Friday, February 28, 2020

बनारस में पहलवान की लस्सी और मलइओ का स्वाद


काशी हिंदू विश्वविद्यालय के सिंह द्वार से आगे बढ़ रहा हूं। सड़क पर काफी कुछ बदल गया है, पर मेरी स्मृतियों में तो 1990-95 का लंका है। अब दोनों तरफ विशाल ऊंचे अपार्टमेंट बन गए हैं। इससे सिंह द्वार का सौंदर्य फीका पड़ने लगा है। तभी मुझे बसंत लाल मौर्य की याद आती है। सड़क के पूर्वी तरफ उनकी पुस्तकों और मैगजीन की दुकान है। कई साल बाद बसंत मिले। उसी पुरानी गर्मजोशी से। उनके साथ ढेर सारी पुरानी यादें ताजा की। उसके बाद आगे।

 लंका मतलब बीएचयू के छात्रों की प्रिय जगह। किताबें, स्टेशनरी कपड़ों आदि शॉपिंग या फिर यूं ही शाम को घूमना। टाइम पास करना और फिर हॉस्टल लौट जाना। पर अब मैं देख पा रहा हूं लंका काफी बदल गया। खाने पीने के तौर तरीके भी। अब मोमोज की दुकानें सज गई हैं। हमारे समय में लोग मैंगो शेक पीया करते थे। अब चाइनीज डिश ने भी दस्तक दे दी है। कुछ दुकानें वही पुरानी हैं। लंका पर जो स्टेशनरी की दुकाने हैं उनके नाम ड्राइंग इंपोरियम होते हैं। जैसे  नंदा ड्राईंग इंपोरियम, विकास ड्राईंग इंपोरियम, नटराज ड्राईंग इंपोरियम आदि आदि। इनमें से कुछ दुकानें उसी तरह दिखाई दीं। कुछ दूर आगे चलने पर लंका का प्रसिद्ध स्टूडियो है गोरस स्टूडियो। लंका पर टहलते हुए पुरानी यादें ताजा करते हुए मैं चार मुहानी पर पहुंच गया हूं। यहां से एक रास्ता दुर्गा कुंड की ओर चला जाता है तो दूसरा रास्ता अस्सी की तरफ।  एक रास्ता सामने घाट की तरफ जाता है।

इसी चार मुहानी पहलवान की लस्सी की प्रसिद्ध दुकान है। यहां तक किसी जमाने हमलोग लौंगलता खाने पहुंच जाते थे। कई बार देर रात को हॉस्टल से आकर यहां पर गर्म दूध भी पीया करते थे। पहलवान की लस्सी गर्मियों में काफी लोकप्रिय रहती है। पर अभी नवंबर का महीना है। हल्की सर्दी का दौर है। तो इस दौर में लस्सी नहीं यहां पर मिल रही है मलइयो। बनारस का मलइयो अलग तरह की चीज है। यह काफी हद तक कानपुर के शुक्ला मलाई मक्खन से मिलती जुलती है।

मिट्टी के कप में मलइयो की दर है 25 रुपये कप। दाम वाजिब है। तो कप मलइयो पी लेना चाहिए। हां एक बात और ये ऐसी लस्सी है जो सिर्फ सर्दी के दिनों में ही बनती है। गरमी में ये अपने रुप में नहीं ठहर सकती। गरमी के कारण तुरंत ही पिघल जाएगी। इसलिए जब आप सर्दी में बनारस पहुंचे तो मलइयो का स्वाद जरूर लें।

अब हमें गोदौलिया पहुंचना है।  मैं एक बैटरी रिक्शा पर बैठ गया हूं। यहां से गोदौलिया की ओर जाने के लिए। अस्सी के बाद भदैनी से पहले रिक्शा गलियों में मुड़ गया। जाम से बचने के लिए। पर गली में भी जाम लगा  है। खैर सोनारपुरा मदनपुरा होते हुए मैं गोदौलिया पहुंच रहा हूं। रिक्शा पर धीमी गति में गोदौलिया की ओर पहुंचना अच्छा लग रहा है। हमारे बैटरी रिक्शा में कुछ लड़कियां बैठी हैं। उनसे पता चला कि अब आर्य महिला और वसंता कॉलेज में भी पीजी की पढ़ाई शुरू हो गई है।

जंगमबाड़ी मठ के थोड़ा आगे जाने पर बैटरी रिक्शा ने रोक दिया। उसने बताया कि आगे नहीं जाएगा। गोदौलिया चौराहा तक जाने के लिए आपको थोडा पैदल चलना पड़ेगा।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-        ( LANKA, VARANASI, PAHALWAN LASSI, MALAIO )


