Friday, January 31, 2020

तुगलकाबाद फोर्ट – दिल्ली का सबसे विशाल नगर था


दिल्ली अलग अलग काल खंड में सात बार सात नामों से बसी। इनमें से एक है तुगलकाबाद। आजकल दिल्ली में तुगलकाबाद नाम से रेलवे स्टेशन और मेट्रो स्टेशन हैं। जैसा कि नाम से ही प्रतीत होता है कि ये नगर चौदहवीं सदी में तुगलककाल में आबाद हुआ था। 

यह दिल्ली का सबसे विशाल किला किला प्रतीत होता है। यह लालकिला से भी काफी बड़ा है। यह दिल्ली के सात शहरों में तीसरा शहर है। इसकी स्थापना गयासुद्दीन तुगलक ने की थी। किले के सामने सड़क के उस पार गयासुद्दीन तुगलक का मकबरा भी है। यह मकबरा लाल बलुआ पत्थरों का बना हुआ है। किले के सबसे ऊंचे प्वाइंट पहुंचने पर पास ही करणी सिंह शूटिंग रेंज नजर आता है।

कई लोग इसे भी दिल्ली के भूतहा यानी हाउंटेड प्लेस के तौर पर देखते हैं। इसका भी कारण है। किले के आसपास बड़ा वन क्षेत्र है। रोज किले को देखने कुछ सौ लोग ही पहुंचते हैं। लिहाजा यह दिन भर सुनसान रहता है। किले में प्रवेश के लिए टिकट है। यहां पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से चौकीदार नियुक्त किए गए हैं। ये लोग किला घूमने मेंआपकी मदद करते हैं। पर वे सलाह देते हैं कि किले के अंदर बहुत दूर तक अकेले नहीं जाएं। कई इलाके से खुला होने के कारण इसमें बाहरी लोग कहीं से घुस आते हैं। कई बारे अकेले में घूमने वालों के साथ लूटपाट हो सकती है। लिहाजा वहीं तक जाएं जहां तक चौकीदार आपको सलाह दें। अगर आप बड़े समूह में हैं तो बेखौफ कहीं भी घूम सकते हैं। आमिर खान की लोकप्रिय फिल्म रंग दे बसंती समेत कुछ फिल्मों में इस किले को देखा जा सकता है।

तुगलकाबाद किले का विस्तार छह किलोमीटर में है। इस लिहाज से यह दिल्ली का सबसे बड़ा किला था। इसका निर्माण 1321 में आरंभ हुआ। पर यह किला कभी भी पूरी तरह आबाद नहीं हो सका। गयासुद्दीन तुगलक को ये किला 1327 में छोड़ देना पड़ा। वास्तव में उस समय दिल्ली में राजधानी का संचालन सिरी फोर्ट से होता था। तभी विकल्प के तौर पर इस किले का निर्माण शुरू हुआ। पर एक तरफ से ये किला बस रहा था, वहीं दूसरी तरफ लोग इसे छोडकर जा भी रहे थे।

किले को लेकर एक दिलचस्प कहानी है। गयासुद्दीन तुगलक ने जब पहाड़ी पर ये किला बनवाना शुरू किया तो उसने बड़ी संख्या में मजदूर लगा दिए। उसी समय सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया अपने लिए बावली भी बनवा रहे थे। मजदूरों के किला निर्माण में लग जाने से बावली का काम ठप हो गया। ऐसी सूरत में उन्होंने उन मजदूरों को रात में काम करने के लिए राजी कर लिया। मजदूर दिन में किला बनाते और रात में जाकर बावली में अपना योगदान देते। 

पर ऐसा कहा जाता है कि सुल्तान सूफी संत औलिया से चिढ़ता था। उसने निजामुद्दीन बस्ती से मिलने वाला तेल बंद करा दिया। रोशनी की व्यवस्था न होने से बाउली का काम ठप हो गया। उस वक्त औलिया ने नाराज होकर कहा था, सुल्तान यह जो किला बनवा रहा है इसमें या तो सियार बसेंगे या गूजर। तो सूफी संत की बददुआ के कारण ये किला कभी पूरी तरह आबाद नहीं हो सका।
कैसे पहुंचे – बदरपुर बार्डर से महरौली जाने वाली किसी बस में बैठें। वह आपको तुगलकाबाद किले के प्रवेश द्वार पर उतार देगी। महरौली बदरपुर रोड यानी एमबी रोड तुगलकाबाद फोर्ट के बीच से होकर गुजरती  है। दूसरा तरीका है कालकाजी या गोविंदपुरी मेट्रो स्टेशन से आटो रिक्शा लेकर पहुंचे। यहां से किले की दूरी पांच किलोमीटर है। किला तुगलकाबाद गांव, तुगलकाबाद एयरफोर्स स्टेशन के पास स्थित है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
( TUGLAKABAD FORT, DELHI, GAYASUDDIN TUGLAK )



