Thursday, December 31, 2020

दुनिया गोल है...गोल डाकखाना और गोल मार्केट



दिल्ली में दो गोल इमारते हैं। गोल डाक खाना और गोल मार्केट। तो पहले बात गोल डाकखाना की। यह नई दिल्ली का जीपीओ यानी जनरल पोस्ट ऑफिस है। इसका पिनकोड है – 110001 इस गोल डाकखाना से ही आसपास के इलाकों की पहचान है। पर यह बना हुआ है एक चौराहे के बीचों बीचों। यानी यह एक सर्किल है या राउंड एबाउट का केंद्र विंदू है। यहां पर कुल पांच रास्ते आकर मिलते हैं। बाबा खड़ग सिंह मार्ग से होते हुए गुरुद्वारा बंग्लासाहिब से आगे बढ़कर आप गोलडाकखाना वाले चौराहे पर पहुंचते हैं। यहां पंत मार्ग, काली बाड़ी मार्ग जैसी सड़के भी मिलती हैं।





पर आपको पता है मजेदार बात। इस गोल इमारत का निर्माण 1932 में हुआ था तब यहां पर घोड़े बांधे जाते थे। मतलब ये घुड़साल हुआ करती थी। आजादी के बाद यहां पर सन 1948 में दिल्ली के मुख्य डाकघर को शिफ्ट किया गया।

यहां डाक से जुड़ी सारी सेवाएं मिलती हैं। स्टांप खरीदना, स्पीड पोस्ट, मनीआर्डर, डाकघर बचत बैंक आदि। अब यहां पर पोस्ट आफिस बैंक का एटीएम भी लग गया है। गोलडाकघर के बचत बैंक में लाखों लोगों का खाता है। इसमें बड़ी संख्या में बुजुर्ग लोग भी शामिल हैं। गोल डाकघर की इमारत को दिल्ली के संरक्षित इमारतों की सूची में शामिल किया गया है।


पर एक दिक्कत है यहां पर राउंड एबाउट होने के कारण बड़ी तेज गति से वाहन यहां से होकर गुजरते हैं। कोई रेड लाइट तो है नहीं। ऐसे में बीच में स्थित गोलडाक घर तक तेज ट्रैफिक को चीर कर पहुंचना आसान काम नहीं है। डाकघर जाने वाले लोगों के साथ ही यहां काम करने वाले स्टाफ को भी इस दिक्कत का सामना करना पड़ता है। कई बार यहां पर अंडर पास या उपरिगामी सेतु बनाने की बात उठी। पर इस पर अमल नहीं हो पाया। ये मामला संसद में भी उठ चुका है।



चलिए गोल मार्केट - गोल डाकखाना से काली बाड़ी मार्ग में चलकर तुरंत दाहिनी तरफ भाई वीर सिंह मार्ग पर मुड़े। थोड़ा आगे चलते हुए आप पहुंच जाएंगे गोल मार्केट। गोल मार्केट भी ब्रिटिशकालीन मार्केट है। अंग्रेजों ने इसे चिकेन मटन के बाजार के तौर पर बनाया था। तब ब्रिटिश अधिकारी यहां तांगे पर बैठकर मटन खरीदने आते थे।

दिल्ली के डिजाइनर एडविन ल्यूटियन ने गोल मार्केट को भी डिजाइन किया था। यह बाजार 1921 में बना था। माना जाता है कि यह बाजार नई दिल्ली के केंद्र विंदु पर बना है।



पेशवा रोड, शहीद भगत सिंह रोड, रामकृष्ण आश्रम रोड और भाई वीर सिंह रोड इस गोल मार्केट पर आकर मिलते हैं। वास्तव में गोल मार्केट का डिजाइन अष्टकोणीय है। कई दशक तक गोल मार्केट का बाजार लोगों के बीच काफी लोकप्रिय रहा। कनॉट प्लेस के पास स्थित इस मध्यमवर्गीय बाजार को लेकर कई पीढ़ी के लोगों की ढेर सारी खट्टी मीठी स्मृतियां है। गोल मार्केट इतना लोकप्रिय नाम रहा है कि साल 2008 तक इस नाम से नई दिल्ली का विधानसभा क्षेत्र भी हुआ करता था।

अष्टकोणीय डिजाइन का है गोल मार्केट। 


2007 में खतरनाक घोषित हुआ गोल मार्केट - पर साल 2007 में नई दिल्ली नगरपालिका परिषद ने गोल मार्केट के भवन को खतरनाक घोषित कर दिया। यहां के दुकानदारों को दूसरी जगह शिफ्ट करने का विकल्प दिया गया।

