Wednesday, January 8, 2020

यहां सबसे पहले शान से लहराया था तिरंगा


हमलोग आटो रिक्शा से कारबाइन कोव की तरफ जा रहे थे तो रास्ते में एक नया स्मारक दिखाई दे गया। हां जी, पोर्ट ब्लेयर के फोरशोर रोड पर एक नया स्मारक बन गया है। वह जगह जहां 1943 में तिरंगा लहराया गया था। समंदर के किनारे बने इस स्मारक पर विशाल अंक स्थापित किए गए हैं। ये अंक है 1943 भला ये 1943 क्यों। इस साल का अंदमान के इतिहास में और भारत से स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में काफी महत्व है।

वह ऐतिहासिक दिन - वह 30 दिसंबर 1943 का दिन था जब सुभाष चंद्र बोस ने पोर्ट ब्लेयर में पहली बार शान से तिरंगा लहराया था। इस घटना के 75 साल पूरे होने पर भारत सरकार ने पोर्ट ब्लेयर के फोर शोर रोड पर इस स्मारक का निर्माण कराया। यहां पर बड़े अक्षरों में साल 1943 को महिमा मंडित किया गया है। साथ ही यहां पर विशाल तिरंगा भी शान से लहरा रहा है। ऐसा प्रतीत होता है मानो वह समंदर के संग लगातार संवाद कर रहा हो। लहरों की धु पर आजादी के तराने गुनगुना रहा हो। यहां कुछ पल गुजारते हुए बड़ा आनंद आ रहा है। तब यह पोर्ट ब्लेयर का जिमखाना मैदान कहलाता था। यहां पर आजाद हिंद फौज की टुकड़ी ने पहली बार तिरंगे को सलामी दी थी। यही तिरंगा 1947 में 14 अगस्त की रात को देश आजाद होने पर लाल किले पर लहराया गया। पर पोर्ट ब्लेयर में ये तिरंगा तो 1943 में यानी चार साल पहले लहरा चुका था। यह भारतीय क्षेत्र में आधिकारिक तौर पर तिरंगा फहराये जाने की पहली घटना थी।

इस घटना की 75वीं वर्षगांठ पर पोर्ट ब्लेयर में इस स्मारक का निर्माण कराया गया है जो पोर्ट ब्लेयर का प्रमुख आकर्षण है। इस मौके पर सरकार ने 75 रुपये का विशेष स्मारक सिक्का भी जारी किया। यह सिक्का तांबे और चांदी का बना हुआ है। इस पर नेताजी और सेल्युलर जेल की तस्वीर बनी है।

नेताजी को अंधेरे में रखा - अपने दिसंबर 1943 के पोर्ट ब्लेयर के तीन दिन दौरे के क्रम में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने सेल्युलर जेल का भी दौरा किया था। हालांकि तब उन्हें आजादी के रणबांकुरों पर हो रहे जुल्मो सितम को लेकर जेल प्रशासन ने अंधेरे में रखा था। उस समय पोर्ट ब्लेयर द्वीप पर जापानियों का कब्जा हो चुका था। पर जापानी प्रशासन की ओर से भी पोर्ट ब्लेयर के बाशिंदों पर आजादी के सेनानियों पर जुल्मो सितम बदस्तूर जारी था। जापानी किसी को भी ब्रिटिश प्रशासन का खबरी होने के शक में यातना देकर मार डालते थे। 

वास्तव में जापानियों का जुल्म तो ब्रिटिश जुल्म से भी ज्यादा था। तब कई बुद्धिजीवी भी ये कहने लगे थे न तो अंग्रेज हमें आजादी देंगे न ही जापानी। मतलब जापानी हमारे दोस्त नहीं हो सकते। जापान सरकार के जुल्म के शिकार नेताजी द्वारा स्थापित इंडियन ओपिनियल लीग ( आईएलएल) के लोग भी हुए थे। इनमें सरदार दीवान सिंह का नाम प्रमुख है।

नेताजी 29 दिसंबर 1943 को पोर्ट ब्लेयर पहुंचे थे। उन्हें जापानी प्रशासन ने रॉस द्वीप पर ठहराया था, जिसका नाम अब नेताजी द्वीप कर दिया गया है। नेताजी 1 जनवरी 1944 को पोर्ट ब्लेयर से प्रस्थान कर गए थे।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
(PORT BLAIR, NETAJEE, TIRANGA, SUBHASH CHANDRA BOSE )

2 comments:

  1. achchha likha aapne, karbain kove pdhte hi andmaan ki yaaden taza ho uthhin .
    agar aapko interest ho to yahan kuchh sajha kar rahi hun ...
    http://shardaa.blogspot.com/2012/02/blog-post.html

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    1. अच्छी तसवीरें है आपके ब्लॉग पर

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