Saturday, August 15, 2020

दादा जी के साथ भोज खाने का आनंद


घर में भोजन तो आप रोज करते हैं, पर भोज में पांत में बैठकर खाने का आनंद कुछ और ही होता है। दही बड़े, पूड़ियां, पुलाव, मिठाई और भी बहुत कुछ। बचपन में जब मैंने समाज को समझना शुरू किया तभी से मुझे भोज में खाने में बड़ा आनंद आता था। धुंधली सी याद आती है, गांव में सरिता फुआ की शादी हुई थी। पहली बार मैंने गांव में एंबेस्डर कार आती देखी। उसमें दुल्हन बनी फुआ चलीं गईं। पर उनकी शादी का भोज याद रहा।

मुझे जब भी पता चलता की आसपास के गांव में कहीं भोज है। उसमें दादा जी जा रहे हैं, तो जाने के लिए मन मचल उठता। मैं दादा जी को कहता मैं भी चलूंगा आपके साथ। चाहे गांव कितनी दूर क्यों न हों। एक बार अपने टोला में एक चाचा के तिलक के भोज में मेरी इच्छा और दही बड़ा लेने की थी। पर दही बड़ा बांटने वाले मेरे आवाज लगाने के बाद भी आगे बढ़ गया। मैं पांत से उठकर दौड़ा और उसे रोका। मेरे इस दही बड़ा प्रेम का गांव के लोग लंबे समय याद करके मजाक उड़ाते रहे।

मैं कोई चार पांच साल का रहा होउंगा। दादाजी तुर्की गांव में एक भोज में जा रहे थे। मैंने कहा मैं भी चलूंगा। तुर्की मेरे गांव से पैदल पांच किलोमीटर का रास्ता। मेरे दादा जी मुझे ले नहीं जाना चाहते थे। पर मैं जिद पर अड़ गया। दादा जी की उंगली पकड़े खेतों से होते हुए पैदल पैदल हमलोग चल पड़े तुर्की गांव की ओर। ये खेतों वाला रास्ता थोड़ा नजदीक पड़ता था। रास्ते में इस्माइलपुर के सीवान में एक खेतों के बीच एक छोटी सी कुटिया नजर आई। दादा जी वहां रुके। कुटिया में एक साधु बाबा रहते थे। वे दादा जी के दोस्त थे। उन्होंने हमें जल पिलाया। फिर हम आगे चल पड़े।

दोपहर होते होते हम तुर्की पहुंच गए। गांव के लोगों ने इसका नया नाम रखा था सुंदरबाग। सचमुच सुंदर था तुर्की। बचपन में मेरे सपनों के गांव सरीखा। दोपहर का भोज खाने के बाद। गांव में बच्चों के साथ हमने खूब धमा-चौकड़ी की। पर इसी बीच एक बस आई।
मेरे दादाजी उस बस में जा बैठे। मैंने पूछा कहां, वे बोले बारात जा रहा हूं। परसों लौटूंगा। तब तुम यहीं रहो। बुधन चाचा के घर। बारात दूर जा रही है इसलिए तुम्हें बारात में नहीं ले जाउंगा। बारात जा रही है सासाराम के पास उचितपुर गांव। तुर्की गांव के बच्चों के साथ खेलने में मेरा मन लग गया था। इसलिए मैंने बारात जाने की जिद नहीं की।

दिन तो खेलते कूदते गुजर गया। शाम गहराई तो मुझे भूख लग गई। जिस घर में मैं आया था, उसके सारे पुरुष सदस्य बारात में जा चुके थे। मैं घर के आंगन में गया। औरतें गप्प लड़ाने में व्यस्त थीं। चूल्हे पर खाना बन रहा था। पर उसे देखकर लग रहा था कि भोजन तैयार होने में देर है। उधर मेरे पेट में चूहे कूद रहे थे। मैं घूमता हुआ पड़ोस वाले घर में चला गया। वहां क्या देखता हूं मेरे पिता जी के मित्र और मौसेरे भाई, भृगनाथ मास्टर साहब बैठकर खाना खा रहे हैं।
वे मेरे घर अक्सर आते थे तो मैं उनको पहचानता था। मैं उनके पास गया और बोला मैं भी खाऊंगा। वे बोल पड़े- तुम तो बारात वाले घर में आए हो। वहां रंग बिरंगे व्यंजन बन रहे हैं। मेरे घर में तो खाने में सूखी रोटी मिलेगी। मैंने कहा, मैं वहीं खाऊंगा सूखी रोटी ही सही। उनके बगल में मेरी थाली लग गई। खाने के बाद में मास्टर साहब के साथ ही उनके जाकर दलान में सो गया।

अगले दिन सुबह से शाम तक सुंदरबाग के खेत खलिहानों में बच्चों के साथ खेलता रहा। बुधन चाचा के मिट्टी के बने दो मंजिला घर के पीछे एक सुंदर सा तालाब था। तालाब के चारों तरफ कई किस्म के फूल खिले थे। इनमें वैजयंती का पौधा भी था। उसमें भी फूल खिले थे। अब वह तालाब नहीं रहा, पर उस हरे भरे तालाब का तस्वीर मेरे मानस पटल पर आज भी अंकित है।


इस तुर्की गांव में हमारी एक फुआ रहती थीं। पंचरतना फुआ। वे बड़े स्नेह से बातें करतीं। इसी तुर्की गांव में रिश्ते में मेरे दादा लगने वाले तीन लोग ऐसे थे जो बुढ़ापे में साधु बन गए थे। साधु शालिकदास, साधु दुर्गानाथ और साधु रामनाथ। इन तीनों साधुओं के सानिध्य में बैठकर उन्हें सुनना काफी अच्छा लगता। वे लोग रामकथा सुनाते थे। अपने घूमंतु जीवन का वृतांत भी सुनाते थे। इसमें एक साथ बाबा कभी बिहार पुलिस में हुआ करते थे। तो कभी कभी उनका पुलिस जीवन याद आ जाता था। पर रिटायर होने के बाद उन्होंने साधु बनना पसंद किया। ये तीनों साधु बाबा लोग अपने गांव में अपने पुश्तैनी घर से अलग रहते थे। अपने कमंडल में पानी पीते। सधुकरी भाषा में बातें करते। एक दो लोग इनमें चिलम भी पीते थे।  

तीसरे दिन सुबह-सुबह बारात की बस लौट आई। उस बस में मेरे दादाजी भी लौट आए। थोड़ी देर बाद मैं दादा जी की उंगली पकड़े वापस लौट चला अपने गांव की ओर।
-         --- विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com 
(( SOHWALIA DAYS, ROHTAS, BIHAR, BHOJ AND BARAT ) 

