Thursday, April 30, 2020

मथुरा संग्रहालय में शिव के कई रूपों का दर्शन करें


मथुरा की मूर्ति कला शैली का समय पहली शताब्दी से छठी शताब्दी के बीच का माना जाता है। इस दौरान यहां पर सनातन हिंदू देवी देवताओं, बौद्ध और जैन तीर्थंकरों की मूर्तियां बड़े पैमाने पर बनीं। कहा जाता है मथुरा के आसपास जो टीले मिलते हैं, वे वास्तव में उपासना स्थल और मूर्तिकला के केंद्र थे।
मथुरा संग्रहालय के महादेव शिव के कई रूपों के दर्शन किए जा सकते हैं। सनातन धर्म में शिव सबसे प्राचीन देवता हैं।

अदभुत है पंचमुखी शिवलिंगम - मथुरा संग्रहालय में शिवलिंग के निर्माण में अदभुत प्रयोग दिखाई देता है। पहला शिवलिंग अपने पारंपरिक स्वरूप में है। पर पंचमुखी शिवलिंगम तो आपको अपनी कलात्मकता से अचरज में डाल देता है। इस चारों तरफ से देखें, हर तरफ से यहा कुछ नयापन लिए हुए दिखाई देता है। यह पूरी दुनिया में अनूठा है। इसके प्रत्येक शिवलिंग में शिव की मुखाकृति भी बनी हुई है। इनमें चार मुख चार दिशाओं के सूचक हैं। जबकि उपर का मुख आसमान को इंगित करता है। गुप्तकाल में निर्मित इस मूर्ति को मथुरा के ही सप्त समुद्री कुआं से प्राप्त किया गया था। 
अदभुत हैं मूछों वाले महादेव - 

आपने शिव की तमाम मूर्तियां देखी होंगी पर कभी आपने शिव की ऐसी मूर्ति शायद न देखी हो। इस मूर्ति में शिव की विशाल मूछे हैं। एक और अनूठा शिवलिंग देखा जा सकता है। इसमें लिंग के उपर शिव की मुखाकृति उभरी हुई है।
 इस मुखाकृति में शिव की विशाल मूंछे भी बनाई गई हैं। संग्रहालय के गाइड बताते हैं कि यह विश्व में इस तरह का एकमात्र शिव लिंगम है।

उमा महेश्वर की प्रतिमाएं - मथुरा संग्रहालय में उमा महेश्वर की भी कई सुंदर प्रतिमाएं हैं। इनमें से कई प्रतिमाओं में शिव पार्वती प्रणय मुद्रा में हैं। कई में वे आलिंगन की मुद्रा में हैं। इन प्रतिमाओं में कला का चरमोत्कर्ष देखने को मिलता है। इन प्रतिमाओं शिल्पकारों की अदभुत कल्पनाशीलता देखने को मिलती है। शिव पार्वती की कई और मूर्तियां भी यहां पर है जिसमें वे आलिंगन की मुद्रा में हैं।

पांचवी सदी की विष्णु की मूर्ति - बुद्ध मूर्तियों के बाद मथुरा के आसपास हिंदू मूर्तियां बनने लगी थीं। यहां पांचवी सदी में बनी विश्वरूप विष्णु की मूर्ति देखी जा सकती है। यह मूर्ति अलीगढ़ क्षेत्र से प्राप्त हुई है।

इसके बाद मध्यकाल में मिली विष्णु की चतुर्भुज स्वरूप की प्रतिमा भी अत्यंत सुंदर है। इसमें विष्णु ध्यान की मुद्रा में हैं। काले पत्थरों से बनी इस प्रतिमा में उनके एक तरफ सरस्वती तो दूसरी तरफ लक्ष्मी विराजमान हैं। ये मूर्ति मथुरा के पन्नापुर कुआं से मिली थी। 

कान्हा की जीवन लीला भी देखें - यहां पर कृष्ण के जीवन लीला से जुड़ी हुई कुछ बेहतरीन मूर्तियां भी देखी जा सकती है। नवजात कृष्ण टोकरी में रखकर ले जाते हुए वसुदेव की पहली सदी की बनी हुई प्रतिमा यहां पर देखी जा सकती है। यह वह काल खंड था जब हिंदू मूर्तियों के निर्माण की शुरुआत हुई थी। यहां पर गोवर्धन पर्वत को अपने हाथों पर उठाए हुए कृष्ण की भी एक प्रतिमा आप देख सकते हैं। यह प्रतिमा गुप्तकाल के बाद की है।

जैन धर्म में भी मथुरा अत्यंत महत्वपूर्ण - मथुरा शहर का जैन धर्म में भी महत्वपूर्ण स्थान है। जैन धर्म के सातवें तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ जी की जन्मस्थली है मथुरा। मथुरा के संग्रहालय में कई जैन तीर्थंकरों की भी मूर्तियां देखी जा सकती हैं।

