Monday, May 25, 2020

केदारनाथ - शिव का डमरु डम डम बाजे


हमलोग रात साढ़े नौ बजे केदारनाथ मंदिर परिसर में पहुंचने के बाद भोजन के लिए मंदिर के पास स्थित तिवारी भोजनालय में पहुंचे। अभी खाने का आर्डर करने की सोच ही रहे थे कि वहां काउंटर पर भभूत लगाए एक साधु के दर्शन हुए। मैंने श्रद्धा से उन्हें नमस्कार किया। उन्होंने भी आशीर्वाद दिया साथ ही उन्होंने मुझसे कोल्ड ड्रिंक पीने की इच्छा जताई।
वे स्प्राइट की एक बोतल पीना चाहते थे जो 80 रुपये की मिल रही थी। मैंने उन्हें वह बोतल दिलवाई दी। साथ में कुछ मिठाइयां भी। ये सब कुछ लेकर वे प्रसन्न होकर चले गए। पता नहीं क्यों ऐसा करके मुझे भी आत्मिक प्रसन्नता हुई।
बाबा केदारनाथ के मंदिर में साधुओं की अलग दुनिया है। यहां पर आपका साक्षात्कार अलग-अलग तरह के साधुओं से होता है। पहली रात से लेकर अगले दिन, दिन भर भभूत लगाए कई साधुओं के वार्ता करने और उनका आशीर्वाद पाने का मौका मिला। 

प्रसाद में चौलाई के लड्डू - अगले दिन सुबह स्नान करने के बाद हमलोग सुबह आठ बजे मंदिर में दर्शन के लिए लाइन में लग गए। तकरीबन तीन घंटे बाद हमारा नंबर आया। इस दौरान हमारा परिचय चेन्नई से आए मनोज चक्रवर्ती और उनके परिवार से हुआ। वे देश भर के मंदिरों और उनके वास्तु के बारे में अच्छी जानकारी रखते हैं। 



कानपुर का श्रीवास्तव और अग्निहोत्री परिवार भी दर्शन के लिए पंक्ति में लगा है। कई लोग प्रसाद की थाली लेकर लाइन में लगे हैं। ये थाली 101 रुपये से लेकर 251 रुपये तक है। केदारनाथ का प्रसाद मुख्य रुप से गुड़ के बने चौलाई के लड्डू होते हैं। ये स्वाद में काफी अच्छे होते हैं। ये लड्डू स्थानीय महिलाओं के स्व सहायता समूह द्वारा बनाए जाते हैं।

मंदिर के दाहिने, बाएं और पीछे की तरफ साधु गण बैठे रहते हैं। केदारनाथ आने वाले श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार इस साधुओं को दान देते हैं। दोपहर में गले में रुद्राक्ष की ढेर सारी माला डाले एक साधु ने मुझे अपने पास बुलाया। उसने कहा, देखो भक्त, 350 रुपये में रसगुल्ले का एक डिब्बा आता है। एक डिब्बा लाकर हमें दे दो। साधुओं को खाकर तृप्ति मिल जाएगी। इसी तरह हमारे एक साथी ने भभूत लगाए एक साधु से पूछ लिया – बाबा आपको केदारनाथ में ठंड नहीं लगती। बाबा जी बोले उठे, हां लगती है ना,  ऐसा करो दो हजार रुपये का एक कंबल आएगा। खरीदकर हमें दान कर दो।

हमें दिन में एक नागा संप्रदाय के युवा साधु मिले। उन्होंने बताया कि छह माह केदारनाथ में रहने के बाद बरेली के पास फरीदपुर स्थित आश्रम चला जाता हूं। मैंने उनसे पूछा ये साधु लोग रसगुल्ले और शीतलपेय की मांग करते हैं। क्या ये उचित है। वह साधु बनने के बाद भी जिह्वा की लालसा से ऊपर क्यों नहीं उठ पाएं हैं.. युवा साधु ने जवाब दिया। इसमें कुछ गलत नहीं है। हमें मन की आवाज सुननी चाहिए। जो मन खाने की इच्छा करे, वह मांगने में कोई दोष नहीं है।

उन्होने बताया कि केदारनाथ के साधुओं को जो दान छह माह में मिलता है उसी दान राशि से उनका अगले छह माह का काम चलता है। हालांकि लंबी चर्चा करने वाले उस युवा साधु ने मुझसे दान में कुछ नहीं लिया। केदारनाथ में रहने वाले ज्यादातर साधु मंदिर के कपाट बंद होने पर मैदानी इलाकों में चले जाते हैं। पर कुछ साधुओं ने मुझे बताया कि वे पहाड़ की गुफाओं में एकांत वास में बर्फबारी के छह माह गुजार देते हैं। इस दौरान उनका कहना था कि जड़ी-बूटी खाकर गुजारा करते हैं।

केदारनाथ मंदिर परिसर में शाम की आरती का नजारा भव्य होता है। सात से आठ बजे तक आरती के दौरान केदारनाथ के श्रंगार दर्शन होते हैं। हल्की बारिश के बीच हमने आरती में आनंदित होकर हिस्सा लिया। इस दौरान एक साधु महाराज खूब श्रंगार करके डमरू बजा रहे थे। लोग उनके साथ तस्वीरें खिंचवाने के लिए उतावले थे। वे भी किसी को निराश नहीं कर रहे थे।   

छह माह बंद रहता है मंदिर – बाबा केदार का मंदिर गर्मियों के दौरान केवल 6 महीने के लिए खुला रहता है। यह तीर्थ स्थान सर्दियों के दौरान बंद रहता है। क्योंकि इस दौरान क्षेत्र में भारी बर्फबारी के कारण यहां की जलवायु प्रतिकूल हो जाती है। इस दौरान केदारनाथ के मूल निवासी भी निचले क्षेत्रों में चले जाते हैं और भगवान केदारनाथ की पालकी को उखीमठ पहुंचा दिया जाता है और पूरे शीतकाल पूजा यहीं होती है। पालकी आने जाने की प्रक्रिया तीन दिनों में पूरी होती है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
( SADHU OF KEDAR NATH, SHIV KA DAMRU DAM DAM BAJE, KEDAR -12  ) 


4 comments:

  1. साधुओं का किस्सा दिलचस्प है ,जय बाबा भोलेनाथ की जय ,अद्भुत नजारा, सुंदर सचित्र वर्णन ,आपका
    बहुत बहुत धन्यवाद

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