Tuesday, June 30, 2020

मनमोहक, मनभावन तवी नदी के संग-संग


हमलोग कटरा से उधमपुर की राह पर हैं। कटरा से बाहर कोई दस किलोमीटर जाने पर हमें ककड़ियाल में श्रीमाता वैष्णो देवी यूनिवर्सिटी का परिसर नजर आया। ये विश्वविद्यालय श्रीमाता वैष्णो देवी ट्रस्ट ने बनवाया है। यहां कई विधाओं में पढ़ाई शुरू हो चुकी है। कुछ ही सालों में विश्विवद्यालय ने अच्छी रैंकिंग हासिल की है।  

कटरा शहर से कुछ किलोमीटर आगे निकलने पर सड़क के किनारे दाहिनी तरफ शनि देव का विशाल मंदिर आया। स्थानीय लोगों की इस मंदिर में बड़ी आस्था है। वैसे शनि के कोप से हर कोई डरता है। शनि गरीबों, दलितों और पीड़ितों पर अपनी कृपा बरसाते हैं। हमने यहां पर रुक कर उन्हें प्रणाम किया और आगे की ओर बढ़ चले।

थोड़ी देर बाद टिकरी आया। टिकरी वह जगह हैं जहां पर हमें जम्मू श्रीनगर हाईवे मिला। हमलोग बायीं तरफ यानी उधमपुर की तरफ चलने लगे। अगर दाहिनी तरफ जाएंगे तो जम्मू पहुंच जाएंगे। मतलब जम्मू से कटरा अगर सड़क मार्ग से आना हो तो उधमपुर नहीं आएगा। पर रेल मार्ग उधमपुर होकर आती है। यहां से श्रीनगर की दूरी 220 किलोमीटर लिखी है। आगे बालियां नामक ग्राम आया। थोड़ी देर बाद हमलोग उधमपुर शहर पहुंच गए हैं। हाईवे ऊधमपुर शहर के बाहरी इलाके से होकर गुजर जाता है। हमने अब उधमपुर शहर को पार कर लिया है। 

उधमपुर का रेलवे स्टेशन उधमपुर शहर से बाहर बना हुआ है। रेलवे स्टेशन और शहर के बीच में श्रीनगर की ओर जाने वाला नेशनल हाईवे नंबर 44 गुजर रहा है। इसके बायीं तरफ शहर है तो दाहिनी तरफ रेलवे स्टेशन अगर आप रेल से देर रात या अहले सुबह उधमपुर रेलवे स्टेशन उतरते हैं तो कहीं जाने के लिए साधन मिलने में अभी थोड़ी दिक्कत हो सकती है। 

माधवी के आग्रह पर हमारे ड्राईवर साहब बिट्टू शर्मा जी गाड़ी बहुत ही धीमी गति से संयत से चला रहे हैं। जम्मू श्रीनगर हाईवे को चौड़ा करने का काम जगह जगह जारी है। इसलिए कई जगह सड़क पर काम चलता हुआ नजर आ रहा है। तो कई जगह धूल उड़ रही है तो वाहन सावधानी से चलाना और जरूरी हो जाता है।

सूर्य की पुत्री है तवी -  उधमपुर के आगे चलने पर हमें हाईवे के साथ साथ तवी नदी बहती हुई दिखाई दे रही है। एक जगह मैं बिट्टू शर्मा जी से आग्रह करता हूं टैक्सी रोकने के लिए। तवी को काफी निकट से देखने की इच्छा है। मैं उतर कर चला जाता हूं तवी नदी की जलधारा के काफी करीब। चांदी जैसा धवल जल है तवी का। बीच में ढेर सारे पत्थर हैं। इन शिलाओं के संग सतत प्रणय संवाद करती हुई तवी मदमाती हुई आगे बढ़ती जाती है। इन शिलाओं ने भी क्या किस्मत पाई है। मैं देख रहा हूं कि थकी होने के बावजूद पीछे पीछे माधवी भी चली आ रही हैं। तवी का प्यार उन्हें भी बुला लेता है। तवी नदी जम्मू क्षेत्र की जीवन रेखा मानी जाती है। यह चिनाब की सहायक नदी है। 

तवी का उदगम डोडा जिले में भद्रवाह के पास कैलाश कुंड के आसपास से हुआ है। तवी नदी के उदगम से पहले शुद्ध महादेव का मंदिर है, जो इस इलाके का प्रमुख तीर्थ है। तवी नदी को सूर्य की पुत्री माना जाता है। इसकी कुल लंबाई मात्र141 किलोमीटर है। जम्मू शहर भी तवी नदी के तट पर बसा हुआ है। आगे पाकिस्तान में जाकर तवी चिनाब में समाहित होकर अपना अस्तित्व मिटा देती है। नदियों की यही नियती है। ईश्क में फना हो जाना। 

