Thursday, April 2, 2020

दिल्ली से मथुरा और शेरशाह के डाक पोस्ट


दुनिया के तमाम देश कोरोना जैसी गंभीर बीमारी से लड़ रहे हैं। ऐसे वक्त में घर में रहें। यात्राएं हरगिज न करें। यात्रा साहित्य पढें। नई किताबें पढ़ें। दानापानी ब्लॉग पर लगातार अपलोड हो रही यात्राएं पहले की गई हैं।

दिल्ली से एक बार फिर गोवर्धन जाने की इच्छा है। पिछली बार की यात्रा में गोवर्धन की परिक्रमा की थी। इस बार उसके आसपास के स्थलों को देखने की इच्छा है। लंबे समय बाद बाइक से दिल्ली से निकल पड़ा हूं। एक बार सोचा कि मेट्रो की पार्किंग में बाइक लगाकर आगे की यात्रा बस से करुंगा। पर अचनाक इच्छा हुई कि बाइक से ही आगे चलते हैं। तो फरीदाबाद शहर पार करके बल्लभगढ़ पहुंचा हूं। बल्लभगढ़ तक मेट्रो आ गई है। वायलेट लाइन का यह आखिरी मेट्रो स्टेशन है। इसका नाम राजा नाहर सिंह मेट्रो स्टेशन है। बल्लभगढ़ को पार करके मैं फिर आगे पलवल की तरफ चल पड़ा हूं। सुबह सुबह पुराने जीटी रोड पर कहीं जाम नहीं मिला। हल्की सरदी की सुबह की खिली-खिली धूप में चलना अच्छा लग रहा है।

दिल्ली से मथुरा के मार्ग में कोसी कलां के पास सड़क बाएं किनारे मुझे स्तंभ दिखाई देता है। ये स्तंभ शेरशाह द्वारा बनवाया गया था। दिल्ली से लाहौर के रास्ते में पानीपत, अंबाला में भी जीटी रोड के किनारे ऐसे स्तंभ नजर आते हैं। ऐसे कई स्तंभ सड़क के किनारे खेतों में गर्व से खड़े नजर आते हैं। वास्तव में ये शेरशाह द्वारा शुरू कराए गए डाक व्यवस्था की याद दिलाते हैं। शेरशाह ने अपने शासन काल में कोलकाता से अमृतसर तक सड़क बनवाई तो इसके किनारे जगह जगह सराय का निर्माण कराया। इनमें से कई सराय के भवन भी अभी अस्तित्व में हैं। वहीं उस महान शासक ने देश में पहली बार डाक व्यवस्था शुरू की। शेरशाह की यह डाक व्यवस्था रिले सिस्टम से चलती थी।

इसमें एक डाकिया डाक लेकर दौड़ता था। वह चार किलोमीटर दूर जाकर ऐसे डाक पोस्ट के नीचे जाकर खड़ा हो जाता था। वहां पर उसे दूसरा डाकिया मिलता था। दोनों अपनी अपनी डाक का आदान प्रदान करते थे। इसके बाद दोनों फिर विपरीत दिशा में दौड़ जाते थे। इस तरह डाक एक शहर से दूसरे शहर में पहुंच जाती थी। तब रेलगाड़ियां. मोटरगाड़ियां नहीं थी। पर डाक पहुंचाने की यह तकनीक कामयाब थी। कई जगह इस डाक के आदान प्रदान के लिए घुड़सवारों की मदद भी ली जाती थी।

दिल्ली के चिड़ियाघर परिसर में शेरशाह का पोस्ट। 
शेरशाह ने डाक लेकर दौड़ने वालों का हिसाब किताब रखने के लिए तारीक नवी ( डाक विभाग के कलर्क ) की भी बहाली की थी। ये लोग रजिस्टर में डाक का हिसाब रखते थे। डाक ढोने वालों को मेवाड़ (संदेशवाहक या दौड़ाहा ) कहते थे। इस व्यवस्था में बंगाल से पंजाब तक 1400 मील की दूरी में डाक पहुंचने में एक हफ्ते से कम का समय लगता था। आज भी आप पोस्ट ऑफिस से कोई साधारण डाक भेजें तो इतना समय लग जाता है। शेरशाह की इस पूरी डाक व्यवस्था की निगरानी एक बड़ा अधिकारी करता था जिसका पद था दारोगा-ए-डाक। उसके नीचे एक सुपरिटेंडेट का पद होता था जिसे दारोगा-ए-डाक चौकी कहा जाता था।


1700 सराय भी बनवाए थे - शेरशाह ने जीटी रोड पर हर चार मील पर तकरीबन 1700 सरायों का निर्माण कराया था। यहां राहगीरों के रहने का इंतजाम हुआ करता था। इन सराय के आसपास बाजार लगा करता था।
तब से अब जीटी रोड का स्वरूप बहुत बदल गया है। पर शेरशाह द्वारा बनवाए गए ये डाक पोस्ट अभी भी जगह जगह नजर आते हैं। ऐसा ही एक डाक पोस्ट आप दिल्ली के चिड़िया घर परिसर में भी देख सकते हैं। शेरशाह को कई  महान कार्यों के लिए याद किया जाता है उनके में डाक व्यवस्था भी एक है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-        (SHERSHAH, POSTAL SYSTEM, DAROGA-E-DAK, GT ROAD )

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