Wednesday, February 26, 2020

काशी हिंदू विश्वविद्यालय का ऐतिहासिक सिंह द्वार


एक बार फिर काशी हिंदू विश्वविद्यालय की ओर। जहां हमने पांच साल गुजारे थे। करजी गांव से रमेश भाई अपनी बाइक से जीटी रोड तक छोड़ने आए हैं। उनके गांव से सात किलोमीटर की दूरी पर दुर्गावती बाइपास पर हमें वाराणसी की बस मिल गई यह जगह मरहिया मोड़ कहलाता है। मैं जिस बस में बैठा हूं यह निजी बस है जो हमें मुगलसराय शहर के बाहर से बाइपास होते हुए वाराणसी से ले गई।



रास्ते में कई जगह थोड़ा जाम मिला। पर इस बस ने बीएचयू के पीछे मारुति नगर इलाके में एक निजी बस अड्डे पर उतार दिया। इस बस अड्डे से बिहार के कई छोटे छोटे शहरों के लिए बसें चलती हैं। इसलिए लोग इसे बिहार बस स्टैंड कहते हैं। पर ऐसा प्रतीत होता है कि यह डग्गामार बसों को स्टैंड है जो बिना परमिट के चलाई जा रही हैं।

खैर इस बस स्टैंड से मुझे बीएचयू गेट यानी लंका के लिए बैटरी रिक्शा मिल गया। रास्ते में राम नगर को जोड़ने वाला नया गंगा पुल नजर आया। हमारे समय में तो यहां पीपे का पुल हुआ करता था। वह पुल बारिश के दिनों में बंद हो जाता था। आगे सड़क पर बहुत जाम है तो मैं बीएचयू गेट से पहले नए बने ट्रोमा सेंटर के पास ही उतर गया। यहां से पैदल चलता हुआ लंका पर पहुंच गया हूं।

एक बार फिर काशी हिंदू विश्वविद्यालय का विशाल सिंह द्वार मेरी नजरों के सामने है।  अपने पांच साल के बीएचयू प्रवास के दौरान इस गेट से अनगिनत बार अंदर और बाहर जाना हुआ होगा। पर यह प्रवेश द्वार हर बार कुछ नया लगता है। शिक्षार्थ आइए और सेवार्थ जाइए का संदेश देता हुआ यह प्रवेश द्वार तनकर खड़ा प्रतीत होता है। इसका निर्माण नागर शैली में कराया गया है। दूर से यह किसी मंदिर जैसा प्रतीत होता है।

जैसा कि आपको मालूम ही है कि काशी हिंदू विश्वविद्यालय के निर्माण में देश के प्रमुख राजा रजवाड़ों की बड़ी भूमिका रही है। तो इस सिंह द्वार का निर्माण उत्तर प्रदेश के बलरामपुर राज घराने के सौजन्य से हुआ था। इसकी जानकारी भी सिंह द्वार के अंदर की तरफ लगे संगमरमर पट्ट पर लिखी गई है। महाराजा पाटेश्वरी प्रसाद सिंह ने अपनी माता देवेंद्र कुंअरी जी की स्मृति में इस गोपुरम का निर्माण कराया था। साल था संवत 1997 यानी सन 1940 ईस्वी में। बीएचयू की स्थापना से कोई 23 साल बाद यह प्रवेश द्वार अस्तित्व में आया था।

आजकल शाम को यह प्रवेश द्वार एलईडी लाइटों से जगमग हो जाता है। आप थोड़ी देर तक इसे देखें तो अलग अलग रंग की रोशनी इसमें बदलती रहती है। यानी सुनहले रंग का यह प्रवेश द्वार कई अलग अलग रंगों में नजर आता है। इस प्रवेश द्वार के ठीक पीछे कतार में आपको हमेशा कई सौ साइकिलें लगी दिखाई दे जाएंगी। 

दरअसल बीएचयू के हास्टल में रहने वाले छात्र यहां अपनी साइकिलें खड़ी करते शहर में घूमने निकल जाते हैं। वापस आने पर अपनी साइकिलें ले जाते हैं। एक बार मेरी साइकिल यहां 24 घंटे से ज्यादा खड़ी रह गई थी। उसका ताला भी खुला रह गया था, पर चोरी नहीं हुई। हालांकि कई दोस्तों की साइकिलें यहां से चोरी भी हो जाती हैं। मेरे पास ज्यादा समय नहीं है इसलिए बीएचयू के सिंह द्वार से ही वापस चल पड़ा हूं। अपने किसी दोस्त को भी वाराणसी आने की सूचना नहीं दे पाया हूं। तो महामना की धरती नमन...

-- विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
( BHU GATE, SINGH DWAR, CONSTRUCTED BY RAJA OF BALRAMPUR ESTATE RAJA PATESWARI PRASAD SINGH IN 1940 )


Tuesday, February 25, 2020

मेरे बड़े दादा सूर्यनाथ सिंह और सन बयालीस की क्रांति


इस बार अपने गांव सोहवलिया खुर्द गया तो एक बार फिर ढेर सारी पुरानी यादें ताजा हो गईं। अपने एकमात्र जीवित दादा जी श्री भुवनेश्वर सिंह का आशीर्वाद मिला। वे 90 के पार हैं। पर 1989 में वायुसेना के रिटायर होने के बाद गांव में मजे से रह रहे हैं।

मेरे दादा जी प्रयाग सिंह 1984 में इस दुनिया को छोड़ गए। पर उनकी यादें हमेशा साथ चलती हैं। प्रेरणा बनकर रास्ता दिखाती हुई। भले ही वे ज्यादा पढ़े लिखे नहीं थे पर बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। किसान थे मेरे दादाजी। पर जब शहर जाते शानदार धोती, सिर पर बड़ा सा मुरेठा बांधते। हाथ में बैग और कंधे पर गमछा लिए किसी नेता सदृश नजर आते। पर उनकी रुचि नेतागिरी में नहीं थी। पर समाजसेवा में थी। शादी के लिए जोड़ियां मिलाने में अगुवा की भूमिका निभाते। विवादों के निपटारे की पंचायती में आगे रहते। मौका मिलता तो खूब बातूनी भी थे। बडे घुम्मकड़ भी थे। पुराना शाहाबाद ( भोजपुर, रोहतास, बक्सर, कैमूर ) के लगभग सभी गांवों के बारे में जानते थे। दौरा कर चुके थे। कई गांवों की सैकड़ो कहानियां सुनाते। दादा जी कोई कई लोकगीत कंठस्थ थे। वे कभी  बनारस के माधोदास के धरहरा की कहानी सुनाते तो कभी बर्मा यात्रा की।

तो ये सोहवलिया हमारा आदिम गांव नहीं है। हमारा पुरखे भोजपुर जिले में पीरो से पश्चिम नाढ़ी गांव से पाही करके यहां आए थे। थोड़ा पीछे चलते हैं मेरे परदादा जगदेव सिंह थे। नाढ़ी गांव के रहने वाले। उनकी ससुराल भोजपुर जिले के बरनांव गांव में थी। ये स्मृतियां मैं खुद से साझा कर रहा हूं। ताकि सनद रहे।
नाढ़ी गांव छोड़कर हमार पुरखे सोहवलिया इसलिए 1927 में आए ताकि यहां जमीन का बड़ा टुकड़ा मिले खेती करने को। वैसे मेरे परदादा समृद्ध किसान थे। यहां पर गोरी और भोखरी गांव के राजपूत जमींदारों से मेरे चार परदादाओं को जमीन मिली। खेती का धंधा अच्छा चला। खेती के साथ बडे पैमाने पर गौ पालन भी होता था।

तो मेरे परदादा चार भाई थे। जगदेव सिंह, बलदेव सिंह, राम लखन सिंह और मुखराज सिंह। इन चारों नामों को सुनकर ही लगता है कि ब्रिटिशकालीन भारत में हमारा परिवार काफी सुशिक्षित था। सबसे छोटे परदादा मुखराज सिंह पहलवानी करते थे। इलाके के पहलवानों में उनका नाम था। तो मेरे परदादा के पांच बेटे हुए। सबसे बड़े सूर्यनाथ सिंह, उसके बाद हरिभजन सिंह उसके बाद प्रयाग सिंह, फिर विश्वनाथ सिंह और आखिरी रघुनाथ सिंह। मेरे परदादा के बारे  मेरे पिता जी श्री कन्हैया सिंह बताते हैं कि उनकी मृत्यु 1946 में हुई। आंगन में खाट पर सो रहे थे। सोते सोते ही उपर वाले का बुलावा आ गया। कोई कष्ट नहीं। परदादा जगदेव सिंह का खुदवाया हुआ कुआं आज भी हमारे गांव  स्थित है।

मेरे सबसे बड़े दादा सूर्यनाथ सिंह पढ़े लिखे व्यक्ति थे। कद काठी लंबी और आवाज बुलंद। पर 1927 के बाद वे गांधी जी से प्रभावित होकर स्वतंत्रता सेनानी हो गए। घर छोड़कर आजादी के आंदोलन की रैलियों में शामिल होने लगे। बापू के प्रभाव में आकर शाकाहारी हो गए। गांव के लोगों को भी शाकाहारी बनने के लिए प्रेरित करने लगे। वे गांव घर को कम समय दे पाते थे। उनके पास किताबों की विशाल लाइब्रेरी थी। खूब पढ़ाकू भी थे। पर 1942 के आंदोलन में वे जेल गए। उनकी जेल में ही सेहत खराब होने के बाद मृत्यु हो गई। पिता जी बताते हैं कि एक बार आग लगने से उनकी लाइब्रेरी की सभी किताबें जल गईं। उनके साथ दस्तावेज भी जल गए। अधजली किताबों पर उनके हस्ताक्षर बचे रहे। अब वे भी किसी के पास नहीं हैं।

