Sunday, May 31, 2020

केदारनाथ मंदिर - साल 2013 के आपदा के बाद


बाबा केदारनाथ के नियमित दर्शन के लिए आने वाले लोग साल 2013 को याद करके सिहर उठते हैं। जून माह में आई इस आपदा ने पूरी केदारघाटी के स्वरुप को ही बदल दिया। सिर्फ मुख्य मंदिर ही बचा रहा, पर मंदिर के आसपास का सब कुछ तबाह हो गया। इस घटना के गवाह रहे कई लोगों से हमारी इस यात्रा के दौरान मुलाकात हुई। 



बताया जाता है कि मंदिर के ठीक पीछे विशाल पत्थर आ गया। इस पत्थर के कारण पहाड़ो से तेज गति से आ रहा पानी दो हिस्सों में बंट गया। इसकी वजह से मंदिर को कोई नुकसान नहीं हुआ पर  मंदिर के आसपास के सारे भवन तबाह हो गए। इस पत्थर को भीम शिला कहते हैं। लोग कहते हैं महाबली भीम ने एक बार फिर मंदिर को बचा लिया।



तिवारी होटल के 22 कर्मचारी बह गए - मंदिर के पास तिवारी रेस्टोरेंट जहां हमने कई बार खाना खाया, इस रेस्टोरेंट के मालिक तिवारी जी उस आपदा को याद करते सिहर उठते हैं। वे बताते हैं कि वह नजारा भयावह था। मेरा भाई उस आपदा में चला गया। हमारे होटल में काम करने वाले 22 कर्मचारियों का बाद में कुछ पता नहीं चला। वे सब पानी में बह गए थे। जब पानी तेजी से आया तो बड़ी संख्या में लोगों ने हमारे होटल की छत पर लंबा वक्त गुजारकर किसी तरह जान बचाई थी।


आपदा की रात -
वह 16 जून 2013 की रात थी। तीन दिन से लगातार हो रही बारिश के बाद अचानक बड़ी तबाही की वह घड़ी आई, जब प्रकृति का तांडव शुरू हुआ। सबसे पहले लोगों ने भैरोनाथ मंदिर वाली पहाड़ी की तरह के कुछ हिस्से को टूटते हुए देखा। उसके बाद मंदिर के आसपास सब कुछ तेजी से डूबने लगा, बर्बाद होने लगा। लोगों के पास बचने का कोई रास्ता नहीं था। 
मरने वालों का सही आंकड़ा नहीं - थोड़ी देर मे केदारनाथ में बने हेलीपैड को नदी बहा ले गई। इस आपदा में केदारनाथ, रामबाड़ा, गौरीकुंड, सोन प्रयाग, चंद्रापुरी, अगस्त्य मुनि में भारी नुकसान हुआ। सिर्फ दस में पांच हजार से ज्यादा लोगों की जान चली गई। मरने वालों का सही आंकड़ा आज तक नहीं पता चल सका है।


शनेश्वर महादेव मंदिर तबाह हुआ केदारनाथ मंदिर के बगल में स्थित शनेश्वर महादेव मंदिर आपदा के दौरान ध्वस्त हो गया। क्योंकि उसके पीछे कोई शिला नहीं थी जल धारा से बचाने के लिए। उस मंदिर की मूर्तियां बची हुई हैं। इस मंदिर को दुबारा बनाने की बात चल रही है। पर छह साल बाद भी इस मंदिर को पुराने स्वरूप में नहीं बनाया जा सका है।





इस आपदा ने आपदा ने केदारनाथ यात्रा के मध्य पड़ाव रामबाड़ा का तो नामोनिशान ही मिटा डाला। वहां कुछ नहीं बचा। नदी पुल होटल, दुकानें सब कुछ तबाह हो गया। केदारनाथ मंदिर के आसपास अभी भी कई कलात्मक और बहुमूल्य मूर्तियां यूं ही खुले में पड़ी हुई दिखाई दे जाती हैं। 



अब क्रेन और जीप पहुंच गई – साल 2019 में मैं एक बार फिर देख रहा हूं। केदार घाटी में नव निर्माण जारी है। निर्माण के नाम पर मंदाकिनी नदी के धाराओं के किनारे मरीन ड्राईव बनाया जा रहा है। हिमालय के इस सुंदर क्षेत्र में गुजरात से कृत्रिम टाइल्स लाकर बिछाई जा रही है। 

मंदाकिनी के पुल के किनारे विशाल चौबारा और सीढ़ीदार घाट बना दिए गए हैं। इससे केदारनाथ का वातावारण नकली होता जा रहा है। उसका प्राकृतिक सौंदर्य खत्म हो रहा है। अगर ये सब कुछ करना भी था तो यहीं के प्राकृतिक पत्थरों से सजावट का काम किया जाना चाहिए थे। दो विशाल क्रेन यहां दिन रात चल रहे हैं। आखिर इतना विशाल क्रेन केदारनाथ मंदिर तक पहुंचा कैसे होगा। क्या टुकड़ों-टुकड़ों में हेलीकॉप्टर से परिवहन करके लाया गया होगा।




एक विदेशी मल्टी यूटीलिटी जीप भी केदारनाथ मंदिर के पास पहुंच गई है। ये सब कुछ मिलकर केदारनाथ मंदिर के आसपास सौंदर्यीकरण के नाम पर यहां के प्राकृतिक वातावरण के साथ बड़ी छेड़छाड़ कर रहे हैं। आवास के लिए पंडों ने एक बार फिर नए भवन बना लिए हैं। इन भवनों में टाइल्स, मार्बल सब कुछ लग गया है। आखिरी इतनी सुविधाओं की केदारघाटी में जरूरत ही क्यों है।

