Saturday, May 23, 2020

महादेव का पांचवां ज्योतिर्लिंग मंदिर - केदारनाथ धाम (05 )

केदारनाथ मंदिर ( 16 सितंबर 2019 की सुबह ) 


उत्तराखंड में हिमालय पर्वतमाला में स्थित केदारनाथ मंदिर देश के द्वादश ज्योतिर्लिंगम में शिव का पांचवा ज्योतिर्लिंग है। केदारनाथ का मंदिर समुद्र तल से 3584 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह 12 ज्योतिर्लिंग में सबसे ऊंचाई पर स्थित है। साथ ही सारे ज्योतिर्लिंग की तुलना में यहां तक पहुंचना थोड़ा कठिन कार्य है। 

मेरा सौभाग्य है कि मैं देश के अलग हिस्से में स्थित 11 ज्योतिर्लिंग के दर्शन के बाद 12वें और आखिरी ज्योतिर्लिंग के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त कर रहा हूं। सन 1990 में वाराणसी में पहले ज्योतिर्लिंग काशी विश्वनाथ का दर्शन का सौभाग्य मिला था। वैसे मां बताती हैं कि मैं उनके गोद में भी काशी विश्वनाथ के दर्शन करने गया था। सन 1991 में बोलबम की 120 किलोमीटर की पदयात्रा कर रावणेश्वर धाम यानी देवघर स्थित बाबा वैद्यनाथ धाम के दर्शन का सौभाग्य मिला था।

केदारनाथ का मंदिर तीन तरफ पहाड़ से घिरा है। एक तरफ है करीब 22 हजार फीट ऊंचा केदारनाथ शिखरदूसरी तरफ है 21600 फीट ऊंचा खर्चकुंड और तीसरी तरफ है 22700 फुट ऊंचा भरतकुंड। इस ज्योतिर्लिंग  के बारे में कहा जाता है कि हिमालय के केदार श्रृंग पर भगवान विष्णु के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थे। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शंकर प्रकट हुए और उनकी प्रार्थना पर प्रसन्न होकर ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा वास करने का वर प्रदान किया।

मंदिर कटवां पत्थरों के विशाल शिलाखंडों को जोड़कर बनाया गया है। ये शिलाखंड भूरे रंग के हैं। मंदिर छह फीट ऊंचे चबूतरे पर बना है। इसका गर्भगृह काफी प्राचीन बताया जाता है। मंदिर की विशालकाय छत एक ही पत्थर की बनी है। मंदिर के अंदर आठ पत्थर की बनीं मूर्तियां हैं। इनमें श्रीकृष्ण, युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल सहदेव माता कुंती की प्रतिमाएं हैं। यहां बीच में नदी की सुनहली प्रतिमा है। मंदिर के अंदर लक्ष्मीनारायण की भी प्रतिमा है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर द्वारपाल जय और विजय की प्रतिमा है। मंदिर के बाहर पत्थर की बनी नंदी की विशाल प्रतिमा है।


मंदिर के गर्भ गृह में शिवलिंगम नहीं बल्कि बैल पीठ के आकार की प्रतिमा है। कहा जाता है कि यहां पर महाभारत के युद्ध के बाद शिव ने पांडवों को पशु के रुप में दर्शन दिए थे। इसलिए केदारनाथ में पीठ के दर्शन होते हैं। जबकि नेपाल की राजधानी काठमांडु में स्थित पशुपतिनाथ मंदिर में उनकी मुखाकृति के दर्शन होते हैं।

पौराणिक तौर पर यह माना जाता है कि केदारनाथ मंदिर का निर्माण पांडवों ने कराया था। यह कहा जाता है कि आठवीं सदी में शंकराचार्य यहां आए थे। उन्होंने यहां पर नियमित पूजा शुरू कराई थी। कहा जाता है कि शंकराचार्य का निधन यहीं हो गया था। उनकी समाधि मंदिर के पीछे हुआ करती थी, जो 2013 के आपदा में तबाह हो गई।