बाद में नगरपालिका परिषद ने तय किया कि गोल मार्केट के भवन की मरम्मत कराने के बाद इसे संग्रहालय में तब्दील किया जाएगा। साल 2013 में इसे दिल्ली हाईकोर्ट ने भी संग्रहालय बनाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। सारे दुकानदारों से गोल मार्केट खाली भी करा लिया गया। पर साल 2020 तक गोल मार्केट की इमारत को बड़े-बड़े स्क्रीन कटर लगाकर घेर कर रखा गया है। इसे अभी तक संग्रहालय का रूप नहीं दिया जा सका है।



- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 

( GOL  DAKKHANA, POST OFFICE, GPO, NEW DELHI 110001,  GOL MARKET ) 

Tuesday, December 29, 2020

तो कुछ इस तरह बना था दिल्ली का कनॉट प्लेस

दिल्ली आने वाला या दिल्ली में रहने वाला हर शख्स कनॉट प्लेस ( राजीव चौक ) जरूर आता है। पर आपको पता है दिल्ली के इस शानदार बाजार के बनने से पहले यहां पर क्या था। तो यहां पर हुआ करते थे कुछ गांव जिन्हें कनॉट प्लेस बनाने के लिए विस्थापित करके करोलबाग की ओर भेजा गया।


निर्माण से पहले यह क्षेत्र एक वन्य इलाका था। इस इलाके में कीकर के पेड़ बहुतायत थे। तब यहां जंगली सूअर,
 गीदड़ का भी वास होता था। तब पुरानी दिल्ली में रहने वाले लोग यहां तीतर का शिकार करने आते थे। हालांकि इस वन क्षेत्र में भी प्राचीन हनुमान मंदिर हुआ करता था। लोग इस मंदिर में मंगलवार और शनिवार को सूर्यास्त से पहले ही आया करते थे। रात में यह इलाका सुरक्षित नहीं रह जाता था।  कनॉट प्लेस के विस्तार के लिए माधोगंज, जयसिंह पुरा जैसे गांवों के निवासियों से क्षेत्र खाली करवाया गया।



इसका नाम ब्रिटेन के शाही परिवार के सदस्‍य ड्यूक ऑफ़ कनॉट के नाम पर रखा गया था। वैसे तो अब इसका नाम बदलकर अब कनॉट प्लेस की जगह राजीव चौक  कर दिया गया है, पर यह नाम लोगों की जुबान पर  ज्यादा चढ़ा नहीं है। अभी भी ज्यादातर दिल्ली वाले इसे सीपी के नाम से बुलाते हैं।



इस मार्केट का डिजाइन डब्यू एच निकोल और टॉर रसेल ने बनाया था। इसकी बनावट अगर आसमान से देखें तो घोड़े के पांव के आकार में है। इसका निर्माण 1929 में आरंभ हुआ था। यह चार साल बाद 1933 में बनकर तैयार हो गया। ब्रिटिश इस तरह के वास्तु को शुभ मानते थे। तो यह मार्केट अपने समय की देश की सबसे बड़ी मार्केट थी।



कुल 12 ब्लॉक -  इस कनॉट प्लेस में कुल 12 ब्लॉक बनाए गए हैं। ए, बी, सी, डी, ई, एफ, जी, एच, के, एल, एम और एन। इसमें आई और जे ब्लॉक नहीं है।  ये आई और जे  ब्लॉक क्यों नहीं है इसका सही  उत्तर क्या हो सकता है। ठीक उसी तरह जैसे चंडीगढ़ में सेक्टर 13 नहीं है।  मार्केट मे ं सर्किल हैं। एक इनर दूसरा आउटर।



सफेद रंग का इमारतों में कनॉट प्लेस दूर से ही खूबसूरत दिखाई देता है। जब आसमान में बादल हों तो बाजार का सौंदर्य और निखर जाता है। इस बाजार में कपड़ों के महंगे शोरूम, किताबों की दुकाने खाने पीने के नायाब रेस्टोरेंट से लेकर सिनेमा घर तक सब कुछ है।   हालांकि इनमें  से रीगल सिनेमा बंद हो चुका है। पर  रिवोली, प्लाजा  और ओडियन जैसे सिनेमाघर   अभी भी चल रहे हैं। 