रास्ते में कई छोटे छोटे झरने तवी नदी में समाहित होते रहते हैं। थोड़ी दूर आगे चलने पर हमलोग शाम के नास्ते के लिए एक होटल में रुके। इस होटल का नाम भी है तवी व्यू। यह समरोली नामक एक छोटे से गांव में है। हमारे टैक्सी वाले को सामान का एक पैकेट यहां पर किसी दुकानदार को देना था। पर वह दुकान आज बंद है तो उन्होंने पड़ोस के दुकान को ये पैकेट पकड़ा दिया है।

होटल के पृष्ठ भाग से तवी नदी का सुंदर नजारा दिखाई दे रहा है। तवी नदी हाईवे के साथ ही चल रही है। नदी की गहराई ज्यादा नहीं है। आप कहीं भी नदी के अंदर उतर सकते हैं। अनादि को ये जगह काफी पसंद आई और वे नदी के उस पार के नजारों की तस्वीरें उतारने में व्यस्त हो गए। तवी नदी का नजारा करते हुए हमलोग पराठे के संग चाय की चुस्की ले रहे हैं।  हमारा सफर अभी जारी है।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com

 ( TAWI RIVER, KATRA TO UDHAMPUR, SAMROLI, HOTEL TAWI VIEW )
 आगे पढ़िए - देश की सबसे लंबी सुरंग - चेनानी नाशरी टनेल 


Sunday, June 28, 2020

कटरा से पटनी टॉप - स्वप्नलोक का सफर


माता वैष्णो देवी की अनवरत चढ़ाई और दर्शन के बाद लगातार सफर करके उतर आने के बाद हम सब थक चुके थे। थकते भी भला क्यों नहीं हमने 17 घंटे में चढ़ना उतरना जिसमें भैरोनाथ की यात्रा भी शामिल है, रास्ता नाप लिया था। दोनों ने इस यात्रा में खूब उत्साह दिखाया था। तो माधवी और अनादि तो होटल में आते ही सो गए।

हमारा होटल में चेकआउट का समय दोपहर 12 बजे का है। हालांकि होटल वाले ने कहा है कि वह एक घंटे की रियायत भी दे देगा। पर मैंने माधवी वंश को कहा कि हम अब आगे यहां से पटनी टॉप जाने वाले हैं। यह सुनकर उन्हें थोड़ी कोफ्त हुई, क्योंकि वे आराम करके यात्रा की थकान मिटाना चाहती थीं। पर हमने उन्हें ज्यादा सोने का मौका नहीं दिया। दोपहर एक बजे तक हमें अगले सफर के लिए तैयार होना पड़ा।

हमने पटनी टॉप जाने के लिए एक टैक्सी बुक कर ली है। हमारे मित्र प्रमोद कुमार तिवारी पहले पटनी टॉप जा चुके हैं। उनके अनुभव के आधार पर टैक्सी बुक करके जाने की योजना बनी। मैंने कटरा से अमर उजाला नोएडा में कार्यरत प्रमोद तिवारी को फोन किया। उन्होंने एक टैक्सी वाले का नंबर दिया। फिर हमने अपने होटल के प्रोपराइटर को फोन किया, जहां हम जाकर ठहरने वाले हैं। दोनों ने टैक्सी की दरें एक सी ही बताईं।


फिर हमने पटनी टॉप के लिए टैक्सी उसी होटल के प्रोपराइटर से बुक की जिनका होटल हमने पटनी टॉप में बुक किया है। ये होटल हमने गोआईबीबो डॉट काम से बुक किया है। होटल के प्रोपराइटर का नाम रंजीत ठाकुर है। पता चला कि वे स्थायी तौर पर कटरा में ही रहते हैं। यहां पर उनके दो होटल हैं और ट्रैवेल टूर ऑपरेटर का भी काम करते हैं। वे इंडिका एसी टैक्सी लेकर हमारे होटल आए और हमारा परिचय ड्राईवर से करा दिया। 


टैक्सी ड्राईवर महोदय का नाम बिट्टू शर्मा है। (मोबाइल – 94196-09095 ) वे काफी अनुभवी हैं। उनका हमारा दो दो दिन का साथ रहा। ये तय हुआ कि वे आज हमें पटनी टॉप के होटल छोड़ देंगे। अगले दिन पटनी टॉप और आसपास घुमाने के बाद रात तक जम्मू शहर में छोड देंगे। इस पूरे पैकेज के हमें उन्हें 4500 रुपये देने हैं। बिट्टू शर्मा जी के साथ हमारा सफर यादगार रहा। 