Thursday, August 13, 2020

कल्हुआड़ी में गर्म गुड़, राब और सिरका

आजकल हमारे गांव में गन्ने की खेती नहीं होती। पर हमारे बचपन में गन्ना लगाया जाता था। गांव के पास डीह में ही। हमारे खेतों मे भी हर साल कई कट्ठे में गन्ना जरूर लगाया जाता था। पर हमारे यहां से गन्ना चीनी मिलों में नहीं जाता था। ये गन्ना गुड़ बनाने के लिए लगाया जाता था।

जब पहली बार गन्ना बीज से लगाया जाता तो उसे नवधा कहते थे। बाद में पिछले साल के गन्ने से काटकर गन्ना लगाते तो उसे जरी कहते थे। जब गन्ना तैयार हो जाए तो खेत में जाकर गन्ना तोड़कर लाना और दिन दुपहरिया बैठ कर दांतो से छिल छिलकर गन्ना चूसना ये बचपन का प्रिय शगल था। जब गन्ना तैयार हो जाता तो उसे काटकर कल्हुआड़ी में लाया जाता जहां उससे गुड़ बनता था। हमारे गांव में एक सांझी कल्हुआडी हुआ करती थी। उसमें बारी बारी से हर घर के लोग गुड़ बनाते थे।

पहले बैलों को नाध कर गन्ने को पेरकर उससे रस निकाला जाता। इसमें हमारी भूमिका बैलों के पीछे पीछे चलकर उन्हें हांकने की होती या फिर मशीन के पास बैठकर उसमे गन्ना लगाने की। हमें दोनों काम में मजा आता। पर हमें इंतजार रहता है कड़ाह में गन्ने का रस डाल देने के बाद उसके पकने का। कड़ाह में उबलते रस के साथ हम कई प्रयोग करते थे।

कई बार खेत से ताजे आल निकालकर उसमे सूई से कई छेद करने के बाद आलू को रस्सी से बांध कर कड़ाह में छोड़ देते। रस से गुड़ तैयार होने में कई घंटे लगते हैं। इस दौरान आलू पक जाता था और उसमे गुड़ की मिठास अंदर तक चली जाती थी। ये मीठा आलू खाने में खूब मजा आता। जब गुड़ बिल्कुल तैयार हो जाता था, तब हम भी तैयार रहते थे। गर्मा गर्म गुड़ खाने के लिए। उसकी सोंधी खुशूब और स्वाद का तो कहना ही क्या। महंगी मिठाइयों में भी वह मजा कहां है जो गर्मा गर्म गुड़ खाने में है। कभी आपको मौका मिले तो किसी कल्हुआड़ी में खाकर देखिएगा ना।

राब और रोटी खाना - मेरे दादा जी गुड़ बनने की प्रक्रिया में राब निकालते थे। दरअसल गुड़ जब बनने की प्रक्रिया में रहता था तभी उसके ठोस बनने से पहले जेली अवस्था में निकाल लिया जाता था। यह जेली अवस्था का गुड़ ही राब कहलता है भोजपुरी में। इसे किसी मिट्टी के घडे में रखा जाता था। मुझे इस राब के साथ रोटी खाना खूब पसंद था। जिस दिन सब्जी पसंद की नहीं बनी हो मैं राब और रोटी खाने की मांग करता था।

गन्ने का सिरका - दादा जी गुड़ से सिरका बनाकर भी बोतल में भर कर रखते थे। ये सिरका कई तरह के दवाओं में काम आता था। ये सिरका बनता कैसे है। गन्ने को रस को किसी घड़े में भरकर रख दिया जाता था। उसके मुंह पर कपड़ा बांध दिया जाता था। इस घड़े को तकरीबन एक महीने तक रोज धूप में रखा जाता है। इस प्रक्रिया में सिरका तैयार होता है। इसे छानकर बोतल में भरकर रख लिया जाता है। आपको पता है कि गन्ने का सिरका रक्त वसा को नियंत्रित करता है। वहीं, वजन घटाने और बढ़े हुए लिवर को भी घटाने में काफी कारगर है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( SOHWALIA DAYS, SUGERCANE, SIRKA ) 


Tuesday, August 11, 2020

हथिया हथिया शोर कइले, गदहो ना ले अइले रे...

हथिया हथिया शोर कइले, गदहो ना ले अइले रे,
तोरा बहिन के सोटा मारो..गांव के नाम हसवले रे...
बकरी के रोड़िया मिठइया ले अइले रे, 
मार समधी भड़ुवा...नउवा हसवले रे.... 
ये बानगी है भोजपुरी इलाके में बारात दरवाजे पर आने शादी में दिए जाने वाले गारी (गाली) की...
हमारे गांव में जब किसी घर में शादी हो तो कई दिन पहले से माहौल बनने लगता है। मडवा छाने की रस्म के साथ ही। शादी में हर रीति रिवाज के साथ जुड़े होते हैं। उसके गीत। माडो छवाई के कई गीत होते हैं... 
हरे हरे बाबा बंसवा कटइह,
उंचे-उंचे मडवा छवईह हो...
और  
चारो बंसवा गड़िह बाबा चारो कोनवा,
एगो बंसवा गड़िह बाबा बेदिया के बीचवा...
शादी के पहले मटकोर की रस्म होती है। इसमें महिलाएं झुंड में पास के खेत में मिट्टी कोड़ने जाती हैं। ये रस्म बिहार के लगभग हर इलाक में होती हैं। इस मटकोर के भी कई गीत हैं...
कहंवा के पीयर माटी...कहंवा के कुदार हो..
कहंवा के सात सुहागिन...माटी कोड़े जास हो... 

शादी के पहले घर में होती ही इमली घोटाने की रस्म। इसमें मामा की भूमिका होती है। लड़की हो या लड़का दोनों के लिए इमली घोटाने की रस्म होती है। हालांकि इसमें इमली का इस्तेमाल नहीं होता। आम के पल्लव को पांच बार कन्या या वर की मां काटती है। इसका भी गीत होता है-
मामा हाली हाली, मामा हाली  हाली
इमली घोटाव हो मामा हाली हाली....

लड़के के घर में शादी से पहले कन्या पक्ष की ओर से तिलक आता है। इस तिलक के भी दर्जनों गीत हैं... 
तिलक चढ़ावे तिलकहरू, तिलक काहे थोड़ आईल हो...
मोरे बाबू पढ़ल पंडितवा तिलक काहे थोड़ आईल हो...