ध्यान के नाम पर नई-नई कृत्रिम गुफाएं तैयार की जा रही हैं। अब ध्यान को भी अब एक कारोबार बना दिया गया है। ध्यान की ऑनलाइन बुकिंग भी शुरू हो गई है। इन सबके बीच अगर बाबा केदार को एक बार फिर गुस्सा आया तो क्या होगा। इस बीच 25 सितंबर 2019 को अखबार में एक रिपोर्ट आई है कि इस बार बड़ी संख्या में लोगों ने बाबा केदार के दर्शन किए।


श्री केदारनाथ मंदिर के परिसर में कापुर वाले एसपी अग्निहोत्री जी के साथ। 

रिकॉर्ड दर्शनार्थी पहुंचे - साल 2019 में केदारनाथ के दर्शन करने वालों की संख्या 9 लाख के पार कर गई है। यह संख्या किसी भी साल से ज्यादा है। श्रद्धालुओं को हम केदारनाथ आने से मना नहीं कर सकते। पर जरूरत इस बात की है कि केदारघाटी के प्राकृतिक वातावरण से ज्यादा छेड़छाड़ नहीं की जाए। हमें राजाभोज से प्रेरणा लेने की जरूरत है जिन्होंने मंदिर के निर्माण में पत्थरों का इस्तेमाल किया और मंदिर आज भी मौसम की मार से बचते हुए गर्व से खड़ा है। ( आगे पढ़िए - केदारनाथ से वापसी का सफर ...
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( KEDARNATH 2013 APDA, NEW CONSTRUCTION, KEDAR-15  ) 


Friday, May 29, 2020

भैरोनाथ मंदिर और साधुओं की ध्यान गुफाएं


केदारनाथ मंदिर के दर्शन के बाद अक्सर श्रद्धालु भैरोनाथ मंदिर के दर्शन करने जाते हैं। मुख्य मंदिर के भैरोनाथ की दूरी तकरीबन एक किलोमीटर है। मंदिर तक जाने के लिए सीधी चढ़ाई है। पर रास्ता अच्छा बना हुआ है। मंदाकिनी नदी के पुल को पार करके भैरोनाथ के लिए चढ़ाई चढ़नी पड़ती है। भैरोनाथ को केदारनाथ क्षेत्र का क्षेत्रपाल देवता माना जाता है। हर साल केदारनाथ मंदिर के कपाट खुलने से पहले भैरोनाथ की पूजा की जाती है। साल के छह महीने जब केदारनाथ मंदिर के कपाट बंद रहते हैं तो भैरवनाथ ही केदारघाटी की सुरक्षा करते हैं। इसलिए वे केदारघाटी के संरक्षक हैं। 

साल 2013 में आई भीषण आपदा में भैरोनाथ मंदिर को बिल्कुल हानि नहीं पहुंची। भैरोनाथ मंदिर में जो मूर्तियां स्थापित की गई हैं उनके ऊपर कोई छत नहीं है। यह एक खुला हुआ मंदिर है।
भैरोनाथ का मंदिर के दर्शनकेदारनाथ मंदिर के दर्शन के बाद दोपहर में हमलोग भैरोनाथ के मंदिर के दर्शन के लिए चल पड़े। मंदिर तक पहुंचने में आधे घंटे का वक्त लगा होगा। मंदिर तक पहुंचने के लिए सीधी चढ़ाई है। जब आप केदारनाथ तक पदयात्रा करके आ गए हैं तो भैरोनाथ जाना कोई मुश्किल काम नहीं है। हालांकि केदारनाथ आने वाले सारे लोग भैरोनाथ के मंदिर तक नहीं जाते हैं।  


केदारघाटी का अदभुत नजारा - भैरोनाथ मंदिर की ऊंचाई से पूरी केदारघाटी का सुंदर नजारा दिखाई देता है। यहां से बाबा केदार के मंदिर में दर्शन करते श्रद्धालु। हेलीपैड से बार-बार उड़ान भरते और उतरते हुए हेलीकॉप्टर दिखाई देते हैं। जब आप मंदिर की ऊंचाई पर पहुंचते हैं तो वहां से जल्दी उतरने की इच्छा नहीं होती। हल्की बारिश और बादलों के बीच हमारी भैरोनाथ मंदिर तक की यात्रा यादगार रही। थोड़ा वक्त वहां गुजराने के बाद हमलोग उतरने लगे। उतरते हुए कानपुर वाले अग्निहोत्री जी एक बार फिर मिल गए। 

संत रामानंद का आश्रम – केदारनाथ मंदिर से चार किलोमीटर की दूरी पर गरुड़ चट्टी के पास संत रामानंद का आश्रम है। इस स्थल को हनुमान गुफा भी कहते हैं। हमें स्थानीय साधुओं ने बताया कि मंदिर के कपाट बंद होने के बाद बर्फबारी में भी संत रामानंद का आश्रम गुलजार रहता है। यहां से साधु लोग कहीं नहीं जाते। संत रामानंद के आश्रम में हर मौसम में रहने योग्य सुविधाएं मौजूद हैं। दरअसल केदारनाथ पदयात्रा का पुराना मार्ग गरुड़ चट्टी से ही होकर आता था। अब आपको संत के आश्रम तक जाने के लिए पुराना रास्ता अपनाना पड़ेगा।  