बिट्टू शर्मा रास्ते के काफी जानकार होने के साथ बड़े संयमित ढंग से टैक्सी चला रहे हैं। वर्ना पहाड़ों पर आपको अच्छे चालक न मिलें तो लोगों को चक्कर आने लगते हैं। दोपहर में हमलोग कटरा शहर से बाहर निकल रहे हैं। लंच नहीं कर सके हैं तो चलते-चलते हमने एक बार फिर हमने कटरा के कुलचे खाए। यहां के कुलचों का स्वाद निराला है। खाने के साथ रास्ते के लिए कुलचे पैक कराकर भी रख लिए। कटरा से हमलोग उधमपुर के मार्ग पर चल निकले हैं। तो आगे के सफर की बातें अगली कड़ी में। 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
( KATRA TO UDHAMPUR,TAXI, KULCHA OF KATRA)

Friday, June 26, 2020

वैष्णो माता ने किया था भैरोनाथ का वध


माता के दर्शन के बाद बाहर आने पर हमने रात के 10 बजे एक रेस्टोरेंट में रात्रि भोजन किया। इसके बाद लगेज बॉक्स से अपना सामान निकाला। माधवी और वंश ने कहा कि अब हमलोग भैरोनाथ चलेंगे। सारे श्रद्धालु तो नहीं पर काफी लोग माता के दर्शन के बाद भैरोनाथ भी जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि भैरो के दर्शन के बाद ही यात्रा पूरी होती है। भैरो घाटी की ऊंचाई सांझी छत और भवन से ज्यादा है। भैरोनाथ का मंदिर 6600 फीट की ऊंचाई पर है जबकि माता का मंदिर समुद्र तल से 5200 फीट की ऊंचाई पर स्थित है।

इससे पूर्व की अपनी यात्राओं में मैं सिर्फ एक बार ही भैरोनाथ गया हूं। तब जब हम गीतेश्वर भाई और सुधीर राघव के साथ आया था। तो हम भैरोनाथ के दर्शन के लिए चल पड़े। माधवी ने पूरा उत्साह दिखाया। अनादि के उत्साह में तो कोई कमी नहीं रहती। भैरोनाथ तक पहुंचने के दो तरीके हैं। एक सड़क मार्ग के से तो दूसरा सीढ़ियों से। सीढ़ियों वाला रास्ता थोड़ा थकाने वााला है। पर इससे समय बचता है। भैरोनाथ के लिए हमने सीढ़ियों वाले मार्ग का ज्यादा इस्तेमाल किया।



भैरोनाथ के लिए रोप-वे सेवा - वैष्णो देवी से भैरोनाथ की दूरी दो किलोमीटर के करीब है। इस यात्रा के लिए नई रोपवे सेवा भी शुरू हुई है। पर ये रोपवे सेवा रात में बंद हो जाती है। हमलोग सीढ़ियों के रास्ते से जल्दी ही भैरोनाथ मंदिर तक पहुंच गए। रात के 12 बजे के आसपास भैरोनाथ के दर्शन के बाद हमलोगों ने नीचे उतरना भी शुरू कर दिया। भैरोनाथ से अधकुआंवारी तक उतरने के लिए हमने पुराने रास्ते का इस्तेमाल किया। इसमें रास्ते में सांझी छत आता है जबकि जाते समय हिमकोटि मार्ग से जाने पर सांझी छत नहीं पड़ता है। 

भैरोनाथ की कथा - भैरोनाथ मंदिर के पास साईन बोर्ड पर भैरोनाथ की जो कथा लिखी गई है उसके मुताबिक भैरोनाथ माता का वाणगंगा से पीछा करता हुआ चरण पादुका होते हुए पवित्र गुफा भवन तक आ पहुंचा था। जब उसने गुफा में प्रवेश करने की कोशिश की तो वहां पर मौजूद हनुमान जी से उसका युद्ध हुआ। इसी दौरान माता स्वयं गुफा से निकलकर आईं और भैरोनाथ का सिर धड़ से अलग कर दिया। 

अपना सिर कट जाने के बाद भैरोनाथ को माता की शक्ति समझ में आई। उसके बाद वह माता के शरणागत हो गया। वह माता से प्रार्थना करने लगा। तब माता ने उसे आशीर्वाद दिया कि जो श्रद्धालु मेरे दर्शन करने आएंगे वे भैरोनाथ के भी दर्शन करेंगे तभी उनकी यात्रा संपन्न मानी जाएगी। कहा जाता है कि जहां पर भैरोनाथ का मंदिर है वहीं पर उसका सिर आकर गिरा था। 



