Wednesday, February 26, 2020

काशी हिंदू विश्वविद्यालय का ऐतिहासिक सिंह द्वार


एक बार फिर काशी हिंदू विश्वविद्यालय की ओर। जहां हमने पांच साल गुजारे थे। करजी गांव से रमेश भाई अपनी बाइक से जीटी रोड तक छोड़ने आए हैं। उनके गांव से सात किलोमीटर की दूरी पर दुर्गावती बाइपास पर हमें वाराणसी की बस मिल गई यह जगह मरहिया मोड़ कहलाता है। मैं जिस बस में बैठा हूं यह निजी बस है जो हमें मुगलसराय शहर के बाहर से बाइपास होते हुए वाराणसी से ले गई।



रास्ते में कई जगह थोड़ा जाम मिला। पर इस बस ने बीएचयू के पीछे मारुति नगर इलाके में एक निजी बस अड्डे पर उतार दिया। इस बस अड्डे से बिहार के कई छोटे छोटे शहरों के लिए बसें चलती हैं। इसलिए लोग इसे बिहार बस स्टैंड कहते हैं। पर ऐसा प्रतीत होता है कि यह डग्गामार बसों को स्टैंड है जो बिना परमिट के चलाई जा रही हैं।

खैर इस बस स्टैंड से मुझे बीएचयू गेट यानी लंका के लिए बैटरी रिक्शा मिल गया। रास्ते में राम नगर को जोड़ने वाला नया गंगा पुल नजर आया। हमारे समय में तो यहां पीपे का पुल हुआ करता था। वह पुल बारिश के दिनों में बंद हो जाता था। आगे सड़क पर बहुत जाम है तो मैं बीएचयू गेट से पहले नए बने ट्रोमा सेंटर के पास ही उतर गया। यहां से पैदल चलता हुआ लंका पर पहुंच गया हूं।

एक बार फिर काशी हिंदू विश्वविद्यालय का विशाल सिंह द्वार मेरी नजरों के सामने है।  अपने पांच साल के बीएचयू प्रवास के दौरान इस गेट से अनगिनत बार अंदर और बाहर जाना हुआ होगा। पर यह प्रवेश द्वार हर बार कुछ नया लगता है। शिक्षार्थ आइए और सेवार्थ जाइए का संदेश देता हुआ यह प्रवेश द्वार तनकर खड़ा प्रतीत होता है। इसका निर्माण नागर शैली में कराया गया है। दूर से यह किसी मंदिर जैसा प्रतीत होता है।

जैसा कि आपको मालूम ही है कि काशी हिंदू विश्वविद्यालय के निर्माण में देश के प्रमुख राजा रजवाड़ों की बड़ी भूमिका रही है। तो इस सिंह द्वार का निर्माण उत्तर प्रदेश के बलरामपुर राज घराने के सौजन्य से हुआ था। इसकी जानकारी भी सिंह द्वार के अंदर की तरफ लगे संगमरमर पट्ट पर लिखी गई है। महाराजा पाटेश्वरी प्रसाद सिंह ने अपनी माता देवेंद्र कुंअरी जी की स्मृति में इस गोपुरम का निर्माण कराया था। साल था संवत 1997 यानी सन 1940 ईस्वी में। बीएचयू की स्थापना से कोई 23 साल बाद यह प्रवेश द्वार अस्तित्व में आया था।

आजकल शाम को यह प्रवेश द्वार एलईडी लाइटों से जगमग हो जाता है। आप थोड़ी देर तक इसे देखें तो अलग अलग रंग की रोशनी इसमें बदलती रहती है। यानी सुनहले रंग का यह प्रवेश द्वार कई अलग अलग रंगों में नजर आता है। इस प्रवेश द्वार के ठीक पीछे कतार में आपको हमेशा कई सौ साइकिलें लगी दिखाई दे जाएंगी। 

दरअसल बीएचयू के हास्टल में रहने वाले छात्र यहां अपनी साइकिलें खड़ी करते शहर में घूमने निकल जाते हैं। वापस आने पर अपनी साइकिलें ले जाते हैं। एक बार मेरी साइकिल यहां 24 घंटे से ज्यादा खड़ी रह गई थी। उसका ताला भी खुला रह गया था, पर चोरी नहीं हुई। हालांकि कई दोस्तों की साइकिलें यहां से चोरी भी हो जाती हैं। मेरे पास ज्यादा समय नहीं है इसलिए बीएचयू के सिंह द्वार से ही वापस चल पड़ा हूं। अपने किसी दोस्त को भी वाराणसी आने की सूचना नहीं दे पाया हूं। तो महामना की धरती नमन...

-- विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
( BHU GATE, SINGH DWAR, CONSTRUCTED BY RAJA OF BALRAMPUR ESTATE RAJA PATESWARI PRASAD SINGH IN 1940 )


2 comments:

  1. मौर्य जी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय का सिंहद्वार वास्तव में आकर्षित करता है किंतु इसके सम्मुख लगा हुआ जाम इस द्वार को विस्तार से देखने में अड़चन पैदा करता है। प्रशासन को एक अलग द्वार चौपहिया गाड़ियों के लिए बना देना चाहिए।

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    1. वहां जगह नहीं है। बाकी अंदर जाने के और भी गेट है ं

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