Wednesday, January 29, 2020

क्या सचमुच भूतहा है - भूली भटियारी का महल



दिल्ली के केंद्र में है भूली भटियारी का महल। यह दिल्ली के रिज यानी वन क्षेत्र में स्थित है। दिल्ली के दिल कनाट प्लेस से कुछ मिनट की दूरी तय कर आप इस जंगल में पहुंच सकते हैं। पर इस महल के बारे में चर्चित है कि ये भूतहा स्थान है। यानी हाउंटेड प्लेस है। इस बात को बल इससे भी मिलता है कि खुद दिल्ली पुलिस ही शाम के बाद लोगों को यहां जाने नहीं देती।

पर सच्चाई क्या है। यह सब जानने के लिए हमलोग एक दिन भूली भटियारी के महल में पहुंच गए। दिल्ली के घुम्मकड़ी दिल से समूह के लोगों ने तय किया कि आज की सैर भूली भटियारी के महल में। तो हम सब लोग झंडेवालन मेट्रो स्टेशन के पास मिले। यहां 108 फीट ऊंचे हनुमान जी का मंदिर है। इसी मंदिर से हमारा समूह महल की ओर चल पड़ा। बग्गा लिंक मोटर्स के बगल से एक सड़क अंदर जा रही है। इस सड़क पर आधा किलोमीटर चलने के बाद दाहिनी तरफ भूली भटियारी का महल दिखाई देता है। इसमें प्रवेश के लिए कोई टिकट नहीं है।

भूली भटियारी महल दिल्ली के रिज यानी वन क्षेत्र में स्थित है। इसके चारों तरफ हरे भरे जंगल हैं। यह वन क्षेत्र राष्ट्रपति भवन से लेकर धौलाकुआं तक फैला हुआ है। पर आप जान लें कि भूली भटियारी महल के बारे में भूतहा होने की कहानी सत्यता से परे है।

तुगलककालीन शिकारगाह - वास्तव में यह तुगलककालीन ऐतिहासिक इमारत है। इसका निर्माण फिरोजशाह तुगलक ने करावाया था। फिरोजशाह तुगलक का शासनकाल 1351 से 1388 का रहा। फिरोजशाह तुगलक ने कुल पांच शिकारगाह बनवाए। इनमें मालचा महल, कुशक महल, उत्तरी दिल्ली के बाडा हिंदुराव अस्पताल के अंदर और महिपालपुर में। भूली भटियारी महल भी इसी शिकारगाह में शामिल है। यह राजाओं की शिकारगाह थी। राजा जब जंगलों में शिकार करने आते थे तो यहां पर रात्रि विश्राम करते थे। जाहिर है इस शिकारगाह में रहने का भी इंतजाम था। इसकी छत पर एक विशाल दालान बना हुआ है जहां खाने-पीने का इंतजाम किया जाता रहा होगा। ऐसा प्रतीत होता है कि शिकार के बाद रात को यहां राजा की महफिल जमती होगी। ये महल अरावली हिल्स के अनगढ़ पत्थरों से बना हुआ है। इसका प्रवेश द्वार विशाल है। प्रवेश द्वार के बाद एक बड़ा सा आंगन है। महल अभी भी काफी अच्छी हालत में है। महल के अंदर कुछ छोटे छोटे कक्ष बने हुए हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि  ये वस्त्र बदलने के लिए बने होंगे। 

तो आप जान गए होंगे कि ये महल भूतहा बिल्कुल नहीं है। पर आज भी वन क्षेत्र में स्थित होने के कारण शाम को यह सुनसान हो जाता है। कानून व्यवस्था के कारण पुलिस यहां लोगों को जाने नहीं देती। इसी इलाके रहने वाले सरयू प्रसाद मिश्रा बताते हैं कि मेरा बचपन इसी इलाके में गुजरा है। मैंने विश्वास के साथ कह सकता हूं कि ये इलाका भुतहा बिल्कुल नहीं है।

कैसे पड़ा भूली भटियारी का महल नाम – ऐसा माना जाता है कि जंगलों में बना यह महल शिकार के बाद ज्यादातर समय खाली रहता था। इसी दौरान राजस्थान की भटियारिन संप्रदाय का एक कुनबे का परिवार यहां आकर रुक गया। वह परिवार लंबे समय तक यहां रहा। उस परिवार की महिला का नाम भूली भटियारिन था। उसके नाम पर ही आगे इस महल का नाम पड़ गया।

कैसे पहुंचे – यहां पहुंचने का निकटतम मेट्रो रेलवे स्टेशन झंडेवालन है। 108 फीट ऊंचे हनुमान जी के मंदिर के बगल से बायीं तरफ रास्ता जा रहा है। आधा किलोमीटर चलने के बाद आप महल पहुंच जाएंगे।

- विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com 
( BHULI BHATIARI MAHAL, TUGLAK, HAUNTED PLACE ) 