भैरोनाथ के दर्शन के बाद लोग वहां से प्रसाद के तौर पर वहां जलाई जा रही धूने से भभूत लेकर अपने साथ जाते हैं। हमने भी थोड़ा सा भभूत लिया और बिना देर किए वापसी की राह पर चल पड़े। भैरोनाथ से चलने के बाद रास्ते में ओम व्यू प्वांट आता है। अगर आप दिन में यात्रा कर रहे हों तो त्रिकुटा पहाड़ी के सुंदर नजारे यहां से दिखाई देते हैं। 


ओम व्यू प्वाइंट से आगे चलने के बाद हमलोग धीरे-धीरे सांझी छत पहुंच गए हैं। यहां पर रुक कर हमने चाय पी। सांझी छत पर रुकना मुझे हमेशा अच्छा लगता है। हर यात्रा में मैं यहां पर थोड़ा वक्त बिताना चाहता हूं। इसके बाद फिर धीरे-धीरे उतरने का सिलसिला शुरू कर दिया। सांझी छत से अधकुआंरी तक खड़ी चढ़ाई है इसलिए उतरने में भी सावधानी बरतनी पड़ती है। रात में सहयात्री बहुत कम हैं। रात के तीन बजे के करीब हमलोग अधकुंवारी पहुंच चुके थे। यहां 24 घंटे काफी चहल पहल रहती है। यहां मंदिर परिसर भी मनोरम हो गया है। 

रात सुबह से मिलने के लिए आगे बढ़ रही है। पर हमें थोड़ी भूख लगती जा रही है। अध कुआंरी में सागर रत्ना में रुककर हमने मसाला डोसा का ऑर्डर दिया। अनादि को बैठने पर नींद आ रही है। जब नींद आ रही हो तो खाने से वे नाराजगी दिखाते हैं। हालांकि डोसा उनका प्रिय भोजन है। खैर, थोड़ी सी पेट पूजा के बाद हमने एक बार फिर उतरना शुरू कर दिया। सबकी आंखों में नींद थी, पर हम जल्दी उतर जाना चाहते थे। चरण पादुका पहुंचने के बाद रास्ते में कई सारे फुट मसाज वाले पार्लर खुल गए हैं। पांव की थकान मिटाने के लिए हमलोग एक मसाज सेंटर में थोड़ी देर बैठ गए। इसका भी मजा ले लिया जाए। 

वापसी में वही सारे रास्ते वही सारी दुकानें दिखाई दे रही हैं जो हमें जाते समय मिली थीं। वाणगंगा पहुंचने से पहले अनादि और माधवी थक चुके थे। वाणगंगा का गेट पार करने के बाद हमने अपने होटल के टैक्सी वाले को फोन किया। अपने वादे के मुताबिक ही थोड़ी देर में वे टैक्सी लेकर वाणगंगा पर हाजिर थे। टैक्सी में बैठकर सुबह के सात बजे से पहले हमलोग कटरा अपने होटल में पहुंच चुके थे। इस तरह 17 घंटे में हमने माता के दरबार में चढ़ने उतरने की यात्रा पूर कर ली, जिसमें भैरोनाथ के दर्शन भी शामिल हैं।
दर्शन के बाद वापसी वाणगंगा में 

-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-        ( KATRA TO BHAWAN, BHAIRON NATH TEMPLE, MATA VASHINO DEVI, TARAKOT MARG, HIMKOTI MARG )

Thursday, June 25, 2020

वैष्णो देवी - हिमकोटि मार्ग से माता के दरबार की ओर


कटरा के विशाल रेलवे स्टेशन से बाहर निकलने पर पार्किंग में हमें मारुति वैन के एक ड्राईवर मिले। उन्होंने बताया कि हमारा होटल है जहां आपको 1000 रुपये में 24 घंटे के लिए कमरा मिलेगा। अगर आप कमरा कुछ घंटे के लिए स्नान आदि के लिए लेते हैं तो 800 रुपये देने होंगे। उसके बाद लगेज छोड़कर आप भवन की ओर प्रस्थान कर सकते हैं। 
उन्होंने बताया कि हम आपको स्टेशन से होटल तक छोड़ेंगे। फिर होटल से वैष्णो देवी की यात्रा की चढ़ाई वाले प्वाइंट तक टैक्सी छोड़ेगी। वापसी में आपको होटल वापस भी लाएंगे। अंत में आपको रेलवे स्टेशन या बस स्टैंड भी छोड़ देंगे।