पूरे कनॉट प्लेस की बनावट गोलाकार है। इसके बीच में विशाल हरा भरा घास का मैदान है, जिसे सेंट्रल पार्क कहते हैं। यहां लोग सर्दियों में दिन में धूप सेंकते नजर आते हैं, तो शाम को यहां कई तरह के सांस्कृतिक और राजनीतिक आयोजन भी होते रहते हैं।



कनॉट प्लेस के वृताकार बाहरी सर्किल से अलग अलग दिशाओं में कुल 12 सड़के निकलती हैं जो दिल्ली के अलग अलग हिस्सों में चली जाती हैं। इन सड़कों में बाराखंबा रोड, कस्तूरबा गांधी मार्ग, जनपथ, संसद मार्ग, बाबा खड़क सिंह मार्ग, शहीद भगत सिंह मार्ग, पंचकुईयां मार्ग, चेम्सफोर्ड मार्ग, स्टेट एंट्री मार्ग, मिंटो मार्ग, शंकर मार्केट मार्ग प्रमुख हैं।

 


अब कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में विशाल तिरंगा भी लहराने लगा है। यह सेंट्रल पार्क का नया आकर्षण है। आप चाहें इस बाजार में सुबह जाएं, दोपहर जाएं या फिर शाम को हमेशा रौनक दिखाई देती है। कनॉट प्लेस की सबसे खास बात है इसके चौड़े बरामदे।



कनॉट  प्लेस के इन  बरामदे में घूमते हुए आप धूप और बारिश से हमेशा बचे रहते हैं। इन गलियारों में स्ट्रीट मार्केट सजा हुआ दिखाई देता है। पोस्टर, राजस्थानी हैंडीक्राफ्ट की दुकानें सजी दिखाई देती हैं। दुनिया के अलग अलग देशों से आने वाले लोगों को भी कनॉट प्लेस आकर्षित करता है।



आजादी के बाद कनॉट प्लेस के ए ब्लॉक के पास पार्क के नीचे पालिका मार्केट का निर्माण हुआ। यह दो मंजिला अंडरग्राउंड मार्केट है। यहां पर विशाल अंडरग्राउंड पार्किंग भी है। पर यह दुखद है कि स्वतंत्रता के बाद हम दिल्ली में कनॉट प्लेस जैसा कोई दूसरा बाजार नहीं बना सके।

-        --- विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com 

( ( RAJEEV CHAWK,   CONNAUGHT PALACE, DELHI ) 

 

कनॉट प्लेस के गलियारों में  खरीदें राजस्थानी उत्पाद

यहां कभी गेलार्ड रेस्टोरेंट हुआ करता था अब पिंड बलूची में तब्दील हो गया है। 


शाम को शॉपिंग के साथ खाने पीने का भी मजा। 


Sunday, December 27, 2020

करोलबाग - दिल्ली का दिल - शॉपिंग , स्वाद और मटरगस्ती


दिल्ली में रहकर जब भी कुछ खरीदादारी करने की इच्छा हो तो एकबारगी करोलबाग जाने का विचार मन में आता है। करोल बाग दिल्ली के केंद्र में स्थित ऐसा बाजार है जहां आप स्ट्रीट मार्केट से लेकर बड़े बड़े शोरूम से खरीददारी कर सकते हैं।   अब करोल बाग की सूरत और भी संवर गई है। 



मैं पहली बार दिल्ली 1991 में पहुंचा था। पर 1993 में दिल्ली दूसरी बार पहुंचा तो करोल बाग के हरध्यान सिंह रोड में अपने एक दोस्त के घर में जाना हुआ था। जब 1995 में दिल्ली में रहना शुरू किया उसके बाद से अनगिनत बार करोल बाग जाना हुआ होगा। साल 2003 में जब मेरी शादी हुई तो उससे पहले शॉपिंग के लिए मैं एक बार फिर करोल बाग पहुंचा। हालांकि तब मैं जालंधर में रहता था। करोल बाग के बैंक स्ट्रीट पर ज्यादातर ज्वेलरी की दुकाने हैं। पीपी ज्वेलर्स फर्म की तब एक मल्टी स्टोर शॉप शुरू हुई थी पीपी डिजाईन एस्टेट। वहां से भी कुछ खरीददारी की थी।



