Friday, April 24, 2020

मथुरा का स्वाद : बृजवासी के पेड़े


मथुरा के स्वाद की पहचान उसके पेड़े के कारण है। और ये पेड़े अगर बृजवासी के हों तो फिर और क्या बात है। बृजवासी के पेड़े की एक दुकान गोवर्धन के बाजार में भी है। वैसे उनकी मुख्य  दुकान मथुरा शहर के होली गेट के पास है।
गोवर्धन से वापसी से पहले मैं बृजवासी के रेस्टोरेंट और स्वीट शॉप में पहुंच गया हूं। यहां हमेशा खाने पीने वालों की भीड़ रहती है। मैं अपनी मनपसंद रबड़ी का ऑर्डर करता हूं। इनकी रबड़ी का स्वाद बेहतर है। बृजवासी के मीनू पर नजर डालने पर पता चलता है कि वे नास्ता, भोजन सब कुछ पेश करते हैं। मिठाइयों के अलावा कई तरह की नमकीन भी उपलब्ध है।

पर बृजवासी की पहचान उनके पेड़े के लिए है। उनके पेड़े बाकी के दुकानों से थोड़े महंगे हो सकते हैं। पर उनका स्वाद और शुद्धता भी अलहदा है। यहां पर दो तरह के पेड़े हैं। एक कम चीनी वाला और एक समान्य चीनी वाला। कम चीनी वाला पेड़ा थोड़ा महंगा है। आपको अगर चीनी कम चाहिए तो फीका पेड़ा भी खरीद सकते हैं।

बृजवासी के पेड़े की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान है। मथुरा में होली गेट के अलावा उनकी एक दुकान कृष्ण जन्मभूमि मंदिर के पास भी स्थित है। अब आप चाहें तो उनके पेड़े और मिठाइयों के लिए ऑनलाइन ऑर्डर भी कर सकते हैं। ज्यादा जानकारी के लिए उनकी वेबसाइट पर जा सकते हैं- बृजवासी डॉटकाम (https://www.brijwasi.com/store/)
जैसे आगरा का पेठा प्रसिद्ध है ठीक उसी तरह मथुरा के पेड़े की प्रसिद्धि है। दूसरे शहरों में भी इसी तरह का पेड़ा मथुरा के पेड़ा के नाम से बिकता है। मथुरा में पेड़ा बनाने की कहानी सदियों पुरानी है। न सिर्फ मथुरा बल्कि नंदगांव, बरसाना के हलवाई भी बड़े कड़ाह में दूध को धीमी आंच पर जलाकर पेड़ा बनाते हुए दिखाई दे जाते हैं। वैसे तो पेड़ा बनाने की प्रक्रिया कोई मुश्किल नहीं है। पर मथुरा के पेड़े अपने अनूठे स्वाद के लिए जाने जाते हैं।

बृजवासी मिठाईवाले के स्वामी राजीव अग्रवाल, रवि अग्रवाल, सतीश अग्रवाल और पुलकित अग्रवाल हैं। अब यह परंपरागत दुकान कारपोरेट रूप ले चुकी है। मथुरा रेलवे स्टेशन के पास ही इस परिवार का एक होटल भी है नाम है बृजवासी रॉयल।

बृजवासी में थोड़ी पेट पूजा के बाद दिल्ली वापसी की राह पर हूं। गोवर्धन से बरसाना रोड पर चलने के बाद मैं छाता की तरफ जाने वाली सड़क पर मुड जाता हूं। छाता से जीटी रोड पकड़कर मैं दिल्ली तरह चल पडूंगा। रास्ते में आगरा नहर दिखाई दे जाता है। इस पर बना हुआ पुल देखकर मैं थोड़ा चौंकता हूं। पुल पर लगे बोर्ड पर इसका निर्माण वर्ष अंकित हैं – शहर 1873 जी हां, आगरा कैनाल की कथा बहुत पुरानी है। ब्रिटिश काल में दिल्ली के ओखला में यमुना पर बैराज बनाकर आगरा नहर निकाली गई थी। इससे ब्रज क्षेत्र के खेतों को सिंचाई के लिए पानी पहुंचा था।

नहर के आसपास खेतों धान की बालियां झूम रही है। धान पकने को हैं।  मैं एक जगह रुक कर इन सुनहरी बालियों के संग सेल्फी लेने का मोह नहीं छोड़ पाता। हमारे गांव में भी धान की खेती बड़े पैमाने पर होती है। मेरा बचपन इन खेतों के साथ ही तो गुजरा है। थोड़ी दूर आगे चलने पर कुछ खेतों में किसान पराली जलाते हुए दिखाई दे जाते हैं। आजकल ये बड़ा मुद्दा बना हुआ है। पर पराली जलाने वाले लोग नहीं मान रहे।

धरम ढाबा का गरम पराठा - मैं छाता पहुंच गया हूं। यहां से हाईवे पर दिल्ली की दूरी लिखी है। दिल्ली 119 किलोमीटर। थोड़ी दूर चलने के बाद गुलशन ढाबा में रुकता हूं। यहां कुल्हड़ वाली चाय भी उपलब्ध है सिर्फ 20 रुपये में। चाय पीने के बाद फिर आगे चल पड़ता हूं। अगला पड़ाव है धरम ढाबा। यहां पर रुक कर एक पराठे आर्डर किया। धरम ढाबा का पराठा भी शानदार है। एक पराठा काफी है पेट पूजा के लिए।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
( MATHURA, BRIJWASI, PEDA, CHHATA, GULSHAN DHABA, DHARAM DHABA) 

2 comments:

  1. बहुत ही सुंदर जानकारी दी ,चित्रों के माध्यम से दर्शन भी कर लिया हमने ,पेड़े तो हमे बहुत पसंद है ,स्थिति पहले की तरह हो जाये ,सुधर जाये ,तो अवश्य मंगवाऊंगी ।नमस्कार

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