मथुरा संग्रहालय में कई विशाल मृदभांड भी देखे जा सकते हैं। ये मिट्टी के बने हुए हैं। कदाचित इनका इस्तेमाल सामूहिक भोज के मौके पर किया जाता होगा।
मथुरा की मूर्तिकला मध्यकालीन भारत में भी फलफूल रही थी। मुहम्मद गजनवी के आक्रमण से समय में यहां की कला चरमोत्कर्ष पर थी। गजनवी ने कई मंदिर तोड़े पर कहा जाता है कि वह मथुरा की मूर्तियों पर मोहित हो गया। उसने इन मूर्तियों के साथ छेड़छाड़ नहीं की।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
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Wednesday, April 29, 2020

बौद्ध संस्कृति का बड़ा केंद्र था मथुरा

किसी जमाने में मथुरा बौद्ध कला संस्कृति का बड़ा केंद्र था। यह बात मथुरा संग्रहालय की वीथियों में भ्रमण के दौरान और पुख्ता हो जाती है। संग्रहालय में गौतम बुद्ध की कई नायाब मूर्तियों का संग्रह है। किसी जमाने में मथुरा बौद्ध धर्म का बड़ा केंद्र था। यहां बुद्ध अपने जीवन काल में दो बार पधारे भी थे। 

बुद्ध की पहली मूर्ति मिली यहां पर - कान्हा की नगरी मथुरा से बुद्ध का बहुत पुराना रिश्ता है। गौतम बुद्ध की पहली मूर्ति मथुरा से ही मिली थी। मानव के रूप में बनी बुद्ध की यह मूर्ति 1860 में खुदाई के दौरान कटरा केशवदेव से मिली थी। यह मूर्ति कुषाण काल की बनी हुई है। कनिष्क के समय हुई बौद्ध धर्म की चौथी संगीति (महासभा) के बाद महायान शाखा के अनुयायियों ने बुद्ध की पहली मूर्ति मथुरा में बनाई थी।

बौद्ध शिक्षा का बड़ा केंद्र - बौद्ध धर्म के अनुयायियों ने मथुरा में शिक्षा ग्रहण की थी। यहां पर 42 बौद्ध भिक्षु यमुना के किनारे रह कर शिक्षा ग्रहण करते थे। तब यहां 16 बौद्ध विहार हुआ करते थे। कुषाण काल में मथुरा उच्च शिक्षा का बड़ा केंद्र था। तब यह शहर कला के उच्चतम शिखर पर था। बौद्धधर्म के विद्वान आचार्य उपगुप्त मथुरा निवासी थे। उन्हें सम्राट अशोक ने प्रवचन के लिए पाटलिपुत्र आमंत्रित किया था। आचार्य उपगुप्त के बाद मथुरा बौद्ध संप्रदाय का बड़ा केंद्र बन गया।

कुषाण काल में ही मथुरा में बड़ी संख्या में बुद्ध की मूर्तियों का निर्माण हुआ। मथुरा के शिल्पी गांधार कला में निर्मित बुद्ध की मूर्तियों से काफी प्रभावित थे। पर मथुरा के शिल्पियों की अपनी अलग शैली रही है। बुद्ध के जीवन से जुड़ी सबसे ज्यादा मूर्तियां गांधार और मथुरा कला शैली में ही बनी हैं।
मथुरा संग्रहालय में भगवान बुद्ध की पहली और दूसरी शताब्दी में बनी मूर्तियां देखी जा सकती हैं। यहां रामनगर ग्राम से प्राप्त महात्मा बुद्ध की आदमकद प्रतिमा देखी जा सकती है।

गौतम बुद्ध आए थे मथुरा - बौद्ध ग्रंथ अंगुत्तर निकाय के मुताबिक गौतम बुद्ध का मथुरा आगमन भी हुआ था। वेरंजक ब्राह्मण सुक्त में भी बुद्ध के मथुरा आने का प्रकरण मिलता है। वहीं पाली ग्रंथों के मुताबिक बुद्ध ज्ञान प्राप्ति के 12 वर्ष बाद मथुरा आए थे। इसके बाद निर्वाण से कुछ पहले वे दूसरी बार मथुरा आए। तत्कालीन शासक अवंतिपुत्र ने उनका स्वागत सत्कार किया था। उन्होंने नगर की जनता को आशीर्वाद दिया था। उनकी प्रेरणा से काफी स्थानीय लोगों ने बौद्ध धर्म की दीक्षा भी ली थी।

मथुरा के राजकीय संग्रहालय में स्थित भगवान बुद्ध की प्रसिद्ध मूर्ति पास के जमालपुर टीले से प्राप्त हुई थी। यह भारतीय मूर्तिकला के श्रेष्ठ नमूनो में गिनी जाती है। इस मूर्ति के कमल के समान नेत्र, घुंघराले बाल, लंबे कान लोगों को आकर्षित करते हैं। मूर्ति चारों दिशाओं में ज्ञान का प्रकाश बिखेरती हुई प्रतीत होती है।