पर करोल बाग में शॉपिंग का बेहतरीन अनुभव है अजमल खां रोड पर पैदल सैर करते हुए चलना। अब आप करोल  बाग मेट्रो स्टेशन से उतरकर उत्तर दिशा  में चलते हुए अजमलखां रोड पर शॉपिंग कर सकते हैं। साल 2019 में इस सड़क का कायाकल्प हो गया है। भारी वाहनों के चलने पर रोक लग गई है। सड़क के दोनों तरफ बैठने के लिए जगह-जगह बेंच लगा दी गई है। 



सड़क के बीच में फूलों के गमले लगा दिए गए हैं। इस अजमल खां रोड पर जनक स्टूडियो, टाटा का वेस्टसाइड से लेकर तमाम बड़े ब्रांड के शोरूम हैं। वहीं छोटी-छोटी मध्यम वर्गीय लोगों के जेब के अनुकूल दुकानें भी हैं। उससे भी आगे स्ट्रीट मार्केट सस्ते कपड़े, जूते, पर्स, बैग आदि की दुकाने हैं। आप अपने किसी भी टूटे-फूटे बैग की यहां पर आकर मरम्मत करा सकते हैं।



अजमल खां रोड से आगे बढ़कर आप चलते हुए बैंक स्ट्रीट पहुंच सकते हैं। यहां देश की जानीमानी ज्वेलरी की दुकाने हैं। वहीं अजमल खां रोड के मध्य से पश्चिम की तरफ जाने पर गफ्फार मार्केट पहुंच सकते हैं। महान स्वतंत्रता सेनानी खान अब्दुल गफ्फार खान के नाम पर बने इस मार्केट आज मोबाइल फोन और उसकी मरम्मत का हब बन चुका है।



पर आपको पता है कि करोल बाग सन 1920 से पहले खेत और जंगल जैसा इलाका हुआ करता था। कनॉट प्लेस के निर्माण के लिए जिन गांवों के लोगों को विस्थापित होना पड़ा वे करोलबाग में आकर बसे। पर 1947 के करोल बाग इलाके की बड़ी मुस्लिम आबादी पाकिस्तान चली गई। करोल बाग आजादी के बाद बड़े व्यापारिक केंद्र के रूप में उभरा। करोल बाग ने सन 1984 में सिख दंगों को दंश झेला। सन 2008 में इसने गफ्फार मार्केट में आतंकी धमाके को भी देखा। पर इन सबके बीच जिंदगी अपनी रफ्तार से चलती रहती है।



करोलबाग की सड़कों पर घूमते हुए आप दिल्ली के अलग-अलग तरह के स्वाद का भी मजा ले सकते हैं। यहां पंजाबी से लेकर दक्षिण भारतीय स्वाद उपलब्ध है। छोले भठूरे, रसगुल्ले, के साथ पंरपरागत पूड़ी सब्जी का भी स्वाद ले सकते हैं। तो यहां दक्षिण भारतीय खाने पीने के भी रेस्टोरेंट हैं। करोल बाग इलाके में कई मध्यमवर्गीय होटल भी हैं।



करोल बाग के पास ही दिल्ली का प्रसिद्ध सर गंगाराम अस्पताल और बीएल कपूर मेमोरियल अस्पताल हैं। करोलबाग और राजेंद्र पैलेस मेट्रो स्टेशन के पास आईएएस के कोचिंग का बड़ा हब भी विकसित हो चुका है। देश के जाने माने कोचिंग संस्थान जहां अनगिनत लोगों को सपने बुने जाते हैं। इस कोचिंग जोन में कई प्राइवेट लाइब्रेरी बनी हैं जहां कंपटिशन देने वाले पढ़ाई करते हैं। 


दिल्ली के किसी भी कोने से करोल बाग पहुंचने के लिए आप दिल्ली मेट्रो का सहारा ले सकते हैं।  वैशाली से  द्वारका वाली  लाइन पर करोलबाग मेट्रो स्टेशन है।  रेलवे स्टेशन की बात करें तो सराय रोहिल्ला  रेलवे स्टेशन सबसे करीब है। वैसे नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के पहाड़गंज वाले इलाके से भी यह ज्यादा दूर नहीं है। 


तो कभी कुछ  खरीददारी  करने या अच्छा खाने पीने का दिल करे तो करोल बाग का रूख करें।   दिल्ली  के हर कोने से करोल बाग के लिए बसें भी चलती हैं।  कोई  न कोई बस आपके यहां से भी आती होगी न।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com  ( KAROL BAG, DELHI,  AJMAL KHAN ROAD,  GAFFAR MARKET ) 