रामानंद आश्रम की अपनी गौशाला है। यहां तक कि आश्रम का पास अपना पनबिजली प्लांट भी है। वे पांच किलोवाट बिजली खुद बना लेते हैं।   
आश्रम के पास ही हनुमान गुफा भी है। जो कभी केदारनाथ आने वाले श्रद्धालुओं के आकर्षण के केंद्र हुआ करती थी। केदारनाथ मंदिर से गरुड चट्टी होते हुए लिंचोली का वैकल्पिक मार्ग हुआ करता था। पर आपदा के बाद ये मार्ग नाममात्र का रह गया है।





साधुओं की ध्यान गुफाएं – केदारनाथ क्षेत्र में कई ध्यान गुफाएं बनी हुई हैं। इन गुफाओं में साधु लोग ध्यान करते हैं। कई गुफाओं के बारे में तो आमलोगों को मालूम भी नहीं है। कई साधु हनुमान गुफा में भी ध्यान लगाते हैं। अभी हाल में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल पर केदारनाथ में ध्यान गुफा का निर्माण कराया गया है। इसमें ध्यान करने के लिए ऑनलाइन बुकिंग होती है। ध्यान करने का शुल्क भी रखा गया है।



पर ध्यान करने के लिए वास्तव में किसी गुफा का होना जरूरी है क्या। आप चाहे जहां चाहें ध्यान लगा सकते हैं। दिन भर बाबा केदारनाथ धाम में इधर उधर घूमने के बाद रात्रि भोजन के बाद अब सोने की बारी थी। पर मेरी आंखों में नींद नहीं है। नींद न आने पर मैंने मोबाइल में हेडफोन लगाकर अपने पसंद के पुराने शास्त्रीय गीतों को सुनना शुरू कर दिया। दो घंटे संगीत सुनने के बाद नींद तो आ गई। 

पर बमुश्किल दो घंटे सोने के बाद सुबह के तीन बजे फिर नींद खुल गई।  मैं अपने बिस्तर पर ही बैठकर ध्यान करने लगा। एक घंटे ध्यान और प्राणयाम करने के बाद सुबह होने वाली है तो अब मैंने अपने साथियों को जगाया। केदारघाटी में रात भर हल्की बारिश हुई थी। पर सुबह में यह बारिश रुक गई है। तारीख के हिसाब से देखें तो केदारनाथ मंदिर परिसर में हमारा तीसरा दिन है। इस ब्रह्मवेला में हम एक बार फिर केदारनाथ मंदिर के दर्शन कर रहे हैं।    
- विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com  
(KEDARNATH TEMPLE, BHAIRONATH TEMPLE, SANT RAMANAND ASHRAM, KEDAR 14 ) 
श्री केदारनाथ मंदिर - सुबह सुबह 


Wednesday, May 27, 2020

बाबा केदार के धाम में रात्रि विश्राम- एक अलौकिक अनुभूति


केदारनाथ आने वाले बहुत से श्रद्धालु ऐसे हैं तो अहले सुबह पहुंचकर दर्शन करने के बाद लौट जाते हैं। पर ज्यादातर श्रद्धालु कम से कम एक रात यहां रुक कर वापस जाते हैं। कई लोग केदारधाम में ऱात्रि विश्राम को सौभाग्य मानते हैं। लगातार 21 बार से ज्यादा केदारनाथ की यात्रा कर चुके हमारे दिल्ली के साथी महेश कटारिया जी ने भी सलाह दी कि केदारनाथ धाम में आपको एक दिन तो रुकना ही चाहिए। 
बारिश के बाद शाम की आरती के समय बाबा केदारनाथ का मंदिर। 

हमलोग तो रात नौ बजे के बाद केदारनाथ पहुंचे थे। तो पहली रात तो रुकना ही था। पर अगले दिन दर्शन के बाद हमारे साथियों को केदारनाथ के अलौकिक और आधात्मिक वातवरण में इतने रम गए कि वे एक दिन और रुकने की बात करने लगे। हमने भी हामी भर दी। इसका लाभ हुआ कि हम शाम की आरती में शामिल हो सके।

केदारनाथ में आवास –  केदारनाथ धाम में मंदिर के आसपास आवास की सुविधा उपलब्ध है। ये आवास अलग अलग पंडा लोगों द्वारा बनवाए गए धर्मशाला हैं। साल 2013 की आपदा में इनमें से काफी आवास क्षेत्र तबाह हो गए थे। पर अब उनमें से काफी का पुनर्निर्माण हो गया है। हमारे पहले दिन का ठिकाना बना पंजाब एंड सिंध आवास। इसके कमरे बड़े और सुंदर बने हुए हैं। वे सुबह स्नान के लिए गर्म पानी भी उपलब्ध करा देते हैं। पर कमरे का कुछ तय किराया नहीं है। जैसे यजमान उस हिसाब से दान का राशि तय होती है। इसके प्रभारी पंडित विट्ठल अवस्थी हैं।

वैसे केदारनाथ में कई धर्मशालाओं में आपको 700 से 1000 रुपये में डबल या ट्रिपल बेड का कमरा मिल जाएगा। अगले दिन पंजाब सिंध का कमरा खाली नहीं था। तो हमने अलीगढ़ हाथरस में जाकर शरण ली। इनके यहां हमें 1000 रुपये में चार बेड वाला कमरा मिला। केदारनाथ में हिमाचल, पाटलिपुत्र जैसे अलग अलग शहरों के नाम पर कई आवास क्षेत्र बने हुए हैं। सुविधाओं के हिसाब से इनका किराया तय होता है।

