Wednesday, February 12, 2020

शेरगढ़ – कैमूर की पहाड़ी पर अनूठा किला


दोपहर में हमने शेरगढ़ के किले पर चढ़ाई शुरू कर दी है। करीब एक किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई के बाद हम किले की पहाड़ी पर पहुंच गए हैं। इस चढ़ाई में कई जगह सीढ़ियां हैं तो कई जगह पत्थर लगे हैं। अब वन विभाग द्वारा रास्ते में एक जगह यात्री शेड का निर्माण कराया जा रहा है। रास्ते में हम काम करते हुए कुछ मजदूर मिले। उम्मीद है अगली बार आने पर आपको रास्ता थोड़ा बेहतर मिले। तकरीबन एक घंटे की चढ़ाई के बाद हमलोग किले के प्रवेश द्वार पर पहुंच गए हैं। यह सिंह द्वार कहलाता है। यहां संतरियों के रहने के लिए आवास भी बना हुआ है। ये पक्का दो मंजिला आवास है। देखकर लगता है कि यहां से दुश्मनों पर निगरानी रखी जाती होगी। जिस रास्ते से हमने चढ़ाई की है उसे राजघाट कहा जाता है।

यहां पर अर्धचंद्राकार परकोटा बना हुआ है। इस परकोटे की मोटाई 27 फीट है। पहाड़ी के चारों ओर दस फीट मोटी सुरक्षा दीवार बनाई गई है। ये दीवारें अब कई जगह टूट चुकी हैं।

शेरगढ़ का यह किला अदभुत है। इसका निर्माण दसवीं सदी के आसपास खरवार राजाओं ने कराया था। खरवार आज भले ही बिहार झारखंड में अनुसूचित जनजाति समाज का हिस्सा बन गए हों। पर कभी ये लोग कैमूर के राजा हुआ करते थे। 

कई सौ साल राज करने के दौरान उन्होंने ये अदभुत किला बनवाया था। इस किले की खास बात है कि इसके ज्यादातर महल भूमिगत बने हुए हैं। मतलब बारिश धूप के साथ दुश्मनों से भी सुरक्षित। इसलिए ये किला देखने में तिलस्मी प्रतीत होता है। कई लोग से भुतहा भी मानते हैं।

शेरगढ़ का यह किला लगभग छह वर्ग मील में फैला हुआ है। सुरक्षा के लिहाज से भी इस स्थान का चयन काफी सोच समझ कर किया गया होगा। इसे दो तरफ से दुर्गावती नदी घेरती है। यानी इस किले पर सिर्फ दो रास्ते से ही आक्रमण किया जा सकता था।

किले के परिसर में रानी पोखर - सिंहद्वार से दक्षिण की तरफ लगभग तीन किलोमीटर चलने के बाद मुख्य किले तक पहुंचने का रास्ता है। हमलोग इस रास्ते पर चल पड़े हैं। कोई और सैलानी आने जाने वाले रास्ते में नहीं मिले। हां कुछ मजदूर जरूरत रास्ते की सफाई में जुटे हुए हैं। थोड़ी दूर चलने के बाद दाहिनी तरफ एक विशाल तालाब नजर आता है। हमलोग रुककर इस तालाब को देखने के लिए चल पड़े। इस तालाब का नाम रानी पोखर है। इसका निर्माण खरवार राजाओं ने वर्षा जल संचय के लिए किया था। पानी बरबाद न हो इसलिए तालाब के चारों तरफ पक्की दीवारें बनाई गई थीं। तालाब में उतरने के लिए सीढ़ियां भी बनी हुई हैं।

रानी पोखर देखने के बाद हमलोग आगे चल पड़े हैं। यहां से तकरीबन ढाई किलोमीटर चलने के बाद किले का मुख्य प्रवेश द्वार आया। रास्ते में जंगल में पेड़ पौधे हैं। बेल (श्रीफल) के पेड़ हैं। कहीं कही लंगूर भी दिखाई दे जाते हैं। किले के मुख्य प्रवेश द्वार के पास फिर सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है। यहां पर भी संतरियों के रहने के लिए आवास बना हुआ है। मुख्य द्वार से दाहिनी तरफ फिर कुछ मंजिले चढ़ने के बाद आपको ऐतिहासिक किले के दर्शन होने लगते हैं। किले के पृष्ठ भाग में दुर्गावती नदी बह रही है।

शेरगढ़ के किले के कई हिस्से हैं। इसमें विशाल बारादरी बनी है। इसमें अलग अलग कई कमरे बने हैं। पर एक जगह हमें नीचे उतरने की सीढ़ियां नजर आती हैं। हमलोग टार्च की रोशनी में नीचे उतरने लगे। नीचे एक विशाल कुआं नजर आता है। कुएं के चारों तरफ बरामदा बना हुआ है। इस कुएं में हमेशा शीतल जल मौजूद रहता था। इतनी ऊंचाई पर कुआं देखकर कर अचरज होता है। बगल में दुर्गावती नदी की धारा काफी नीचे बह रही है। फिर इस  कुएं में इस स्तर तक पानी कैसे आता होगा।

कुएं से बाहर निकलकर हमलोग आगे बढ़े तो कई और कौतूहल हमारा इंतजार कर रहे थे। आगे फिर ऐसी सीढ़ियां सुरंग की ओर उतरती नजर आईं। हमलोग कौतूहलवश उतर गए। अंदर पूरा भूमिगत आवास बना हुआ नजर आया। अगले कुछ घंटे में हमने चार ऐसा आवास में सीढ़ियां उतरकर नजारा किया। अंदर बिल्कुल अंधेरा रहता है। इसलिए अच्छी तरह देखने के लिए आपके पास शक्तिशाली टार्च होना चाहिए। (अभी जारी है...)  
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-        ( SHERGARH FORT, SHERSHAH, KHARWAR KINGS, WONDER OF INDIA )


2 comments:

  1. वाह रोचक। जिस तरह से यह किला बना हुआ है मुझे लगता है अगली कड़ियों में मुझे गढ़े हुए खजाने के विषय में पढ़ने को ही न मिल जाये। अगले भाग का इन्तजार और हो सके तो इस किले को लेकर एक कहानी भी लिखिए। मज़ा आएगा।

    ReplyDelete