादित होने वाली वस्तुएं यहां बिकती हैं। 

इस स्टोर में किसानों के उत्पाद सीधे तौर पर बिक्री के लिए उपलब्ध हैं। हमने जानना चाहा कि इनका दिल्ली में कोई स्टोर है तो पता चला कि नहीं है। तो हमने यहां से कुछ खरीदने का तय किया। यहां कई किस्म के अचार और दालों के पैकेट मिल रहे हैं। हमने यहां पर मड़ुआ यानी रागी का आटा खरीदा। आधा किलो का पैकेट 15 रुपये में। मतलब 30 रुपये किलो।

हमारे साथी अमित बता रहे हैं कि दिल्ली में मॉल में तो मड़ुआ का आटा 80 रुपये किलो बिक रहा है। बात सही है मैंने ऑनलाइन चेक किया तो रागी यानी मडुवा का आटा 65 रुपये का आधा किलो बिक रहा है। यहां पर रागी के बने बिस्कुट भी हैं 25 रुपये में। इसके अलावा कुल्थी का दाल समेत कई तरह की दालें मिल रही हैं। इस स्टोर में हस्तशिल्प के उत्पादों में रंग बिरंगी टोकरियां भी बिक रही हैं। कई किस्म के फलों से निर्मित उत्पाद भी यहां मिल रहे हैं। अपनी पसंद की चीजें खरीदने के बाद हमलोग होटल वापस आ गए। 


रात का डिनर अमित लॉज एंड रेस्टुरेंट में ही हुआ। मैंने आर्डर दिया मिक्स वेज तो अमित ने पनीर बटर मसाला थोड़ा स्पाइसी। मैं सफर में पनीर खाना पसंद नहीं करता। जितनी ज्यादा हरी सब्जियां मिल जाएं उतना ही अच्छा है। रुद्र प्रयाग के होटल के कमरे मे पंखे लगे हैं मतलब यहां गर्मी पड़ती है। रात दस बजे के बाद सड़क पर वाहनों की चिल-पों खत्म हो चुकी है। तो हमें अच्छी नींद आ गई।     (आगे पढ़िए - धारी देवी का मंदिर और श्रीनगर शहर )   


चर्चा में दानापानी ब्लॉग -
मेरा एक छात्र विद्युत प्रकाश मौर्य पर्यटन पर ब्लॉग लिखता है। भारत के लगभग हर राज्य में जा चुका है। सैकड़ों  (हजारों) ब्लॉग पोस्ट उसने अब तक लिख दिए हैं। हर नए शहर में जाते ही सबसे पहले शाकाहारी भोजन का बोर्ड ढूंढता है। गोवा में मसाला डोसा कहां मिलेगा। भूटान में शाकाहारियों के भोजन की समस्या कैसे सुलझाएं ? यह सब प्रश्न वह हल कर चुका है। मेरे जैसे कट्टर शाकाहारी को बांग्लादेश गया तो इन प्रश्नों के उत्तर पहले ढूंढने होंगे। क्या खाऊंगा? कहां खाऊंगा ? मेरी डॉक्टर बरुआ इस मामले में मदद कर सकते हैं।
( डॉक्टर रामजीलाल जांगिड के शीघ्र प्रकाश्य संस्मरण की एक कड़ी , डॉक्टर जांगिड भारतीय जन संचार संस्थान, नई दिल्ली में हिंदी पत्रकारिता विभाग के संस्थापक अध्यक्ष रहे )



-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-        ( RUDRA PRAYAG, ALAKNANDA AND MANDAKINI SANGAM, RUDRANATH, NARAD,  MADUA, RAGI, KEDAR -24 )
लहरों का संगीत - रात्रि में अलकनंदा और मंदाकिनी के संगम पर। 


4 comments:

  1. चित्रमय यात्रावृतांत से बहुत जानकारी मिली। गंगा और अलकनंदा के बीच सास-बहु के संबंध के बारे में पहली बार पता चला। बहुत अच्छा लेखन।

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    1. धन्यवाद, मुझे भी वहां स्थानीय लोगों से पता चला

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