बड़े दादा स्वतंत्रता सेनानी सूर्यनाथ सिंह का विवाह सूर्यमुखी देवी से हुआ था। वे दिनारा के पास के एक गांव की रहने वाली थीं। दादा जी की मृत्यु के बाद उनकी शादी छोटे भाई हरिभजन सिंह से करा दी गई। पर कुछ दिनों बाद हरिभजन सिंह भी स्वर्ग सिधार गए। इन दोनों बड़े दादा लोगों की कोई संतान नहीं हुई। हां दादी आठवीं कक्षा तक पढ़ी लिखी थीं। तो उनकी नौकरी प्राथमिक विद्यालय में मास्टर के तौर पर लग गई। वे 1980 के बाद तक नौकरी करती रहीं। लंबे समय तक बसपुरा के प्राथमिक विद्यालय में पदस्थापित रहीं। बचपन में दादी की उंगलियां पकड़ कर मैं उस स्कूल में पढ़ने भी जाता था।

एक बार फिर बात मेरे दादा जी प्रयाग सिंह की। दादा जी की ससुराल कोआथ के पास इटवा गांव में थी। मेरी दादी का नाम रामरति देवी था। पर दादी का निधन 1950 में ही हो गया। तब मेरे पिता जी चार साल से कुछ ज्यादा उम्र के रहे होंगे। इसलिए उन्हें भी दादी की ज्यादा याद नहीं है। दादा जी की चार बेटियां हुई और एक बेटे। दादाजी ने खेती किसानी करते हुए तमाम मुश्किलात के बीच अपने बेटे को पढ़ाया। कृषि विज्ञान की पढ़ाई करने के बाद पिता जी बैंक में अधिकारी बने।

आज हमारे गांव के तमाम लोग रोजीरोटी की तलाश में कई शहरों में पलायन कर चुके हैं। पर जब भी गांव पहुंचता हूं। अपनी गांव की मिट्टी को नमन करता हूं तो दादा परदादाओं को याद करते सहज गर्व की अनुभूति होती है।
-   -------- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( ( SOHWALIA, SURYANATH SINGH, JAGDEV SINGH, PRAYAG SINGH ) 




Monday, February 24, 2020

गांव में पीपल, पीपल की छैंया में पानी...

देश दुनिया घूमने की खुशी अलग होती है। अपने गांव में पहुंचने की अलग। चार साल बाद अपने गांव पहुंच रहा हूं। तो मन में एक कौतूहल है। मुझे अपने गांव का वो पीपल का पेड़ याद आ रहा है। और वह पुराना गीत भी... गांव में पीपल.. पीपल की छैंया... छैयां में पानी... 
मुंडेश्वरी, भभुआ, कुदरा से होते हुए दोपहर में मैं अपने गांव सोहवलिया के चल पड़ा हूं। कई सालों बाद इस रास्ते पर हूं। कुदरा जहानाबाद के बाद लालापुर, केवढ़ी, बडरकोना, हलिवंता, फिर आया गंगवलिया। इसके बाद बसहीं में कुदरा नदी का पुल। अब ये पुल काफी ऊंचा बन गया है। उसके बाद वह नहर का पुल, जहां बैठकर बचपन में हम घंटो कुदरा जाने वाले तांगे का इंतजार करते थे। फुली मोड़ से कानडिहरा होते हुए मैं अपने गांव में पहुंच गया हूं। कुदरा से कोई 20 मिनट लगे हैं अशोक भाई की कार से गांव पहुंचने में।

बस कुछ घंटे में अपने चाचाओं और एक मात्र जीवित दादा भुवनेश्वर सिंह जी से मुलाकात के बाद बारात का हिस्सा बन गया हूं। छोटे भाई संजीव के बारात निकलने की तैयारी चल रही है। दस से ज्यादा बुलेरो में लोग सवार हो गए हैं। अब बारात की संस्कृति बदल गई है। मेरी गांव की बहनें और बहुएं भी बारात में जा रही हैं। 

एक घंटे के सफर के बाद हमलोग बारात वाले गांव में पहुंच गए हैं। ये गांव है अवखरा। भभुआ से पश्चिम चैनपुर से दो किलोमीटर आगे। ये एक बड़ा गांव है।
यहां खाने-पीने के इंतजाम अब शहरों की तरह बुफे  सिस्टम में हैं। तो सब लोग पहुंचते ही खाने पीने में जुट गए।भाई की शादी में मैं सारी रात जाग कर सारे रस्मो रिवाज देखता रहा।