वैसे आप बेस कैंप के बाद रास्ते में कई जगह तंबू वाले आश्रय स्थल में ठहर सकते हैं। यहां पर 250  से 300 रुपये प्रति व्यक्ति रहने की सुविधा मिल सकती है। यहां पर गढ़वाल मंडल का अतिथिगृह भी बना हुआ है। इसमें भी डारमेटरी और रहने के लिए कमरे बने हुए हैं।

भोजन और नास्ता – केदारनाथ मे भोजन और नास्ता की बात करें तो बहुत ही सीमित विकल्प हैं। मंदिर के पास कुल चार पांच औसत दर्जे के रेस्टोरेंट हैं। यहां पर आपको 120 से 150 रुपये की खाने की थाली मिलती है। इससे कम में खाना हो तो 50 रुपये में एक पराठा या फिर मैगी आदि खा सकते हैं। समोसा और पूरियां भी खाने के लिए मिल जाती है। मंदिर के पास तिवारी रेस्टोरेंट खाने के लिए सबसे अच्छी जगह है। यहां पर कलाकंद और कुछ मिठाइयां भी मिल जाती हैं। हमने यहां रात को थाली तो दिन मे पराठे खाए।

मंदिर के पास चाय बिस्किट का लंगर केदारनाथ के ठंडे मौसम और बारिश के बीच अगर आपको अच्छी सी चाय पीने को मिल जाए तो क्या कहना। और वह भी मुफ्त में। मंदिर के दाहिनी तरफ हर रोज दोपहर 2 बजे से शाम 6.30 बजे तक चाय का लंगर लगता है। यह लंगर महाराष्ट्र की एक संस्था द्वारा लगाया जाता है। यहां पहुंचने वालों को वे बड़ी श्रद्धा से चाय पीलाते हैं। 


चाय के साथ कई बार बिस्कुट भी मिलता है। यहां चाय बनाने की तकनीक काफी अत्याधुनिक है। इसमें वाघ बकरी कंपनी की इंस्टेंट मिक्स से चाय बनाई जाती है। ऐसा मिक्स जिसमें चाय पत्ती, चीनी, दूध सब कुछ मिला हुआ है पहले से ही। चाय का स्वाद बहुत अच्छा होता है। लंगर लगाने वाली संस्था इस चाय के लंगर पर रोज सात से आठ हजार रुपये खर्च करती है। इतनी ऊंचाई पर जहां सारा सामान नीचे से ढोकर लाना पड़ता है। पुणे की एक संस्था द्वारा रोज लंगर चलाना बड़ा ही सम्मानजनक कार्य है। उनकी इस सेवा को नमन। हां स्टाक रहने पर लोगों को कभी कभी चाय के साथ यहां बिस्कुट नमकीन भी मिलता है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com
 ( SRI KEDARANTH TEMPLE, LODGING. FOOD, TEA, KEDAR -13 ) 
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Monday, May 25, 2020

केदारनाथ - शिव का डमरु डम डम बाजे


हमलोग रात साढ़े नौ बजे केदारनाथ मंदिर परिसर में पहुंचने के बाद भोजन के लिए मंदिर के पास स्थित तिवारी भोजनालय में पहुंचे। अभी खाने का आर्डर करने की सोच ही रहे थे कि वहां काउंटर पर भभूत लगाए एक साधु के दर्शन हुए। मैंने श्रद्धा से उन्हें नमस्कार किया। उन्होंने भी आशीर्वाद दिया साथ ही उन्होंने मुझसे कोल्ड ड्रिंक पीने की इच्छा जताई।
वे स्प्राइट की एक बोतल पीना चाहते थे जो 80 रुपये की मिल रही थी। मैंने उन्हें वह बोतल दिलवाई दी। साथ में कुछ मिठाइयां भी। ये सब कुछ लेकर वे प्रसन्न होकर चले गए। पता नहीं क्यों ऐसा करके मुझे भी आत्मिक प्रसन्नता हुई।
बाबा केदारनाथ के मंदिर में साधुओं की अलग दुनिया है। यहां पर आपका साक्षात्कार अलग-अलग तरह के साधुओं से होता है। पहली रात से लेकर अगले दिन, दिन भर भभूत लगाए कई साधुओं के वार्ता करने और उनका आशीर्वाद पाने का मौका मिला। 

प्रसाद में चौलाई के लड्डू - अगले दिन सुबह स्नान करने के बाद हमलोग सुबह आठ बजे मंदिर में दर्शन के लिए लाइन में लग गए। तकरीबन तीन घंटे बाद हमारा नंबर आया। इस दौरान हमारा परिचय चेन्नई से आए मनोज चक्रवर्ती और उनके परिवार से हुआ। वे देश भर के मंदिरों और उनके वास्तु के बारे में अच्छी जानकारी रखते हैं। 



कानपुर का श्रीवास्तव और अग्निहोत्री परिवार भी दर्शन के लिए पंक्ति में लगा है। कई लोग प्रसाद की थाली लेकर लाइन में लगे हैं। ये थाली 101 रुपये से लेकर 251 रुपये तक है। केदारनाथ का प्रसाद मुख्य रुप से गुड़ के बने चौलाई के लड्डू होते हैं। ये स्वाद में काफी अच्छे होते हैं। ये लड्डू स्थानीय महिलाओं के स्व सहायता समूह द्वारा बनाए जाते हैं।

