Saturday, February 15, 2020

शेरशाह ने जीत लिया था भुरुकड़ा का किला


खरवार राजाओं ने शेरगढ़ के किले को बनवाने के लिए अपने समय में अदभुत तकनीक का सहारा लिया था। ज्यादातर भूमिगत अपार्टमेंट इसलिए बनवाए थे ताकि वे बारिश और धूप से सुरक्षा दे सकें। साथ रास्ते इस तरह के बने हैं कि दुश्मनों की सेना को जल्दी पता ही नहीं चले रास्ता किधर से है और वे चकमा खा जाएं।

खरवार राजाओं ने जब दसवीं सदी में इस किले का निर्माण कराया तो इसका नाम भुरुकुड़ा का किला हुआ करता था। यह नाम किले के पूर्वी क्षेत्र में स्थित भुरुकुड़ा गांव के नाम पर है। पर सोलहवीं सदी में इसे शेरशाह ने जीत लिया। तब शेरशाह ने इसे नया नाम दिया शेरगढ़।

शेरगढ़ के इस किले में दीवाने खास, रनिवास और नाच घर आदि का निर्माण कराया गया था। ये सभी आवास भूमिगत हैं। इन भूमिगत आवास में रोशनी जाने के लिए भी प्रबंध किया गया था। विशाल महल में कुएं के पास एक तहखाना भी है। कहा जाता है कि इसमें अब भी राजा का खजाना कहीं छिपा हुआ है। पर यह अदभुत किला कई सौ सालों तक दुनिया की नजरों से ओझल रहा। ब्रिटिश काल में यह किला थोड़ा प्रकाश में आया।   

ब्रिटिश सरकार ने अपने अधिकारी फ्रांसिस बुकानन को 1807 में दक्षिण बिहार के सर्वेक्षण का दायित्व सौंपा। बुकानन 30 नवम्बर 1812 को रोहतास जिले में आया और उसने जिले के कई पुरातात्विक स्थलों का दौरा किया। बुकानन ने 7 जनवरी 1813 में शेरगढ किले का दौरा किया था। उसने शेरगढ़ किले को अदभुत बताया है।

बुकानन लिखता है कि इस किले में कुल 28 भूमिगत आवास बनाए गए हैं। पर रोहतास जिले के इतिहास पर लगातार शोध करने वाले सासाराम के इतिहासकार मर्मज्ञ श्याम सुंदर तिवारी बताते हैं कि बुकानन के बाद 170 सालों में 28 में से शेरगढ़ किले के 20 भूमिगत आवास दबकर नष्ट हो गए। हमने इस अनमोल ऐतिहासिक विरासत का संरक्षण नहीं किया। अगर आगे भी इसी तरह की उपेक्षा जारी रही तो हो सकता है कि बाकी भूमिगत आवास भी आने वाली पीढ़ी को देखने को नहीं मिलें।

हां एक बात और शेरगढ़ किले के पास भुरुकुड़ा गांव में आज भी खरवार समाज के लोग रहते हैं। वे लोग खुद को खरवार राजा के वंशज मानते हैं। कई सौ सालों से उनके बीच आज भी राजा चुनने की परंपरा चली आ रही है। इन दिनो कामेश्वर सिंह खरवार राजवंश के सबसे नूतन पीढ़ी के राजा हैं।

मैं देश भर में दो सौ के आसपास छोटे बड़े किले देख चुका हूं। पर इन सब के बीच मैं शेरगढ़ के किले को काफी अलग और अनूठा पाता हूं। कुछ मामलों में यह राजस्थान के झालावाड़ के गगरोन के किले जैसा दिखाई देता है। क्योंकि वहां भी किले के तीन तरफ से नदियां बहती हैं। वहीं कई बार यह किला महाराष्ट्र के औरंगाबाद के पास स्थित दौलताबाद के किले जैसा भी लगता है।

पर जरूरत इस बात कि है इस किले को संरक्षित किया जाए। इसे पर्यटन के मानचित्र पर लाया जाए। सासाराम से यहां आने के लिए पैकेज टूर का इंतजाम किया जाए। आप वाराणसी से भी यहां पहुंच सकते हैं। आप चाहें तो एक साथ मुंडेश्वरी देवी, गुप्ता धाम और शेरगढ़ का किले देखने का कार्यक्रम भी बना सकते हैं। ये सब कुछ दो दिनों में हो सकता है। पर शेरगढ़ पहुंचने के लिए आपको कुदरा या चेनारी से आरक्षित वाहन का इंतजाम करना पड़ेगा।  
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-        ( SHERGARH FORT, SHERSHAH, KHARWAR KINGS, WONDER OF INDIA )
   

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