Sunday, April 19, 2020

सूर की साधना स्थली – गोवर्धन में 73 साल तक रहे सूरदास



बरसाना में राधारानी के दर्शन के बाद मैं गोवर्धन मार्ग पर चल पड़ा हूं। मैं दूसरी बार गोवर्धन पहुंच रहा हूं। पहली बार मथुरा बाईपास की तरफ से आया था। इस बार बरसाना की तरफ से पहुंच रहा हूं। गोवर्धन बरसाना से 18 किलोमीटर की दूरी पर है। रास्ते में सड़क के किनारे जल प्लावित खेतों में पक्षियों का बसेरा दिखाई दे रहा है।



एक बार गोवर्धन की परिक्रमा कर चुका हूं। इस बार गोवर्धन में पहले महान कवि सूरदास की तपस्थली की तरफ चल पड़ा हूं। गोवर्धन में दानघाटी मंदिर से दो किलोमीटर आगे मथुरा रोड पर सूर की तपस्थली स्थित है। यह पारसौली ग्राम में आता है। यहां पर एक विशाल सरोवर है जिसे सूर सरोवर या चंद्र सरोवर कहा जाता है। यहां पर एक आश्रम और गौशाला भी है। यहां पर सूर श्याम सेवा संस्थान नामक संस्था सक्रिय है। मैं जब पहुंचा हूं तब यहां पर किसी स्वामी जी का प्रवचन चल रहा है। दूर दूर से श्रद्धालु उन्हें सुनने के लिए पहुंचे हैं।  



सूरदास की तपस्थली पर स्थित इस विशाल सरोवर का जीर्णोद्धार कर इसे भव्य रूप प्रदान किया गया है। इसके चारों तरफ सुंदर घाट बनाए गए हैं। इन घाटों के किनारे छोटे छोटे झरोखे भी बने हैं। यहां पर बैठकर आप अपना वक्त गुजार सकते हैं। सरोवर के चारों तरफ चौबारे में कुछ प्रमुख संतों की मूर्तियां भी लगी हुई हैं। सरोवर के आसपास का परिदृश्य मनोरम है।



अब महाकवि सूरदास के बारे में, वास्तव में नटवर नागर कृष्ण और उनकी बाल लीलाओं के बारे में जो कुछ हमारे मानस पटल पर अंकित है उसमें सूरदास का बड़ा योगदान है। सूरदास का जन्म संवत 1535 ( 1478 ईस्वी) में हुआ था और उनका निधन संवत 1640 ( 1583  ईस्वी) में हुआ। यानी वे 105 साल तक इस धरती पर रहे।

सीही है सूरदार की जन्मस्थली - सूरदास की जन्म स्थली मानी जाती है सीही। सीही ग्राम हरियाणा में फरीदाबाद और बल्लभगढ़ के बीच में स्थित है। आजकल ये मेट्रो का एक स्टेशन है। इस स्टेशन का नाम ही दिया गया है सीही सूरदास। यहीं पर सूरदास का जन्म पंडित रामदास सारस्वत के घर हुआ था। उनके पिता रामदास भी भजन गायक थे।



रुनकता में कई साल रहे सूरदास - कुछ विद्वान सूरदास का जन्मस्थान रुनकता ग्राम भी मानते हैं। सूरदास अपने माता पिता से रुठकर सीही गांव से चार कोस दूर 18 साल तक रहे। यहां पर उन्होंने कान्हा की भक्ति में तमाम पदों की रचना की। रुनकता में कई साल रहने के बाद सूरदास में वैराग्य का भाव उत्पन्न हुआ और वे ब्रज की ओर चले गए। वे मथुरा और आगरा के बीच गउ घाट में भी लंबे समय तक रहे।