Monday, January 27, 2020

कोलकाता का गोरा बाजार और खीर कदम की मिठास

कोलकाता एयरपोर्ट से हमें गोरा बाजार जाना है। सड़क पर आकर हमने एक काली पीली टैक्सी को रोका। कोलकाता में सभी टैक्सी वाले मीटर से चलते हैं। कोई कहीं भी जाने से इनकार भी नहीं कर सकता। सो यहां ओला उबर तलाशने की जरूरत नहीं है। हालांकि यहां पर ओला की सेवाएं शुरू हो चुकी हैं। तो एक टैक्सी में बैठकर हमलोग गोरा बाजार पहुंच चुके हैं। यहां जोसेप एंड कंपनी के पास दमदम गर्ल्स हाई स्कूल के निकट मेरे एक भैया रहते हैं जो भूकंप वैज्ञानिक हैं। हम उनके घर पहुंचने वाले हैं।

अंदमान से हफ्ते भर की यात्रा से लौट कर हमलोग कोलकाता के गोरा बाजार में पहुंचे हैं। पर ये गोरा बाजार नाम क्यों हैं। कभी यहां पर गोरे लोग यानी अंग्रेज रहते थे इसलिए इसका नाम गोरा बाजार पड़ गया। ये इलाका कोलकाता के दमदम उपनगर का हिस्सा है। ये एयरपोर्ट के काफी पास है। गोरा बाजार के पास दमदम कैंटोनमेंट इलाका है। यहां लोकल ट्रेन का रेलवे स्टेशन भी है दमदम कैंट। कई सालों बाद भाभी जी भतीजी निशिता से मुलाकात हुई है। निशिता तो 12वीं पास कर चुकी है। अनादि 2014 में अपनी निशिता दीदी से मिले थे। तब वे चौथी कक्षा में थे अब नौंवी में हैं। वे बार बार दीदी को याद करते रहते थे। आज मुलाकात हो गई है।

कोलकाता से मेरी और माधवी, अनादि की राहें अलग होने वाली हैं। वे दोनों ट्रेन से पटना जाएंगे और मैं रात की उड़ान से दिल्ली। तो इससे पहले गोरा बाजार में थोड़ी शॉपिंग। शाम को हमलोग पास के बाजार में पहुंचे। कोलकाता सूती की साडियां खरीदने के लिए बडी अच्छी जगह है। तीन दुकानों में काफी साडियां देखने के बाद हमें कुछ पसंद आ गईं। आगे बाजार में जाकर हमने सरसों की चटनी भी खरीदी। ये खास तौर पर कोलकाता के आसपास ही मिलती है। अब कोलकाता में हैं और मिठाइयां न खरीदें ये कैसे हो सकता है। तो हम पहुंच गए हैं जेएन तिवारी रोड पर कोलकाता स्वीट्स में। मैंने अपनी पसंदीदा बंगाली मिठाई खरीदी है - खीर कदम।

शाम को हमलोग टैक्सी लेकर चल पड़े हैं कोलकाता रेलवे स्टेशन के लिए। टैक्सी वाले निराला मुसलमान हैं। पर हाल में हुए लोकसभा चुनाव के बाद बंगाल में भाजपा को मिली 18 सीटों पर कहते हैं कि भाजपा दो से 8 हो गई है , अगले साल विधानसभा चुनाव में तो दीदी साफ हो जाएंगी। दीदी ने टैक्सी वालों पर बड़ा जुल्म किया है। वे बता रहें नारा चल रहा है – लोकसभा में हाफ, विधानसभा में साफ। दीदी तेरा काम तमाम, जय श्री राम।

कोलकाता रेलवे स्टेशन काफी साफ सुथरा है। हम पटना गरीब रथ की तलाश में हैं। पर गलती से गुवाहाटी गरीब रथ में जाकर बैठ गए। जल्द ही गलती पता चल गई, फिर जाकर सही ट्रेन में बैठे। खाने का समय हो गया है, पर प्लेटफार्म पर पास में कोई भोजनालय नहीं है। हमने अनादि को ट्रेन चलने पर पेंट्री से खाना मंगवा लेने की सलाह दी। तब तक उन लोगों के लिए कुछ स्नैक्स लेकर दिया और मैं चल पड़ा। 

एयरपोर्ट के लिए कोलकाता रेलवे स्टेशन के बाहर से अजय ने सलाह दी थी कि थोड़ा बायीं तरफ पैदल चलने पर पर उलटाडांगा एयरपोर्ट रोड पर पहुंच जाएंगे पर ये पदयात्रा मुझे एक किलोमीटर से ज्यादा लगी। दो बैग के साथ इतना चलना थका देने वाला रहा। खैर मुख्य सड़क पर पहुंचने पर एयरपोर्ट जाने वाली एसी बस मिल गई। मैं समय रहते एयरपोर्ट परिसर में पहुंच गया। बोर्डिंग पास लेने से पहले टैक्सी स्टैंड में रात्रि भोजन कर लेना ठीक रहेगा। यहां 70 रुपये की थाली है चावल की। खाने के बाद एयरपोर्ट परिसर में दाखिल हुआ।