मंदिर के दाहिने, बाएं और पीछे की तरफ साधु गण बैठे रहते हैं। केदारनाथ आने वाले श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार इस साधुओं को दान देते हैं। दोपहर में गले में रुद्राक्ष की ढेर सारी माला डाले एक साधु ने मुझे अपने पास बुलाया। उसने कहा, देखो भक्त, 350 रुपये में रसगुल्ले का एक डिब्बा आता है। एक डिब्बा लाकर हमें दे दो। साधुओं को खाकर तृप्ति मिल जाएगी। इसी तरह हमारे एक साथी ने भभूत लगाए एक साधु से पूछ लिया – बाबा आपको केदारनाथ में ठंड नहीं लगती। बाबा जी बोले उठे, हां लगती है ना,  ऐसा करो दो हजार रुपये का एक कंबल आएगा। खरीदकर हमें दान कर दो।

हमें दिन में एक नागा संप्रदाय के युवा साधु मिले। उन्होंने बताया कि छह माह केदारनाथ में रहने के बाद बरेली के पास फरीदपुर स्थित आश्रम चला जाता हूं। मैंने उनसे पूछा ये साधु लोग रसगुल्ले और शीतलपेय की मांग करते हैं। क्या ये उचित है। वह साधु बनने के बाद भी जिह्वा की लालसा से ऊपर क्यों नहीं उठ पाएं हैं.. युवा साधु ने जवाब दिया। इसमें कुछ गलत नहीं है। हमें मन की आवाज सुननी चाहिए। जो मन खाने की इच्छा करे, वह मांगने में कोई दोष नहीं है।

उन्होने बताया कि केदारनाथ के साधुओं को जो दान छह माह में मिलता है उसी दान राशि से उनका अगले छह माह का काम चलता है। हालांकि लंबी चर्चा करने वाले उस युवा साधु ने मुझसे दान में कुछ नहीं लिया। केदारनाथ में रहने वाले ज्यादातर साधु मंदिर के कपाट बंद होने पर मैदानी इलाकों में चले जाते हैं। पर कुछ साधुओं ने मुझे बताया कि वे पहाड़ की गुफाओं में एकांत वास में बर्फबारी के छह माह गुजार देते हैं। इस दौरान उनका कहना था कि जड़ी-बूटी खाकर गुजारा करते हैं।

केदारनाथ मंदिर परिसर में शाम की आरती का नजारा भव्य होता है। सात से आठ बजे तक आरती के दौरान केदारनाथ के श्रंगार दर्शन होते हैं। हल्की बारिश के बीच हमने आरती में आनंदित होकर हिस्सा लिया। इस दौरान एक साधु महाराज खूब श्रंगार करके डमरू बजा रहे थे। लोग उनके साथ तस्वीरें खिंचवाने के लिए उतावले थे। वे भी किसी को निराश नहीं कर रहे थे।   

छह माह बंद रहता है मंदिर – बाबा केदार का मंदिर गर्मियों के दौरान केवल 6 महीने के लिए खुला रहता है। यह तीर्थ स्थान सर्दियों के दौरान बंद रहता है। क्योंकि इस दौरान क्षेत्र में भारी बर्फबारी के कारण यहां की जलवायु प्रतिकूल हो जाती है। इस दौरान केदारनाथ के मूल निवासी भी निचले क्षेत्रों में चले जाते हैं और भगवान केदारनाथ की पालकी को उखीमठ पहुंचा दिया जाता है और पूरे शीतकाल पूजा यहीं होती है। पालकी आने जाने की प्रक्रिया तीन दिनों में पूरी होती है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
( SADHU OF KEDAR NATH, SHIV KA DAMRU DAM DAM BAJE, KEDAR -12  ) 


Saturday, May 23, 2020

महादेव का पांचवां ज्योतिर्लिंग मंदिर - केदारनाथ धाम (05 )

केदारनाथ मंदिर ( 16 सितंबर 2019 की सुबह ) 


उत्तराखंड में हिमालय पर्वतमाला में स्थित केदारनाथ मंदिर देश के द्वादश ज्योतिर्लिंगम में शिव का पांचवा ज्योतिर्लिंग है। केदारनाथ का मंदिर समुद्र तल से 3584 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह 12 ज्योतिर्लिंग में सबसे ऊंचाई पर स्थित है। साथ ही सारे ज्योतिर्लिंग की तुलना में यहां तक पहुंचना थोड़ा कठिन कार्य है। 

मेरा सौभाग्य है कि मैं देश के अलग हिस्से में स्थित 11 ज्योतिर्लिंग के दर्शन के बाद 12वें और आखिरी ज्योतिर्लिंग के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त कर रहा हूं। सन 1990 में वाराणसी में पहले ज्योतिर्लिंग काशी विश्वनाथ का दर्शन का सौभाग्य मिला था। वैसे मां बताती हैं कि मैं उनके गोद में भी काशी विश्वनाथ के दर्शन करने गया था। सन 1991 में बोलबम की 120 किलोमीटर की पदयात्रा कर रावणेश्वर धाम यानी देवघर स्थित बाबा वैद्यनाथ धाम के दर्शन का सौभाग्य मिला था।