गोवर्धन में सात दशक रहे सूरदास -  रुनकता और गउ घाट के बाद सूरदास गोवर्धन आ गए। सूरदास ने संवंत 1567 में महान संत वल्लभाचार्य से दीक्षा ली थी। इसके बाद वे कृष्ण भक्ति में और ज्यादा लीन हो गए। यहीं रहकर उन्होंने कृष्ण भक्ति में अनगिनत पद रचे। यहीं गोवर्धन में सूरदार श्रीनाथ जी के मंदिर में कीर्तन सेवा करने लगे। गोवर्धन में उनका स्थायी निवास पारसौली में ही था। अपने जीवन के 73 साल सूरदास पारसौली में ही रहे। यहीं पर उन्होंने सूरसागर समेत अगणित पदों की रचना की।

यहां है सूरदास की समाधि - संवत 1640 ई (1583 ईस्वी) में पारसौली में ही सूरदास का यहीं पर देहावसान हुआ। तब गोस्वामी विट्ठलनाथ जी उनके पास मौजूद थे। पारसौली में सूरकुटी में सूरदास की समाधि का निर्माण कराया गया है। हिंदी भाषा में सूरदास पर शोध करने वाले छात्र भी इस कुटिया और समाधि को देखने के लिए यहां पहुंचते हैं।
उत्तर प्रदेश सरकार ने सूरदास की कुटिया का जीर्णोद्धार कराया है। सूरदास भक्ति काल से श्रेष्ठ कवि हैं। वे सगुण भक्ति शाखा के कवि हैं। उन्हें हिंदी कविता सूर्य माना जाता है। उनके बार में कहा जाता है-
सूर सूर  और तुलसी शशि, उडगन केशवदास...
आज के कवि खद्योत सम, जहं तहं करत प्रकाश...

जन्मांध नहीं थे सूरदास - सूरदास ने राधाकृष्ण का जिस तरह सजीव चित्रण अपनी कविताओं में किया है वह कहीं और नहीं मिलता। कुछ विद्वान मानते हैं सूरदास के आंखों की रोशनी चली गई थी। पर कुछ विद्वानों का तर्क है कि अगर वे देख नहीं पाते तो इतने सजीव पद कैसे रच पाते। हिंदी के जाने माने आलोचक श्याम सुन्दरदास ने लिखा है - सूर वास्तव में जन्मान्ध नहीं थे, क्योंकि श्रृंगार तथा रंग-रुपादि का जो वर्णन उन्होंने किया है वैसा कोई जन्मान्ध नहीं कर सकता।  हालांकि हमारे स्कूली शिक्षक बताते थे कि सूर के पास दिव्य दृष्टि थी। 

पांच ग्रंथों की रचना -  सूरदास जी द्वारा लिखे गए कुल पांच ग्रंथ बताए जाते हैं। 1. सूरसागर  2.  सूरसारावली 3. साहित्य-लहरी 4 नल-दमयंती 5. ब्याहलो। इनमे से अंतिम दो अप्राप्य हैं। सूरदास ने असंख्य पद रचे। सूर की रचित मेरी पसंदीदा पंक्तियां - 
मेरो मन अनत कहां सुख पावै।
जैसे उड़ि जहाज की पंछी, पुनी जहाज पै आवै॥
कमल-नैन को छाड़ि महातम, और देव को ध्यावै।
परम गंग को छाड़ि पियासो, दुरमति कूप खनावै॥
जिहिं मधुकर अंबुज-रस चाख्यो, क्यों करील-फल भाव।

'सूरदास' प्रभु कामधेनु तजि, छेरी कौन दुहावै॥

-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-        ( SURDAS, 1478- 1583, SIHI, PARSAULI, GOAVARDHAN, MATHURA, UP)


6 comments:

  1. वाह बहुत अच्छी जानकारी दीं आपने....

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  2. बढ़िया जानकारी। अगली ब्रज यात्रा में यहां जरूर जाना चाहूंगा। बहुत बहुत धन्यवाद।

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  3. यात्रा वृतांत बहुत अच्छे लगते हैं क्योंकि सचित्र लेखन हमें भी घुमा देता है ।

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  4. धन्यवाद, पढ़ते रहिए...आगे भी काफी कुछ है।

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