वेटिंग लाउंज में हमें मां दुर्गा की थ्रीडी प्रिंटर से निकाली गई प्रतिमा दिखाई देती है। इसे दुनिया की पहली थ्रीडी प्रिंटेड मां दुर्गा की प्रतिमा होने का दावा किया गया है। हमारी गो एयर की उड़ान है दिल्ली के लिए। रात 11 बजे है उड़ान का समय। बोर्डिंग के बाद अपने एयरब्रिज गेट पर इंतजार करने लगा। इस बीच पटना जा रही गरीब रथ की ऑनलाइन ट्रैकिंग भी देख रहा हूं। विमान दिल्ली के लिए समय पर उड चला है। इसे उड़ा रही हैं कैप्टन सरिता। सह पायलय हैं युगांक। क्रू मेंबर हैं निशा, शिखा, आदर्श और वैजयंती। मैं रात्रि उड़ान में सोने की कोशिश कर रहा हूं। पर सो नहीं पाता। करीब सवा दो घंटे बाद हम दिल्ली के आसमान पर हैं। टी – 2 पर उतरने के बाद रात्रि दो बजे के बाद बाहर आकर कश्मीरी गेट जाने वाली एसी बस में बैठ गया हूं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-        ( GORA BAZAR, DUMDUM. KOLKATA, KHIR KDAM SWEETS, GO AIR, DELHI )

Saturday, January 25, 2020

पोर्ट ब्लेयर से वापसी – सिटी ऑफ जाय कोलकाता

कई दिनों की तफरीह के बाद हमलोग अब अंदमान निकोबार द्वीप समूह से वापसी की राह पर हैं। सुबह सुबह स्नानादि से निवृत होकर चाय बिस्किट लेने के बाद तैयार हैं हमलोग। बाहर चटकीली धूप खिली हुई है। तारीख है 30 मई। सुबह-सुबह हमने होटल ब्लेयर से चेकआउट कर लिया है। इस होटल में कुछ दिनों को प्रवास यादगार रहा। शायद अगली बार आने पर भी हम इसी होटल को चुनें।

होटल के गेट पर हमलोग खड़े हैं, एयरपोर्ट के लिए किसी सवारी का इंतजार है। तभी एक आटो रिक्शा वाला आया। हमने बताया एयरपोर्ट जाना है। उन्होंने किराया भी वाजिब मांगा। सत्तर रुपये। अब बस से भी जाएं तो 30 रुपये लगने है। हमारे पास अच्छा खास लगेज है तो आटो रिक्शा ही सही। अगले 15 मिनट में हमलोग एयरपोर्ट पहुंच गए। पोर्ट ब्लेयर के सावरकर एयरपोर्ट के नए टर्मिनल भवन का निर्माण कार्य जारी है। 

मैं इंडिगो के बोर्डिंग पास के काउंटर पर पहुंच गया हूं। इंडिगो एयरलाइन्स की स्टाफ ने पूछा आप कल भी आए थे क्या... मैंने कहा नहीं। तो उसने कहा कि कल काफी लोग लौट गए, क्योंकि हमारी कई उड़ाने रद्द करनी पड़ी थी। खराब मौसम के कारण पोर्ट ब्लेयर आए विमान उतर नहीं सके। 
इसका मतलब आने वाले आ नहीं सके और जाने वाले जा नहीं सके। तो उसमें से काफी लोगों को आज भेजा जा रहा है। मतलब पोर्ट ब्लेयर में मई महीने में भी ऐसा हो सकता है कि आपका विमान उतर नहीं पाए या उड़ान ही नहीं भर पाए। हां तो कल बारिश का मौसम भी था। पर आज आसमान साफ है। हमें बोर्डिंग पास मिल गया है। हमलोग चेकइन करके वेटिंग हॉल में पहुंच गए हैं। लगभग सारी कुर्सियां भरी हुई हैं।

हमें इस बार 14 नंबर की पंक्ति में सीट मिली है सी, डी, और ई। मतलब एक भी खिड़की वाली सीट नहीं है। कोई बात नहीं। अब तमाम विमानन कंपनियां खिड़की वाली सीट के लिए प्रिमियम राशि लगाने लगी हैं। हमने वह राशि नहीं दी तो हमें खिड़की वाली सीट नहीं मिल सकी है।

अभी उड़ान में देर है तो वेटिंग हॉल के बाजार का मुआयना किया जाए। यहां भी सागरिका का स्टॉल है। पर हमें कुछ नहीं खरीदना। पढ़ने के लिए अखबार सामने है। द फिनिक्स पोस्ट। थोड़ी देर में बोर्डिंग गेट खुल गए। लोग जाने लगे हैं। हम भी लाइन में लग गए हैं। विमान महज 200 मीटर दूर है पर हमें बस में बिठाकर ले जाया गया है। मैं बीच वाली सीट पर बैठ गया हूं। आने जाने के रास्ते के बाद मेरे सामने वाली सीट पर अनादि और माधवी बैठे हैं। नीयत समय पर उड़ान की तैयारी हो चुकी है। अब अंदमान को अलविदा कहने का वक्त है। दूसरी बार। पर अलविदा क्यों, यहां तो फिर आने की इच्छा बनी रहेगी। 

