Friday, August 11, 2017

दिल्ली के कैलाश पर्वत पर सम्राट अशोक का शिलालेख

दक्षिणी दिल्ली में सम्राट अशोक का एक शिलालेख स्थित है। इस लघु शिलालेख पर लिखे शब्दों का मौर्यकालीन इतिहास में काफी महत्व है। दिल्ली के लोग भले ही इस शिलालेख के बारे में ज्यादा नहीं जानते हों पर दुनिया भर के बौद्ध देशों के लोग हर साल इस शिलालेख को देखने के लिए पहुंचते हैं।
शिलालेख का भाव कुछ इस प्रकार है –

धम्म के लिए अपने प्रयासों के फलस्वरूप वह जंबुद्वीप के लोगों को देवताओं के निकट लाने में समर्थ हो सका। वह अपनी प्रजा से आकांक्षा रखता है कि, चाहे वे प्रतिष्ठित व्यक्ति हों या निचले दर्जे के हों, प्रयास करते रहें ताकि वे स्वर्ग प्राप्त कर सकें।

अत्यंत महत्व का है ये लघु शिलालेख - वैसे तो सम्राट अशोक के शिलालेख देश के कई हिस्सों में मिलते हैं। उनमें से कई बड़े शिलालेख हैं। उनकी तुलना में दिल्ली का शिलालेख एक लघु शिलालेख है। कुछ एकड़ में फैले छोटे से हरित क्षेत्र में एक पहाड़ी पर ये शिलालेख स्थित है। मुख्य द्वार से प्रवेश करने पर आप एक बागीचे में दाखिल होते हैं। कुछ कदम पैदल चलने के बाद बायीं तरफ ऊंची पहाड़ी पर ये शिलालेख स्थित है। इसे संरक्षित करने के लिए छोटे से छतरीनुमा शेड से ढक दिया गया है। आप इसे जालीदार झरोखे से देख सकते हैं।

अब यहां पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का सुरक्षा गार्ड तैनात रहते हैं। यहां प्रवेश के लिए कोई टिकट नहीं है। पर ये शिलालेख दिल्ली के सबसे प्राचीन ऐतिहासिक स्मारकों में शामिल हैं। वैसे तो दिल्ली में दो अशोक स्तंभ भी हैं, पर वे दूसरे शहरों से बाद में यहां लाए गए थे। पर सम्राट अशोक के काल का यह एकमात्र स्मारक है जो अपनी जगह पर मौजूद है।

बौद्ध धर्म के इतिहास में इस शिलालेख का काफी महत्व है। क्योंकि ये शिलालेख इस बात को मजबूती से प्रमाणित करता है कि सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म को अपनाने के बाद अपने जीवन में आए सकारात्मक बदलाव की बात करते हैं। वे जनता से भी बौद्ध धर्म अपनाने की अपील करते हैं। यही कारण है कि दुनिया भर में बौद्ध धर्म को मानने वाले लोग बड़ी श्रद्धा से इस शिलालेख को देखने पहुंचते हैं।

दिल्ली में स्थित अशोक का ये लघु शिलालेख इस बात का प्रमाण है कि मौर्य काल में भी दिल्ली प्रमुख नगर था। भले ही तब कोई बड़ा शहर नहीं था पर यह व्यापारिक मार्ग पर स्थित था।

ये शिलालेख भले ही तीसरी शताब्दी इसा पूर्व का है, लेकिन इसे 1966 में पहचाना जा सका। यह इस इलाके में खुदाई के दौरान मिला। कुल दस पंक्तियां का यह शिला लेख प्राकृत और ब्राह्मी लिपी में लिखा गया है। इस पर लिखे अक्षर ठीक से दिखाई नहीं देते। सम्राट अशोक ने इस शिलालेख पर गुदे अपने संदेश में जनता को धर्म के करीब लाने का आह्वान किया था।  यह सम्राट अशोक से 14 लघु शिलालेखों में से एक है। 30 इंच लंबा और लगभग 30 इंच चौड़ा ये शिलालेख अरावली के चट्टानों पर अंकित किया गया है। अपने अनूठे संदेश के कारण शिलालेख का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्व बढ़ गया है।

मैं जिस दिन इस शिलालेख को देखने पहुंचा हूं बड़ी संख्या में श्रीलंका के सैलानी यहां पर पहुंचे हुए हैं। वे बड़ी श्रद्धा से इस शिलालेख का पंक्ति में खड़े होकर दर्शन कर रहे हैं। कई लोग तो इस शिलालेख के आसपास श्रद्धा से मोमबत्तियां भी जलाने लगते हैं।

कैसे पहुंचे – ओखला ईएसआईसी मेट्रो स्टेशन से कोई आधा किलोमीटर पैदल चलकर यहां पहुंचा जा सकता है। यह चंद्र आर्य विद्या मंदिर के बगल में है। यहां से इस्कॉन मंदिर का मुख्य द्वार भी काफी निकट है। आसपास के लोग इसे अशोका पहाड़ी के नाम से जानते हैं।  
- विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com
( DELHI, ASHOKA, BUDDHA, SHILALEKH ) 

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