मूर्तिकला का बड़ा केंद्र सन 150 से 300 ईस्वी तक मथुरा मूर्ति कला का बड़ा केंद्र था। इस दौरान यहां शिल्पियों ने खूब मूर्तियां बनाई। मथुरा में भूतेश्वर टीला, कंकाली, कटरा केशवदेव, चामुंडा टीला, गोवर्धन, सौंख, महोली, अन्योर आदि से भी भगवान बुद्ध की कई प्रतिमाएं मिली हैं। इससे प्रतीत होता है कि मथुरा कुषाण काल में बौद्ध संस्कृति का बड़ा केंद्र था।

बुद्ध का जीवन दर्शन देखिए मूर्तियों में - मथुरा मूर्तिकला में बुद्ध के जीवन की चार प्रमुख घटनाओं को प्रदर्शित किया गया है। ये घटनाएं हैं - जन्म, संबोधि, धर्मचक्र प्रवर्तन (सारनाथ में दिया पहला उपदेश) और महा परिनिर्वाण। इसके अलावा बुद्ध के जीवन की तीन गौण घटनाओं को भी यहां प्रदर्शित मूर्तियों में देखा जा सकता है। इनमें इंद्र को भगवान बुद्ध का दर्शन देना, बुद्ध का स्वर्ग से माता को ज्ञान देकर वापस जाना और लोकपालों द्वारा बुद्ध को भिक्षापात्र अर्पण करना।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
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Tuesday, April 28, 2020

मथुरा संग्रहालय – यहां कुषाण काल का वैभव देखिए


उत्तर प्रदेश के सबसे पुराने और संग्रह के लिहाज से महत्वपूर्ण संग्रहालयों में से एक है मथुरा संग्रहालय। यहां पर प्राचीन भारतीय इतिहास के कई कालखंडों की झलक देखी जा सकती है। सनातन, बौद्ध, जैन धर्म से जुड़ी मूर्तियां और कई तरह के समृद्ध संग्रह से रूबरु कराता है ये संग्रहालय। आप यहां पहुंचने के बाद दो हजार साल पुरानी दुनिया में पहुंच जाते हैं। इतिहास के कई महत्वपूर्ण अध्याय समेटे हुए है ये नायाब म्युजियम। 

मथुरा संग्रहालय मथुरा जंक्शन रेलवे स्टेशन से तकरीबन दो किलोमीटर की दूरी पर डैंपियर चौराहा के पास स्थित है। रेलवे स्टेशन या बस स्टैंड से बैटरी रिक्शा से यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है। संग्रहालय की इमारत लाल रंग की वृताकार बनी है। इमारत भी दूर से आकर्षित करती है। इमारत के परिसर में गौतम बुद्ध की विशाल प्रतिमा बनी है। दरअसल मथुरा कभी बौद्ध संस्कृति का बड़ा केंद्र था। स्वयं गौतम बुद्ध भी मथुरा में पधारे थे। वृताकार इमारत के अंदर एक विशाल आंगन भी है। अगर आप कला के पारखी हैं तो यहां पर आप मूर्तियों को देखते हुए घंटों गुजार सकते हैं।

पांच रुपये का प्रवेश टिकट - संग्रहालय में प्रवेश का टिकट महज 5 रुपये का है। मोबाइल से फोटोग्राफी के लिए 20 रुपये का टिकट लेना पड़ता है। हां, संग्रहालय के अंदर वीडियोग्राफी की मनाही है। मूर्तियों की तस्वीरें आप चाहें जितनी ले सकते हैं। विदेशी पर्यटकों के लिए शुल्क 25 रुपये है। वहीं बच्चों के लिए प्रवेश शुल्क 2 रुपये रखा गया है। प्रवेश द्वार पर बैग आदि जमा करने के लिए लगेज काउंटर भी बना हुआ है। यह सुविधा निःशुल्क है। यह संग्रहालय उत्तर प्रदेश शासन के अधीन आता है। संग्रहालय के स्टाफ का व्यवहार काफी मित्रवत है।

मथुरा के संग्रहालय में जो मूर्तियां संग्रहित की गई हैं वे मथुरा शहर आसपास के गांव से खुदाई से प्राप्त हुई हैं। यहां पड़ोसी राज्य राजस्थान और उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के रटौल से प्राप्त मूर्तियों का भी संग्रह है।

काल खंड के मुताबिक देखें तो यहां सबसे ज्यादा मूर्तियां पहली और दूसरी शताब्दी की दिखाई देती हैं। संग्रहालय की कुछ मूर्तियां अत्यंत विलक्षण है। कई मूर्तियां ऐसी हैं जिनका दुनिया भर में दूसरा कोई सानी नहीं है। इस लिहाज से यह उत्तर प्रदेश का बेहतरीन संग्रहालय है। 

