Monday, February 24, 2020

गांव में पीपल, पीपल की छैंया में पानी...

देश दुनिया घूमने की खुशी अलग होती है। अपने गांव में पहुंचने की अलग। चार साल बाद अपने गांव पहुंच रहा हूं। तो मन में एक कौतूहल है। मुझे अपने गांव का वो पीपल का पेड़ याद आ रहा है। और वह पुराना गीत भी... गांव में पीपल.. पीपल की छैंया... छैयां में पानी... 
मुंडेश्वरी, भभुआ, कुदरा से होते हुए दोपहर में मैं अपने गांव सोहवलिया के चल पड़ा हूं। कई सालों बाद इस रास्ते पर हूं। कुदरा जहानाबाद के बाद लालापुर, केवढ़ी, बडरकोना, हलिवंता, फिर आया गंगवलिया। इसके बाद बसहीं में कुदरा नदी का पुल। अब ये पुल काफी ऊंचा बन गया है। उसके बाद वह नहर का पुल, जहां बैठकर बचपन में हम घंटो कुदरा जाने वाले तांगे का इंतजार करते थे। फुली मोड़ से कानडिहरा होते हुए मैं अपने गांव में पहुंच गया हूं। कुदरा से कोई 20 मिनट लगे हैं अशोक भाई की कार से गांव पहुंचने में।

बस कुछ घंटे में अपने चाचाओं और एक मात्र जीवित दादा भुवनेश्वर सिंह जी से मुलाकात के बाद बारात का हिस्सा बन गया हूं। छोटे भाई संजीव के बारात निकलने की तैयारी चल रही है। दस से ज्यादा बुलेरो में लोग सवार हो गए हैं। अब बारात की संस्कृति बदल गई है। मेरी गांव की बहनें और बहुएं भी बारात में जा रही हैं। 

एक घंटे के सफर के बाद हमलोग बारात वाले गांव में पहुंच गए हैं। ये गांव है अवखरा। भभुआ से पश्चिम चैनपुर से दो किलोमीटर आगे। ये एक बड़ा गांव है।
यहां खाने-पीने के इंतजाम अब शहरों की तरह बुफे  सिस्टम में हैं। तो सब लोग पहुंचते ही खाने पीने में जुट गए।भाई की शादी में मैं सारी रात जाग कर सारे रस्मो रिवाज देखता रहा।

पहले जयमाला हुई, फिर द्वार पूजा, उसके बाद बरनेत यानी गहने आदि चढ़ाने की रस्म। फिर देर रात गए शादी की शुरुआत। तो शादी खत्म होते होते सुबह के चार बज गए। शादी के दौरान ओरतें गारी गा रही हैं- एक नया दू नया गिन लिह पंडीजी, दुल्हा के भाई के दहेज लिह पंडी जी। एक पइसा दू पइसा गिन लिह पंडी जी,  दुल्हा के फुआ के दहेज लिह पंडी जी।  ... बकलोल ससुरा, बकलोल ससुरा... बहु खातिर सारी रात जागा ससुरा...आदि आदि...

विवाह समारोह से निवृत होने के बाद सुबह सुबह मैं करजी गांव के लिए चल पड़ा हूं। अवखरा से थोड़े इंतजार के बाद एक बस मिल गई। इस बस ने मुझे खरिगांवा मोड़ पर उतार दिया। यहां  करजी करजांव के लिए दूसरी बस थोड़े इंतजार पर मिल गई। इस बस में करजी गांव के कुछ लोग भी हैं। यह मेरे बीएचयू के दिनों के साथी रमेश कुमार का गांव है। वे मेरा इंतजार कर रहे हैं। बस में करजी गांव के जो लोग हैं वे रमेश को जानते हैं। एक सज्जन हैं जो इस गांव के पूर्व सरपंच राधेेश्याम सिंह हैं। उनसे मैंने रमेश की बात भी कराई। अब मेरा रमेश के घर पहुंचना आसान हो गया। सरपंच जी ने बस से उतरने के बाद मुझे रमेश के घर पहुंचा दिया, फिर वे अपने घर गए। 


करजी कैमूर जिले के बड़े गांव में से एक है। इस गांव में 3000 के आसपास मतदाता हैं। गांव की आबादी दस हजार से ज्यादा है। ऐसे बड़े गांव पंजाब और हरियाणा में तो होते हैं। पर इतने बड़े गांव रोहतास और कैमूर जिले में कम ही हैं। 

गांव में कई बिरादरी के लोग रहते हैं। गांव में दलित और मुसलिम आबादी भी है। गांव के बीच सड़क गुजरती है। वहां छोटा सा बाजार भी बन गया। गांव का परिदृश्य कुछ ऐसा है कि यहां किसी भोजपुरी फिल्म की शूटिंग हो सकती है। 

जाहिर गांव बड़ा है तो पंचायत चुनाव हो या विधानसभा का चुनाव राजनीति चरम पर होती है। गांव के बीच से सड़क गुजरती है। गांव में छोटा सा बाजार भी है। गांव की गलियां भी पक्की हैं। इस गांव में कुल चार चार तालाब हैं। इसके आसपास पर चार मंदिर भी हैं। गांव में एक मठ भी है।

बीएचयू से पढाई के बाद मैं अलग -अलग शहरों में भटकने लगा पर रमेश गांव में आ गए और अपनी पुश्तैनी खेतीबाड़ी देख रहे हैं। साथे में ठेकेदारी भी कर लेते हैं। कोई 24 साल बाद उनसे मिलना हुआ। वैसे ही मस्त हैं। थोड़ी देर आराम के बाद दोपहर का भोजन रमेश के घर में हुआ। उसके बाद रमेश मुझे बस स्टैंड तक छोड़ने के लिए चले। रास्ते में उसने एक छोटी सी नदी दिखाई। इसका नाम गेंहुअनवा नदी है। इसकी खास बात यह है कि अपने छोटे से सफर में यह बहुत तेजी से कई बार मार्ग बदलती है। अपने सर्पिले वलय के कारण ही इसे गेंहुअनवा नाम दिया गया है।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com

-        ( SOHWALIA DAYS - 8, KARJI, KARJAON, AWAKHARA, CHAINPUR, KAIMUR )  

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