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Friday, December 25, 2020

कैसे करें सस्ते में दिल्ली की सैर


दिल्ली देश की राजधानी है। वहीं दिल्ली देश दुनिया के लोगों के लिए पसंदीदा पर्यटक स्थल भी है। दिल्ली आने वाले लोगों की तमन्ना दिल्ली दर्शन की रहती है। तो बड़ा सवाल है कि दिल्ली  कैसे घूमा जाए।
तमाम बाहर से आने वाले लोग दिल्ली घूमने के लिए दिल्ली दर्शन बस की सेवा लिया करते हैं। 


मैं भी पहली बार जब दिल्ली 1991 के सितंबर में आया था तो दिल्ली का दर्शन बस से ही किया था। यह निजी सेवा की बस थी। लाल किला के सामने से चली थी। आधे दिन में इसने दिल्ली के प्रमुख स्थलों का दर्शन कराया था। पर उस जमाने में दिल्ली दर्शन के लिए फटफट सेवा भी चलती थी। यह बुलेट मोटरसाइकिल के इंजन वाले आटो रिक्शा होते थे। चारों तरफ से खुले होने के कारण इसमें दिल्ली को देखना आसान था।



पर दिल्ली ट्रांसपोर्ट कारपोरेशन यानी डीटीसी की बस सेवा भी दिल्ली का दर्शन कराती है। दिल्ली दर्शन की सरकारी बसों की बुकिंग कनॉट प्लेस के पास सिंधिया हाउस पर डीटीसी के काउंटर से होती है। दिल्ली दर्शन की बसें यहीं से सुबह नौ बजे चलती हैं। इनका किराया वाजिब है। कोई धोखाधड़ी नहीं है। इन बसों में एक गाइड भी होता है।



हो हो बस सेवा से दिल्ली की सैर - वहीं दिल्ली पर्यटन दिल्ली दर्शन के लिए एक हो हो बस सेवा का भी संचालन करती है। हो हो यानी हूप इन हूफ आफ.. आप एक स्पाट पर उतर जाइए। फिर नियत समय बाद वहां दूसरी हो हो बस आएगी, उस पर चढ़ जाइए। इसके लिए होहो बसों की समय सारणी को पता कर लिजिए। हांलाकि हो हो बस सेवा कभी ज्यादा लोकप्रिय नहीं हो सकी। इसका किराया भी थोड़ा अधिक है। 


डीटीसी बस पास, सबसे सस्ता तरीका - अगर आपको दिल्ली का भूगोल पता है तो आप डीटीसी की बसों से भी दिल्ली घूम सकते हैं। डीटीसी की बसों का दिन भर का पास 50 रुपये का मिलता है। यह सुबह 6 बजे से रात्रि 12 बजे तक मान्य होता है। तो बस सुबह सुबह एक पास खरीद लें और दिन भर घूमते रहें दिल्ली। एक बस से दूसरी बस। दूसरी बस से तीसरी बस। ये 50 रुपये वाला पास लाल यानी एसी बसों और हरी यानी नॉन एसी बसों में मान्य होता है। ये दिल्ली घूमने का सबसे सस्ता तरीका हो सकता है। ये बस पास हर कंडक्टर के पास उपलब्ध होता है।



मेट्रो से दिल्ली की सैर करें - अब दिल्ली में मेट्रो भी दिल्ली के ज्यादातर टूरिस्ट प्लेस से होकर गुजरती है तो आप चाहें तो मेट्रो से भी दिल्ली घूम सकते हैं। इसके लिए दिल्ली मेट्रो में टूरिस्ट टोकन का भी प्रावधान है। आप पूरे दिन के सफर के लिए मेट्रो का टोकन खरीद सकते हैं। इसके लिए किसी भी मेट्रो स्टेशन के स्वागत कक्ष पर संपर्क कर सकते हैं।

हां आपके पास ज्यादा पैसे हैं तो आप बेतकल्लुफ होकर आटो रिक्शा या दिन भर के लिए टैक्सी बुक करके भी दिल्ली घूम सकते हैं। पैकैज टूर, बस या मेट्रो फिर आप जैसे लोगों के लिए नहीं है।

-         विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com

( DELHI DARSHAN, AUTO, TAXI, BUS, DTC, METRO, HO HO BUS )