तो अब उड़ चले हैं हम। कहां के लिए। आए तो थे दिल्ली से पर हमारी ये उड़ान कोलकाता तक ही है। कोलकाता, हां वही सिटी ऑफ जॉय। इस बार विमान में एक बार भी घोषणा नहीं हुई कि हम खराब मौसम से गुजर रहे हैं। मतलब मौसम बिल्कुल अच्छा है। हमलोग दो घंटे बाद कोलकाता के आसमान पर हैं।
जहाज के कप्तान थे अजय कुमार मोहन जो दिल्ली निवासी हैं। सह कप्तान हैं तरुण सेठी। परिचारिकाएं थीं रुपाली, अंकिता, नेहा और कनिका। सबका धन्यवाद।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस एयरपोर्ट, दमदम, कोलकाता में हमलोग एयरब्रिज से उतरकर जल्द ही बाहर आ गए। पर कोलकाता में उतरते ही माधवी और वंश को भूख लग गई है। तो कहीं भी जाने से पहले पेट पूजा। एयरपोर्ट से बाहर निकल कर हमलोग टैक्सी स्टैंड पर पहुंचे हैं। यहां पर एक अस्थायी रेस्टोरेंट में पराठे की प्लेट ने हमारा ध्यान खींचा। दो पराठे, सब्जी, दाल, दही ये सब कुछ बिल्कुल वाजिब दाम में। खाने में सुविधा के लिए उन्होंने पराठेको कैंची से कई हिस्सों में काट दिया है। ये और भी अच्छा है। पेट पूजा के बाद अब हमें टैक्सी की तलाश है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-        ( PORT BLAIR, SAVARKAR AIRPORT, INDIGO AIRLINES, NSB AIRPORT, KOLKATA )



Thursday, January 23, 2020

अंदमान में जल क्रीड़ा और राजीव गांधी वाटर स्पोर्ट्स कांप्लेक्स

आप अंदमान में हैं और टाइम पास करना है तो सबसे अच्छी जगह है राजीव गांधी वाटर एंड स्पोर्ट्स कांप्लेक्स। यहां पर कई तरह की जल क्रीड़ा का आनंद ले सकते हैं। यह पोर्ट ब्लेयर का केंद्रीय स्थल है। चाहे आप शहर के किसी कोने से आए यहां पर बैठकर आप अपना टाइम पास कर सकते हैं। इसके आसपास मनोरंजन के कई साधन और खाने-पीने के विकल्प मौजूद हैं। इसके पास ही अंदमान का सरकारी कॉलेज जवाहरलाल नेहरु कॉलेज स्थित है। पास में रामकृष्ण आश्रम भी है।

पोर्ट ब्लेयर की आखिरी सुबह- खट्टे मीठे आम का स्वाद 

पोर्ट ब्लेयर शहर में हमारा आज आखिरी दिन है। सुबह साढ़े दस बजे यहां से उड़ान है। पर आखिरी दिन भी घूमने से कोताही कैसी। तो मैं सुबह पांच बजे ही होटल से बाहर आकर सुबह की सैर करने निकल पड़ा है। ब्लेयर होटल से बाहर निकलने पर चौराहे पर आकर मैं डेलानीपुर जाने वाली सड़क पर पैदल पैदल चल पड़ा हूं। ये एक सुहानी सुबह है। इस सड़क पर भी कई आवासीय होटल बने हुए हैं। इस सड़क का नाम मौलाना आजाद रोड है। संक्षेप में इसे एम ए रोड कहते हैं। इस संक्षिप्तिकरण से नई पीढ़ी को असली नाम का पता ही नहीं चलता। ये बड़ी गलत बात है।

मुझे सामने मसजिद नूर दिखाई दे रही है। पोर्ट ब्लेयर शहर की प्रमुख मस्जिद। इस इलाके का नाम क्वैरी हिल भी है। इसके आगे रिट्ज होटल दिखाई दिया। इसमें चूल्हा चौका नामक रेस्टोरेंट है। इसके आगे केरला समाजम का भवन और विशाल मैदान दिखाई देता है। यह मलयाली भाइयों को सामाजिक भवन है। हमारे होटल के सामने आंध्रा के लोगों को भवन है। इस मौलाना आजाद रोड पर होटलों के अलावा आटो मार्केट भी है।