पहले जयमाला हुई, फिर द्वार पूजा, उसके बाद बरनेत यानी गहने आदि चढ़ाने की रस्म। फिर देर रात गए शादी की शुरुआत। तो शादी खत्म होते होते सुबह के चार बज गए। शादी के दौरान ओरतें गारी गा रही हैं- एक नया दू नया गिन लिह पंडीजी, दुल्हा के भाई के दहेज लिह पंडी जी। एक पइसा दू पइसा गिन लिह पंडी जी,  दुल्हा के फुआ के दहेज लिह पंडी जी।  ... बकलोल ससुरा, बकलोल ससुरा... बहु खातिर सारी रात जागा ससुरा...आदि आदि...

विवाह समारोह से निवृत होने के बाद सुबह सुबह मैं करजी गांव के लिए चल पड़ा हूं। अवखरा से थोड़े इंतजार के बाद एक बस मिल गई। इस बस ने मुझे खरिगांवा मोड़ पर उतार दिया। यहां  करजी करजांव के लिए दूसरी बस थोड़े इंतजार पर मिल गई। इस बस में करजी गांव के कुछ लोग भी हैं। यह मेरे बीएचयू के दिनों के साथी रमेश कुमार का गांव है। वे मेरा इंतजार कर रहे हैं। बस में करजी गांव के जो लोग हैं वे रमेश को जानते हैं। एक सज्जन हैं जो इस गांव के पूर्व सरपंच राधेेश्याम सिंह हैं। उनसे मैंने रमेश की बात भी कराई। अब मेरा रमेश के घर पहुंचना आसान हो गया। सरपंच जी ने बस से उतरने के बाद मुझे रमेश के घर पहुंचा दिया, फिर वे अपने घर गए। 


करजी कैमूर जिले के बड़े गांव में से एक है। इस गांव में 3000 के आसपास मतदाता हैं। गांव की आबादी दस हजार से ज्यादा है। ऐसे बड़े गांव पंजाब और हरियाणा में तो होते हैं। पर इतने बड़े गांव रोहतास और कैमूर जिले में कम ही हैं। 

गांव में कई बिरादरी के लोग रहते हैं। गांव में दलित और मुसलिम आबादी भी है। गांव के बीच सड़क गुजरती है। वहां छोटा सा बाजार भी बन गया। गांव का परिदृश्य कुछ ऐसा है कि यहां किसी भोजपुरी फिल्म की शूटिंग हो सकती है। 

जाहिर गांव बड़ा है तो पंचायत चुनाव हो या विधानसभा का चुनाव राजनीति चरम पर होती है। गांव के बीच से सड़क गुजरती है। गांव में छोटा सा बाजार भी है। गांव की गलियां भी पक्की हैं। इस गांव में कुल चार चार तालाब हैं। इसके आसपास पर चार मंदिर भी हैं। गांव में एक मठ भी है।

बीएचयू से पढाई के बाद मैं अलग -अलग शहरों में भटकने लगा पर रमेश गांव में आ गए और अपनी पुश्तैनी खेतीबाड़ी देख रहे हैं। साथे में ठेकेदारी भी कर लेते हैं। कोई 24 साल बाद उनसे मिलना हुआ। वैसे ही मस्त हैं। थोड़ी देर आराम के बाद दोपहर का भोजन रमेश के घर में हुआ। उसके बाद रमेश मुझे बस स्टैंड तक छोड़ने के लिए चले। रास्ते में उसने एक छोटी सी नदी दिखाई। इसका नाम गेंहुअनवा नदी है। इसकी खास बात यह है कि अपने छोटे से सफर में यह बहुत तेजी से कई बार मार्ग बदलती है। अपने सर्पिले वलय के कारण ही इसे गेंहुअनवा नाम दिया गया है।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com

-        ( SOHWALIA DAYS, KARJI, KARJAON, AWAKHARA, CHAINPUR, KAIMUR )  

Saturday, February 22, 2020

मोकरी गांव और गोविंद भोग चावल की खुशबू


मुंडेश्वरी देवी से वापस लौटते हुए हमलोगों ने दूसरा रास्ता लिया। यह रास्ता मोकरी बेतरी गांव से होकर आता है। यह भभुआ शहर के आगे चैनपुर रोड में जाकर मिल जाता है। रास्ते में अशोक ने बताया कि मोकरी इस इलाके का बड़ा गांव है। पर यह गांव इन दिनों एक नए कारण से चर्चा में है। वह है इस गांव में उपजने वाला गोविंद भोग चावल।