तिलक का एक और गीत ....
उठ ए राजा बबुआ हो जा तैयार हो... 
दुअरे तिलकरु अइलें, चूमें लिलार हो...
जब बारात दरवाजे पर आती है तो दुल्हा परीक्षन के समय के भी गीत होते हैं। उसके बाद गहने चढाने की रस्म के समय भसुर को भी खूब मीठी गालियां सुनने को मिलती हैं... 
अइसन सुनर धिया बकचोन्हर मिलल भसुर,
बकलोल मिलल भसुर...
गैया असन धिया के खेलाड़ मिलन भसुर...

सुबह बेटी विदाई के गीत को सुनकर सबकी आंखों में आंसू होते हैं। शादी के चार दिन बाद होने वाले चउठारी के भी गीत होते हैं। हर गीत में बाबा,चाचा, भाई के नाम लिए जाते हैं।

छुटपन में शादियों में शामिल होने का अपना ही आनंद था। चाहे गांव में शादी हो या फिर बारात जाना हो। गांव में शादी होती तो कई दिन पहले से घर में तैयारी शुरू हो जाती। हमारे यहां माडो गाड़ने की रश्म होती है। इसमें हरे बांस से आंगन में माडो बनाया जाता है। दूर से ही दिखाई दे जाता है कि इस घर में किसी कन्या का विवाह हो रहा है।


शादियों की तैयारी शुरू होती है घर में अड़ोस पड़ोस में रौनक छा जाती थी। कुछ दिन पहले से ही मेहमानों के आने सिलसिला शुरू हो जाता था। गांव में कुछ रिश्तेदारी नातेदारी के नए बच्चे आ जाते थे। उनके साथ गलियों में खेलने का मौका मिलता था। जिस घर में शादी होने वाली है उसके आंगन का तो कहना ही क्या। तरह तरह के पकवान बनाने की तैयारी पहले से ही शुरू हो जाती थी। बड़ी सी हांडी में दही बड़े बन रहे हैं। तो हलवाई मोतीचूर के लड्डू तैयार कर रहे है। खाजा तैयार करके झपोली में सजाए जा रहे हैं। इन शादियों के दौरान हमें पढ़ाई लिखाई करने से भी थोड़ी छूट मिल जाती थी। हम बच्चों को भला इससे क्या मतलब कि शादी की तैयारी में घर के मुखिया को कितने पापड़ बेलने पड़ रह हैं। इस शादी में कितना दहेज दिया गया है। वह रकम कितनी मुश्किल से जुटाई गई होगी। तो हमारे छुटपन में गांव में हमारी कई फुआ लगने वाली कन्याओं की शादी हो रही थी। शुभंती फुआ की शादी, तो बिमला फुआ की शादी। हर शादी में हमें भोज खाने को मिल रहा था।

पर सरिता फुआ की शादी खास थी। सरिता फुआ वैसे तो गांव में नहीं रहती थीं। उनके पिता जी वायु सेना में पदस्थापित थे। कानपुर में पोस्टिंग थी। पर उनकी शादी के लिए सारा परिवार गांव पहुंचा था। कोई सन 1976-77 का साल रहा होगा। उनके विशाल घर में शादी की तैयारियां चल रही थी। पूरे गांव में रौनक थी। तब मैं बहुत छोटा था। मुझे उस शादी की बड़ी धुंधली सी याद है। बारात सोन नदी के किनारे अर्जुन बीघा गांव से आई थी। पूरी शादी के बीच बस इतना मुझे याद है कि एक सफेद एंबेस्डर कार आई थी। उसमें शादी के बाद सरिता फुआ चली गईं। बस उनकी विदाई का दृश्य स्मृतियों में है। उसके बाद मेरी सरिता फुआ से सभी मुलाकात नहीं हुई, कभी उन्हें देखा नहीं।

इस बात के कई दशक गुजर गए। पर अचानक साल 2020 में डेहरी ओनसोन से संचालित होने वाली एक वेबसाइट सोनमाटी डाट काम की एक खबर पर मेरी नजर गई। उसमें डॉक्टर सरिता सिंह के तीन दशक से ज्यादा का शिक्षिका की नौकरी से रिटायर होने की खबर प्रकाशित थी। तो सरिता फुआ ने कानपुर में अंग्रेजी साहित्य से 1977 में बीए किया था। वे 1980 से दरिहट रोहतास के रामप्यारी बालिका उच्च विद्यालय में बतौर अंग्रेजी शिक्षिका पढ़ाने लगी थीं। 

इसी दौरान उन्होंने रांची विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में एमए किया। इसके बाद उन्होंने 1999 में वीर कुंअर सिंह विश्वविद्यालय से बाल श्रम की समस्या पर पीएचडी भी किया। अब वे डॉक्टर हो गईं। साल 2017 में दरिहट के उसी स्कूल से लंबी नौकरी के बाद रिटायर हो गईं। उनके पति अवधेश कुमार सिंह जिला बीज निरीक्षक, छपरा में नौकरी करते हुए रिटायर हुए।

सोनमाटी डॉट काम के सौजन्य से ही मुझे सरिता फुआ का नंबर मिला। उनसे बात हुई। गांव की मिट्टी से जुड़ा हुई रिश्ता भला कभी विस्मृत होता है। उन्हें भी मेरी याद आ गई। उनकी बातों में स्नेह था। प्रसन्नता के सुर थे। और हमने मिलकर अपने बचपन के गांव को खूब याद किया। सोनमाटी को धन्यवाद।

-       ---  विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
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Sunday, August 9, 2020

ठग लिया लड़का हमारा....जी समधी बेइमान...


उनका असली नाम वीरेंद्र था, पर हमलोग उन्हें बीलर चाचा कहते थे। आते जाते कई बार उन्हें चिढ़ाते भी थे। बीलरा बेराम बा, हमरा कौन काम बा। लेकिन यह सब सुनकर वे नाराज नहीं होते थे। उनका घर मेरे गांव से उत्तर था। गांव के सबसे किनारे। वे आते जाते गलियों में मिल जाते थे। हम उनके साथ खूब खेलते थे। मुझे याद आता है कि उनके बड़े भाई यानी राजेंद्र चाचा की शादी तय हो गई। शादी से पहले हमलोगों के गांव में तिलक आता है। तिलक क्या उसमें भी पूरी बारात ही होती है। क्षमता के अनुसार 20 से सौ लोग तक तिलक चढ़ाने आते हैं। इस तिलक में भी भोज होता है।