 हमें यह पैकेज अच्छा लगा तो हम उनके साथ हो लिए। वे हमें होटल साई वाटिका में ले गए। होटल का कमरा अच्छा है तीन बेड वाला। हमलोग थोड़ी देर में स्नान करके आगे के सफर के लिए तैयार हो गए। होटल की टैक्सी ने हमें वाणगंगा तक छोड़ दिया। रास्ते में टैक्सी थोड़ी देर बस स्टैंड में रूकी। क्योंकि हमारे कुछ सहयात्रियों ने पर्ची नहीं बनवाई थी। वे यहां पर्ची बनवाने गए तब तक हमने कटरा के छोले कुलचे उदरस्थ किए।

वाणगंगा से शुरू हो गया सफर - वाणगंगा में हमने यात्रा के लिए तीन लाठियां किराये पर ली। पिछली यात्राओं के अनुभव से जानता हूं कि पहाड़ों पर चढ़ाई में ये लाठियां साथ निभाती हैं। माथे पर जय माता दी की पट्टी बांधी और हो गए तैयार माता के दरबार की ओर प्रस्थान करने के लिए।

नया ताराकोट मार्ग - ये मेरी वैष्णो देवी के छठी यात्रा है। इस बार वाणगंगा में एक बड़ा चेकपोस्ट बन गया है। यहां पर यात्रा पर्ची की स्कैनिंग होती है, फिर आप आगे बढ़ते हैं। पर वाणगंगा से ही अब एक नया रास्ता बन गया है जो अपेक्षाकृत चौड़ा है। यह ताराकोट मार्ग कहलाता है जो लोगों को अधकुआंरी पहुंचाता है। पर हमें थोड़ी पूछताछ पर पता चला कि नया रास्ता दूरी की लिहाज से थोड़ा लंबा है। तो हमने पुराने रास्ते से ही चलना तय किया। दोपहर के दो बजे हमने भवन के लिए चढ़ाई शुरू कर दी। अनादि की माता वैष्णो देवी के दरबार में ये पहली यात्रा है। थोड़ी दूर आगे चलकर तुलसी भोजनालय में हमने दोपहर का भोजन किया। रोटी, दाल, सब्जी आदि।

हमलोग बड़े उत्साह से पर धीरे-धीरे आगे की ओर बढ़ रहे हैं। सफर की सौंदर्य का आनंद लेते हुए। साथ में हल्की पेट पूजा भी करते हुए। गुरुकुल , चरण पादुका से आगे बढ़ते हुए हमलोग अध कुआंरी पहुंचने वाले हैं। कई जगह हमने सीढ़ियों वाले रास्ते का चयन भी किया। यह थोड़ी दूरी कम कर देता है, पर थकान भी बढ़ा देता है।

वैष्णो देवी के मार्ग में रास्ते में बने कॉफी शॉप मुझे काफी आकर्षित करते हैं। यहां कॉफी की दरें काफी रियायती हैं। प्राकृतिक नजारों के बीच बैठकर कॉफी पीना काफी सुखकर लगता है। हमलोग पहले कॉफी शॉप में ही रुक गए। यहां बैठकर कॉफी पी। बैठने के लिए यहां स्थायी बेंच बनी हुई हैं। जो आनंद यहां बैठक 10 से 20 रुपये वाली कॉफी पीेने का है वह आनंद दिल्ली मुंबई के महंगे कॉफी शॉप में नहीं। इन कॉफी घरों के नाम भी बड़े सुंदर हैं – आलोक, समीर , अंबालिका आदि।

नया हिमकोटी मार्ग - अधकुंवारी से ठीक पहले हमें भवन जाने वाले नए रास्ते के बारे में पता चला। इस नए हिमकोटी वाले रास्ते में चढ़ाई  भी कम है। जहां से दो रास्ते अलग होते हैं उस जंक्शन से हिमकोटी मार्ग से भवन दूरी 5.5 किलोमीटर है तो पुराने मार्ग से 6.5 किलोमीटर। साथ ही इस रास्ते पर बैटरी कार से जाने का भी विकल्प है। यह माता के दरबार तक थोड़ी दूरी भी कम कर देता है। तो हमने इस नए रास्ते से चलना तय किया। पर हमने बैटरी कार का सहारा नहीं लिया। पैदल चलते रहे। वैसे बैटरी कार का एक व्यक्ति का किराया 354 रुपये है।