थोड़ा आगे चलने पर एक आम के पेड़ से मुलाकात हो गई। उस पेड़ से अधपके आम टूट कर गिर रहे थे। मैंने कुछ छोटे छोटे आम उठाए। उनमें से एक आम को चखकर देखा। आम मीठा है। बचपन याद आ गया जब हम ढेला मार कर आम तोड़ा करते थे। जिसका निसाना अचूक होता वह आम तोड़ने में विजय प्राप्त कर लेता। जो मजा उस आम को खाने में था, वह बाजार से खरीदकर पके हुए आम खाने में कहां हैं। उस आम के साथ के जीत का स्वाद होता था। वह निशानेबाजी का प्रतिफल होता था।

और चलते चलते हम डिलानीपुर पहुंच गए हैं। चौराहे से पहले राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय का बोर्ड दिखाई देता है। यहां मनीषा रिजेंसी नामक एक होटल दिखाई देता है। अंदमान में सैलानियों की जरूरत के मुताबिक हर बजट के होटल बन चुके हैं। आप 400 से लेकर 5000 रुपये प्रतिदिन के होटल में यहां ठहर सकते हैं। जैसा दाम वैसी सुविधाएं। तो मैं दो किलोमीटर से ज्यादा पैदल चल चुका हूं। तो अब लौटना चाहिए। तो इसी रास्ते पर लौट चला हूं। घड़ी की सूई भी आगे बढ़ती जा रही है।

होटल के करीब पहुंच कर एक चाय की दुकान से माधवी और वंश के लिए चाय पैक करा लिया। उन्हें बेड टी मिल जाएगा तो वे लोग जल्दी तैयार हो जाएंगे। मैंने तो दूध वाली चाय पीनी काफी कम कर दी है। नींबू चाय या ग्रीन टी पी लेता हूं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-        ( WALKING ON PORT BLAIR ROADS )

Tuesday, January 21, 2020

हैवलॉक जैसा ही सुंदर है नील द्वीप


अंदमान आने वाले सैलानी हैवलॉक द्वीप जरूर जाना चाहते हैं। यह बड़ा ही सुंदर द्वीप है। पर जैसा हैवलॉक सुंदर है उसी तरह नील द्वीप भी अंदमान के सुंदर दर्शनीय स्थलों में से एक है। मैं अपनी पिछली यात्रा के क्रम में हैवलॉक द्वीप गया था। पर इस बार तारीखें स्पष्ट नहीं होने के कारण हैवलॉक जाने और आने का टिकट नहीं मिल पाया।

हमने सोचा हैवलॉक न सही तो नील द्वीप का दौरा किया जाए। पर ग्रीन ओसन और मैक्रूज की नील द्वीप जाने वाले सेवाओं की समय सारणी मेरी यात्रा से मैच नहीं हो पा रही थी। तो हमने सरकारी फेरी सेवा तलाश करने की सोची। इसके लिए मैं फिनिक्स बे स्थित सरकारी फेरी सेवा के बुकिंग दफ्तर गया। वह कई एकड़ में फैला हुआ विशाल परिसर है। यहां पर भारत भूमि में कोलकाता, चेन्नई, विशाखापत्तनम जाने के लिए जहाज के टिकट भी बुक होते हैं। वहीं अंदमान के अलग अलग द्वीप पर जाने के लिए टिकट भी बुक किए जाते हैं। पर ये सारी बुकिंग ऑनलाइन नहीं की जा सकी है। इसलिए आपको टिकटों के लिए इस दफ्तर में आना ही पड़ता है। हम साल 2019 में चारों तरफ डिजिटल इंडिया की बात कर रहे हैं पर यहां पर हम अभी काफी पीछे हैं।


बहुत सारे काउंटर यहां पर टिकट खरीदने के लिए तमाम काउंटर बने हुए हैं। मैं एक काउंटर पर जाकर नील द्वीप के टिकट के लिए बात करता हूं। काउंटर पर मौजूद मोहतरमा ने बताया कि कल का टिकट उपलब्ध नहीं है। हां टिकट की उपलब्धता बताने से पहले उन्होंने पूछा कि आप अंदमान के हो या मेनलैंड के। मेरे बताने पर की मेन लैंड का हूं उन्होंने ना में उत्तर दिया। मतलब स्टीमर की टिकटों में मेनलैंड और अंदमान के लोगों को कोटा निर्धारित है।
अलग अलग दरें – चाहे आपको कोलकाता या चेन्नई जाना हो या किसी अंदमान के ही द्वीप पर मेनलैंड के निवासी और अंदमान के लोगों के लिए टिकट की अलग अलग दरें निर्धारित हैं। इन दरों में तीन गुने का अंतर है। पर सारे लोग पहले सरकारी फेरी सेवा का टिकट पता करते हैं क्योंकि इसकी दरें निजी सेवा से काफी सस्ती है। जैसे नील का टिकट निजी क्रूज में 1200 है तो सरकारी फेरी में 500 के आसपास वहीं अंदमान वासियों के लिए तो यह 80 रुपये के आसपास ही है।  