तो राजेंद्र चाचा के तिलक में भी लाउडस्पीकर लग गया था और उसमें गाने बज रहे थे। हमारे गांव और आसपास के गांव में शादी विवाह मे लाउडस्पीकर बजाने का काम कानडिहरा के डोमा साह के सबसे छोटे भाई संतु साह करते थे। मेरी उनसे अच्छी जान पहचान थी। वे बड़े मजाकिया स्वभाव के हैं। शादियों में तब एलपी रिकार्ड बजते थे। इन रिकार्ड पर तब बालेश्वर के गीत बजा करते थे। हमका जानत रहन बाबा कि बीबी बीए पास बा....और ऐसे ही गीत।

तो चाचा के तिलक में लाउडस्पीकर में गांव की औरते गारी गा रही थीं। वह शादी ही क्या जहां गांव की औरतें समधी को गारी (गाली) न दें। ये हमारी भोजपुरी की मीठी परंपरा का हिस्सा है। कुछ ऐसी होती थी गालियां  - ठग लिया लड़का हमारा....जी समधी बेइमान...जी समधी बेइमान।

तिलक के बाद शादी की घड़ी निकट आ गई। हम सबको बारात जाना था। इस बार की बारात में ट्रेक्टर से जाने का मौका मिला। बारात मे पिताजी भी गए और मैं भी। तुर्की गांव में बारात जा रही है। ये गांव कुदरा से दक्षिण चेनारी से भी आगे कैमूर की पहाड़ी की तलहटी में है। ट्रैक्टर की चाल ज्यादा तेज नहीं होती, इसलिए बारात को पहुंचने में कई घंटे लग गए। चेनारी के बाद मलाहीपुर फिर उसके आगे हम बारात वाले गांव तुर्की पहुंचे तो शाम ढल रही थी। पर इस गांव में पहुंचकर बड़ा मजा आया। पहाड़ की तलहटी में गांव का नजारा बड़ा मनोरम था। यहां बिजली पहुंच चुकी है। मैंने पहली बार बिजली से चलने वाला पंपिंग सेट देखा जो आवाज ही नहीं करता। वरना मेरे गांव में डीजल इंजन पंपिंग सेट चलता था जो तेज आवाज करता था। उसे स्टार्ट करने के लिए भी पूरी ताकत लगानी पड़ती है।

तो तुर्की गांव से बारात से हमलोग अगले दिन लौटने लगे तो चेनारी के बाजार में थोड़ी देर रुके। यहां से पिताजी एक बोरी महुआ खरीदा। यह दुधारु पशुओं को खिलाने के लिए था। इससे पशुओं का दूध बढ़ जाता है।

राजेंद्र चाचा और वीरेंद्र चाचा अयोध्या दादा के बेटे हैं। वे हमारे सबसे छोटे परदादा का परिवार है। पर इस शादी के कुछ साल बाद एक ऐसा समय आया जब अयोध्या दादा ने पूरे परिवार के साथ हमारा गांव छोड़ दिया। वे शिवसागर के पास एक नए गांव में चले गए। गांव क्यों छोड़ा। जहां तक मुझे याद आता है कि उनके घर एक बार चोरी हो गई। इससे वे दुखी हो गए। सन 1984 में जब मेरे दादा जी का निधन हुआ तो अयोध्या दादा जानकारी मिलने पर मेरे दादाजी के श्राद्ध कर्म में शामिल होने पहुंचे थे। उसके बाद हमने उन्हें नहीं देखा। सुना है कि अब वे इस दुनिया में नहीं हैं। पर हमारे प्यारे बिलर चाचा इन दिनों कहां हैं मुझे नहीं मालूम...
-         --विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com 
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Friday, August 7, 2020

मदन भैया की बारात – रोहतासगढ़ की ओर बांदू गांव में

वह साल 1991 के गरमियों के दिन थे। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हमारे सीनियर मदन दूबे की शादी होनी थी। वे मुझसे पांच साल वरिष्ठ थे। उन्होंने मुझे खास तौर पर आमंत्रित किया। कहा कि शादी में तुम्हे जरूर चलना है। तो मैं इनकार नहीं कर सका।

मदन दूबे मेरे ही गांव सोहवलिया के रहने वाले हैं। हमारा गांव सोहवलिया खुर्द है तो उनका गांव सोहवलिया कलां। वैसे दोनों गांव में सिर्फ 500 मीटर की दूरी है। सड़क के इस पार और उस पार। पहले सड़क नहीं थी वहां छवर हुआ करती थी। छवर मतलब चौड़ी सरकारी जमीन। उसी जमीन पर अब सड़क बन गई है। पर छवर थी तो वहां एक जामुन का पेड़ हुआ करता था। वहां से हमलोग जामुन तोड़कर खूब खाते थे। सड़क बन गई पर वह जामुन और उसके आसपास के कुछ पेड़ शहीद हो गए।

तो बारात जाने के लिए मैं एक दिन पहले अपने गांव पहुंच गया। लंबे समय बाद अपने पुश्तैनी घर में रहा। अगले दिन दोपहर में बस से बारात जाने वाली थी। गांव में मेरे चंदेश्वर भैया और दूसरे लोग पूछ रहे थे किस गांव बारात जा रही है। पर मुझे ये तो पता नहीं था। दूसरी महत्वपूर्ण बात। इस बारात में जाना हमारे गांव के चाचा लोगों के लिए बड़े आश्चर्य की बात थी। क्योंकि सोहवलिया कलां जिसे दूबे का सोहवलिया भी कहा जाता है ( हालांकि दूबे के सोहवलिया में दूबे जी लोगों के अलावा बनिया, हरिजन आदि लोगों भी टोला पर दूबे जी लोग बहुतायत हैं) उस गांव से हमारे टोला पर के लोगों का भोज भात का रिश्ता उन दिनों टूटा हुआ था। कारण क्या था, मुझे नहीं मालूम।

तो मैं दूबे के सोहवलिया में किसी की बारात में जा रहा हूं यह बात गांव के लोगों के गले नहीं उतर रही थी। तो दोपहर के बाद एक बस और कुछ कारों से बारात निकल पड़ी। मुझे सम्मान से बस में जगह मिली। बीएचयू से एक और हमारे सीनियर जीतेंद्र द्विवेदी भी बारात में चल रहे थे। मदन दूबे के पिताजी श्री रंगनाथ दूबे, चाचा दारोगा दूबे आदि से परिचय इसी बारात यात्रा के दौरान हुआ। बारात में कुछ बच्चे बस की छत पर भी सवार हो गए थे।
तिलौथू, अमझोर, बनजारी की ओर - पहले कुदरा फिर सासाराम, फिर डेहरी ओनसोन के बाद बस चल पड़ी डेहरी नौहट्टा मार्ग पर। रास्ते में तिलौथू आया। कभी तिलौथू छोटा सा एस्टेट (राजघराना ) हुआ करता था। इसके बाद बस चल बंजारी की ओर। डेहरी ओनसोन के आगे का ये रास्ता मेरे लिए बिल्कुल नया था। तिलौथू के बाद आया अमझोर। ये रास्ता सोन नदी के पश्चिमी किनारे के साथ साथ चल रहा है। अमझोर के बाद चितौली, करमा फिर बनजारी। बनजारी में कभी सीमेंट का कारखाना हुआ करता था। इस मार्ग पर कभी डेहरी रोहतास लाइट रेलवे भी दौड़ती थी।