वैसे तो गोविंद भोग चावल कई जगह उपजाया जाता है। यह धान की एक खुशबूदार किस्म है। बंगाल में भी इसकी खेती होती है। पर बिहार के कैमूर जिले में होने वाला यह धान काफी खास है। मोकरी गांव के खेत में होने वाला गोविंद भोग धान का स्वाद बाकी जगह से अलग होता है। वह इसलिए क्योंकि यहां सालों भर मुंडेश्वरी देवी के पहाड़ से पानी रिसकर खेतों में आता रहता है। जो इस गांव के धान के स्वाद को बाकी जगह से अलग करता है।

 तो आप यों कह सकते हैं कि इस धान से होने वाले चावल को माता मुंडेश्वरी का खास आशीर्वाद मिला हुआ है। यह इसके स्वाद और मिठास को बढा देता है। मोकरी के गोविंद भोग लोकप्रियता कुछ ऐसी है कि बाजार में दुकानदार आसपास के गांव के गोविंद भोग चावल को मोकरी का बताकर बेच डालते हैं।

गोविंद भोग चावल से बनी खीर काफी स्वादिष्ट होती है। अब एक नई बात मोकरी गोविंदभोग चावल के बारे में। पटना के हनुमान मंदिर ट्रस्ट के प्रशासक पूर्व आईपीएस किशोर कुणाल ने कहा कि अयोध्या के राम मंदिर पास बनने वाली सीता की रसोई में प्रसाद में जो खीर मिलेगी, यह खीर मोकरी के गोविंद भोग चावल से ही बनेगी।

तो मोकरी से गोविंद भोग चावल की सप्लाई शुरू हो गई है। चावल की खेप अयोध्या भेजी जा रही है। इस आशय की खबर स्थानीय अखबारों में भी छपी है। वैसे हमारा कैमूर और रोहतास जिला महीन खुशबूदार चावल का बड़ा उत्पादक इलाका है। हमारे कुदरा बाजार में और उसके आसपास कई दशक से कई बड़ी राइस मिले हैं। ये राइस मिल उसना चावल यानी ब्वाएल्ड राइस का निर्माण करते हैं। यह चावल ज्यादा सुपाच्य होता है। आजकल कई नामचीन कंपनियों के ब्रांडेड राइस कुदरा, खुर्माबाद और उसके आसपास के राइस मिलों से लिए जा रहे हैं।

ग्रीन सिटी भबुआ – मोकरी से आगे बढ़कर हमलोग भबुआ बाजार में पहुंच गए हैं। इन दिनों भबुआ शहर की पहचान ग्रीन सिटी के तौर पर होने लगी है। कुछ साल पहले एक जिलाधिकारी आए उन्होने भबुआ शहर में हरियाली बढ़ाने पर जोर दिया। इसके साथ ही लोगों को अपने घर की बाहरी दीवारों को हरे रंग से रंगने की सलाह दी। लोग उनकी सलाह पर अमल भी करने लगे। तो अब आप भबुआ शहर से होकर गुजरेंगे तो आपको ग्रीन सिटी के लुक का फील आएगा। 

जैसे जयपुर शहर की पहचान पिंक सिटी के तौर पर है। जोधपुर शहर की पहचान ब्लू सिटी के तौर पर है, उसी तरह अब भबुआ की पहचान ग्रीन सिटी के तौर पर होने लगी है। इसी ग्रीन सिटी में अशोक से ससुर जी ने सेना से अवकाश प्राप्ति के बाद अपना घर बना लिया है। तो हमलोग थोड़ी देर के लिए उनसे मिलने उनके घर भी पहुंच गए।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmai.com
-        (GOVIND BHOG RICE, MOKARI VILL, KAIMUR GREEN CITY, BHABUA )

Friday, February 21, 2020

कुदरा से मुंडेश्वरी धाम की ओर

कुदरा में सुबह सुबह कई साल बाद श्याम सुंदर चाचा और उनके परिवार से मिलना हुआ। सुबह का रास्ता उनके घर। कई तरह के फल सब्जियों का सलाद और सिलबट्टे पर पीसी हुई चटनीजिसे हम भोजपुरी में कुछिला कहते हैं। उसके बाद मेथी के पराठे। अब हमारा कार्यक्रम है मुंडेश्वरी घाम जाने का।

तो अशोक भाई की आल्टो निकल पड़ी है। कुदरा बाजार को पार करते हुए हमलोग भभुआ रोड पर चल पड़े हैं। कई सालों बाद मैं कुदरा को देख रहा हूं। यहां बाजार काफी विकसित हो गया है। शहर विस्तार लेता जा रहा है। कुदरा से भभुआ की सड़क काफी अच्छी है। 