नाग पूजन की प्राचीन परंपरा के दर्शन  आमतौर पर देश में कहीं भी छठी शताब्दी से पहले की हिंदू देवी देवताओं की मूर्तियां हमें देखने को नहीं मिलती हैं। पर मथुरा के संग्रहालय में कुछ संग्रह हमें आश्चर्यचकित करते हैं। पहली शताब्दी में बड़वा गांव मथुरा से प्राप्त भूमि नाग की प्रतिमा देखी जा सकती है। इसमें नाग और नागिन को दिखाया गया है। इससे लगता है कि नाग पूजन की परंपरा हमारे देश में काफी पुरानी रही है। यह भी संभव है कि तब नाग को बलिष्ठ जाति रही हो।

नंद और सुंदरी की प्रणय लीला -  संग्रहालय में मौजूद कलात्मक मूर्तियों में से एक है दूसरी सदी में गुरुग्राम हरियाणा से प्राप्त मूर्ति। इसमें अश्वघोष द्वारा रचित सौंदर्यानंद की कथा का चित्रण है। इसमें नंद और सुंदरी की प्रणय लीला का अंकन है। इसमें पुरुष स्त्री के बालों को संभालता हुआ दिखाई दे रहा है। वहीं स्त्री अपने हाथों में दर्पण लिए हुए है। पास में खड़ी दासी के पास श्रंगार पेटिका है। यह महलों के अंतःपुर का दृश्य प्रतीत होता है।


बापू और नेहरू का अस्थि कलश है यहां पर -  यहां पर वह कलश देखा जा सकता है जिससे महात्मा गांधी यानी बापू की अस्थियों को मथुरा में यमुना नदी में 12 फरवरी 1948 में प्रवाहित किया गया था। इसके बाद इस कलश को तत्कालीन जिलाधिकारी को सौंप दिया गया था। बाद में यह कलश संग्रहालय में लाकर रख दिया गया।

दूसरा अस्थि कलश देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का है। सन 1964 में उनकी मृत्यु के बाद उनकी अस्थियां भी मथुरा में यमुना नदी में प्रवाहित करने के लिए लाई गई थीं। इस कलश को भी मथुरा के संग्रहालय में संभाल कर रखा गया है। आगे हम शिव और बुद्ध के और कई रूप इस संग्रहालय में देखेंगे।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com
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आगे पढ़िए - बौद्ध संस्कृति का बड़ा केंद्र हुआ करता था मथुरा 

Sunday, April 26, 2020

मथुरा वृंदावन रेल बस का सफर


रेलवे लाइन पर बस। जी हां, देश के कुछ स्थलों पर रेल की पटरियों पर बस भी चलती है। अगर आप दिल्ली में रहते हैं तो ऐसी बस को देखने के लिए बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं है। मथुरा जंक्शन से वृंदावन के बीच ऐसी रेल बस रोज संचालित होती है। इसका सफर भी काफी सस्ता है। दस रुपये में मथुरा से वृंदावन पहुंचिए। 

बीच में मरम्मत के लिए कई बार बंद रहने के बाद इन दिनों इस मार्ग पर रेल बस का संचालन किया जा रहा है। दरअसल मथुरा से भरतपुर और हाथरस का मार्ग कभी मीटरगेज हुआ करता था। ये सारी लाइनें अब ब्राडगेज में बदल चुकी हैं पर मथुरा से वृंदावन की की सिंगल ट्रैक वाली कुल 14 किलोमीटर की रेलवे लाइन अभी भी मीटर गेज ही है। इसे ब्राडगेज में बदलना रेलवे के लिए फायदे का सौदा नहीं है। इसलिए इस लाइन पर रेल बस चलाने की योजना बनी।


मथुरा जंक्शन रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर एक और दो से आगरा दिल्ली मार्ग की रेलगाड़ियां गुजरती हैं। स्टेशन भवन के पूरब तरफ की लाइनो से हाथरस जाने वाली रेलगाड़ियां गुजरती हैं। इनके बीच में स्टेशन का मुख्य भवन है। इससे बाहर निकलने पर एक शेड के नीचे वृंदावन जाने वाली रेल बस खड़ी रहती है।

हर रोज पांच बार वृंदावन की ओर - आजकल ये ट्रेन सुबह में दो बार मथुरा से वृंदावन की तरफ और शाम को तीन बार वृंदावन की तरफ जाती है। यानी एक रेल बस पांच बार वृंदावन की तरफ जाती है और इतनी ही बार वृंदावन से मथुरा की तरफ वापस लौटती है।

 रेल बस सुबह 6.35 बजे, 8.55 बजे, 15.20 बजे, 16.55 बजे और शाम को 19.25 बजे मथुरा से वृंदावन के लिए प्रस्थान करती है। दोपहर में इस रेल बस का सफर कुछ घंटे के लिए थम जाता है।

वृंदावन से रेल बस सुबह 7.25, 9.40, शाम को 16.10 इसके बाद 17.40 और 20.30 बजे अपने सफर पर चलती है। रात को ये रेल बस मथुरा जंक्शन पर अपने शेड में आराम फरमाती है।