रोहतासगढ़ से आगे बांदू - बनजारी के बाद हमलोग बौलिया रोड पर नवाडीह की तरफ बढ़ रहे थे। इसी इलाके में अकबरपुर के पास रोहतासगढ़ का किला भी स्थित है। हमलोग अकबरपुर से आगे बढ़ चुके हैं। ये रोहतास जिले के रोहतासगढ़ प्रखंड का इलाका है। कैमूर अलग जिला बन जान के बाद भी रोहतास बहुत बड़ा जिला है। बौलिया के पास एक ऐसी जगह आई जहां पर बस जाकर रुक गई। बताया गया कि बस यहां से आगे नहीं जाएगी। अब यहां से सबको पैदल चलना होगा। बस आगे इसलिए भी नहीं जाएगी क्योंकि आगे सड़क नहीं है।

हमें जाना हैं बांदू गांव। ये सोन नदी के किनारे का गांव है।यह नौहट्टा प्रखंड के अंतर्गत आता है। पंडित जी को लोगों का प्रसिद्ध गांव है। तो पैदल पैदल कोई चार किलोमीटर चलने के बाद हमलोग बांदू गांव में पहुंच गए। बारातियों के लिए दो बड़े बड़े तंब यान शामियाना लगे हुए थे। बांदू पहुंचते हुए शाम गहरा गई थी। तो मैंने बताया था कि बांदू गांव सोन नदी के किनारे है। यहां एक ट्राली मार्ग बना हुआ है जिससे पहाड़ से पत्थरों की ढुलाई जपला सीमेंट फैक्टरी के लिए की जाती है। बांदू के सामने सोन नदी के उस पार पलामू जिले का हैदरनगर कस्बा आता है।

रात गहराने के साथ शादी की रश्में शुरू हो गईं। बारातियों को पहले नास्ता कराया गया, फिर थोड़ी देर बाद भोज में शामिल हुए हम सारे लोग। दूबे जी के परिवार के रिश्तेदार लोग जो मुझे नहीं जानते थे सब मेरा परिचय पूछ रहे थे। सबके लिए मेरा बारात में आना सुखद रूप से आश्चर्यजनक था। बारातियों के लिए एक विशाल शामियाना लगा हुआ था।

तो बारातियों के मनोरंजन के लिए शादी में गीता रानी की नौटंकी का भी इंतजाम था। गीता रानी रोहतास जिले की उस जमाने की प्रसिद्ध नौटंकी वाली थी। गीता के साथ नाचने वाली कई और लोगों की टीम थी। देर रात तक नाच गाने की महफिल जमी रही। अगले दिन बारात का मरजाद था। मरजाद मतलब की शादी के अगले दिन भी बारात विदाई नहीं होगी। हमारे इलाके के कई शादियों में पहले मरजाद हुआ करता था। इसका मतलब की आज गई बारात कल के बजाय परसों गांव लौटेगी। यानी दो रातें लड़की वालों के घर।

आर्थिक रूप से संपन्न लोग ही मरजाद वाली बारात करते हैं। शादियां अक्सर गेहूं कट जाने के बाद गरमियों में होती हैं इसलिए लोगों के पास भी समय होता है। सुबह का नास्ता दोपहर का खाना उसके बाद रात को फिर खाना। दोपहर में फिर गीतारानी के नौटंकी की महफिल जमी। गीता रानी एक के बाद एक फरमाईश वाले भोजपुरी गीत सुनाती रही। कुछ अच्छे गीत तो कुछ द्विअर्थी गाने।

इस महफिल में कुछ ऐसे लोग भी आ बैठे थे जो न तो लड़की वाले न लड़के वाले किसी भी तरफ से आमंत्रित नहीं थे। ऐसे लोग नाच नौटंकी के बारे में सूंघ कर पहुंच जाते हैं। कई लोग तो दस-दस किलोमीटर पैदल चलकर नाच देखने पहुंच जाते हैं। ऐसे आशिकों को नौटकी टीम से ही जानकारी मिल जाती है कि अगला प्रोग्राम किस गांव में किसके दरवाजे पर है। दो दिन शादी के दौरान मदन दूबे बार बार मेरा हाल चाल पूछ रहे हैं। ठीक से खाना क्या न... कोई दिक्कत तो नहीं है। मुझे मिल रहे इस खास तवज्जो से कुछ उनके रिश्तेदारों को कौतूहल हो रहा है।

हां मदन भैया की शादी में दुल्हन घूंघट में आई। पूरी शादी में किसी ने दुल्हन का चेहरा नहीं देखा। संभवतः मदन भैया ने भी अपनी होने वाली पत्नी की तस्वीर तक पहले नहीं देखी थी। परिवार ने शादी तय कर दी और वे तैयार हो गए। कन्या पक्ष के लोग टाटानगर में रहते हैं। गांव में सिर्फ शादी करने आए हैं। परिवार पढ़ा लिखा है पर अभी भी लड़की दिखाने का रिवाज नहीं है।

अगली रात नाच देखने के बाद सब लोग शामियाना में सो गए। अचानक सुबह 4.30 बजे ही सबको जगाया जाने लगा। चलिए उठिये और चल पड़िए। मतलब तीसरे दिन कोई चाय नाश्ता नहीं मुंह अंधेरे बारात विदाई। हमलोग उजाला होते होते खेतों के उबड़ खाबड़ पैदल रास्ते से होते हुए सड़क तक पहुंच गए जहां हमारी बस खड़ी थी।

बारातियों को लेकर बस चल पड़ी। कुछ देर बाद तिलौथू बाजार में बस रुकी। यहां पर लोगों ने चाय-नास्ता किया। फिर आगे बढ़ चले। दोपहर होने से पहले हम अपने गांव सोहवलिया पहुंच चुके थे।

