Sunday, February 2, 2020

तुगलकाबाद किले में था विशाल अंडरग्राउंड बाजार


तुगलकाबाद किले को घूमते हुए आपको प्रतीत होगा कि इसे बड़े सुनियोजित ढंग से बसाने की योजना पर काम हुआ था। जब आप किले में चलते हुए आगे बढ़ते हैं तो कुछ नई चीज देखने को मिलती है। सीढ़ियां उतरने के बाद लंबा सा गलियारा। 

गलियारे के दोनों तरफ आधुनिक मार्केट की तरह दुकाने बनीं हुई नजर आती हैं। दरअसल किले के अंदर विशाल बाजार का भी निर्माण कराया गया था। ये बाजार पूरी तरह से अंडरग्राउंड है। आज आप कनाट प्लेस में जमीन के नीचे पालिका बाजार देखते हैं। पर ऐसे बाजार का निर्माण किले में कई सौ साल पहले हो चुका था। 

इस बाजार में हर थोड़ी दूर पर बाहर निकलने के लिए सीढ़ियां भी बनाई गई हैं। इन सीढीदार रास्ते से हवा और रोशनी भी आती रहती है। साथ ही कोई यहां से बाहर भी निकल सकता है। 

ये ऐसा बाजार था जो सर्दी गर्मी बरसात में रात दिन खुला रह सकता था। कहते हैं कि इस बाजार में दुनिया भर के कारोबारी आते थे और हीरे-मोती जवाहरात की तिजारत होती थी।

किले में है विशाल बाउली – दिल्ली में कई दर्जन बाउली मिलती हैं। ये जल संरक्षण का अदभुत नमूना हैं। इसी तरह की एक विशाल बाउली तुगलकाबाद किले में भी है। यह बाउली काफी हद तक किसी विशाल कुएं जैसी नजर आती है। पर इसमें नीचे उतरने के लिए सीढ़ियां भी बनी हुई हैं।

तुगलकाबाद किले के दक्षिण में आदिलाबाद का किला देखा जा सकता है। इसे गयासुद्दीन तुगलक के बेटे मोहम्मद बिन तुगलक ने बनवाया था। हालांकि ये किला पूरा नहीं हो सका। दरअसल मुहम्मद बिन तुगलक ने अचानक अपनी राजधानी दिल्ली से दूर महाराष्ट्र में औरंगाबाद के पास दौलताबाद ले जाना तय किया। हालांकि कुछ साल बाद ये प्रयोग असफल रहा तो फिर वह दिल्ली वापस आया। इस बार उसने सीरी फोर्ट से आगे जहां पनाह नगर बसाया।

तुगलक काल में अनेक इमारतों का निर्माण दिल्ली में हुआ। तुगलकाल के वास्तुकारों ने अपनी अलग वास्तुकला विकसित की। इसमें दक्षिण दिल्ली के ही इलाके में कालू सराय, बेगमपुर गांव में बिजय मंडल मालवीय नगर के पास खिड़की मसजिद,चिराग-ए-दिल्ली की दरगाह जैसी इमारते हैं। इन स्थानो पर तुगलक कालीन वास्तुकला का उदाहरण देखा जा सकता है।

तुगलकाबाद किले से एमबी रोड को पार करने के बाद गयासुद्दीन तुगलक के मकबरे तक पहुंचा जा सकता है। यह किले के दक्षिणी चौकी के पास पक्की सड़क से जुडी हुई थी। यह पक्की सड़क 600 फीट लंबी है। इसमें 27 मेहराब बनाए गए थे। पर बीसवीं शताब्दी में इस पक्की सड़क के कुछ भाग को महरौली-बदरपुर रोड बनाने के लिए तोड़ डाला गया। एक पुराने पीपल के पेड़ को पार करने के बाद गयासुद्दीन तुगलक के किले का एक विशाल प्रवेश द्वार आता है, जिसे लाल पत्थरों से बनाया गया है। 

गयासुद्दीन तुगलक की समाधि – गयासुद्दीन तुगलक की समाधि को एकल गुंबददार वर्ग के आकार में बनाया गया है। इसकी ढलान वाली दीवारों की सुंदरता देखने लायक है। समाधि की दीवारों का निर्माण ग्रेनाइट पत्थर से किया गया है। समाधि के किनारों को लाल पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है। इसे सजाने के लिए संगमरमर का भी उपयोग भी किया गया है।

मकबरे में तीन कब्र – इस समाधि में कुल तीन कब्र बनी हैं। बीच वाली कब्र गयासुद्दीन तुगलक की है। दूसरी कब्र उनकी पत्नी की है। तीसरी कब्र उसके उत्तराधिकारी मुहम्मद बिन तुगलक की है। दीवार के उत्तर-पश्चिमी भाग पर स्तंभ से जुड़े गलियारे में एक और अष्टकोणीय कब्र का निर्माण किया गया है। यह कब्र किसकी है ये नहीं पता। इसी आकार में छोटे संगमरमर का उपयोग कर उसके दरवाजों के ऊपर लाल पत्थर भी लगाए गए हैं। 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
( TUGLAKABAD FORT, DELHI, GAYASUDDIN TUGLAK , MUHAMAD BIN TUGLAK)





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