केदारनाथ का मंदिर तीन तरफ पहाड़ से घिरा है। एक तरफ है करीब 22 हजार फीट ऊंचा केदारनाथ शिखरदूसरी तरफ है 21600 फीट ऊंचा खर्चकुंड और तीसरी तरफ है 22700 फुट ऊंचा भरतकुंड। इस ज्योतिर्लिंग  के बारे में कहा जाता है कि हिमालय के केदार श्रृंग पर भगवान विष्णु के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थे। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शंकर प्रकट हुए और उनकी प्रार्थना पर प्रसन्न होकर ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा वास करने का वर प्रदान किया।

मंदिर कटवां पत्थरों के विशाल शिलाखंडों को जोड़कर बनाया गया है। ये शिलाखंड भूरे रंग के हैं। मंदिर छह फीट ऊंचे चबूतरे पर बना है। इसका गर्भगृह काफी प्राचीन बताया जाता है। मंदिर की विशालकाय छत एक ही पत्थर की बनी है। मंदिर के अंदर आठ पत्थर की बनीं मूर्तियां हैं। इनमें श्रीकृष्ण, युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल सहदेव माता कुंती की प्रतिमाएं हैं। यहां बीच में नदी की सुनहली प्रतिमा है। मंदिर के अंदर लक्ष्मीनारायण की भी प्रतिमा है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर द्वारपाल जय और विजय की प्रतिमा है। मंदिर के बाहर पत्थर की बनी नंदी की विशाल प्रतिमा है।


मंदिर के गर्भ गृह में शिवलिंगम नहीं बल्कि बैल पीठ के आकार की प्रतिमा है। कहा जाता है कि यहां पर महाभारत के युद्ध के बाद शिव ने पांडवों को पशु के रुप में दर्शन दिए थे। इसलिए केदारनाथ में पीठ के दर्शन होते हैं। जबकि नेपाल की राजधानी काठमांडु में स्थित पशुपतिनाथ मंदिर में उनकी मुखाकृति के दर्शन होते हैं।

पौराणिक तौर पर यह माना जाता है कि केदारनाथ मंदिर का निर्माण पांडवों ने कराया था। यह कहा जाता है कि आठवीं सदी में शंकराचार्य यहां आए थे। उन्होंने यहां पर नियमित पूजा शुरू कराई थी। कहा जाता है कि शंकराचार्य का निधन यहीं हो गया था। उनकी समाधि मंदिर के पीछे हुआ करती थी, जो 2013 के आपदा में तबाह हो गई।

पांडवों को मिली थी मुक्ति - महाभारत के युद्ध में विजयी होने पर पांडव गोत्रहत्या के पाप से मुक्ति पाना चाहते थे। इसके लिए वे भगवान शंकर का आशीर्वाद पाना चाहते थे। शिव के दर्शन के लिए वे काशी गएपर वे उन्हें वहां नहीं मिले। वे लोग उन्हें खोजते हुए हिमालय पहुंचे। भगवान शंकर पांडवों को दर्शन नहीं देना चाहते थेइसलिए वे केदार में जा बसे। पांडव उनका पीछा करते हुए केदार पहुंच गए। भगवान शंकर ने तब तक बैल का रूप धारण कर लिया। तब भीम ने अपना विशाल रूप धारण कर दो पहाडों पर पैर फैला दिया। अन्य सब गाय-बैल तो निकल गएपर शंकर जी पैर के नीचे से जाने को तैयार नहीं हुए। भीम ने उन्हें पहचान लिया। उन्होंने बैल की पीठ को पकड़ लिया। शिव पांडवों की भक्ति देख कर प्रसन्न हो गए। उन्होंने तत्काल दर्शन दे उन्हें पाप मुक्त कर दिया। उसी समय से यहां शिव बैल की पीठ की आकृति के रूप में पूजे जाते हैं।

राजा भोज ने बनवाया केदारनाथ मंदिर - ऐतिहासिक तौर पर यह माना जाता है कि वर्तमान केदारनाथ मंदिर का निर्माण दसवीं सदी में मालवा के राजा भोज ने करवाया था। मंदिर के निर्माण इतनी कुशलता और वैज्ञानिकता के साथ किया गया कि यह हर तरह के आपदा को झेलने में सक्षम हो। ग्वालियर से मिले राजा भोज के स्तुति पत्र के अनुसार राजा भोज ने 1076 से 1099 के बीच केदारनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण कराया था। 

परमार वंश के सबसे महान शासक राजा भोज ने धार में 1000 ईसवी से 1055 ईसवी तक शासन किया था। महापंडित राहुल सांकृत्यायन के अनुसार यह मंदिर 12-13वीं शताब्दी का है। वहीं इतिहासकार डॉक्टर शिव प्रसाद डबराल मानते हैं कि शैव लोग आदि शंकराचार्य से पहले से ही केदारनाथ जाते रहे हैं तब भी यह मंदिर मौजूद था।

मंदिर खुलने का समय - मंदिर दर्शनार्थियों के लिए सुबह 6.00 बजे से खुलता है। दोपहर बाद तीन बजे तक लगातार श्रद्धालु दर्शन करते हैं। दोपहर 3 से 4 विशेष पूजा होती है और फिर मंदिर बंद कर दिया जाता है। इस दौरान मंदिर की साफ सफाई और बाबा का श्रंगार होता है। शाम 5 बजे श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए मंदिर फिर से खोला जाता है।
केदारनाथ मंदिर के पास बहती मंदाकिनी नदी की धारा। 