बांदू गांव की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि – इस गांव से एक शिलालेख मिला था। फ्रांसिस बुकानन ( 1812-13 ) ने अपने यात्रा वृतांत में बांदू शिलालेख का उल्लेख किया है। इस शिलालेख में खरवार राजा प्रताप धवल देव और रोहतासगढ़ पर शासन करने वाले अन्य राजाओं के नाम दिए गए हैं। इस शिलालेख में कुल 11 राजाओं के नाम हैं। 

पुल बनाने की मांग - झारखंड के भवनाथपुर के विधायक पूर्व मंत्री भानु प्रताप शाही ने झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास को पत्र लिखकर नौहट्टा प्रखंड के बांदू एवम पलामू जिला के हैदरनगर प्रखंड के कबरा कला गांव के बीच सोन नदी पर पुल बनाने का मांग की है। विधायक ने मुख्यमंत्री को लिखे अपने पत्र में कहा है कि आदिवासियों का प्रमुख तीर्थ स्थल ऐतिहासिक रोहतास गढ़ किला इस पुल से मात्र 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है । उन्होंने अपने पत्र में लिखा है कि कबरा कलां व बिहार के नौहट्टा प्रखंड के बांदु गांव को सोन नदी पर पुल बनाकर जोड़ देने से ऐतिहासिक स्थल रोहतास गढ़ कीला की दूरी झारखंड से 120 किलो मीटर कम हो जाएगी। उन्होंने लिखा है कि पलामू के हैदरनगर, हुसैनाबाद, उंटारी रोड, विश्रामपुर, छतरपुर, ,रमुना आदि के लोगों को बिहार के रोहतास जिला तक जाने के लिए 120 किलो मीटर दूर डेहरी ओन सोन में सोन नदी का पुल है। ( दैनिक भास्कर, 2018 )  

- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com ( BARAT, DEHRI, TILAUTHU, AMJHOR, BANJARI, ROHTAS, BAULIA, BANDU, SONE RIVER ) 

Wednesday, August 5, 2020

जब झूमती गाती बैलगाड़ी से निकली बारात

बचपन में कई बारात जाने का मौका मिला। बड़े होने पर भी कई बारात में गया। पर एक बारात का अनुभव इन सबसे अलग रहा। आप बारात रेलगाड़ी से जाते हैं, बस से जाते हैं, कार से जाते होंगे। गांव में कई बार साधनों की उपलब्धता के मुताबिक ट्रैक्टर से तो कई बार पैदल भी बारात जाना पड़ता है।

हमारे गांव के सुदामा चाचा की शादी थी। बारात ज्यादा दूर नहीं जानी थी। बस एक मील दूर पीपरा गांव में। तो तमाम बाराती पैदल ही पहुंच सकते थे। तो हुआ कि बारात में कुछ बैलगाड़ियां जाएंगी। बैलगाड़ियां इसलिए कि इसमें झपोली में खाजा और दूसरी मिठाइयां लाद कर ले जाई जाएंगी। साथ ही वापसी में दुल्हन इन्ही बैलगाड़ी में से एक में आएगी।

तो सुबह से  तैयारी शुरू हो गई। बारात जाने और भोज खाने का उत्साह तो मन में था ही। बारात में मेरी बैलगाड़ी भी जाने वाली थी। तो पहले बैलगाड़ी की सफाई की गई। उसके पहिए और हाल की धुलाई की गई। आराम से बैठने के लिए बैलगाड़ी में पुआल बिछा दिया गया। हमने दोनों बैलों पीपरैला और ददरिया को भी नहला धुला कर तैयार किया। दोनो के गले में घंटियां बांध दी गई। बैलों के सींग में सरसों तेल लगा कर चमका दिया। क्यों नहीं करते भला, बैल कोई इधर उधर जा रहे थे, बारात में जा रहे थे भाई। वे भी तो अच्छे दिखाई देने चाहिए। 
शाम को सूरज ढलने से पहले बैलगाड़ी तैयार हो गई। उसे कौन से चाचा हांक रहे थे उनका नाम तो अब याद नहीं रहा। पर मुझे और कुछ बच्चों को बैलगाड़ी में बैठकर जाने का मौका मिला। जब बैलगाड़ी पीपरा की तरफ चल पड़ी तो हमारे उत्साह का कोई ठिकाना नहीं था। बैलों के गले की घंटी के संगीत के साथ हम पीपरा गांव की ओर बढ़ रहे थे। टन..टन..टन...टना...खड़ खड़...पड़ पड़....इहो...चल हट....

हमारे दोनों बैल बड़े समझदार थे उन्हें कुछ कहना नहीं पड़ता। और पीपरैला तो अपने पुराने गांव में ही जा रहा था। वहीं से तो दादा जी उसे खरीदकर लाए थे।तो उसका उत्साह दोगुना था।

तो शाम ढलने से पहले हमलोग बारात में पहुंच गए। बगीचे में बैलों को बांध दिया गया। हमारे सोने का इंतजाम भी इसी बागीचे में खाट पर था।आम का बाग था। आम अभी कच्चे थे, पर हमारी पहुंच के करीब। तो हमने कई आम तोड़कर खाए। वैसे पीपरा गांव से हमारा एक और रिश्ता है। मेरे आसपास के कई गांवों का पोस्ट ऑफिस पीपरा सकरवार गांव ही है। कभी उस गांव को सकरवार राजपूतों ने बसाया था। इसलिए गांव का नाम ऐसा है। 

इसी गांव से डाकिया जिनका नाम हरिहर सिंह था, डाक लेकर हमारे घर आते थे। कभी वे शादी कार्ड लेकर आते तो कभी नौकरी के इंटरव्यू लेटर। कभी टेलीग्राम लेकर आते। पिता जी कई साल तक डाक से अखबार भी मंगवाया करते थे। हरिहर डाकिया हमारे जिंदगी का अभिन्न हिस्सा थे। संयोग से पीपरा पोस्ट ऑफिस के पोस्टमास्टर भी हमारे रिश्तेदार थे।
गांव की औरतें बारात के स्वागत में गीत गा रही थीं...
पूरब पछिमवा से आवे सुनर दुल्हा
जुड़ावे लगली हो सासु नयनवा 
बारात में शाम का नास्ता और रात का खाना खाने के बाद हमलोग बगीचे में पेड़ के नीचे लगे खाट पर सो गए। तब शादियां देखने में मेरी कोई रुचि नहीं थी। बारात मतलब नए गांवों में सैर और भोज।

सुबह बारात वापस चली। दुल्हन को लेकर। तो हमारी बैलगाड़ी से नई नवेली चाची आने वाली थीं। बैलगाड़ी में रंगीन साड़ियों से ओहार लगा दिया गया। हमलोग बैलगाड़ी के पीछे पीछे पैदल पैदल अपने गांव की ओर चल पड़े। कुछ बच्चे गीत गुनगुना रहे थे – डोली में के कनेया ओहार लगावे ली... जब हमलोग गांव पहुंचे तो मां, चाची, दादी सब लोग दुल्हन के स्वागत के लिए तैयार थीं। गांव में दरवाजे से दुल्हन को बड़े-बड़े परात में पांव रखवाते हुए धीरे-धीरे आंगन से होकर कमरे तक ले जाते हैं। इस दौरान बाकी औरतें हौले हौले स्वर में गीत गाती रहती हैं। 

-         ----विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com 
-          ( SOHWALIA DAYS, BARAT, PIPRA SAKARWAR, BAILGADI )

Monday, August 3, 2020

आन्ही बूनी आवेला चिरैया ढोल बजावे ले..


