Friday, June 12, 2020

चोपता : जिंदगी है बहार फूलों की


तुंगनाथ मंदिर परिसर में हमलोग तकरीबन दो घंटे रहे। दोपहर में धूप नहीं है और आसपास में बादल चहलकदमी कर रहे हैं। मंदिर के आसपास गहरी वादियों में बादलों ने डेरा जमा रखा है। हमलोग यहां से घाटियों का नजारा कर रहे हैं। मंदिर के आसपास का वातावरण इतना मोहक बना हुआ है कि यहां लौटने की इच्छा नहीं हो रही है।


इसी बीच तुंगनाथ में चेन्नई के मनोज चक्रवर्ती और उनके परिवार के सदस्यों का आना होता है। वही मनोज जो हमें केदारनाथ के दर्शन के समय पंक्ति में मिले थे। उनके परिवार के साथ मिलकर हम काफी खुश होते हैं। थोड़ी देर बातचीत के बाद उनसे विदा लेते हैं। पहाड़ों पर चढ़ाई की तुलना में उतरने में ज्यादा वक्त नहीं लगता। 

तुंगनाथ तक आने वाले लोगों में से काफी लोग चंद्रशिला तक भी जाते हैं। मंदिर से चंद्रशिला की दूरी एक किलोमीटर है। पर हमलोग इस यात्रा में चंद्रशिला तक जाने का इरादा नहीं रखते। काफी लोग चंद्रशिला से सूर्योदय का नजारा देखते हैं। इसके लिए कई लोग तुंगनाथ मंदिर के पास आकर रात को रुक जाते हैं। यहां से मुंह अंधेरे ट्रैक कर चंद्रशिला पहुंचते हैं।
अब हमलोग वापस लौटना चाहते हैं। पर वापसी से पहले थोड़ी पेट पूजा। हमलोगों ने मंदिर के पास ही एक दुकान में पराठे बनवाए। एक पराठा 40 रुपये का। दुकानदार ने बड़े दिल से पराठे बनाए। नास्ता करने के बाद हमने वापसी की राह पकड़ ली है।



चोपता में तुंगनाथ मंदिर के पास ही चढ़ाई करते समय बायीं तरफ हाई एल्टीट्यूड रिसर्च सेंटर की स्थापना की गई है। यह उत्तराखंड के हेमवती नंदन बहुगुणा विश्वविद्यालय, श्रीनगर की एक शोध इकाई है। 3800 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस शोध केंद्र में हिमालय के ऊंचे क्षेत्र में उगने वाले पौधों पर शोध कार्य किया जाता है। ऐसे शोध केंद्र बड़ा महत्व रखते हैं। 

इस केंद्र का नाम एल्पाइन शोध स्टेशन, तुंगनाथ है। यह हाई एल्टीट्यूट प्लांट फिजियोलॉजी रिसर्च सेंटर है। यह शोध केंद्र 3500 मीटर की ऊंचाई पर बना हुआ है। वैज्ञानिक यहां पर पहाड़ों पर उगने वाले पौधे के बारे में शोध करते हैं। खासतौर पर इन पौधों के औषधीय गुणों के बारे में शोध किया जाता है। पहाड़ पर ऊंचाई पर उगने वाले कई पौधे मानव जीवन के लिए काफी उपयोगी हैं। इस पर सीएसआईआर भी कई जगह शोध कर रहा है। 

तुंगनाथ - ऊंचाई पर बुरांश और दूसरे रंग बिरंगे फूल
तुंगनाथ के रास्ते में आते जाते हुए कई तरह के पहाड़ी फूल नजर आते हैं। कुछ पीले रंग के तो कुछ बैंगनी रंग के फूल खिले हैं। इन पहाड़ों पर जुलाई, अगस्त और सितंबर महीने मे अलग अलग तरह के फूल खिलते हैं। हालांकि इन फूलों में ज्यादा खुशबू नहीं है पर इनकी सुंदर मन को लुभाती है। रास्ते में कई जगह बुरांश के पौधे भी दिखाई दे रहे हैं। स्थानीय दुकानदार यहां से बुरांश का जूस निकालकर बेचते भी नजर आ रहे हैं।

गड़ेरिया बोला अब ऊन का बाजार नहीं - वापसी में  मैं कई जगह पत्थर के बने ट्रैकिंग वाले पक्के रास्ते की जगह बुग्यालों से होकर छोटे रास्ते का चयन करके तेजी उतरने लगा। इसी रास्ते में मेरी मुलाकात भेड़ चराते हुए एक गड़ेरिए से हुई। मैं थोड़ी देर बैठकर उनसे बातें करने लगा। वे बताने लगे कि उनके पास करीब 200 भेड़ हैं। इन्हें चराते हुए वे 20 किलोमीटर दूर तक भी निकल जाते हैं। क्या ये भेड़े ऊन देती हैं। हां, साल में तीन बार। हर चार महीने पर वे इन भेड़ों के बाल काटकर वे ऊन निकालते हैं। पर वे बताते हैं कि अब ऊन की कीमत पहले जैसी नहीं मिल रही है।








आजकल ऊन का बाजार कम हो रहा है। शायद ये फैक्ट्रियों में बनने वाले कृत्रिम ऊन के कारण ही ऐसा हो रहा होगा। गड़ेरिया भाई इस बात से दुखी हैं कि भेड़ पालना अब लाभकारी धंधा नहीं रहा। मुझे गड़ेरिये से मिलकर बचपन में पढ़ी कविता याद आ गई - बा बा ब्लैक शीप, हैव यू एनी वूल...यस सर यस सर, थ्री बैग्स फुल, पर अब इन बैग के कद्रदान नहीं रहे।



मैं जब उतर रहा हूं तो भी तुंगनाथ के दर्शन के लिए कुछ श्रद्धालु चढ़ते हुए मिल रहे हैं। हालांकि तुंगनाथ में कभी ज्यादा भीड़ नहीं होती। इसलिए रास्ता मनोरम बना रहता है। पर रास्ते में कई जगह यह देखकर दुख हो रहा है कि ट्रैक पर आने वाले श्रद्धालु पहाड़ों पर प्लास्टिक कचरा फैला रहे हैं। कई गड्ढे तो प्लास्टिक की बोतलों से पटे पड़े हैं। आने वाले दिनों में हमें इन पहाड़ों पर इस कचरे की सफाई का अभियान भी चलाना पड़ेगा। वन विभाग ने प्लास्टिक फ्री जोन के बोर्ड लगा रखे हैं, पर उसका लोगों पर कोई असर होता नहीं दिखाई देता।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य  - vidyutp@gmail.com 
( TUNGNATH TO CHOPTA RETURN, HNB UNIVERSITY, HIGH ALTITUDE RESEARCH CENTRE, KEDAR-21) 

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