वृंदावन वन रेलवे स्टेशन का स्टेशन कोड बीडीबी (BDB) है। इस रेल के सफर में रास्ते में दो स्टेशन आते हैं। मथुरा से दो किलोमीटर आगे श्रीकृष्ण जन्मस्थान और छह किलोमीटर पर मसानी। इसके बाद आखिरी स्टेशन वृंदावन। यानी ऐतिहासिक श्रीकृष्ण जन्मभूमि को यह मीटर गेज रेल नेटवर्क जोड़ती है।



इस 14 किलोमीटर की सफर के लिए रेल बस का किराया 10 रुपये है। पर आपको इसके टिकट के लिए कहीं रेलवे की खिड़की पर जाकर लाइन में लगने की कोई जरूरत नहीं है। इसका टिकट रेल बस में ही मिल जाता है। हालांकि स्थानीय लोगों में यह रेल बस सेवा ज्यादा लोकप्रिय नहीं हैं। इसलिए रेल बस के सफर में कोई खास भीड़ नहीं होती।

एक कोच वाली यह रेल बस डीजल इंजन से संचालित होती है। रास्ते में जहां जहां सड़कों के समपार आते हैं वहां पर लोको पायलट को खुद सावधानी बरतते हुए बस की रफ्तार को धीमी करके ट्रेन का संचालन करना पड़ता है। कई साल इस ट्रैक पर रेल सेवा बंद रहने पर पटरियों के आसपास लोगों ने अतिक्रमण कर लिया था।

इस रेल बस का निर्माण रेलवे के इज्जतनगर वर्कशॉप में किया गया है। पहले एक रेल बस हुआ करती थी। साल 2019 में एक और रेल बस उपलब्ध कराई गई। रेल बस के कोच के बाहर कृष्ण के जीवन से जुड़ी झांकियों की पेंटिंग लगी है। मथुरा से वृंदावन दर्शन के लिए रेल बस से सफर एक सस्ता तरीका है।
मथुरा जंक्शन पर रेल बस का डिपो बना हुआ। इस रेल बस की व्यवस्था एक सीनियर सेक्सन इंजीनियर के हवाले है। यह रेल बस सेवा उत्तर मध्य रेलवे के तहत आती है।
ऐसी ही एक रेल बस दक्षिण भारत में कर्नाटक के कोलार और बंगारपेट के बीच चलती थी जो अब बंद हो गई। 


मेट्रो रेल की योजना - भविष्य में मथुरा वृंदावन के इस रेलवे लाइन को ऊपर एलिवेटेड मेट्रो रेलवे ट्रैक बनाने की योजना पर काम चल रहा है। जहां अभी रेलवे लाइन है वहां सड़क और उसके ऊपर रेलवे ट्रैक बिछाने का प्रस्ताव है। अगर ऐसा हुआ तो मीटर गेज रेल बस सेवा इतिहास बन जाएगी।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com
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Friday, April 24, 2020

मथुरा का स्वाद : बृजवासी के पेड़े


मथुरा के स्वाद की पहचान उसके पेड़े के कारण है। और ये पेड़े अगर बृजवासी के हों तो फिर और क्या बात है। बृजवासी के पेड़े की एक दुकान गोवर्धन के बाजार में भी है। वैसे उनकी मुख्य  दुकान मथुरा शहर के होली गेट के पास है।
गोवर्धन से वापसी से पहले मैं बृजवासी के रेस्टोरेंट और स्वीट शॉप में पहुंच गया हूं। यहां हमेशा खाने पीने वालों की भीड़ रहती है। मैं अपनी मनपसंद रबड़ी का ऑर्डर करता हूं। इनकी रबड़ी का स्वाद बेहतर है। बृजवासी के मीनू पर नजर डालने पर पता चलता है कि वे नास्ता, भोजन सब कुछ पेश करते हैं। मिठाइयों के अलावा कई तरह की नमकीन भी उपलब्ध है।

पर बृजवासी की पहचान उनके पेड़े के लिए है। उनके पेड़े बाकी के दुकानों से थोड़े महंगे हो सकते हैं। पर उनका स्वाद और शुद्धता भी अलहदा है। यहां पर दो तरह के पेड़े हैं। एक कम चीनी वाला और एक समान्य चीनी वाला। कम चीनी वाला पेड़ा थोड़ा महंगा है। आपको अगर चीनी कम चाहिए तो फीका पेड़ा भी खरीद सकते हैं।

