Saturday, January 11, 2020

फजले हक खैराबादी- जिन्होंने ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ फतवा लिखा


पोर्ट ब्लेयर के फोरशोर रोड पर जिसे कार्बाइन कोव रोड भी कहते हैं तिरंगा मेमोरियल से आगे और साइंस सेंटर से पहले एक मजार है। यह मजार है महान स्वतंत्रता सेनानी फजले हक खैराबादी की। पोर्ट ब्लेयर का यह इलाका साउथ प्वाइंट कहलाता है। 

समंदर के किनारे खूबसूरत सड़क पर यह मजार किसकी है। स्थानीय लोग इसे मजार बाबा के तौर पर जानते हैं। अत्यंत साफ सुथरी इस मजार का इंतजाम अंडमान वक्फ बोर्ड देखता है। कौन थे फजले हक खैराबादी। वे उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र के सीतापुर जिले खैराबाद के रहने वाले थे। वे इस्लामिक मामलों के महान विद्वान थे। लोग उन्हें अल्लमा कहते थे। उनका जन्म यूपी के सीतापुर जिले खैराबाद कस्बे के मियां सराय मुहल्ले में संपन्न परिवार में हुआ था। इस्लामिक विद्वान होने के कारण उनका सम्मान भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान से लेकर अरब देशों तक है।

दार्शनिक, तर्कशास्त्री और शायर
बहादुर शाह जफर पर डाक्यूमेंटरी फिल्म का निर्माण करने वाले वरिष्ठ पत्रकार सुरेश शर्मा कहते हैं कि अल्लामा फजले-हक खैराबादी अध्येता, दार्शनिक, तर्कशास्त्री और अरबी के मशहूर शायर थे। वे मिर्जा गालिब के करीबी दोस्त और आखिरी मुगल बहादुर शाह जफर के सलाहकार भी थे। उन्हें 1857 के स्वाधीनता संघर्ष में लोगों का जी जान से नेतृत्व करने के जुर्म में अंग्रेजों ने काला पानी की सजा दी गई थी।

भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में कई ऐसे क्रांति वीर हुए, जिन्होंने इस जंग-ए-आजादी में योगदान दिया और इतिहास के पन्नों में नाम दर्ज कराया। उसी में कुछ क्रांतिकारी ऐसे भी थे जिनके बारे में कम चर्चा होती है। उन्हीं में से एक थे अल्लामा फजले हक खैराबादी। यूपी की सीतापुर में जन्में फजले हक खैराबादी के पिता दिल्ली सिविल कोर्ट में उपन्यायाधीश थे, जो बाद में अदालत के जज (मुफ्ती) भी हुए।

फजले हक ने पहले खैराबाद में अध्यापन किया फिर 1816  में 19  साल की उम्र में ब्रिटिश सरकार में नौकरी शुरू की। इसके बाद उन्हें दिल्ली के सिविल कोर्ट में अधिकारी पद पर नियुक्त किया गया। पर बाद में उन्होंने अंग्रेजों की गुलामी नहीं करने का मन बना लिया और फिर 1831  में ब्रिटिश नौकरी को छोड़ दी।

मिर्जा गालिब के दोस्त
उस समय उनकी मुलाकात मशहूर शायर मिर्जा गालिब से हुई। इन्हीं के साथ ये मुगल बादशाह शाह अब्दुल जफर के दरबार में जाने लगे। इसके बाद इन्होंने बहादुर शाह जफर की अदालत में सदस्य के तौर पर नौकरी की। कुछ समय बाद इन्होंने बादशाह की नौकरी छोड़कर झज्जर के नवाब की सेवा में चले गए। कुछ ही समय बाद झज्जर के नवाब की मौत हो गई, और फिर ये सहारनपुर, रामपुर और नवाब वाजिद अली की सेवाओं में रहे। सन 1856 में ब्रिटिश सरकार के अवध कब्जे के बाद मौलाना खैराबादी अलवर के राजा विनय कुमार के निमंत्रण पर अलवर चले गए। अलवर के राजाय के यहां उन्होंने लगभग डेढ़ साल नौकरी की।

ब्रिटिश सरकार के खिलाफ फतवा ए जेहाद
जब 1857 की क्रांति शुरू हुई तो बहादुर शाह जफर ने खैराबादी को मदद के लिए बुलाया। अल्लामा ने बहादुर शाह जफर के निमंत्रण पर राजा विनय कुमार से बात की और अलवर से एक बार फिर दिल्ली के लिए रवाना हो गए।

बहादुर शाह जफर और फजले हक खैराबादी की मुलाकात हुई जिसमें क्रांतिकारी जनरल बख्त भी शामिल थे। ऐसा माना जाता है कि जनरल बख्त खान की रणनीति के तहत ही जिहाद का फतवा जारी हुआ। मौलाना फजले हक खैराबादी ने फतवा तैयार किया, जिस पर कई प्रतिष्ठित धार्मिक गुरुओं ने हस्ताक्षर किए। ऐसा कहा जाता है कि मौलाना खैराबादी ने दिल्ली की जामा मस्जिद में जुमा की नमाज के बाद अंग्रेजों के खिलाफ फतवा दिया। मुसलमानों को अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने का फरमान जारी किया।

खैराबादी को सजा ए कालापानी
फतवे के बाद से ही अंग्रेजों ने उनकी तलाश शुरू कर दी थी। इस बीच वे किसी तरह से बचते बचाते दिल्ली से अवध पहुंच गए और फिर खैराबाद से इनको गिरफ्तार कर लिया गया। इनको लखनऊ ले जाया गया, जहां इनके ऊपर मुकदमा चलाया गया। उन्हें सजा के तौर पर कालापानी यानी अंडमान भेज दिया गया। वे 08 अक्तूबर 1859 को अंदमान भेजे गए। दो साल बाद अंदमान में ही 12 फरवरी 1861 को उनका इंतकाल हो गया। फिर यहीं पर उनकी कब्र बना दी गई। उनके कब्र की देखभाल अंदमान वक्फ बोर्ड करता है। खैराबादी की कब्र पर उनका विस्तार से परिचय भी लिखा है। हर साल फरवरी में मौलाना खैराबादी की याद में पोर्ट ब्लेयर में उर्स का भी आयोजन होता है।

जावेद अख्तर के परदादा
फजले हक खैराबादी के खानदान में शायरी की परंपरा चली आ रही है। वे बॉलीवुड के गीतकार और मशहूर शायर जावेद अख्तर के परदादा थे। फजले हक खैराबादी के बेटे अब्दुल हक ( शमशुल उलेमा) हुए। उनके बेटे इफ्तिखार हुसैन उर्फ मुजतर खैराबादी भी शायर हुए। मुजतर खैराबादी के बेटे जांनिसार अख्तर भी जाने माने शायर हुए। जांनिसार अख्तर के बेटे जावेद अख्तर भी शायर हैं।  सीतापुर के खैराबाद में उनकी याद में अल्लामा फजले खैराबादी मेमोरियल डिग्री कॉलेज की स्थापना की गई है। खैराबाद में भी उनकी याद में स्मारक बनवाया गया है।

अल्लामा खैराबादी
1797 में यूपी के सीतापुर के खैराबाद में जन्म हुआ।

1859 में 08 अक्तूबर को सजा-ए-कालापानी के तहत अंदमान भेजे गए।

1861 में 12 फरवरी को पोर्ट ब्लेयर में उनका इंतकाल हुआ।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com 
(FAJLE HAQUE KHARABADI ) 

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