Saturday, April 11, 2020

यहां हुआ था उद्धव और गोपियों का संवाद


नंदगांव की गलियां भली, कृष्ण चरणों की थाप
अपने माथे पर लगा, धन्यभाग भई आप।
नंदगांव की महिमा को समझते हुए मंदिर से सीढियां उतर रहा हूं। इसी दौरान एक दुकानदार से बातचीत हुई। उनसे पता चला कि नंदगांव के मंदिर में दान के नाम पर किस तरह लूटपाट जारी है। ये दान की रकम सही जगह नहीं पहुंचती। पुजारी अपनी जेब भरते हैं। 

मैं अपनी बाइक के पास पहुंच गया हूं। बाइक से फिर नंदगांव चौराहे पर पहुंच कर बरसाना जाने वाली सड़क पर चल पड़ा हूं। इस सड़क पर नंदगांव का बाजार है। थोड़ी दूर आगे चलने पर बायीं तरफ एक पथ संकेतक आता है। इस पर लिखा है कि उद्धव गोपी संवाद स्थल। अचानक मुझे महाभारत का वो प्रसंग याद आ आ जाता है। सूरदास के पद याद आ जाते हैं। कृष्ण कहते हैं कि उधो मोसे ब्रज बिसरत नाही। कान्हा को ब्रज की याद आती है। इधर गोपियां भी कान्हा की याद में व्यग्र हैं।

मैं अपनी बाइक बायीं तरफ जा रही कच्ची सड़क की तरफ मोड़ लेता हूं। करीब 500 मीटर अंदर जाने के बाद एक आश्रम नुमा स्थल आता है। इस जगह के बारे में लिखा गया है कि उद्धव और गोपियों का संवाद यहीं हुआ था।
कृष्ण के ब्रज छोड़कर चले जाने के बाद गोपियां उनकी याद में व्यग्र थीं। वे कृष्ण का संदेश लेकर नंदगांव पहुंचे थे। उद्धव परम तत्व ज्ञानी थे। वे कृष्ण के बाल सखा और उनके चाचा के पुत्र थे।

उद्धव-गोपी संवाद श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध के सैंतालीसवे अध्याय में आता है। इसमें उद्धवजी और गोपियों की बातचीत का वर्णन है। इसे 'उद्धव-गोपी संवाद' या 'भ्रमरगीत' भी कहते हैं । श्रीकृष्ण मथुरा के राजा बन गए थे। परन्तु वे ब्रजवासियों का प्रेम भूल नहीं पाए थे। तब उन्होंने गोपियों के पास उद्धव को भेजा था।

मणि जड़ित कुंडल झलके कान नेत्र नूतन कमल दल समान। तन पीताम्बर किया था धारण उद्धव आए गोपियों के कारण। कृष्ण जैसी वेशभूषा देख करके गोपियों ने उद्धव का सलज्ज भाव से सत्कार किया। उद्धव ने गोपियों से कान्हा का संदेश दिया -
सुनौ गोपी हरि कौ संदेस करि समाधि,
अंतर गति ध्यावहु, यह उनकौ उपदेस॥
वै अविगत अविनासी पूरन, सब-घट रहे समाइ । 
तत्व ज्ञान बिनु मुक्ति नहीं है, बेद पुराननि गाइ ॥

पर गोपियां तो कान्हा के प्रेम में रची बसी थीं। वे उद्धव का तत्व ज्ञान सुनने को तैयार नहीं थीं। गोपियों ने उद्धव से कहा, उद्धवजी, हमलोग जानते हैं कि संसार में किसी की आशा न रखना ही सबसे बड़ा सुख है, फिर भी हम श्रीकृष्ण के लौटने की आशा छोड़ने में असमर्थ हैं। उनके शुभागमन की आशा में ही तो हमारा जीवन है। लाख कोशिशों के बावजूद महान ज्ञानी उद्धव गोपियों का ध्यान कान्हा से अलग करने में असफल रहे।
उद्धव सुधो होई गयो सुन गोपिन के बोल
ज्ञान बजाई डुग डुगी बजो प्रेम के ढोल।



उद्धव क्यारी प्रेम धाम - गोपियां उद्धव के समझाने पर भला मानती भी क्यों वे तो कान्हा के रंग में रंगी हुई थीं। उनपर वैराग्य का रंग कहां चढ़ने वाला था। तो इस स्थल का नाम दिया गया है उद्धव क्यारी प्रेम धाम। काफी श्रद्धालु इस स्थल को भी देखने पहुंचते हैं। यहां एक छोटा सा मंदिर बना है। एक साधु आश्रम भी है। ब्रज की चौरासी कोस की परिक्रमा में यह भी एक महत्वपूर्ण स्थल है।   


-        विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com
-        ( UDDHAV GOPI SAMVAD, NANDGAON TO BARSANA ROAD)

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