नहीं मिल नील का टिकट – खैर हमें नील द्वीप का टिकट नहीं मिला। एक स्थानीय अंदमानी भाई से मुलाकात हुई। उन्होंने सलाह दी कि कल सुबह आठ बजे आप फेरी के समय पर यहां पहुंचिए, अगर कई अंदमान के लोग नहीं आएंगे तो आपको जहाज में जगह मिल जाएगी। पर मेरे साथ तीन लोग हैं।अगर जाने की जगह मिल गई और अगले दिन वापसी की नहीं मिली तो मेरी परेशानी बढ़ जाएगी। इसलिए ये सलाह व्यहारिक नहीं लगी। तो मैं वापस लौट आया। नील द्वीप की सैर फिर कभी सही।
नील द्वीप का नाम बदलकर अब शहीद द्वीप कर दिया गया है। यह पोर्ट ब्लेयर से 36 किलोमीटर उत्तर पूर्व दिशा में स्थित है। यह दक्षिण अंदमान में ही आता है। नील द्वीप पर हैवलॉक (स्वराज द्वीप ) की तरह की रहने के लिए कई होटल उपलब्ध हैं। यह बड़ा ही शांत द्वीप है। इसका सौंदर्य दुनिया भर के सैलानियों को लुभाता है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-        ( ANDAMAN , SHAHEED ISLAND )




Sunday, January 19, 2020

एक बार फिर बारिश के बीच माउंट हेरिएट की ओर


डिगलीपुर से लौटने के बाद हमारे पास एक दिन का वक्त था। हालांकि मैं माउंटर हेरियेट अपनी पिछली यात्रा में घूम चुका था, पर मैंने तय किया कि माधवी और अनादि को माउंट हेरियेट जरूर दिखा दिया जाए। सच तो ये है कि इस निराले पर्वत का आकर्षण मुझे भी एक बार फिर बुला रहा था। दूसरा बात की पोर्ट ब्लेयर से यहां पहुंचना काफी आसान है।

तो हमने एक बार फिर सार्वजनिक परिवहन साधनों का इस्तेमाल किया। हमलोग अबरडीन बाजार से आटो रिक्शा बुक करके चाथम जेट्टी पहुंच गए। हालांकि यहां स्थानीय बसों से और भी सस्ते में पहुंचा जा सकता था पर उसमें समय थोड़ा ज्यादा लगता। बस में तीन लोगों के 30 रुपये लगते पर आटो रिक्शा वाले ने 60 रुपये लिए। वह हमें शार्ट कट रास्ते यानी समंदर के किनारे बनी सड़क जो फिनिक्स बे से होकर जाती है उधर से लेकर गया। पर चाथम जेट्टि तक पहुंचते हुए हमें हल्की बारिश ने घेर लिया। 

हमलोग जल्दी से बंबू फ्लैट द्वीप की ओर जा रहे स्टीमर में सवार हो गए। जल्दीबाजी ऐसी की हम टिकट लेना ही भूल गए। खैर रास्ते में चेकिंग नहीं हुई। आधे घंटे में हमलोग बंबू फ्लैट में थे। यहां भी बारिश जारी है। इसी बारिश में सामने एक छोटे से रेस्टोरेंट में हमलोग सुबह के नास्ते के लिए बैठ गए। नास्ते में मिला इडली सांभर और चाय। नास्ते के दौरान ही हमारी एक जीप वाले से बात हुई। वह 450 रुपये में हमें माउंट हेरियेट ले जाने को तैयार हो गया। इसमें इंतजार करना और वापस छोड़ना भी शामिल है।

पिछली बार हमें जिस जीप वाले ने माउंट हेरियेट की सैर कराई थी, हमने पहले उन्ही बशीर भाई को ढूंढने की कोशिश की। उनका मोबाइल नंबर नहीं लगा। साथी जीप वालों ने बताया कि आज वे अपनी जीप की मरम्मत करा रहे हैं। खैर नए जीप वाले भी काफी अच्छे थे। थोड़ी देर में हमलो पहाड़ी पर चढ़ते हुए माउंट हेरियेट पहुंच चुके हैं। पहाड़ी रास्तों में बारिश के बाद ठंड और बढ़ गई है। पर इस ठंड और बारिश के बीच माउंट हेरिय़ेट का हरियाला मौसम और रुमानी हो गया है। अनादि और माधवी को को इस हरियाली और हल्की बारिश के बीच खूब मजा आ रहा है। तो हमलोगों ने इस मौसम के बीच माउंट हेरियेट की पहाड़ी पर आबोहवा का खूब लुत्फ उठाया।
 यहां पर कुछ व्यू प्वाइंट और शेड का निर्माण कराया गया है,जहां से आप चारों तरफ का नजारा देख सकते हैं। प्रकृति के रंग को काफी करीब से महसूस कर सकते हैं। अगर यहां ठहरना चाहें तो प्रशासन की तरफ से गेस्ट हाउस का भी इंतजाम किया गया है। कुछ लोग माउंट हेरियेट काला पत्थर तक ट्रैक करने भी जाते हैं। अगर थोड़ा समय लेकर चले हैं तो इस ट्रैकिंग का भी मजाल जरूर लिजिए।

