Sunday, March 29, 2020

नानकमत्ता गुरुद्वारा – गुरुनानकदेव जी की स्मृतियां हैं यहां


दुनिया के तमाम देश कोरोना जैसी गंभीर बीमारी से लड़ रहे हैं। ऐसे वक्त में घर में रहें। यात्राएं हरगिज न करें। यात्रा साहित्य पढें। नई किताबें पढ़ें। दानापानी ब्लॉग पर लगातार अपलोड हो रही यात्राएं पहले की गई हैं।

खटीमा से चले शेयरिंग आटो रिक्शा ने हमें नानकमत्ता बाजार के चौराहा पर उतार दिया है। नानकमत्ता उत्तराखंड के जिला उधम सिंह नगर का एक ऐतिहासिक शहर है। यह छोटा सा शहर सिखों के पहले गुरु और महान मानवतावादी गुरुनानक देव जी को समर्पित है। यह देवहा नदी की जल धारा के किनारे बसा हुआ है।

नानकमत्ता चौराहे से मुझे गुरुद्वारा जाना है। लोगों ने बताया सीधे सड़क पर चलते जाएं। आगे तिराहे से बायें मुड़ते ही गुरुद्वारा दिखाई दे जाएगा। छोटे से बाजार की सड़क पर हल्की बारिश में मैं आगे बढ़ने लगा। हालांकि बैटरी रिक्शा से जाने का भी विकल्प है। पर मैं पैदल ही चल पड़ा हूं। अब नानकमत्ता का विशाल गुरुद्वारा मेरी नजरों के सामने है। यहां पर निजी वाहनों के लिए विशाल पार्किग उपलब्ध है। गठरी घर में अपना बैग जमा करने और चप्पल जमा करने के बाद सिर में पटका बांध कर मैं गुरु घर में प्रवेश कर गया हूं।



गुरुद्वारे में मत्था टेकने के बाद थोड़ी देर बैठकर कीर्तन सुनने लगा। यह बड़ा सुकुन देने वाला क्षण होता है। नानकमत्ता सिखों के महत्वपूर्ण तीर्थ स्थानों में से एक है। यहां के गुरुद्वारा का नाम भी गुरुद्वारा नानक माता साहिब है। सिखों के पहले गुरु गुरु नानक देव सन 1515 में कैलाश पर्वत की यात्रा के दौरान नानकमत्ता पहुंचे थे। यहां उनका सिद्धों से कई मुद्दों पर विवाद हुआ था। 

धुना साहिब और भोरा साहिब - गुरुद्वारा के मुख्य भवन के अंदर गुरु नानक देव से जुड़ी हुई दो प्रमुख स्मृतियां हैं। यहां एक गड्ढा बना है जिसे भोरा साहिब कहते हैं। इस स्थल पर गुरुनानकदेव जी को सिद्ध लोगों ने परेशान करने की कोशिश की थी। कहा जाता है कि सिद्धों ने एक गड्ढा खोदकर एक बच्चे को छिपा दिया। पर उनकी ये चाल काम नहीं आई है। जब धरती से उस बच्चे के बारे में पूछा गया तो तीन बार आवाज आई – नानकमता, नानकमता, नानकमता।

गुरुघर के अंदर दूसरा ऐतिहासिक स्थल धूना साहिब है। कहा जाता है कि जब गुरुनानक देव जी के शिष्य मरदाना ने  सिद्धों से आग मांगा तो उन्होंने देने से इनकार कर दिया। तब मरदाना ने खुद लकड़ियां जुटाई। फिर इन लकड़ियों में गुरुजी के प्रताप से खुद ही आग जलने लगी।

पीपल साहिब – गुरुद्वारा परिसर में सरोवर के किनारे एक विशाल पीपल का वृक्ष है जिसे पीपल साहिब कहा जाता है। इस पीपल के वृक्ष के बारे में बताया जाता है कि गुरुनानक देव जी ने इसे अपने हाथों से लगाया था। अब इस विशाल वृक्ष को बड़े जतन से संरक्षित करके रखा गया है। यहां आने वाले श्रद्धालु इस वृक्ष के आगे श्रद्धा से सिर झुकाते हैं।

सरोवर में मछलियां - गुरुद्वारा के अंदर विशाल सरोवर है। ऐसे सरोवर देश के कई प्रमुख गुरुद्वारों में दिखाई देते हैं। सरोवर का जल अत्यंत निर्मल है। इसमें मछलियां भी पाली गई हैं। सरोवर में मछलियों को चहलकदमी करते हुए देखना अच्छा लगता है। लोगों को आम तौर पर इस सरोवर में स्नान करने की अनुमति नहीं है।
गुरुद्वारा परिसर में सरोवर के एक किनारे पर एक संग्रहालय का भी निर्माण कराया गया है। इसमें कई चित्र विथिकाएं हैं। यहां पर सिख धर्म के दस गुरुओं के बारे  में और सिख धर्म से जुड़ी प्रमुख ऐतिहासिक लड़ाइयों के बारे में काफी कुछ जाना जा सकता है।

गुरुद्वारा में मत्था टेकने के बाद मैं चल पड़ा लंगर हॉल की तरफ। लंगर में आज दाल रोटी, चावल, सब्जी के साथ खीर मिल रही है। लंगर छकने के बाद अब बाहर चलने की बारी है। गुरुद्वारा के बाहर सड़क के उस पार पार्किंग भी है। यहां पर निजी वाहनों से आने वाले लोग अपने वाहन खड़ा कर सकते हैं।

 दिल्ली और पंजाब की बसें - नानकमत्ता से हर रोज सीधे दिल्ली, अंबाला और पंजाब के सभी शहरों के लिए लग्जरी बसें चलती हैं। ये निजी बसें सिख श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए चलाई जाती हैं। वैसे नानक मत्ता का निकटतम शहर सितारगंज है। यहां पर आप रुद्रपुर या खटीमा कहीं से भी स्थानीय वाहनों से पहुंच सकते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com 
(NANAKMATTA GURUDWARA, SITARGANJ, UTTRAKHAND)


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