Friday, May 1, 2020

मूर्ति कला का बड़ा केंद्र था बागपत का रटौल गांव


सबसे पहले प्रथम पूज्य गणेश और उसके बाद मथुरा के संग्रहालय में मुझे एक से बढ़कर एक बेहतरीन मूर्तियां दिखाई देती हैं इनका प्राप्ति स्थल रटौल गांव लिखा है। ये रटौल गांव यूपी के बागपत जिले में है। पर यह गांव दिल्ली के काफी करीब है। पूर्वी दिल्ली के दिलशाद गार्डन से उत्तर की तरफ महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर यह गांव स्थित है। दसवीं सदी के आसपास यहां बड़े पैमाने पर शिल्पी रहते थे और मूर्तियों का निर्माण करते थे।


वैसे रटौल गांव कभी अपने मीठे और रसीले आम के लिए प्रसिद्ध हुआ करता था। इसके आम का स्वाद लोग सरहद पार पाकिस्तान में भी याद करते हैं। अब वहां आम के वैसे बाग भी नहीं बचे। पर मथुरा संग्रहालय देखने के बाद रटौल गांव के इतिहास के एक और पहलू से रूबरू होने का मौका मिलता है।

गणेश की नृत्यरत प्रतिमा - मथुरा संग्रहालय में रटौल ग्राम से प्राप्त दसवीं सदी की नृत्यरत गणेश की प्रतिमा चकित करती है। तब इसके निर्माण में प्लास्टिक का इस्तेमाल किया गया है। इसमें गणेश की दस भुजाएं दिखाई गई हैं। उनका एक दांत है। उनके अलग अलग हाथों में अलग अलग शस्त्र हैं। वे नृत्य कर रहे हैं।

विष्णु की अदभुत प्रतिमा - रटौल से ही प्राप्त कमल के पुष्प पर खड़े हुए विष्णु की सुंदर प्रतिमा देखी जा सकती है। चतुर्भुज विष्णु की यह प्रतिमा कीरीट मुकुट धारण किए हुए है। उनके एक हाथ में शंख है तो दूसरा हाथ अभय मुद्रा में है। इस प्रतिमा में उनके साथ सरस्वती और गरुड़ भी दिखाई दे रहे हैं। इसी प्रतिमा में उपर के दोनों कोनों में ब्रह्मा और शिव की भी प्रतिमा है। रटौल से प्राप्त विष्णु की दो प्रतिमाएं संग्रहालय में हैं। दोनों में थोड़ा सा ही अंतर दिखाई देता है। 


सूर्यदेव की कलात्मक प्रतिमा – रटौल से मिली सूर्यदेव की प्रतिमा भी अत्यंत कलात्मक है। रथ पर आरुढ़ शिव की प्रतिमा में काफी बारीक काम किया गया है। मानवकार प्रतिमा में सूर्य कमल के आसन पर खड़े हैं। उनके सिर पर मुकुट,कानों में कुंडल और शरीर पर कवच भी है। वे आश्चर्यजनक रूप से पैरों में जूते भी पहने हुए हैं। उनके आसपास उनके पुत्र गण भी खड़े हैं। वे अश्वमुखी और अश्वनी कुमार हैं। प्रतिमा में सूर्य की पत्नियां ऊषा और प्रत्युषा भी मौजूद हैं। वे धनुष वाण लिए हुए खड़ी हैं। प्रतिमा के एक कोने पर शिव भी दिखाई दे रहे हैं। इस विलक्षण प्रतिमा को देखकर रटौल की शिल्पकारों की कल्पनशीलता और उनके उत्कृष्ट कार्य के बारे में अनुमान लगाया जा सकता है।

देवी अंबिका की प्रतिमा - इससे आगे बढ़े तो रटौल से ही मिली देवी अंबिका की एक प्रतिमा दिखाई देती है। इसमें देवी बैठी हुई मुद्रा में हैं। उनके एक हाथ में कमल पुष्प है। उनके गोद में एक बालक भी है। प्रतिमा के दोनों तरफ हथियार लिए हुए अंगरक्षक भी हैं। यह प्रतिमा भी मध्यकालीन है। मथुरा के संग्रहालय में रटौल से प्राप्त कुल नौ मूर्तियां हैं।
मथुरा के इस संग्रहालय में रटौल की इन मूर्तियों को देखकर इस गांव के समृद्ध इतिहास के बारे में पता चलता है। पता नहीं आजकल इस गांव में शिल्पकार रहते हैं या नहीं।

मथुरा संग्रहालय का निर्माण - सन 1874 में तत्कालीन अंग्रेज कलेक्टर एफएस ग्राउज ने यहां खुदाई के दौरान मिली कलाकृतियों में दिलचस्पी दिखाई। उसने इन्हें सहेजने के लिए कचहरी के पास स्थित जमालपुर टीले पर बने विश्राम गृह में एक संग्रहालय की स्थापना की। पर 1933 में इस संग्रहालय को डेम्पियर नगर में शिफ्ट कर दिया गया। अब यह उत्तर प्रदेश का अत्यंत समृद्ध संग्रहालय है। 

-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com

-        ( MATHURA, MURTI, RATAUL, BAGPAT, UP )



4 comments:

  1. वाह विद्युत जी क्या बात है.....कहां आप मथुरा चले गए यहां रटौल आइये इन टीलों से आपकी मुलाकात करायी जाएगी।

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    1. अच्छा दिन ठीक होने पर आएंगे

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  2. कलाकृतिओ को देखकर शिल्पियों की अदभुत सृजनशीलता रोमांचित करती हैं. भारतीय संस्कृति की समृद्ध विरासत का यह अद्वितीय संग्रह हैं.. रटौल से प्राप्त इन मूर्तियों के साथ साथ वहां के सुस्वाद आम का उल्लेख उसकी एक और विशिष्टता है. मै इसके स्वाद और सुगंध से परिचित हू... वास्तव मे यह अविस्मरणीय है.. देसी आम की प्रजातियां अब विलुप्त हो चुकी हैं... मुझे याद हैं दिल्ली की आज़ादपुर मंडी मे रटौल आम के लिए लोगो को व्यापारियों की खुशामद करते हुए....रटौल की कलाकृतियों को संग्रहालय मे देखा जा सकता हैं लेकिन वहां के आम का स्वाद अब सुलभ नहीं.....

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