बचपन के गांव में सारे मौसम बदलते देखे पर बारिश के मौसम में हमारी परेशानी काफी बढ़ जाती थी। वह सबसे मुश्किल दिन होते थे। गांव में हमारा घर का बड़ा हिस्सा मिट्टी का था और उसकी छत खपरैल थी। तो लगातार बारिश होने पर घर में जगह जगह पानी टपकने लगता था। हालांकि बारिश से हर साल पहले दादा जी खपड़ों को छाने का काम करवाते थे। पर यह कामयाब नहीं होता था। कभी कभी तो तेज बारिश में घर के बरामदे में बैठना या रात को सोना भी मुश्किल होने लगता था। मतलब गांव के वो लोग जिनका घर पक्का नहीं है बरसात बहुत सताती थी।




मेरा घर गांव के बीच में था और दलान गांव  बाहर। दादा जी दलान पर रहते थे। बारिश के दिनों में गांव की गली में कीचड़ हो जाता था। घर से जाने के लिए घुटने तक कीचड़ में घुसकर जाना पड़ता था। अब तो गांव की गली पक्की हो गई है तो कीचड़ नहीं होता। पर मैं बचपन में उस कीचड़ से होकर भी दिन भर में तीन बार घर से दलान तक आता जाता। क्या मुश्किल दिन थे वे भी। कभी कभी तो ऐसी बारिश होती कि कई दिनो तक धूप के दर्शन भी नहीं होते। पर इस बारिश में खेती बाड़ी का काम चलता रहता। मेरे जिम्मे गाय चराने का काम होता। बारिश में हम खाद के बोरे में आने वाले प्लास्टिक को काटकर जुगाड़ से रेनकोट बना लेते। इसी रेनकोट को को पहनकर मूसलाधार बारिश में भी गाय चराते रहते।

पर जब तक बारिश के दिन नहीं आते हमलोग बारिश का इंतजार भी करते। क्यों न हो भला बिना बारिश के धान की खेती कैसी होगी। जब पहली बारिश होती है तो हम नाच उठते। नाचते हुए ये गीत गाते -  आन्ही बूनी आवेला चिरैया ढोल बजावे ले..
और जब घनघोर बारिश होने लगती तो कुछ इस तरह का गीत गाते थे हमलोग - हरे रामा बरसे ला रिमझिम रस बुनिया...भीजेला पैजनीया हो रामा...

बारिश के दिनों में सबसे ज्यादा दिक्कत खाने पीने को लेकर होती। हरी सब्जियों की गांव में कमी हो जाती थी। बाजार से सब्जी लाने का विकल्प बचता नहीं था। तो बारिश के दिनों के लिए खास तैयारी की जाती। इसके लिए मेरी मां आलू और गोभी का सुखौंता बनाकर रखती थीं। ये आलू को उबालकर उसे काटकर धूप में कई दिन तक सुखा लिया जाता। इसी तरह गोभी के फूल को भी। ये सुखौंता बारिश के दिनों में बड़ा काम आता था। इसके साथ आलू की बड़ियां भी काम आती थीं बारिश में। मुझे सुखौंता का सब्जी खाने में बहुत सुस्वादु लगती थी।

शहर से कट जाता था गांव - मेरे गांव से दक्षिण में कुदरा नदी बहती है और उत्तर में परसथुआ नदी। दोनों गांव से चार से छह किलोमीटर दूर हैं। पर बारिश में ये नदियां शबाब पर आ जाती हैं। इन दोनों ही नदियों का सड़क पुल काफी कम ऊंचाई वाला था तो बारिश में ये पुल डूब जाते थे। इस तरह साल के तीन महीने हमलोग शहर से कट जाते थे। अगर बहुत मजबूरी हो तो इन नदियों के पानी में उतरकर जाना पड़ता जो बहुत ही खतरनाक कार्य था।

बारिश के दिनों में गांव में खेत खलिहान में बरसाती कीड़े निकलते हैं। सबसे समान्य कीड़ा चारा होता था। इसके अलावा भुइला अगर वह पांव पर चल देती तो ढेर सारे चकत्ते बन जाते थे। खूब जलन भी होती थी। इसी बारिश में खेतों में जाना पड़ता था गाय लेकर। इस दौरान रास्ते में सांप, कनगोजर आदि भी मिलते थे। पर हमारे हाथ में एक छोटी सी लाठी होती थी जो बहुत काम आती थी। इतना ही नहीं रात को लालटेन जलाने पर ढेर सारे कीट पतंगे भी आते थे। पर इन सबके बीच रात को जुगून की गुंजार बहुत प्यारी लगती थी। हमारे दादा उन्हें भगजोगनी कहते थे। वे एक साथ झुंड में चलते तो संगीत भी निकालते और रोशनी भी करते।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-    ( RAIN, SOHWALIA DAYS )

Saturday, August 1, 2020

धूप भरी छत पे बरस गया पानी...


