Thursday, May 21, 2020

केदारनाथ – लिंचोली से बाबा मंदिर वाया छानी कैंप, बेस कैंप, रुद्रा प्वाइंट


केदारनाथ पदयात्रा के पूरे मार्ग में आपको लघु भारत के दर्शन होते हैं। बाबा के दर्शन करने दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, बिहार, बंगाल हर जगह के लोग रास्ते में मिलते रहते हैं। इस बीच हमारी मुलकात चार युवाओं से हुई जो ऋषिकेश से हमारे साथ चले थे। पर वे केदानाथ के दर्शन करके मेराथान गति से अब उतर रहे हैं। इनमें से एक युवा गाजियाबाद के वैशाली का रहने वाला है। उतरते हुए मुझे देखकर वह रुक जाता है और हमारा हालचाल पूछने लगता है।  

रास्ते में मुझे बिहार के सीतामढ़ी के अत्यंत समान्य परिवार की महिलाएं पूरी श्रद्धा से नंगे पांव बाबा के दरबार की ओर बढ़ी चली जा रही नजर आईं। उनके सिर पर एक गठरी है जिसमें कंबल और खाने पीने का सामान है। आस्था के आगे कई तरह की सुविधाएं गौण हैं। बस धुन में चलते जा रहे हैं। मन में लगन है बाबा के दर्शन की। तो हर राह आसान हो जाती है। केदारनाथ के रास्ते में कहीं-कहीं अब वाईफाई का इंतजाम प्रशासन की ओर से किया गया है। मोबाइल नेटवर्क आमतौर पर पूरे रास्ते साथ रहता है। 


बड़ी लिंचोली के आगे भी चढ़ाई है, पर उतनी खड़ी चढ़ाई अब नहीं है। उन्नाव वाले श्रीवास्तव जी के परिवार से अलग होकर मैं एक चाय की दुकान में रुककर अपने साथियों का इंतजार करने लगता हूं। ये चाय नास्ता वाले दुकानदार हिमाचल प्रदेश के चंबा इलाके के रहने वाले हैं। ये छह महीने तक यहीं पर रहते हैं। इस बीच शाम गहराने लगी है। आसमान में बादल अटखेलियां कर रहे हैं। फिजां में हल्की-हल्की ठंड घुलती जा रही है। रात होने के साथ मौसम बदल रहा है। इस बीच आधे घंटे के इंतजार के बाद वे लोग धीरे-धीरे चढ़ते हुए नजर आए। 

दरअसल मेरे साथी थकने लगे हैं। रास्ते में उन्होंने अपना बैग ढोने के लिए एक नेपाली पोर्टर अर्जुन की सहायता ली है। केदारनाथ के मार्ग में बड़ी संख्या में पोर्टर नेपाली लोग ही हैं। भले ही ये देखने में दुबले पतले होते हैं पर इनके अंदर पहाड़ों पर चढ़ने की और वजन ढोने की असीम ऊर्जा होती है। इस बीच शाम गहराने लगी है। हालांकि रास्ते में स्ट्रीट लाइट का इंतजाम है। पर केदारनाथ की पदयात्रा के मार्ग में आपके पास टार्च भी होना चाहिए। कई जगह अंधेरा होता है तो कई बार बिजली कट जाती है। ऐसे वक्त में हमारा मोबाइल टार्च काम आ रहा है।

हल्के अंधेरे में मैं अपने साथियों को उत्साहित करता हुआ धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा हूं। बड़ी लिंचोली से आगे चलते हुए हमलोग छानी कैंप पहुंच गए। अंधेरे में आसपास देखने के दिक्कत आ रही है। एक सुरक्षा में तैनात अर्ध सैनिक बल के जवान ने पूछने पर बताया कि आप छानी कैंप आ चुके हैं। यहां से बाबा का मंदिर चार किलोमीटर रह गया है। मंजिल निकट आने पर चलने का उत्साह बढ़ने लगता है। 



छानी कैंप से हौले हौले चलते हुए दो किलोमीटर और चलने के बाद हम रुद्र प्वाइंट पहुंच गए हैं। यहां पर यात्रा में थक कर बैठे मां बेटे से मुलाकात होती है। बुजुर्ग मां से मैंने पूछा आपको चलने में दिक्कत हो रही है। मां बोली नहीं, मैं तो चल पा रहा हूं मेरा बेटा थक जा रहा है। उनका 32 साल का मोटा थुलथुल बेटा गुरुग्राम के एमएनसी में काम करता है। मैंने उसे देखकर कहा, आप चिकेन खाना छोड़ दो। वह कहता है, ऐसा नहीं हो सकता।
हम फिर आगे की ओर चल पड़े हैं। इस बीच रास्ते में बर्फ से ढकी हुई पहाड़ी दिखाई देती है। वास्तव में इसके नीचे ग्लेसियर है। हमारे साथ चल रहे पोर्टर अर्जुन हमें बर्फ दिखाते हैं। हम उसे छूकर देखते हैं। खुशी होती है। पर इस बर्फीले ग्लेसियर के पास कोई खास ठंड नहीं है।

