Saturday, March 7, 2020

कचौड़ी गली सून कईल. . बलमू

काशी विश्वनाथ के दर्शन के बाद मैं पैदल ही निकल पड़ा हूं चौक की तरफ। पर मेरे पांव मुड़ जाते हैं कचौड़ी गली की तरफ। आपने गौहर जान की प्रसिद्ध कजरी सुनी होगी- मिर्जापुर कइल गुलजार कचौड़ी गली सुन कईल बलमू। कभी गौहर जान इस कचौड़ी गली में रहती थीं। कई सौ सालों में इस कचौड़ी गली में काफी कुछ बदला है। पर बहुत कुछ चीजें ऐसी हैं नहीं बदली।

बनारसी साड़ियों की मंडी -पर कचौड़ी गली इन दिनों साड़ियों की मंडी है। गांव से बनारसी साड़ी बनाकर लाने वाले कारीगर कचौड़ी गली के कमीशन एजेंट को साड़ियां बेच कर जाते हैं। अगर आपको साड़ियां खरीदने का इल्म है इन एजेंटों से साड़ियां खरीद सकते हैं। साल 2003 में अपने विवाह से पूर्व माता जी के साथ साड़ियां खरीदने के लिए मैं इस गली में आया था। तब यहां से साड़ियां खरीदवाने में हमारी मदद वाराणसी से प्रसिद्ध साहित्यकार और कवि धर्मेंद्र कुशवाह जी ने की थी।


दरअसल उनके परिवार का जडी का काम है। इसलिए वे कचौड़ी गली से साड़ी बिक्रेताओं से बाबस्ता थे। और हमें वाजिब दाम पर अच्छी साड़ियां मिल गई थीं।

राज बंधु का स्वाद – इसी कचौड़ी गली में राजबंधु की मिठाइयों की प्रसिद्ध दुकान है। वे देसी घी की मिठाइयां बनाते हैं। भले ही इनकी मिठाइयां थोड़ी महंगी होती हों पर उनका स्वाद अलहदा है। आप यहां परवल वाली मिठाई भी प्राप्त कर सकते हैं। 

अपने बीएचयू के दिनों में मैं अपने दोस्त यज्ञनाथ झा के साथ यहां मिठाइयां खाने आया करता था। वैसे तो बनारस में मिठाइयों की कई प्रसिद्ध दुकाने हैं पर उन सबके बीच राजबंधु का नाम अलग है। बनारस के स्थानीय लोगों के बीच उनकी अलग पहचान कायम है। पर अभी फिलहाल तो मिठाइयां नहीं खानी। 

रात के दस बजे हैं और मुझे भूख लग रही है। तो इसी कचौड़ी गली में एक ढाबे में खाने के लिए प्रवेश कर गया हूं। रात्रि के भोजन की थाली यहां पर 40 रुपये में है। इसमें चार चपाती दो सब्जी और दाल है। अगर चावल भी लेते हैं तो थाली 50 रुपये की हो जाएगी। बनारस के हिसाब से ये खाना सस्ता है। यहां पर मैं देख रहा हूं कि कुछ विदेशी भी खाने के लिए आए हुए हैं। वे खाना पैक कराकर ले जा रहे हैं।

ठाकुर प्रसाद एंड संस के कैलेंडर -  खाने के बाद आगे बढ़ने पर मुझे ठाकुर प्रसाद एंड संस का बोर्ड नजर आता है। ठाकुर प्रसाद मतलब हिंदू कैलेंडर , पांचांग और धार्मिक पुस्तको के बड़े प्रकाशक। दिल्ली पहुंचकर भी मैं हर साल ठाकुर प्रसाद का कैलेंडर जरूर खरीदता हूं। अब इस गली मे ठाकुर प्रसाद नाम से कई प्रकाशक हो गए हैं।  

कचौड़ी गली काशी के प्रसिद्ध मणिकर्णिका घाट जाने का रास्ता भी है। वही घाट जहां दिन रात यानी 24 घंटे अनवरत कोई न कोई लाश जलती रहती है। तो घाट तक जाने वाले लोग अक्सर इसी गली से पैदल गुजरते हैं। तो कई बार आपको राम नाम सत्य है की आवाज कानों मे सुनाई दे जाएगी। रात के अंधेरे में मुझे भी ऐसी आवाज सुनाई दे जाती है।


वापसी की ट्रेन - मुगलसराय की ओर – मेरी वापसी की ट्रेन दीनदयाल नगर से है। कचौड़ी गली से निकलकर मैं पैदल ही मैदागिन की तरफ बढ़ चलता हूं। चौक के बाद बुलानाला, फिर नीची बाग। बनारस में सड़कों पर रात में भी बाजार गुलजार है। मैं मैदागिन पहुंच गया हूं। यहां से कुछ आटो रिक्शा से सीधे मुगलसराय भी जाते हैं। पर वे ज्यादा किराया मांग रहे हैं। तो मैं मैदागिन से कैंट रेलवे स्टेशन का आटो रिक्शा ले लेता हूं। कैंट से रात को 11 बजे के बाद एक आटो रिक्शा मिला। शेयरिंग में मुगलसराय का किराया 30 रुपये। मैं आटो में बैठ गया। इस आटो वाले ने एक कुत्ता पाला हुआ है। इस कुत्ते को अपने आटो की छत पर खड़ा कर रखा है। सारे रास्ते में आसपास लोग इस आटो रिक्शा को कौतूहल से देख रहे हैं।

- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmal.com 
( KACHAURI GALI, VARANASI, RAJ BANDHU SWEETS, THAKUR PRASAD, MANIKARNIKA GHAT ) 


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