हमलोग भभुआ शहर में प्रवेश करने से पहले ही नगर वाले रास्ते से आगे बढ़ गए हैं। अशोक भाई ने कहा कि शहर के ट्रैफिक से बचते हुए हमलोग आगे बढ़ जाएंगे। एक नहर के साथ वाली सड़क पकड़ी है। आगे भगवानपुर बाजार आया। वहां से बायीं तरफ का रास्ता लिया। थोड़ी देर बाद हमलोग माता मुंडेश्वरी के मंदिर के करीब हैं। मंदिर परिसर में जाने वाले वाहनों को पार्किंग फीस चुकानी पड़ती है। मंदिर से ठीक पहले एक छोटा सा बाजार है। यहां पूजा और प्रसाद की दुकाने हैं। ज्यादातर दुकाने महिलाएं और लड़कियां संचालित कर रही हैं।

मुंडेश्वरी देवी का मंदिर कैमूर की पहाड़ की तलहटी में एक छोटी सी पहाड़ी पर स्थित है। तो मंदिर तक जाने के लिए दो रास्ते हैं। या तो आप सीढ़ियों के रास्ते से पैदल चलकर जाएं। ज्यादातर श्रद्धालु ऐसा करते हैं। अगर आपके पास अपना वाहन है और आप निष्णात चालक हैं तो वाहन चलाते हुए घुमावदार रास्ते से मंदिर के मुख्य द्वार तक पहुंच सकते हैं।  


अशोक भाई कार चलाते हुए मंदिर तक पहुंच गए। मंदिर के प्रवेश द्वार पर गाड़ी पार्क करके हमलोग मंदिर में प्रवेश कर गए। दोपहर में मंदिर बंद होने से पहले हमें दर्शन करने का सौभाग्य मिल गया।

मंदिर परिसर में पीछे की ओर हवन कुंड बना है। मुंडेश्वरी मंदिर परिसर में सैकड़ो पुरानी टूटी फूटी मूर्तियों को अवशेष नजर आते हैं। दरअसल यह एक पंचायत शैली का मंदिर था। यहां के कई मंदिर अब नष्ट हो चुके हैं। सिर्फ मुख्य मंदिर बचा है। वह भी पूरी तरह यानी साबुत नहीं बचा है।

पर इस मंदिर से जुड़ी हुई तमाम मूर्तियां आप पटना के संग्रहालय में देख सकते हैं। छठी सातवीं शताब्दी में बनी मुंडेश्वरी से प्राप्त मूर्तियों को वहां पर संग्रहित किया गया है।
अब हमलोग मंदिर में दर्शन के बाद हमलोग मंदिर के प्रवेश द्वार से बाहर निकलकर पीछे पहाड़ी का नजारा करने चल पड़े। यहां पर एक पहाड़ी का आकर ऐसा है जो किसी दैत्य की जिह्वा जैसा नजर आता है। पहाड़ी से नीचे के आसपास के गांव नजर आते हैं।

हमारे आसपास के गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि चार पांच दशक पहले मुंडेश्वरी मंदिर तक पहुंचने का रास्ता इतना आसान नहीं था। सिढ़ियां भी नहीं थीं। पर अब प्रशासन की ओर से काफी इंतजाम कर दिए गए हैं। रास्ता बेहतर हो गया। मंदिर के आसपास सुरक्षा और खाने पीने का इंतजाम भी है। मंदिर के प्रवेश द्वार के आसपास दिन भर रौनक रहती है। तो कुछ घंटे माता के दरबार में गुजारने के बाद हमलोग वापस लौट चले हैं।
मंदिर के बारे में और पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएं-  मुंडेश्वरी देवी 
मुंडेश्वरी मंदिर समूह के बारे में और जानें - पटना संग्रहालय में मुंडेश्वरी देवी की मूर्तियां। 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com

-        ( MUNDESHWARI DEVI, KAIMUR, BHABUA, BIHAR )  
   


Thursday, February 20, 2020

सन 1862 में मुगलसराय में पहुंची थी रेल

साल 2019 में मुगलसराय रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन ( DDU ) कर दिया गया। उसके बाद पहली बार मैं यहां पर उतरा हूं। अभी रात को दो बजे हैं और मुझे अगली ट्रेन का इंतजार करना है। पर ये इंतजार लंबा है। मेरे पास दो घंटे से ज्यादा का वक्त है। तो मैं स्टेशन के बाहर जाकर घूमने की सोचता हूं। मुझे बाहर जाने पर यह देखकर सुखद अचरज होता है कि मुगलसराय के बाजार में स्टेशन गेट के आसपास दुकानें सारी रात खुली रहती हैं। 

कुछ मिठाइयों और चाय नास्ते की दुकानें भी खुली हैं। यहां पर मिट्टी की प्याली में चाय मिल रही है। महज पांच रुपये में। वैसे मैंने दूध की चाय पीनी करीब करीब छोड़ दी है पर मिट्टी की प्याली वाली चाय पी लेता हूं। एक मिठाई दुकान से डोडा बर्फी मिठाई खरीद ली है। चार बजने से पहले कुदरा का पैसेंजर टिकट खरीदकर मैं प्लेटफार्म नंबर छह सात पर पर पहुंच गया हूं।