रुद्रा प्वाइंट से आधे किलोमीटर चलने के बाद बेस कैंप पहुंच गए हैं। बेस कैंप के बाद चढाई खत्म होती है। इसके बाद सीधा रास्ता है। हल्का सा उतार वाला। बेस कैंप से ही श्रद्धालुओं के रहने के लिए तंबू वाले आश्रय स्थल आरंभ हो जाते हैं। यहां पर आप चाहें तो 200 से 300 रुपये में तंबू किराये पर लेकर उसमें विश्राम कर सकते हैं। 

पर हमने तय कर लिया है कि बाबा के मंदिर पास चलकर ही ठहरने की जगह तलाश की जाएगी। मंजिल के करीब पहुंचकर मैं भी थोड़ा सा थका हुआ महसूस कर रहा हूं। तो बेस कैंप में एक दुकान में बैठकर चाय पीता हूं। इससे थोड़ी ऊर्जा तो मिलती है। वैसे तो मैं चाय नहीं पीता पर पहाड़ों पर कभी-कभी पी लेता हूं।

थोड़ा आगे चलने पर बायीं तरफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोगों द्वारा संचालित मेडिकल कैंप मिला। इसके आगे उत्तराखंड सरकार द्वारा बनाया गया आवासीय इंतजाम भी है। यहां पर रहने के लिए कमरे और डॉरमेटरी उपलब्ध हैं। यहां पर भोजनालय भी है। पूछताछ करने पर पता चला कि इसमें खाने की दर 200 रुपये प्रति थाली है।

देव दर्शनी से बाबा के दर्शन -  तकरीबन एक किलोमीटर पहले देव दर्शनी से बाबा केदार का मंदिर दिखाई देने लगता है।  मंदिर से आधा किलोमीटर पहले हेलीपैड है। यहां से आगे चलने पर मंदाकिनी नदी पर एक और पुल है। इस पुल के बगल में मंदाकिनी का एक छोटा सा मंदिर है। मंदाकिनी नदी का पुल पार करने के बाद आप केदारनाथ मंदिर परिसर के काफी करीब पहुंच जाते हैं। यहां पर दोनों तरफ रहने के लिए आवास बने हुए हैं।

हमलोग तकरीबन साढ़े दस घंटे का पैदल सफर करके बाबा के दरबार में पहुंच गए। शायद मैं अकेला होता तो ये दूरी सात से आठ घंटे में तय कर लेता। पर आप समूह में हों तो सबको साथ लेकर चलना चाहिए। हम सीधे पंजाब एंड सिंध आवास क्षेत्र में पहुंच गए। इसके बारे में हमें कटारिया जी ने जानकारी दी थी। हमें पहली मंजिल पर कमरा नंबर 32 आवंटित कर दिया गया। कमरा काफी शानदार है। सामने तिवारी भोजनालय में रात्रि भोजन के बाद हमलोग सीधे कमरे में आकर सो गए।   
रात दस बजे के बाद बाबा श्री केदारनाथ का मंदिर ( 15 सितंबर 2019 ) 

केदारनाथ - पैदल मार्ग - एक नजर ( KEDAR NATH - ON FOOT ROUTE - AT A GLANCE ) 
गौरी कुंड से केदारनाथ - 16 किमी - गौरीकुंड से घोड़ा पड़ाव - 0.5 किमी
भैरव मंदिर, चिरवासा  - 2.5 किमी पर - जंगलचट्टी - 04 किलोमीटर पर
भीमबली - 6 किमी पर  - रामबाड़ा  - 07 किलोमीटर पर
छोटी लिनचौली – 8.5 किलोमीटर पर - बड़ी लिनचोली - 11 किमी पर
छानी कैंप - 12 किमी पर - रुद्रा प्वाइंट – 14 किमी पर
बेस कैंप - 14.5 किमी पर - हेलीपैड- 15.5 किमी पर।
बाबा केदारनाथ का मंदिर - 16 किलोमीटर पर।  
( आगे पढ़िए - शिव का पांचवां ज्योतिर्लिंग -केदारनाथ ) 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
 ( GAURI KUND TO KEDARNATH TEMPLE, CHANI CAMP, RUDRA POINT, BACE CAMP, KEDAR-10 )

2 comments:

  1. अहा कितनी सुखद लग रही ही ये यात्रा आपका शब्दों और चित्रों ने इसे कितना सहज और सरल बना दिया है। बहुत ही कमाल है जिस हिसाब से आप हर छोटी छोटी बात को नोटिस करते हैं वो तो अद्भुत है।

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