बृजवासी के पेड़े की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान है। मथुरा में होली गेट के अलावा उनकी एक दुकान कृष्ण जन्मभूमि मंदिर के पास भी स्थित है। अब आप चाहें तो उनके पेड़े और मिठाइयों के लिए ऑनलाइन ऑर्डर भी कर सकते हैं। ज्यादा जानकारी के लिए उनकी वेबसाइट पर जा सकते हैं- बृजवासी डॉटकाम (https://www.brijwasi.com/store/)
जैसे आगरा का पेठा प्रसिद्ध है ठीक उसी तरह मथुरा के पेड़े की प्रसिद्धि है। दूसरे शहरों में भी इसी तरह का पेड़ा मथुरा के पेड़ा के नाम से बिकता है। मथुरा में पेड़ा बनाने की कहानी सदियों पुरानी है। न सिर्फ मथुरा बल्कि नंदगांव, बरसाना के हलवाई भी बड़े कड़ाह में दूध को धीमी आंच पर जलाकर पेड़ा बनाते हुए दिखाई दे जाते हैं। वैसे तो पेड़ा बनाने की प्रक्रिया कोई मुश्किल नहीं है। पर मथुरा के पेड़े अपने अनूठे स्वाद के लिए जाने जाते हैं।

बृजवासी मिठाईवाले के स्वामी राजीव अग्रवाल, रवि अग्रवाल, सतीश अग्रवाल और पुलकित अग्रवाल हैं। अब यह परंपरागत दुकान कारपोरेट रूप ले चुकी है। मथुरा रेलवे स्टेशन के पास ही इस परिवार का एक होटल भी है नाम है बृजवासी रॉयल।

बृजवासी में थोड़ी पेट पूजा के बाद दिल्ली वापसी की राह पर हूं। गोवर्धन से बरसाना रोड पर चलने के बाद मैं छाता की तरफ जाने वाली सड़क पर मुड जाता हूं। छाता से जीटी रोड पकड़कर मैं दिल्ली तरह चल पडूंगा। रास्ते में आगरा नहर दिखाई दे जाता है। इस पर बना हुआ पुल देखकर मैं थोड़ा चौंकता हूं। पुल पर लगे बोर्ड पर इसका निर्माण वर्ष अंकित हैं – शहर 1873 जी हां, आगरा कैनाल की कथा बहुत पुरानी है। ब्रिटिश काल में दिल्ली के ओखला में यमुना पर बैराज बनाकर आगरा नहर निकाली गई थी। इससे ब्रज क्षेत्र के खेतों को सिंचाई के लिए पानी पहुंचा था।

नहर के आसपास खेतों धान की बालियां झूम रही है। धान पकने को हैं।  मैं एक जगह रुक कर इन सुनहरी बालियों के संग सेल्फी लेने का मोह नहीं छोड़ पाता। हमारे गांव में भी धान की खेती बड़े पैमाने पर होती है। मेरा बचपन इन खेतों के साथ ही तो गुजरा है। थोड़ी दूर आगे चलने पर कुछ खेतों में किसान पराली जलाते हुए दिखाई दे जाते हैं। आजकल ये बड़ा मुद्दा बना हुआ है। पर पराली जलाने वाले लोग नहीं मान रहे।

धरम ढाबा का गरम पराठा - मैं छाता पहुंच गया हूं। यहां से हाईवे पर दिल्ली की दूरी लिखी है। दिल्ली 119 किलोमीटर। थोड़ी दूर चलने के बाद गुलशन ढाबा में रुकता हूं। यहां कुल्हड़ वाली चाय भी उपलब्ध है सिर्फ 20 रुपये में। चाय पीने के बाद फिर आगे चल पड़ता हूं। अगला पड़ाव है धरम ढाबा। यहां पर रुक कर एक पराठे आर्डर किया। धरम ढाबा का पराठा भी शानदार है। एक पराठा काफी है पेट पूजा के लिए।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
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Wednesday, April 22, 2020

कुसुम सरोवर के पास महाराजा सूरजमल की छतरी


गोवर्धन शहर में घूमते हुए इस बार राजस्थान के भरतपुर के जाट राजाओं की समाधि देखने की इच्छा है। पिछली बार मैं उन्हें नहीं देख पाया था। ये समाधि कुसुम सरोवर के पास स्थित है। ये समाधि उत्तर प्रदेश सरकार के अधीन है। मैं जब वहां पहुंचा जो मौके पर मौजूद केयरटेकर ने कहा कि अंदर जाने की इजाजत नहीं है। और कुरेदने पर वे कहते हैं- ये तो राजाओं की कब्रगाह है, आप इसे क्यों देखना चाहते हो। 

दरअसल लोग मानते हैं कि भले ही शाही श्मशान घाट हो पर यहां पर उनकी आत्माएं विचरण करती होंगी। इसलिए लोग यहां आने और अंदर जाने से भय खाते हैं। पर राजा लोग तो अपने समाधि को भी भव्य बनाना चाहते थे। तभी तो उनकी छतरियां और देवल को भी इतना भव्य रूप प्रदान किया गया है। राजस्थान में इसी तरह जोधपुर के राजाओं की छतरियां मंडोर में बनाई गई हैं।
भरतपुर के जाट राजाओं का रिश्ता मथुरा के शहर गोवर्धन से रहा है। दरअसल गोवर्धन भरतपुर के अंतर्गत आता है। वैसे तो महाराजा सूरजमल युद्ध लड़ते हुए दिल्ली में खेत रहे थे। पर उनकी सुंदर छतरी का निर्माण मथुरा के पास गोवर्धन में किया गया है। हालांकि महाराजा सूरजमल की समाधि को लेकर थोड़ा विवाद है।

