Sunday, March 22, 2020

हिमालय की वादियों में विराजती हैं मां पूर्णागिरी


मां पूर्णागिरि मन्दिर भारत के उत्तराखंड के चंपावत जिले में स्थित है। चंपावत जिले की तहसील टनकपुर के पास अन्नपूर्णा शिखर पर 5500 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यह 108 सिद्ध पीठों में से एक माना जाता है। यह स्थान महाकाली की पीठ माना जाता है। कहा जाता है कि यहां पर माता दक्ष गिरा था। माता का मंदिर अत्यंत छोटा सा है। आसपास हिमालय की नाजुक पहाड़ी चट्टाने हैं। इसलिए श्रद्धालुओं को यहां देर तक रुकने और भीड़ भाड़ बढ़ाने की  इजाजत नहीं है।
तीन किलोमीटर की पदयात्रा -  मंदिर के आधार तल जहां वाहनों के लिए पार्किंग का इंतजाम है, वहां से श्रद्धालुओं को तीन किलोमीटर का सफर पैदल ही तय करना पड़ता है। इस रास्ते में काफी सीढ़ियां भी चढ़नी पड़ती है। कहीं कहीं पर रास्ता सपाट भी है। पर मंदिर जाने के लिए किसी चेयर लिफ्ट, पालकी आदि का इंतजाम नहीं है। सिर्फ पैदल चलने में सक्षम लोग ही मंदिर तक पहुंच सकते हैं। अक्सर श्रद्धालु स्नान करने के बाद प्रसाद लेकर पदयात्रा की शुरुआत करते हैं। पार्किंग से लेकर अगले दो किलोमीटर तक मंदिर के पैदल यात्रा मार्ग में दोनों तरफ दुकाने, खाने पीने के रेस्टोरेंट और रहने के लिए छोटी छोटी धर्मशालाएं बनी हैं। इनमें से आप कहीं भी दिन या रात्रि में विश्राम कर सकते हैं।

भैरव मंदिर और झूठे का मंदिर - पदयात्रा की शुरुआत करते ही सबसे पहले भैरव मंदिर आता है। काफी श्रद्धालु भैरव मंदिर में पूजा अर्चना करने के बाद आगे की यात्रा शुरू करते हैं। अब रास्ते में जगह जगह बारिश से बचने के ले शेड भी बनाए गए हैं। पर अच्छा होगा कि आप छाता, टार्च, रेनकोट आदि लेकर माता के दरबार तक पदयात्रा करें। 

पूरे रास्ते दुकानकार आपको प्रसाद लेने के लिए या खाने पीने के लिए पूछते नजर आएंगे। तकरीबन एक किलोमीटर चलने के बाद एक मंदिर आता है उसका नाम है झूठे का मंदिर। कहा जाता है कि एक श्रद्धालु ने माता का मंदिर यहां निर्मित कराया पर उसने सोने की जगह नकली सुनहले रंगों का इस्तेमाल किया। लोग इस मंदिर के प्रति आस्था रखते हैं। पर यह झूठे के मंदिर के नाम से ही जाना जाता है।

तकरीबन दो किलोमीटर चलने के बाद रास्ते में मां काली का मंदिर आता है। वापसी में काफी श्रद्धालु इस मंदिर में भी आस्था से पूजन करते हैं। तकरीबन तीन किलोमीटर से ज्यादा पैदल चलते हुए आप माता पूर्णागिरी के दरबार में पहुंच जाते हैं। माता का मंदिर आकार में बहुत बड़ा नहीं है। यह मंदिर जितनी ऊंचाई पर है वहां पर मंदिर को विस्तारित रूप प्रदान करने की कोई जगह भी नहीं है। श्रद्धालु माता के दर्शन करने के बाद शीघ्र वापस लौटने लगते हैं। यहां श्रद्धालुओं को ज्यादा देर रुकने की इजाजत नहीं दी जाती, क्योंकि पहाड़ की चोटी पर भीड़ बढ़ने पर सबको परेशानी हो सकती है।

माता पूर्णागिरी का मेला-  होली के बाद आने वाली नवरात्रि से माता पूर्णागिरी का मेला शुरू हो जाता है। यह मेला अगले तीन महीने तक चलता है। यानी अप्रैल, मई और जून महीने में। तब माता पूर्णागिरी के दरबार में श्रद्धालओं की भीड़ उमड़ती है।

कैसे पहुंचे – चंपावत जिले के टनकपुर शहर से पूर्णागिरी मंदिर तक के लिए जीप का एक आदमी का किराया एक तरफ का किराया 50 रुपये है। आप टनकपुर में रुक कर मंदिर की ओर प्रस्थान कर सकते हैं। टनकपुर शहर से पूर्णागिरी मंदिर के आधार तल की दूरी 21 किलोमीटर है। इस रास्ते को तय करने के लिए टनकपुर शहर से जीप मिलती है।

माता पूर्णागिरी के मंदिर के रास्ते में चलते हुए प्रकृति का मनोरम नजारा दिखाई देता है। सामने बादल नजर आते हैं, तो नजरें नीचे झुकाने शारदा नदी बड़े ही वेग से बहती हुई नजर आती है। मंदिर बिल्कुल भारत नेपाल की सीमा पर है। मंदिर के आसपास भारत की मोबाइल कंपनियों का नेटवर्क कम पर नेपाल का नेटवर्क आसानी से पकड़ लेता है।

मैं जब माता पूर्णागिरी के दरबार में जाने के लिए चल पड़ा हूं तो पूरे रास्ते आते जाते अकेला यात्री हूं। बारिश के कारण आज कम श्रद्धालु पहुंचे हैं। मंदिर के बीच रास्ते में टुन्नास में पांडे जी मिल गए। वे हमारे साथ जीप में आए थे। उनका यहां पर धर्मशाला, होटल और प्रसाद की दुकान हैं। वे मुझे रोक लेते हैं। मैं उनके यहां एक कप चाय पीकर आगे बढ़ता हूं। वापसी में उनके होटल में दाल चावल खाया। पांडे जी के पास रहने के लिए कमरे का भी इंतजाम है। वे फिर आने का आमंत्रण देते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com
( MATA PURNAGIRI TEMPLE, TANAKPUR, UTTRAKHAND) 


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