नए हिमकोटी मार्ग पर घोड़े-खच्चर आदि नहीं चलते। इसका रास्ता भी काफी चौड़ा है। इसलिए रास्ते पर साफ सफाई अच्छी नजर आती है। बस बीच-बीच में बैटरी वाहन आते-जाते हैं। इस रास्ते पर माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड की ओर से संचालित कई रेस्टोरेंट आते हैं। इनके खाने पीने का स्वाद उम्दा और दरें रियायती हैं।

एक जगह सत्या भोजनालय में हमने सांभर बडा का आनंद लिया। तो कई बार कॉफी भी पी गई। रास्ते कैफे कॉफी डे का भी आउटलेट खुला हुआ है। यहां अनादि ने अपनी पसंद की कॉफी पी। वो क्या नाम था उनकी पसंद का... इस तरह के रास्ते में यात्रा का आनंद बढ़ जाता है। 

तो बिना कहीं लंबा विराम लिए हुए करीब साढ़े छह घंटे की पदयात्रा करके हमलोग रात साढ़े आठ बजे भवन पहुंच चुके हैं। माता के दरबार में काफी भीड़ है। यहां तक की लगेज जमा करने वाले काउंटरों पर भी लंबी लाइन लगी है।
पर संयोग कुछ ऐसा बना कि हमें मात्र एक सवा घंटे में दर्शन करने का मौका मिल गया। यूं तो दर्शन के लिए एक किलोमीटर लंबी लाइन लगी थी। हम इस लाइन में लगने की सोच ही रहे थे तभी आर्मी के एक जवान आए और उन्होंने एक दूसरी लाइन लगाने को कहा। वे आगे आगे चलने लगे उनके पीछे दूसरी लाइन के लोग चलने लगे। और बड़ी तेजी से उन्होंने हमें सीधे वीआईपी गेट तक पहुंचा दिया। इस तरह हमें जल्दी दर्शन का सौभाग्य मिल गया बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के। 

मंदिर के अंदर माता रानी के दर्शन आसानी से हो गए। अंदर पहुंचने के बाद हमें ज्यादा भीड़ का सामना नहीं करना पड़ा। मंदिर की गुफा में प्रवेश के लिए अब नया रास्ता खुला रहता है। इस रास्ते में इंतजाम अच्छे हैं। यहां पर पुराना गुफा वाला रास्ता भी देखा जा सकता है। इस पुराने रास्ते से लोगों को लेटकर आना पड़ता था। 



-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-        ( KATRA TO BHAWAN, MATA VASHINO DEVI, TARAKOT MARG, HIMKOTI MARG )

Tuesday, June 23, 2020

दिल्ली से कटरा: श्री माता वैष्णो देवी के दरबार में


दीपावली की रात को घर को दीयों से रोशन करने के बाद हमलोग एक बार फिर चल पड़े हैं साथ साथ भ्रमण पर। इस बार हमारी मंजिल है कटरा माता वैष्णो देवी के दरबार में। साल 2003 के बाद मैं 16 साल बाद 2019 में माता वैष्णो देवी के दरबार में जा रहा हूं। हमारी ट्रेन सराय रोहिल्ला रेलवे स्टेशन से है। दिल्ली जम्मू दूरंतो एक्सप्रेस ( 12265 ) रात को सवा दस बजे सराय रोहिल्ला रेलवे स्टेशन से चलती है।

हमलोग घर से पर्याप्त समय पहले निकल पड़े हैं। अपने घर मैं रेलवे स्टेशन जाने के लिए ओला कैब बुक करने की कोशिश करता हूं। पर नेटवर्क की समस्या से कैब बुक नहीं हो पाया। इस बीच एक आटो रिक्शा वाले हमें वाजिब किराया पर रेलवे स्टेशन छोड़ने को तैयार हो गए। ओला उबर के आने से एक फायदा हुआ है कि आटो रिक्शा वालों के व्यवहार में भी थोड़ा बदलाव आया है। तो हमलोग आटो रिक्शा में ही रेलवे स्टेशन के लिए चल पड़े।

लंबे समय बाद सराय रोहिल्ला रेलवे स्टेशन जा रहे हैं हम। इस बार एक नई बात हुई है कि करोलबाग वाले साइड से भी रेलवे स्टेशन का प्रवेश द्वार बेहतर बन गया। चौड़ी सड़क वाले स्टेशन के एप्रोच रोड के कारण अब जाम नहीं लगता। 
सराय रोहिला रेलवे स्टेशन पर अब एक बड़ा वेटिंग हॉल भी बन गया है। यात्री सुविधाएं में भी थोडी बेहतर की गई हैं। वरना ये स्टेशन घोर उपेक्षित और यहां पहुंचने पर बाबा आदम का स्टेशन नजर आता था।


