Sunday, May 10, 2020

रुद्रप्रयाग से गुप्तकाशी – मंदाकिनी के संग-संग


बस के कंडक्टर से पता चला कि रुद्र प्रयाग में बस आधे घंटे रुकने वाली है। तो यहां हमलोग बस से उतर कर बाहर आ गए। यहां का बाजार गुलजार है। यहां से थोड़ी मिठाइयां, नमकीन और शीतल पेय आदि लिया फिर बस में बैठ गए। यहां बस थोड़ी खाली हो गई है। अब मुझे अगली पंक्ति में सीट मिल गई है। यहां से चलने पर हमारी बस रुद्र प्रयाग शहर के बीच में बने अलकनंदा नदी के पुल को पार करके आगे बढ़ी है। इस पुल के पार हमें बाबा काली कमली वाले की धर्मशाला नजर आती है। 

इसके पहले श्रीनगर और ऋषिकेश में भी बाबा काली कमली वाले की धर्मशाला दिखाई दे गई थी। चार धाम मार्ग पर बाबा काली कमली वाले की धर्मशालाएं बहुत पुरानी हैं। बंगाल के महान संत ने ये धर्मशालाएं बनवाई थीं। तब यात्री बद्री केदार के लिए ऋषिकेश से पैदल यात्रा करते हुए जाते थे। तब वे इन धर्मशालाओं में ठहरते हुए आगे बढ़ते थे। यहां अन्न क्षेत्र भी चलता है।



रुद्र प्रयाग में भारतीय थल सेना का बड़ा केंद्र है। यहां सड़क बाईं तरफ मुझे सेना की स्थानीय केंद्र और उसकी कैंटीन दिखाई देती है। पहाड़ों पर जीवन और सीमाओं की सुरक्षा करना काफी कठिन कार्य है। देश के जवानों को मेरा सलाम। 
एक सुरंग के अंदर से निकलकर आगे बढ़ी तो अब मंदाकिनी के संग-संग सड़क पर आगे बढ़  रही है। सड़क के बायीं तरफ मंदाकिनी नदी बह रही है। बस में मेरी सीट भी बायीं तरफ है इसलिए मैं मंदाकिनी की उछलती-कूदती जल राशि को देख पा रहा हूं। दरअसल मंदाकिनी एक चपल नदी है। काफी कुछ सिक्किम के तीस्ता की तरह। 

मेरी दाहिनी तरफ हिमालय को काटकर सड़क को चार लेन बनाने का काम जारी है। बड़े-बड़े क्रेन लगे हैं जो हिमालय को लगातार तेज गति से काट रहे हैं। मतलब आने वाले समय में ये सड़क और चौड़ी हो जाएगी। अप और डाउन के लिए अलग अलग लेन उपलब्ध होगा। पर अभी इस नजारे को देखकर लग रहा है मानो हम हिमालय के सीने पर क्रेन चलाकर उसके साथ अत्याचार कर रहे हैं। कहीं फिर हिमालय को गुस्सा आ गया तो... क्या सचमुच सिर्फ छह माह के रास्ते के लिए हमें इतनी चौड़ी सड़कों की जरूरत है।

तिलवाड़ा है जंक्शन - नौ किलोमीटर के सफर के बाद हमलोग तिलवाड़ा पहुंच गए हैं। तिलवाड़ा से उत्तरकाशी टेहरी की तरफ के लिए एक सड़क जाती है। यहां से उत्तरकाशी जाने के लिए बसें भी मिल जाती हैं। इसके अलावा श्रीनगर और देव प्रयाग से भी उत्तरकाशी जाया जा सकता है। यमुनोत्री या गंगोत्री से केदारनाथ की तरफ आने वाले यात्री सीधे तिलवाड़ा पहुंच जाते हैं।

सड़क के बगल में मंदाकिनी बह रही है। नदी की जलधारा में चपलता दिखाई दे रही है। यहां पानी का बहाव तेज है। सड़क से नदी की गहराई कई जगह बहुत ज्यादा नहीं हैं। नदी के उस पार हरे-भरे सीढ़ीदार खेत नजर आ रहे हैं। हिमालय की वादियों का यह नजारा बड़ा मनोरम है। 