बस यहां आने पर देर तक रुकना हो तो अपने साथ खाने पीने की कुछ चीजें भी अपने साथ लेकर आएं तो अच्छा रहेगा। क्योंकि यहां जंगल में कुछ नहीं मिलता है। तो और कितनी देर गुजारेंगे इस हरियाली में चलिए ना अब वापस भी चलना है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-        (MOUNT HERIET AGAIN, GREEN FOREST )


Saturday, January 18, 2020

कार्बाइन कोव की रुमानी शाम और चना जोर गरम


विज्ञान केंद्र से हमलोग कारबाइन कोव की तरफ चल पड़े हैं। समंदर के साथ बनी सड़क का सफर बड़ा ही मनोरम है। थोड़ी देर में हमलोग कारबाइन कोव तट पर पहुंच गए हैं। पोर्ट ब्लेयर शाम गुजारने के लिए यह बेहतरीन जगह है। यहां पर दूसरी बार पहुंचा हूं। पर पिछली बार अकेला था। पर इस बार इस द्वीप पर कुछ बदलाव हो चुका है। यहां पर स्पीड बोट भी चलने लगी है। मतलब समंदर में अटखेलियां करनी हो तो स्पीड बोट पर सवार हो जाइए। वरना इस तट पर उछल कूद मचाएं। मजे लें। यहां हर उम्र के लोग मिल जाएंगे। बच्चे, बूढ़े और जवान। समुद्र तट पर कुछ रेस्टोरेंट हैं। स्ट्रीट फूड की कई दुकाने हैं। शॉपिंग के लिए छोटी छोटी दुकाने सजी हैं। हां नारियल पानी तो होगा ही।

पीछे नारियल के हरे भरे पेड़, उसके बाद बालुका राशि की चौड़ी पट्टी और उसके आगे आती जाती समंदर की लहरें। ये सब कुछ मिलकर कारबाइन कोव के माहौल को रुमानी बनाती हैं। यहां जब शाम को धीरे धीरे सूरज समंदर के आगोश में समाने लगता है तो यह नजारा बड़ा ही सुंदर लगता है। ऐसा लगता है जैसे समंदर सूरज को निगलता जा रहा हो।
कारबाइन कोव समुद्र तट पर 1986 में एक स्तंभ का निर्माण कराया गया है। हालांकि यह स्तंभ है लेकिन इसका नाम रखा गया है कारबाइन कोव समुद्री दीवार।

बंगाली बाबू का चना जोर गरम - तो बहुत हो गया घूमना फिर अब कुछ खाना पीना हो जाए। कारबाइन कोव तट पर मिल गए हैं चना जोर गरम वाले। ये बंगाली बाबू हैं नाम है शिवदास। हमने उनसे 40 रुपये का चना जोर गरम बनवाया। फरही, चना, नमक, प्याज, मिर्च, खीरा, टमाटर, मूली, मसाले, सेव दालमोट, सरसों तेल आदि मिलाकर उन्होंने बड़ा ही सुस्वादु चना जोर गरम बनाया। अनादि को भी इनका चना जोर गरम खूब पसंद आया। 
यह एक सेहतमंद खाद्य पदार्थ है जिसे आप कहीं भी खा सकते हैं। हमने गंगटोक जाने के रास्ते में भी खाया था चना जोर गरम। वैसे तो आपने चना जोर गरम जगह जगह खाए होंगे, पर हर जगह का स्वाद भी अलग अलग होता है। पर ये चना जोर गरम बंगाल में खूब प्रसिद्ध है। तो शिवदास भी बंगाली मानुस हैं। पर वे पिछले दो दशक से पोर्ट ब्लेयर में ही हैं। जब यहां आए तो पहले कई जगह मजदूरी का काम किया। पर इन कामों में मन नहीं रमा। बाद में उन्होंने अपना स्टार्ट अप शुरू किया। मतलब चना जोर गरम बेचने का काम। 

धीरे-धीरे ये काम चल पड़ा। अब वे इस काम में रम गए हैं। पोर्ट ब्लेयर आने वाले सैलानी और स्थानीय लोग भी चना जोर गरम खाते हैं। बताते हैं इसमें जीने खाने पर कमाई हो जाती है। पोर्ट ब्लेयर के बाहरी इलाके में किराये पर रहने के लिए कमरा ले लिया है। बंगाल की तुलना में यहां पर रहने में उन्हें ज्यादा आनंद आता है। पर उनका बंगाल से मोह कम नहीं हुआ है। वे साल में एक बार अपने घर चले जाते हैं। हालांकि आना जाना महंगा है। वे पानी के जहाज से जाते हैं। बंक क्लास में बैठ कर। तो चना जोर गरम वाले भाई की मेहनत को सलाम। आगे चलते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-        ( PORT BLAIR, CHANA JOR GARAM, CARBYNS COVE )