Thursday, April 9, 2020

नंदगांव का नंदराय मंदिर- यहां पले थे कान्हा


कोकिल वन से चलकर मैं नंदगांव चौराहे पर पहुंच गया हूं। एक स्थानीय व्यक्ति से नंदगांव मंदिर जाने का रास्ता पूछा। चौराहे से बायीं तरफ एक रास्ता जाता है। यह रास्ता बरसाना की ओर जा रहा है। यहां से गोवर्धन 28 किलोमीटर तो राजस्थान का शहर कामा 14 किलोमीटर है। मतलब हम राजस्थान की सीमा पर हैं। इस मार्ग एक किलोमीटर चलने के बाद दाहिनी तरफ से मंदिर जाने का मार्ग है। पर मैं दूसरे रास्ते से मंदिर पहुंचता हूं। यह चौराहे से थोड़ा आगे बायीं तरफ से नंदगांव के ग्रामीण गलियों से होकर जा रहा है। 
थोड़ी दूर जाने के बाद मंदिर तक जाने के लिए सीढ़ियों की चढ़ाई दिखाई देती है। मैं अपनी बाइक एक घर के बरामदे में लगा देता हूं। इसके बाद सीढ़ियां चढ़ने लगता हूं।
नंदगांव में नंदबाबा का मंदिर वास्तव में एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित है। यहां तक पहुंचने के दो रास्ते हैं। एक पूरब की तरफ से तो दूसरा उत्तर की तरफ से। मंदिर के रास्ते में ढेर सारी दुकाने हैं। प्रसाद की। किताबों की और खाने पीने की। 


नंदराय का मंदिर किसी महल के समान दिखाई देता है। इसका प्रवेश द्वार विशाल है। नंदबाबा भगवान श्रीकृष्ण के प्रतिपाल्य थे। वे उनके एक तरह से पिता थे। नंदबाबा के बारे में कहा जाता है कि वे वणिक समुदाय से आते थे। जबकि श्रीकृष्ण यादव थे। नंद और यशोदा के आंगन में ही पलकर श्रीकृष्ण बड़े हुए। यहीं पर उन्होंने अपनी तमाम बाल लीलाएं की थी। 

कहा जाता कि नंदीश्वर पहाड़ी पर नंदबाबा ने अपना घर यहां पर बनाया था। वे गोकुल छोड़कर यहां आ गए थे। आजकल नंदगांव कस्बे की आबादी 20 हजार के आसपास है। ब्रजभूमि के मानचित्र में नंदगांव का खास महत्व है। वर्तमान में जो यहां नंदराय का मंदिर है यह भरतपुर के जाट राजा रूप सिंह से 18वीं सदी में बनवाया था। मंदिर का भवन दो मंजिला है। इसकी निर्माण शैली में राजस्थानी कला शिल्प की छाप दिखाई देती है। 

मंदिर ऊपरी मंजिल पर चढकर परिक्रमा करते हुए आप आसपास के पूरे इलाके का नजारा कर सकते हैं। यह मंदिर नंद बाबा को समर्पित है। इस मंदिर में गर्भ गृह में कई मूर्तियां हैं। यहां भगवान कृष्ण का पूरा परिवार बसा हुआ है। मंदिर परिसर में नन्ही नन्ही कन्याएं घूमती हैं जो आपके माथे पर तिलक लगा देती हैं और इसके बाद पैसे मांगती हैं।

मुख्य मंदिर में दर्शन के लिए पुजारी लोगों को जत्था बनाकर प्रवेश कराते हैं। दर्शन के बाद पुजारी लोगों से मंदिर के लिए दान देने की बात करते हैं। पर आप इस तरह के दान से सावधान रहें। इस तरह के दान की कोई रसीद नहीं दी जाती। मुझे स्थानीय दुकानदारों से पता चला कि ये पैसा सीधे पुजारियों की जेब में  जाता है। नंदराय के मंदिर पर ऐसे परिवारों का कब्जा है जो मंदिर में दान के नाम पर कमाई कर रहे हैं।



विशाल पावन सरोवर - नंदगांव में एक विशाल सरोवर भी है। इसके चारों तरफ सुंदर घाट बने हुए हैं। यह सरोवर नंदीश्वर पहाड़ी की तलहटी में सड़क के दूसरी तरफ स्थित है। कहा जाता है माता यशोदा कृष्ण भगवान को इसी सरोवर में हर रोज स्‍नान करवाने लाया करती थीं। नंदराय और अन्य परिवार के लोग भी यहीं पर स्नान किया करते थे।

कई सौ सालों तक यह सरोवर बदहाल रहा। इस सरोवर का जीर्णोद्धार संवत 1804 में वर्धमान की रानी ने कराया था। इस सरोवर का जल बिल्कुल साफ है। इसका नाम पावन सरोवर है। हाल के सालों में इसका पुनुरुद्धार ब्रज फाउंडेशन ने कराया है।

नंदराय के मंदिर के आसपास मिठाइयों की कई दुकाने हैं। यहां से आप ब्रजभूमि के प्रसिद्ध पेड़े खरीद सकते हैं। यहां दुकानदार दिन भर दूध को बड़ी बड़ी कड़ाह में जलाकर पेड़े तैयार करते हुए दिखाई देते हैं। साथ ही यहां पर आप मिट्टी के कुल्हड़ में लस्सी पी सकते हैं। मैंने पीकर देखी, यहां की लस्सी बेहतरीन है।


मंदिर परिसर में मेरी मुलाकात हरे राम हरे कृष्णा संप्रदाय के एक दल से हुई। इस दल के लोग अपने साथियों को कान्हा जी के जीवन के बारे में बड़े सरल ढंग से समझा रहे हैं। इस दल में एक बालक भी है। वह धोती और कुरता पहने हुए है। नन्हें कान्हा भक्त बड़े प्यारे लग रहे हैं। 
मैं सोच रहा हूं कि मैं सचमुच उसी स्थली से होकर गुजर रहा हूं जहां कान्हा ने अपनी तमाम बाल लीलाएं की होंगी। उन लीलाओं को सूरदास ने लिपिबद्ध किया है। 
मैया मोरी मैं नही माखन खाओ.... और कान्हा मैया से सवाल करते हैं...
मैया मुझे दाउ बहुत खिजाओ, मोसो कहत मोल लिन्ही जसोदा, जसुमति कब जाओ.... सचमुच ये धरती बड़ीन्यारी रही होगी। पर कान्हा की बाल लीला की इस स्थली से अब मेरी आगे चलने की बारी है। 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com
-        ( NANDGAON, NANNRAI TEMPLE, NAND AND YASHODA )

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