हमारी ट्रेन ठीक सवा दस बजे चल पड़ी है। दिल्ली से जम्मू के बीच ट्रेन का ठहराव सिर्फ लुधियाना जंक्शन में है। पर यह ट्रेन अंबाला में भी रुक गई। जब ट्रेन पंजाब से होकर गुजरने लगी तो मेरी नींद बार बार टूट जा रही है। जिस राज्य में पांच साल रहने का मौका मिला हो उससे भावनात्मक लगाव हमेशा महसूस करता हूं। सुबह साढ़े सात बजे ट्रेन जम्मू तवी रेलवे स्टेशन पर पहुंच गई। दूरंतो कटरा तक नहीं जाती। हमें पता चला कि सवा नौ बजे जम्मू मेल आएगी जो कटरा तक जाएगी। तो हमने तीन जनरल टिकट खरीद लिए और जम्मू तवी स्टेशन पर अगली ट्रेन का इंतजार करने लगे।
जम्मू रेलवे स्टेशन से मेरी कई बार की यादें जुड़ी हैं। सदभावना रेल यात्रा के दौरान 1993 में तो तीन दिन हमने जम्मू स्टेशन पर ही गुजारे थे। इस बीच जम्मू तवी स्टेशन के एक नंबर प्लेटफार्म पर बने कैफेटेरिया में बैठकर सुबह का नास्ता कर लिया गया। नास्ते में पराठे और दही। कैंटीन सेल्फ सर्विस है। पर स्वाद और समयबद्धता अच्छी है। डायनिंग हॉल भी अच्छा है। इस हॉल से जम्मू शहर का नजारा दिखाई देता है। जम्मू तवी का रेलवे स्टेशन थोड़ी ऊंचाई पर है। आसपास का बाजार थोड़ा नीचे। तो जम्मू स्टेशन बड़ा सुंदर नजर आता है। 

जम्मू मेल समय पर आ गई है। इसमें हमें आसानी से जगह भी मिल गई है। जम्मू से कटरा के बीच ये हमारा पहला रेल सफर है। रास्ते में कई छोटी छोटी नदियां आती हैं। इन्हें स्थानीय भाषा में खड भी कहते हैं। एक स्टेशन आया बजालता। इसके नाम से ही बजालता खड है। आमतौर पर खड में नदी काफी गहराई में बहती है। ये रास्ता बड़ा मनोरम है।


इससे पहले जम्मू से कटरा तक हर बार बस से जाना हुआ था। जम्मू से कटरा रेल लाइन के बीच कई सुरंगे आईं। कुछ छोटी तो कुछ बड़ी सुरंगे। इस रेल मार्ग के रास्ते के स्टेशन हैं बाजलता, संगर, रामनगर, उधमपुर, चक रखवाल और उसके बाद श्रीमाता वैष्णो देवी कटरा। ( SVDK) उधमपुर इस मार्ग का बड़ा रेलवे स्टेशन है। यहां पर ट्रेन ज्यादा देर तक रुकी। वैसे जम्मू मेल पैसेंजर की तरह हर स्टेशन पर रुकती हुई जा रही है।

उधमपुर से कटरा की दूरी 24 किलोमीटर है। कटरा से पहले चक रखवाल नामक रेलवे स्टेशन आता है। जम्मू तवी से कटरा के बीच रास्ते में छोटी छोटी नदियां और सुंदर पहाड़ नजर आते हैं।
हमलोग दोपहर में कटरा रेलवे स्टेशन पहुंच गए। कटरा का स्टेशन भवन काफी विशाल बना हुआ है। दिल्ली से आजकल रोज चार रेलगाड़ियां कटरा आती हैं। पर जामनगर, गाजीपुर, चंडीगढ़ तमाम शहरों से कटरा की सीधी ट्रेनें आने लगी हैं।

कटरा रेलवे स्टेशन पर विशाल प्रतीक्षालय है। कटरा से आगे रेल मार्ग का निर्माण कार्य जारी है। यही मार्ग श्रीनगर तक चला जाएगा। अगर वैष्णो देवी के दर्शन के लिए जाना चाहते हैं तो यात्रा के लिए पर्ची यहीं रेलवे स्टेशन पर बने काउंटर से ही प्राप्त कर सकते हैं। तो हमने भी पर्ची यहीं पर बनवा ली है। यहां तीन काउंटर हैं। फिर भी पर्ची बनवाने में 15 मिनट लग गए। 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( SARAI ROHILA, DURANTO EXPRESS, JAMMU TAVI, KATRA, JAMMU MAIL ) 