पांडवों को मिली थी मुक्ति - महाभारत के युद्ध में विजयी होने पर पांडव गोत्रहत्या के पाप से मुक्ति पाना चाहते थे। इसके लिए वे भगवान शंकर का आशीर्वाद पाना चाहते थे। शिव के दर्शन के लिए वे काशी गएपर वे उन्हें वहां नहीं मिले। वे लोग उन्हें खोजते हुए हिमालय पहुंचे। भगवान शंकर पांडवों को दर्शन नहीं देना चाहते थेइसलिए वे केदार में जा बसे। पांडव उनका पीछा करते हुए केदार पहुंच गए। भगवान शंकर ने तब तक बैल का रूप धारण कर लिया। तब भीम ने अपना विशाल रूप धारण कर दो पहाडों पर पैर फैला दिया। अन्य सब गाय-बैल तो निकल गएपर शंकर जी पैर के नीचे से जाने को तैयार नहीं हुए। भीम ने उन्हें पहचान लिया। उन्होंने बैल की पीठ को पकड़ लिया। शिव पांडवों की भक्ति देख कर प्रसन्न हो गए। उन्होंने तत्काल दर्शन दे उन्हें पाप मुक्त कर दिया। उसी समय से यहां शिव बैल की पीठ की आकृति के रूप में पूजे जाते हैं।

राजा भोज ने बनवाया केदारनाथ मंदिर - ऐतिहासिक तौर पर यह माना जाता है कि वर्तमान केदारनाथ मंदिर का निर्माण दसवीं सदी में मालवा के राजा भोज ने करवाया था। मंदिर के निर्माण इतनी कुशलता और वैज्ञानिकता के साथ किया गया कि यह हर तरह के आपदा को झेलने में सक्षम हो। ग्वालियर से मिले राजा भोज के स्तुति पत्र के अनुसार राजा भोज ने 1076 से 1099 के बीच केदारनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण कराया था। 

परमार वंश के सबसे महान शासक राजा भोज ने धार में 1000 ईसवी से 1055 ईसवी तक शासन किया था। महापंडित राहुल सांकृत्यायन के अनुसार यह मंदिर 12-13वीं शताब्दी का है। वहीं इतिहासकार डॉक्टर शिव प्रसाद डबराल मानते हैं कि शैव लोग आदि शंकराचार्य से पहले से ही केदारनाथ जाते रहे हैं तब भी यह मंदिर मौजूद था।

मंदिर खुलने का समय - मंदिर दर्शनार्थियों के लिए सुबह 6.00 बजे से खुलता है। दोपहर बाद तीन बजे तक लगातार श्रद्धालु दर्शन करते हैं। दोपहर 3 से 4 विशेष पूजा होती है और फिर मंदिर बंद कर दिया जाता है। इस दौरान मंदिर की साफ सफाई और बाबा का श्रंगार होता है। शाम 5 बजे श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए मंदिर फिर से खोला जाता है।
केदारनाथ मंदिर के पास बहती मंदाकिनी नदी की धारा। 

शाम को मंदिर खुलने से पहले मंदिर के पुजारी और सेवक भगवान शिव की पांच मुख वाली प्रतिमा का विधिवत श्रृंगार करते है। हर रोज शाम को 7 से 8 नियमित आरती होती है। इस दौरान शिव के श्रंगार रुप के  दर्शन किए जा सकते हैं। काफी श्रद्धालु इस रूप के दर्शन का इंतजार करते हैं। रात को 8.30 बजे मंदिर फिर से बंद कर दिया जाता है। 
( आगे पढ़िए - शिव का डमरू डम डम बाजे ) 

-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
( KEDAR NATH, RUDRA PRAYAG, UTTRAKHAND, KEDAR-11) 

4 comments:

  1. बढ़िया जानकारी

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  2. Nice sir...aapki to life ghumte huye nikal rhi hai

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    1. ये लॉकडाउन से पहले की यात्रा है

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