शाम को मंदिर खुलने से पहले मंदिर के पुजारी और सेवक भगवान शिव की पांच मुख वाली प्रतिमा का विधिवत श्रृंगार करते है। हर रोज शाम को 7 से 8 नियमित आरती होती है। इस दौरान शिव के श्रंगार रुप के  दर्शन किए जा सकते हैं। काफी श्रद्धालु इस रूप के दर्शन का इंतजार करते हैं। रात को 8.30 बजे मंदिर फिर से बंद कर दिया जाता है। 
( आगे पढ़िए - शिव का डमरू डम डम बाजे ) 

-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
( KEDAR NATH, RUDRA PRAYAG, UTTRAKHAND, KEDAR-11) 
देश में कहां कहां हैं 12 ज्योतिर्लिंग
1. सोमनाथ ( गुजरात)
2. श्री मल्लिकार्जुन स्वामी ( करनूल, आंध्र प्रदेश)
3. महाकालेश्वर ( उज्जैन, मध्य प्रदेश )
4. ओंकारेश्वर (खंडवा, मध्य प्रदेश )
5. केदारनाथ (रुद्रप्रयाग, उत्तराखंड )
6. भीमाशंकर (मंचर, पुणे, महाराष्ट्र)
7. काशी विश्वनाथ (वाराणसी, उत्तर प्रदेश)
8. त्र्यंबकेश्वर (नासिक, महाराष्ट्र)
9. वैद्यनाथ (देवघर, झारखंड)
10. नागेश्वर (द्वारका, गुजरात)
11. रामेश्वरम (रामनाथपुरम, तमिलनाडु)
12. घृष्णेश्वर मंदिर (औरंगाबाद, महाराष्ट्र)

Thursday, May 21, 2020

केदारनाथ – लिंचोली से बाबा मंदिर वाया छानी कैंप, बेस कैंप, रुद्रा प्वाइंट


केदारनाथ पदयात्रा के पूरे मार्ग में आपको लघु भारत के दर्शन होते हैं। बाबा के दर्शन करने दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, बिहार, बंगाल हर जगह के लोग रास्ते में मिलते रहते हैं। इस बीच हमारी मुलकात चार युवाओं से हुई जो ऋषिकेश से हमारे साथ चले थे। पर वे केदानाथ के दर्शन करके मेराथान गति से अब उतर रहे हैं। इनमें से एक युवा गाजियाबाद के वैशाली का रहने वाला है। उतरते हुए मुझे देखकर वह रुक जाता है और हमारा हालचाल पूछने लगता है।  

रास्ते में मुझे बिहार के सीतामढ़ी के अत्यंत समान्य परिवार की महिलाएं पूरी श्रद्धा से नंगे पांव बाबा के दरबार की ओर बढ़ी चली जा रही नजर आईं। उनके सिर पर एक गठरी है जिसमें कंबल और खाने पीने का सामान है। आस्था के आगे कई तरह की सुविधाएं गौण हैं। बस धुन में चलते जा रहे हैं। मन में लगन है बाबा के दर्शन की। तो हर राह आसान हो जाती है। केदारनाथ के रास्ते में कहीं-कहीं अब वाईफाई का इंतजाम प्रशासन की ओर से किया गया है। मोबाइल नेटवर्क आमतौर पर पूरे रास्ते साथ रहता है। 


बड़ी लिंचोली के आगे भी चढ़ाई है, पर उतनी खड़ी चढ़ाई अब नहीं है। उन्नाव वाले श्रीवास्तव जी के परिवार से अलग होकर मैं एक चाय की दुकान में रुककर अपने साथियों का इंतजार करने लगता हूं। ये चाय नास्ता वाले दुकानदार हिमाचल प्रदेश के चंबा इलाके के रहने वाले हैं। ये छह महीने तक यहीं पर रहते हैं। इस बीच शाम गहराने लगी है। आसमान में बादल अटखेलियां कर रहे हैं। फिजां में हल्की-हल्की ठंड घुलती जा रही है। रात होने के साथ मौसम बदल रहा है। इस बीच आधे घंटे के इंतजार के बाद वे लोग धीरे-धीरे चढ़ते हुए नजर आए। 

दरअसल मेरे साथी थकने लगे हैं। रास्ते में उन्होंने अपना बैग ढोने के लिए एक नेपाली पोर्टर अर्जुन की सहायता ली है। केदारनाथ के मार्ग में बड़ी संख्या में पोर्टर नेपाली लोग ही हैं। भले ही ये देखने में दुबले पतले होते हैं पर इनके अंदर पहाड़ों पर चढ़ने की और वजन ढोने की असीम ऊर्जा होती है। इस बीच शाम गहराने लगी है। हालांकि रास्ते में स्ट्रीट लाइट का इंतजाम है। पर केदारनाथ की पदयात्रा के मार्ग में आपके पास टार्च भी होना चाहिए। कई जगह अंधेरा होता है तो कई बार बिजली कट जाती है। ऐसे वक्त में हमारा मोबाइल टार्च काम आ रहा है।

हल्के अंधेरे में मैं अपने साथियों को उत्साहित करता हुआ धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा हूं। बड़ी लिंचोली से आगे चलते हुए हमलोग छानी कैंप पहुंच गए। अंधेरे में आसपास देखने के दिक्कत आ रही है। एक सुरक्षा में तैनात अर्ध सैनिक बल के जवान ने पूछने पर बताया कि आप छानी कैंप आ चुके हैं। यहां से बाबा का मंदिर चार किलोमीटर रह गया है। मंजिल निकट आने पर चलने का उत्साह बढ़ने लगता है। 