रेलवे स्टेशन के परिसर में सुंदर पार्क बना दिया है। इस पार्क में विशाल तिरंगा झंडा भी लहराने लगा है। स्टेशन से प्रवेश द्वार और उसके आगे फ्लाईओवर के दोनों तरफ वाराणसी और आसपास के पर्यटक स्थलों के चित्र लगाए गए हैं। ये चित्र जानकारी भी देते हैं और थोड़ी शांति और सुकून भरा संदेश भी देतें हैें। 

1862 में रेलवे से जुड़ा मुगलसराय - बात मुगलसराय ( दीनदयाल उपा) स्टेशन की। तो यह भारतीय रेलवे का अत्यंत महत्वपूर्ण जंक्शन है। यह उत्तर भारत, पूर्वी भारत और पूर्वोत्तर भारत को जोड़ता है। ग्रैंट ट्रंक रोड ( जीटी रोड ) या शेरशाह सूरी पथ जिसे सड़क ए आजम कहा जाता है, मुगलसराय से होकर गुजरता है। पर मुगलसराय रेलवे स्टेशन बना 1862 में जब मुगलसराय पटना रेल खंड बनकर तैयार हुआ। इसके दो साल बाद मुगलसराय इलाहाबाद ( प्रयागराज) से 1864 में जुड़ गया। सन 1883 में मुगलसराय से वाराणसी के बीच रेलवे लाइन का निर्माण हो गया था,  पर लंबे समय बाद 1898 में मुगलसराय से वाराणसी होते हुए रायबरेली तक रेलवे लाइन का निर्माण हुआ। इसके बाद 1900 में मुगलसराय गया रेल खंड बनकर तैयार हुआ। इस तरह से मुगलसराय बहुत बड़ा जंक्शन बन गया। प्रसिद्ध ग्रैंड कोर्ड रेल मार्ग ( मुगलसराय-हावड़ा ) यहीं से शुरू होता है। 

मुगलसराय एशिया का सबसे बड़ा रेलवे का यार्ड है। रेलवे स्टेशन से चार किलोमीटर पहले और चार किलोमीटर बाद तक आपको अनगिनत रेल की पटरियां दिखाई देती हैं। 
मैं देख रहा हूं कि विशाल दीनदयाल नगर रेलवे स्टेशन की साफ सफाई और सौंदर्यीकरण में काफी बेहतर स्थिति हो गई है। हर प्लेटफार्म पर बैठने की पर्याप्त जगह बन गई है। प्लेटफार्म पर कुछ अच्छी कैंटीनें खुल गई हैं। कुछ साल पहले के मुगलसराय स्टेशन और अब के दीनदयाल नगर स्टेशन पर स्वच्छता और सुविधाओं के मामले में काफी अंतर आ गया है।


खैर मेरी ईएमयू ट्रेन सुबह चार बजे नहीं पहुंची। पता चला कि जो ट्रेन इलाहाबाद के सूबेदारगंज स्टेशन से चलती है, वही आगे गया ईएमयू बनकर जाती है। पर ये ट्रेन अभी लेट है।इस बीच मैंने दातून कर लिया है। मुगलसराय रेलवे स्टेशन पर आपको 24 घंटे महिलाएं दातून बेचती नजर आती हैं। तो जब भी मुझे वे नजर आते हैं उनसे मैं दातून जरूर खरीदता हूं। यह दांतों के लिए टूथ ब्रश से बेहतर है। तीन घंटे लेट से गया पैसेंजर ट्रेन सुबह 4.45 बजे पहुंची। फिर यहां से सुबह के पांच बजे रवाना हुई। 

इस बीच वाराणसी आसनसोल पैसेंजर का भी समय हो गया है। पर मैं गया पैसेंजर में ही बैठ गया हूं। एक-एक करके छोटे छोटे स्टेशन पार हो रहे हैं। चंदौली मझवार, कर्मनाशा, दुर्गावती, भभुआ रोड आदि। सुबह सात बजे के आसपास मैं कुदरा रेलवे स्टेशन पर उतर गया हूं। प्लेटफार्म पर मेरे भाई अशोक मेरा इंतजार कर रहे हैं। इस सुहानी सुबह में मुझे लता जी का गीत याद आ रहा है - जहां पे सबेरा हो बसेरा वहीं है...     
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( SHAHDARA DELHI , DINDAYAL NAGAR, KUDRA ) 
और कहां, अपने गांव के निकटतम रेलवे स्टेशन पर...