महाराजा सूरजमल दिल्ली में यमुना के किनारे शाहदरा के पास जंगलों में युद्ध लड़ते हुए दुश्मनों से घिर जाने के बाद बचकर नहीं निकल सके। उनका वहीं पर निधन हो गया। नियति कुछ ऐसी रही कि भरतपुर का राजघराना उनके शव को नहीं प्राप्त कर सका। दो दिनों तक उनके अंतिम संस्कार को लेकर राजघराने में चर्चा चलती रही। ऐसी हालत में उनकी एक महारानी ने महाराजा सूरजमल का एक पुराना दांत निकाला, जो उनके पास निजी संग्रह में निशानी के तौर पर मौजूद था। तो उनके दांत से ही महाराजा सूरजमल का प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार किया गया। बाद में उनकी याद में गोवर्धन में कुसम सरोवर के पास विशाल छतरी का निर्माण कराया गया।

भरतपुर के राजाओं की ये छतरियां बड़ी कलात्मक हैं। तीन मंजिला इमारत में सुंदर झरोखे बने हैं। इन झरोखों में शानदार नक्काशी की गई है। जाट राजाओं ने इन छतरियों के निर्माण के साथ तत्कालीन शिल्पियों को खूब रोजगार उपलब्ध कराया। पर आजकल इस कलात्मकता के कद्रदान कम हैं।

गंगा बाग नाम से मशहूर - भरतपुर के राजाओं की छतरियों का ये परिसर गंगा बाग के नाम से विख्यात है। यह परिसर करीब 4.35 एकड़ में फैला है। यहां सभी भरतपुर के राजाओं का दाह संस्कार किया जाता था। यहां बनी छतरियों में राजा बलदेव सिंह और बलवंत सिंह की छतरियां काफी कलात्मक हैं। इन छतरियों के निर्माण में राजस्थान से लाए गए पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है। इनके मेहराब में पक्षियों की सुंदर कलाकृतियां हैं। खासतौर पर शुक (तोता) और मयूर का चित्रण बेहतरीन है। इन छतरियों का निर्माण इस विश्वास के साथ कराया गया है कि मरणोपरांत राजा इन महलों में अपने अनुचरों के साथ रह सकें। यहां रानियों की समाधि भी बनाई गई है जिसमें पालकीनुमा मंडप है।

प्रतापी राजा सूरजमल - महाराजा सूरजमल जन्म 13 फरवरी 1707 में हुआ था। उनका निधन 25 दिसंबर 1763 को हुआ। उनका जन्म और मुगलशासक औरगंजेब की मृत्यु का काल खंड एक ही है। महाराजा सूरजमल के पिता का नाम राजा बदन सिंह था। महाराजा सूरजमल भरतपुर के प्रतापी राजा थे उन्होने 1733 में भरतपुर रियासत की स्थापना की थी।


महाराजा सूरजमल और पानीपत की तीसरी लड़ाई- साल 2019 के अंत में पानीपत फिल्म के प्रदर्शन होने के बाद महाराजा सूरजमल की भूमिका को लेकर विवाद उठा। फिल्म की स्क्रिप्ट के मुतबिक पानीपत की तीसरी लड़ाई में 1761 में मराठाओं की सेना का महाराजा सूरजमल ने साथ नहीं दिया। इस लड़ाई में मराठा अहमद शाह अब्दाली से हार गए थे। मराठा सेना को रसद के अभाव में भूखे प्यासे लड़ना पड़ा। पर इसमें आंशिक सच्चाई है।


दिल्ली में महाराजा सूरजमल की समाधि - दिल्ली में जहां महाराज सूरजमल का निधन हुआ वहां पर आजकल महाराजा सूरजमल पार्क का निर्माण कराया गया है। यहां पर बाद में महाराज सूरजमल की एक समाधि का भी निर्माण कराया गया है।

इसके ठीर बगल में पूर्वी दिल्ली की एक आवासीय कॉलनी भी है जिसका नाम सूरजमल विहार रखा गया है। भारत सरकार ने साल 2009 में महाराजा सूरजमल के सम्मान में उनके ऊपर एक पांच रुपये का डाक टिकट भी जारी किया था। 

: विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com
(MAHRAJA SURAJMAL KI CHATRI,  GOVARDHAN,  MATHURA) 
   


Monday, April 20, 2020

आचार्य महाप्रभु वल्लभाचार्य और उनकी 84 बैठकें


सूर की साधना स्थली पारसौली में महानसंत महाप्रभु वल्लभाचार्य जी की बैठक भी है। यह उनकी देश भर में बनी 84 बैठकों में से एक है। सूरदास खुद वल्लभाचार्य के शिष्य थे। सूरदास जी को वल्लभाचार्य के आठ शिष्यों में प्रमुख स्थान प्राप्त था।