छानी कैंप से हौले हौले चलते हुए दो किलोमीटर और चलने के बाद हम रुद्र प्वाइंट पहुंच गए हैं। यहां पर यात्रा में थक कर बैठे मां बेटे से मुलाकात होती है। बुजुर्ग मां से मैंने पूछा आपको चलने में दिक्कत हो रही है। मां बोली नहीं, मैं तो चल पा रहा हूं मेरा बेटा थक जा रहा है। उनका 32 साल का मोटा थुलथुल बेटा गुरुग्राम के एमएनसी में काम करता है। मैंने उसे देखकर कहा, आप चिकेन खाना छोड़ दो। वह कहता है, ऐसा नहीं हो सकता।
हम फिर आगे की ओर चल पड़े हैं। इस बीच रास्ते में बर्फ से ढकी हुई पहाड़ी दिखाई देती है। वास्तव में इसके नीचे ग्लेसियर है। हमारे साथ चल रहे पोर्टर अर्जुन हमें बर्फ दिखाते हैं। हम उसे छूकर देखते हैं। खुशी होती है। पर इस बर्फीले ग्लेसियर के पास कोई खास ठंड नहीं है।

रुद्रा प्वाइंट से आधे किलोमीटर चलने के बाद बेस कैंप पहुंच गए हैं। बेस कैंप के बाद चढाई खत्म होती है। इसके बाद सीधा रास्ता है। हल्का सा उतार वाला। बेस कैंप से ही श्रद्धालुओं के रहने के लिए तंबू वाले आश्रय स्थल आरंभ हो जाते हैं। यहां पर आप चाहें तो 200 से 300 रुपये में तंबू किराये पर लेकर उसमें विश्राम कर सकते हैं। 

पर हमने तय कर लिया है कि बाबा के मंदिर पास चलकर ही ठहरने की जगह तलाश की जाएगी। मंजिल के करीब पहुंचकर मैं भी थोड़ा सा थका हुआ महसूस कर रहा हूं। तो बेस कैंप में एक दुकान में बैठकर चाय पीता हूं। इससे थोड़ी ऊर्जा तो मिलती है। वैसे तो मैं चाय नहीं पीता पर पहाड़ों पर कभी-कभी पी लेता हूं।

थोड़ा आगे चलने पर बायीं तरफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोगों द्वारा संचालित मेडिकल कैंप मिला। इसके आगे उत्तराखंड सरकार द्वारा बनाया गया आवासीय इंतजाम भी है। यहां पर रहने के लिए कमरे और डॉरमेटरी उपलब्ध हैं। यहां पर भोजनालय भी है। पूछताछ करने पर पता चला कि इसमें खाने की दर 200 रुपये प्रति थाली है।

देव दर्शनी से बाबा के दर्शन -  तकरीबन एक किलोमीटर पहले देव दर्शनी से बाबा केदार का मंदिर दिखाई देने लगता है।  मंदिर से आधा किलोमीटर पहले हेलीपैड है। यहां से आगे चलने पर मंदाकिनी नदी पर एक और पुल है। इस पुल के बगल में मंदाकिनी का एक छोटा सा मंदिर है। मंदाकिनी नदी का पुल पार करने के बाद आप केदारनाथ मंदिर परिसर के काफी करीब पहुंच जाते हैं। यहां पर दोनों तरफ रहने के लिए आवास बने हुए हैं।

हमलोग तकरीबन साढ़े दस घंटे का पैदल सफर करके बाबा के दरबार में पहुंच गए। शायद मैं अकेला होता तो ये दूरी सात से आठ घंटे में तय कर लेता। पर आप समूह में हों तो सबको साथ लेकर चलना चाहिए। हम सीधे पंजाब एंड सिंध आवास क्षेत्र में पहुंच गए। इसके बारे में हमें कटारिया जी ने जानकारी दी थी। हमें पहली मंजिल पर कमरा नंबर 32 आवंटित कर दिया गया। कमरा काफी शानदार है। सामने तिवारी भोजनालय में रात्रि भोजन के बाद हमलोग सीधे कमरे में आकर सो गए।   
रात दस बजे के बाद बाबा श्री केदारनाथ का मंदिर ( 15 सितंबर 2019 ) 

केदारनाथ - पैदल मार्ग - एक नजर ( KEDAR NATH - ON FOOT ROUTE - AT A GLANCE ) 
गौरी कुंड से केदारनाथ - 16 किमी - गौरीकुंड से घोड़ा पड़ाव - 0.5 किमी
भैरव मंदिर, चिरवासा  - 2.5 किमी पर - जंगलचट्टी - 04 किलोमीटर पर
भीमबली - 6 किमी पर  - रामबाड़ा  - 07 किलोमीटर पर
छोटी लिनचौली – 8.5 किलोमीटर पर - बड़ी लिनचोली - 11 किमी पर
छानी कैंप - 12 किमी पर - रुद्रा प्वाइंट – 14 किमी पर
बेस कैंप - 14.5 किमी पर - हेलीपैड- 15.5 किमी पर।
बाबा केदारनाथ का मंदिर - 16 किलोमीटर पर।  
( आगे पढ़िए - शिव का पांचवां ज्योतिर्लिंग -केदारनाथ ) 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
 ( GAURI KUND TO KEDARNATH TEMPLE, CHANI CAMP, RUDRA POINT, BACE CAMP, KEDAR-10 )