यहां महर्षि अगस्त्य ने किया था तप -  तिलवाड़ा के आगे हम अगस्त्य मुनि पहुंच चुके हैं। कहा जाता है इस छोटे से कसबे को अगस्त्य मुनि ने स्वयं बसाया था। यहां पर एक अगस्त्य मुनि का मंदिर भी स्थित है। कहा जाता है कि यहां ऋषि अगस्त्य ने कई सालों तक तपस्या की थी। अगस्त्य मुनि में एक हेलीपैड है जहां पवन हंस का हेलीकॉप्टर उतरता है। अगस्त्य मुनि आजकल नगर पंचायत बन चुका है। यहां पर मुझे अपने बायीं तरफ इंटरमीडिएट कॉलेज नजर आता है।

अगर आप अपने निजी वाहन से आएं तो अगस्त्य मुनि में रुक सकते हैं और यहां का मंदिर देख सकते हैं। पर बस में सफर के कारण हम ऐसा नहीं कर सके। साल 2013 के आपदा में अगस्त्य मुनि में मंदाकिनी ने काफी कहर ढाया था।पर मेरे बगल में एक शिक्षक बैठे हैं जो बांसवाड़ा उतरने वाले हैं। वे मुझे 2013 में आई आपदा के निशान दिखा रहे हैं। कई जगह तो सड़कें बिल्कुल ही साफ हो गई थीं। कई घर जमींदोज हो गए थे। उस तबाही का मंजर अब भी कहीं-कहीं देखा जा सकता है। 

संवेदनशील जगह है बांसवाड़ा - अगस्त्य मुनि के बाद का कस्बा है बांसवाड़ा। मेरे सहयात्री अचानक नदी के उस पार एक घर दिखाते हैं जो हाल में ही बादल फटने से तबाह हो गया। उस घर में रहने वाले सारे लोग मारे गए। बांसवाड़ा बहुत ही संवेदनशील जोन है। यहां पर 2018 में निर्माण के दौरान पहाड़ी ढह गई थी और रास्ता बंद हो गया था। 2020 के जनवरी में एक बार फिर बांसवाड़ा में पहाड़ी से लगातार पत्थर गिरने से रास्ता बंद हो गया। बांसवाड़ा में हमें सड़क के किनारे के बोर्ड लगा हुआ दिखाई देता है। इस पर लिखा हुआ है कि बांसवाड़ा संवेदनशील जोन में मार्ग अवरुद्ध होने पर अगस्त्य मुनि से पठालीधार बसुकेदार मार्ग से गुप्तकाशी पहुंचे। अप्रैल 2020 के मध्य में एक बार फिर बांसवाड़ा में पहाड़ी दरकी और ढेर सारा मलबा सड़क पर आ गया। जब जब ऐसा होता है बसुकेदार का वैकल्पिक मार्ग खोला जाता है। बारिश के दिनों में बांसवाड़ा से होकर गुजरने में खतरा और बढ़ जाता है। बातों ही बातों में हम बांसवाड़ा से आगे कुंड पहुंच गए हैं।

कुंड से चोपता के लिए मार्ग - हमारे पीछे वाली सीट पर बैठी तीन लड़कियां कुंड में उतर गईं। उन्हें चोपता जाना है। वे कुछ दिनों के लिए सिर्फ चोपता तुंगनाथ जाने के लिए पहाड़ की ओर आई हैं। कुंड से गुप्त काशी की दूरी सात किलोमीटर रह जाती है। पर कुंड में जहां दो रास्ते अलग होते हैं वहां कोई दुकान बाजार नहीं है। 
यहां पर मंदाकिनी नदी पर बने पुल से बस उस पार हो गई। अब नदी हमारे दाहिनी तरफ बह रही है। शाम गहराने से पहले हमलोग गुप्त काशी पहुंच चुके हैं। हालांकि हमारा टिकट सोन प्रयाग तक का है। पर हमने आज रात गुप्त काशी में ही रुकने का तय कर लिया है। 
यात्रा मार्ग - 
रुद्रप्रयाग से तिलवाड़ा - 9 किलोमीटर
तिलवाड़ा से अगस्त्य मुनि -10 किलोमीटर
अगस्त्य मुनि से बांसवाड़ा - 10 किलोमीटर
बांसवाड़ा से कुंड – 3 किलोमीटर
कुंड से गुप्तकाशी – 7 किलोमीटर



-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com 
( RUDRA PRAYAG, MANDAKINI RIVER TILWARA, AGASTYA MUNI, BANSWARA, KUND, GUPTKASHI, KEDAR-04 ) 

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