Sunday, June 21, 2020

अब भी बची है रटौल के आम की खुशबू


एक बार फिर आम का मौसम आ गया है। आम के बारे में हर किसी की पसंद खास होती है। पर पूर्वी दिल्ली से महज 20 किलोमीटर दूर बागपत जिले का रटौल गांव खुशबूदार आमों के लिए अपनी खास पहचान रखता है। रटौल के आम के स्वाद का जबदस्त पाकिस्तान कनेक्शन भी है। हालांकि अब यहां पहले जैसे विशाल बाग नहीं रहे पर रटौल के शानदार आमों की विरासत अभी भी बची हुई है।

रटौल का आम आकार में छोटा होता है, पर यह अपनी खास तरह की खुशबू और स्वाद के लिए जाना जाता है। रटौल गांव में दशहरी, चौसा, लंगड़ा समेत कई तरह के आम के बाग हैं। लोग बताते हैं कि अब बगीचे कम हो गए हैं। पर अभी भी बचे हुई है आम की खुशबू। जून की भीषण गरमी के बीच जब आप रटौल से होकर गुजरेंगे तो सड़क के दोनों तरफ बाग से तोड़े गए कच्चे और पके हुए आम बिकते नजर आएंगे। यहां आप 20 रुपये किलो से लेकर 60 रुपये किलो तक के आम खरीद सकते हैं। आपको पेड़ के पके हुए टपका आम भी यहां मिल सकते हैं। हालांकि यहां बिकने वाले आम को भी काफी लोग अब आम को गैस से पकाने लगे हैं।
आजादपुर के फल मंडी में रटौल के आम की काफी मांग रहा करती थी। पर अब यहां सिमटते बगीचों के कारण रटौल का आम दूर तक नहीं जा पाता है।

एक दर्जन प्रजातियां - रटौल में करीब एक दर्जन प्रजाति के आम हुआ करते हैं। आपको दशहरी, सरौली, दुधिया गोला, रामकेला, गुलाब जामुन, चौसा, सुरमई, नीमच, रटौल, मक्शूश, लंगड़ा, जुलाई वाला, खशुलखश जैसे प्रजाति के आम देखने को मिल जाएंगे।
रटौल में सन 2000 से पहले तक 13 हजार हेक्टेयर में आम के बाग थे, जिसका रकबा अब सिमटता जा रहा है। फिर भी अभी रटौल और आसपास में दो हजार हेक्टेयर में आम के बाग हैं। आसपास के गांव मुबारक पुर, बड़ागांव, गौना आदि के बाग भी रटौल पट्टी में आते हैं।

सन 1937 में रटौल के आम उत्पादक इसरारुल हक ने लंदन में बेहतर प्रजाति के लिए पुरस्कार प्राप्त किया था। सन 1995 में जावेद अफरीदी को दिल्ली के ताल कटोरा स्टेडियम में लगे आम मेले में पुरस्कार मिला।

रटौल का पाकिस्तान कनेक्शन – पाकिस्तान में भी अनवर रटौल नामक आम की किस्म होती है। बताया जाता है कि भारत के विभाजन के समय जो मुस्लिम पाकिस्तान गए उनमें से एक अबरारूल हक सिद्दकी अपने साथ आम का पौधा लेते गए। उस किस्म का नाम उन्होंने रटौल दिया। पाकिस्तान के मुल्तान क्षेत्र में होने वाला ये आम काफी लोकप्रिय है। पर वह मूल रूप से बागपत के रटौल का है।

ईंट भट्टों से बुरा असर –  वैसे तो 1975 में इस क्षेत्र को राज्य सरकार ने आम पट्टी घोषित कर दिया था। पर रटौल के आम के संरक्षण संवर्धन के लिए कभी प्रयास नहीं किए गए। पिछले दो दशक में रटौल और आसपास के क्षेत्र में आम के उत्पादन पर ईंट भट्टों के कारण बुरा असर पड़ा है। ईंट भट्टों से निकलने वाले प्रदूषण के कारण आम में अब पहले जैसे बौर नहीं आ पाते। इसलिए कई आम उत्पादक अब आम से मुंह मोड रहे हैं। एनसीआर के विस्तार का दंश रटौल झेल रहा है। पिछले कुछ सालों में रटौल में आम के बाग का रकबा घटने लगा है। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( RATAUL, MANGO, BAGPAT, UP )