कौन थे वल्लभाचार्य - वल्लभाचार्य भक्तिकाल में सगुणधारा में पुष्टि मार्ग के प्रणेता माने जाते हैं। उनका सन 1479 में चौड़ा नगर के पास वन में हुआ था। उनका परिवार दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश में गोदावरी नदी के तट पर स्थित ग्राम कांकरवाड का रहने वाला था। उनका मां का नाम इल्लमागारु था। आठ माह में पैदा हुए बालक का नाम वल्लभ रखा गया। 

उनका बचपन काशी व्यतीत हुआ था। यहीं उनका आरंभिक अध्ययन हुआ। उनका परिवार काफी बड़ा और समृद्ध था। आगे चलकर वल्लभाचार्य भी वेद शास्त्र में पारंगत हुए। उनके दो पुत्र हुए गोपीनाथ और विट्टलनाथ। उन्हें श्रद्धा के साथ महाप्रभु वल्लभ भी कहा जाता है। कहा जाता है कि वल्लभाचार्य ने अपना दर्शन खुद गढ़ा था लेकिन उसके मूल सूत्र वेदांत में ही निहित हैं।

महाप्रभु की 84 बैठकें : आचार्य पद प्राप्त करने के बाद वल्लभाचार्य ने कुल तीन बार पूरे भारत भ्रमण किया। वे गुरुनानक देव की तरह ही बड़े भ्रमणशील संत हुए। इस दौरान उन्होंने शुद्धाद्वैत पुष्टिमार्ग संप्रदाय का प्रचार किया और अपने अनगिनत शिष्य बनाए। इस दौरान उन्होंने मार्ग में कुल 84 भागवत पारायण किए। जिन-जिन स्थानों पर पारायण की थी वे आज भी 84 बैठक के नाम से जानी जाती हैं।

दूसरे शब्दों में कहें तो श्री वल्लभाचार्य जी ने अपनी यात्राओं में जहां श्रीमदभागवत का प्रवचन किया था अथवा जिन स्थानों का उन्होंने विशेष माहात्म्य बतलाया था, वहां उनकी बैठकें बनी हुई हैं। ये बैठकें देश के अलग अलग राज्यों में स्थित है। इनमें से कई बैठकें मथुरा के आसपास स्थित हैं। मुझे महाप्रभु की एक बैठक नंदगांव से पहले कोकिल वन में भी दिखाई दे गई थी।
बिहार के शहर हाजीपुर के हेला बाजार में भी महाप्रभु की एक बैठक है। देश में स्थापित इन बैठकों में कई अच्छे हाल में हैं तो कई का हाल बुरा है। कई बैठकों के पास अच्छी खासी जमीन भी है। आज भी महाप्रभु के भक्तों की बड़ी संख्या है जो इन बैठकों से जुड़े हुए हैं।

महाप्रभु वल्लभाचार्य शुद्धाद्वैतवाद - महाप्रभु वल्लभाचार्य के मध्यकालीन भारत के महान संत माने जाते हैं। उनका पूरा जीवन कृष्ण भक्ति में लीन रहा। उनका निधन सन 1537  (संवत 1588)  में हुआ। वे शुद्धाद्वैतवाद के प्रतिपादक संत थे। उन्होंने माधवाचार्य द्वारा प्रतिपादित विचारधारा द्वैतवाद और शंकराचार्य के अद्वैतवाद को आगे बढ़ाया। संत माधवाचार्य की विचारधारा शंकराचार्य के अद्वैतवाद से बिल्कुल उलट है। यानी वे मानते हैं ब्रह्म और जीव अलग अलग हैं। पर वल्लभाचार्य ने कहा कि जीव जगत में ईश्वर का ही रूप है। जीव और जगत में एक अभिन्नत्व भी है।

सम्मान में डाक टिकट जारी हुआ  - संत वल्लभाचार्य ने अपने जीवन काल में कई पुस्तकों की रचना भी की। भारत सरकार ने इस महान संत के सम्मान में सन 1977 में एक रुपये मूल्य का एक डाक टिकट भी जारी किया था।

पुष्टिमार्ग का विचार ः कृष्णभक्ति में लीन उन्होंने पुष्टिमार्ग का विचार प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि ईश्वर और जीव के बीच वास्तव में कोई भेद नहीं है। ब्रह्म का अंश ही है जीव। वल्लभाचार्य के अनुसार जीव ब्रह्म ही है। यह भगवत्स्वरूप ही है, किन्तु उनका आनन्दांश हमेशा आवृत रहता है। आज उनके भक्तों की बहुत बड़ी फेहरिस्त है। 

-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-        ( MAHAPRABHU VALLABHACHARYA, 84 BAITHAK, KRISHNA BHAKTI, PUSTIMARG, MATHURA )