बहुत दिनों बाद मूसलाधार बारिश में भींगने का संयोग बन गया। दिलशाद गार्डन में पिता पुत्र कुछ जरूरी सामान लेने गए इस बीच बादल घिर आए। इसके बाद तो बरसो राम धड़ाके से...खूब बारिश हुई साथ में तेज हवाएं भी। जब देर तक बरसता रहा तो इसी बारिश में भींगते हुए हम घर लौटे। दिल्ली वालों को बारिश बड़े नसीब से मिल पाती है। पर ज्यादा बारिश होती है तो दिल्ली वाले परेशान से हो जाते हैं। क्योंकि उनके पास बारिश के पानी को रोक पाने का कोई तरीका नहीं है। वैसे साल के बाकी दिनों दिल्ली वाले पानी के लिए तरसते भी हैं।
तो दिल्ली में ऐसी बरसात हो रही थी, ऐसी बरसात हो रही थी मानो ..
किसने भींगे बालो से झटका पानी
झूम के आई घटा टूट के बरसा पानी

इस पानी के बीच मुझे अपना सुहाना बचपन, हंसता बचपन, मुस्कुरात बचपन याद आने लगा। तब तो हम बारिश का इंतजार करते थे। आसमान में बादल घुमड़ते देखकर कर खुशी होने लगती थी। हम बादलों का रंग देखकर बता देते थे कितनी तेज बारिश होने वाली है। जब देर तक बारिश नहीं आती तो हम बारिश को बुलाते थे अपने अंदाज में। 
एक मुट्ठी सरसों...बरखा रानी जमके बरसो। 
और बरखा रानी बरस जाती थीं। कभी कभी तो बरखा रानी इतना बरसती थीं कि शाम को बैठने की जगह नसीब नहीं हो पाती थी। तो रात को सोने के लिए मुफीद जगह नहीं मिल पाती थी। 
मानसून में गाजियाबाद के एनएच 9 से बरसता पानी। 

गांव में हमारा मिट्टी का घर था। उसकी छत खपरैल थी। बारिश के दिनों में जब झड़ी लग जाती थी तो हमारी खपरैल छत जगह जगह चूने लगती थी। एक ऐसी बारिश की शाम याद आती है। आंगन पानी से भर चुका था। बरामदे में जगह जगह पानी था। कोई साबूत जगह नहीं बची थी जहां बैठकर मैं रात का खाना खा सकूं। तो मेरी रिश्ते की दादी ने बड़ी मुश्किल से मेरे लिए बैठने की जगह बना सकीं। यह बारिश कुछ ऐसी थी , चंदन दास की गाई गजल की तरह –
धूप भरी छत पर बरस गया पानी... 
आंगन में आके अंगीठी बुझा के 
नागन सा लहरा के डंस गया पानी।

पर इस पानी से हमें कोई शिकायत नहीं थी। क्योंकि हम जानते थे जितने ज्यादा बादल बरसेंगे हमारे खेतों को उतना ही पानी मिलेगा। और धान की फसल भी उतनी ही अच्छी होगी। एक बचपन की  बारिश याद आती है। इतना बरसा इतना बरसा कि नौ दिन तक सूरज के दर्शन ही नहीं हुए। कभी पूरब से बादल आते तो कभी उत्तर से.... तड़ तड़ तड़ तड़....घड़ घड़ घड़ घड़ और टिप टिप बरसा पानी। 
और हम इस बारिश में खूब भींगते। घंटों बारिश के पानी में नहाते रहते थे। जब दादा जी या मां की फटकार लगती तब घर में आते। 

वह भी क्या बारिश के दिन थे ना। कई सालों बाद 1991 में कांवर लेकर जब बोल बम की पदयात्रा पर गया तो बारिश में कई घंटे भींगता रहा। इसके बाद एक बार और कर्नाटक के कुर्ग में बारिश में लगातार दो दिन भींगता रहा। तब एक बार फिर गांव की वह नौ दिन की बरसात याद आ गई। दिल्ली के लोगों को भी बारिश के पानी की अहमियत समझनी चाहिए। इसे संजो कर रखने का उपाय करना चाहिए।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com 
(DELHI, RAIN, WATER ) 

Thursday, July 30, 2020

महरौली - जमाली कमाली मसजिद और अनूठा जहाज महल

महरौली में राजाओं का बाउली के आसपास कई और ऐतिहासिक इमारते हैं। ये इलाका महरौली आर्केलोजिकल पार्क कहलता है। इस क्षेत्र में कुछ अनजान मकबरे भी हैं। इस क्षेत्र में टहलने के लिए सुंदर कच्चा रास्ता बना हुआ है। यहां पहुंचकर आपको लगता है मानो दिल्ली के बाहर किसी ग्रामीण क्षेत्र में पहुंच गए हों। इस इलाके में आजकल युवा टिककॉक वीडियो बनाते हुए नजर आते हैं।

वन क्षेत्र में पैदल चलते हुए आगे चलने पर आपको मैटकॉफ फॉली, बोट हाउस, कुली खां का मकबरा देखने को मिलता है। इसके आगे चलने पर आप जमाली कमाली मसजिद, शाहिद खान का मकबरा और अन्य मुगलकालीन मकबरे देख सकते हैं। महरौली का आर्किलोजिकल पार्क कुल 42 एकड़ में फैला हुआ है। इसमें पैदल घूमने के लिए आपके पास अच्छा खासा वक्त चाहिए।

जमाली कमाली मसजिद - जमाली कमाली मस्जिद और उसके साथ लगती मजार का संबंध कवि और संत शेख फजलुल्लाह से है। वे सिकंदर लोदी और हुमायूं के समकालीन थे। इस मसजिद का निर्माण 1528-29 में आरंभ हुआ था। संत की कब्र इसी मसजिद में बनी है। संत को जमाली नाम से भी जानते हैं। साथ ही कमाली की भी कब्र है। पर कमाली कौन थे उनके बारे में ठीक ठीक नहीं पता। आइए अब आगे चलते हैं...


कुछ ऐसा है महरौली का जहाज महल - महरौली के मुख्य बाजार में स्थित है जहाज महल। एक जहाज महल का नाम आपने मांडू मध्य प्रदेश में सुना होगा। पर एक जहाज महल दिल्ली में भी है। महरौली के इस जहाज महल का निर्माण हौज ए शम्शी में करावाया गया है। यह एक अवकाशकालीन गृह हुआ करता था। पर आजकल इसके आसपास घना बाजार है।


इस महल को दूर से देखकर लगता है मानो पानी में कोई जहाज चल रहा हो। जहाज महल के गुंबद बड़े खूबसूरत हैं। इसका निर्माण लोदी वंश के काल में 1452-1526 के बीच करवाया गया था। यह अवकाश में निवास करने के लिए एक धर्मशाला हुआ करती थी। 
जहाज महल की कलात्मकता देखने लायक है। खासकर इसके गुंबद बड़े नक्काशीदार और सुंदर बने हैं। इसे अलग अलग रंगों से रंगा भी गया था। कभी जहाज महल के आसपास हरित क्षेत्र था। पर अब जहाज महल के आसपास महरौली का घना बाजार है। पास में ही महरौली की सब्जी मंडी है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-        MAHRAULI, JAMALI KAMALI MASJID, RAJAON KI BAWLI, GANDHAK KI BAWLI, JAHAJ MAHAL)