Wednesday, December 23, 2020

बिहार का एक नैरो गेज - फतुहा-इस्लामपुर लाइट रेलवे की याद


फतुहा इस्लामपुर लाइट रेलवे बिहार के पटना जिले में चलने वाली एक नैरो गेज रेल सेवा थी। करीब छह दशक तक इसने लोगों को सेवाएं दीं। सन 1922 में शुरू हुई ये रेल सेवा 1987 में बंद हुई। इस्लामपुर की तरफ से सस्ते में राजधानी पटना की तरफ  आने  के लिए लोग इस सेवा का खूब इस्तेमाल करते थे। 

मार्टिन एंड कंपनी आरा सासाराम लाइट रेलवे के अलावा बिहार में दो और रेल सेवाओं का संचालन करती थी। ये थे पटना जिले में बख्तियारपुर बिहार शरीफ लाइट रेलवे और फतुहा इस्लामपुर लाइट रेलवे। बख्तियारपुर से बिहार शरीफ लाइट रेलवे को कंपनी ने 1902 में आरंभ किया था। बाद में इस लाइन का विस्तार राजगीर तक हुआ। यह लाइन 1962 में ही ब्राड गेज में बदल दिया गया। पर फतुहा इस्लामपुर लाइट रेलवे का संचालन अस्सी के दशक में भी होता रहा।


1922 में शुरू हुआ सफर – मार्टिन एंड कंपनी द्वारा संचालित फतुहा इस्लामपुर लाइट रेलवे पर यात्री संचालन 1922 में आरंभ हुआ था। यह मार्टिन के बाकी रेल नेटवर्क की तुलना में छोटी दूरी का नेटवर्क हुआ करता था। यह कुल 40 मील यानी 64 किलोमीटर की रेल सेवा थी। पूरी रेलवे लाइन सड़क के समांतर चलती थी।

यह रेलवे लाइन तब ईस्ट इंडियन रेलवे यानी नई दिल्ली कोलकाता मेन लाइन के ब्राड गेज नेटवर्क के स्टेशन फतुहा से शुरू होती थी। फतुहा पटना शहर से थोड़ा आगे का छोटा सा रेलवे स्टेशन हुआ करता था। डिस्ट्रिक्ट बोर्ड पटना से सहयोग से मार्टिन एंड कंपनी ने इस रेलवे लाइन की शुरुआत की थी।



इस्लामपुर बिहार के नालंदा जिले का एक छोटा सा कस्बा है। यह राजधानी पटना से 65 किलोमीटर दूर है। यह तब छोटा सा ग्रामीण इलाका था। अब नगर पंचायत का दर्जा प्राप्त कर चुका है। मूल रूप से ये कृषि प्रधान क्षेत्र है।    इलाके के लोग धान की खेती  प्रमुखता से करते हैं। 


ढाई फीट की पटरियां - फतुहा इस्लामपुर लाइट रेलवे  2 फीट 6 ईंच  की पटरियों वाली नैरो गेज रेल सेवा थी। शुरुआती दौर में इस लाइन पर मैनिंग वार्डेल, लीड्स द्वारा निर्मित 0-6-2टी लोकोमोटिव का इस्तेमाल किया जाता था। मार्टिन के बिहार में संचालित होने वाले दूसरे नेटवर्क भी दो फीट 6 ईंच की पटरियों वाले ही थे। 

सन 1915 में बनी कंपनी - फतुहा इस्लामपुर लाइट रेलवे के लिए 5 सितंबर 1915 को कंपनी का गठन हुआ। तब इसकी मूलभूत पूंजी 12 लाख रुपये रखी गई थी। इसका पंजीकृत कार्यालय कोलकाता में ही था। पर क्षेत्रीय कार्यालय पटना से इसकी देखरेख की जाती थी।   इसके 64 किलोमीटर के मार्ग में फतुहा के बाद दनियांवा, हिलसा, एंकगर सराय प्रमुख रेलवे स्टेशन हुआ करते थे। 

1987 तक चली रेल शुरुआती दौर में यह मार्टिन के लिए फायदे का रेल नेटवर्क था। पर लगातार घाटे के बाद 1987 में यह रेलवे लाइन बंद करनी पड़ी। पर इसका संचालन आरा सासाराम लाइट रेलवे के दस साल बाद तक होता रहा। इस्लामपुर के आसपास के गांव के बुजुर्ग लोग नन्ही पटरियों पर इस सफर को याद करते हैं।

भारतीय रेलवे ने किया अधिग्रहण - साल 1987 में इस लाइन का अधिग्रहण भारतीय रेलवे ने कर लिया। फतुहा-इस्‍लामपुर लाइट रेल   लाइन (राष्‍ट्रीयकरण) अधिनियम, 1985   के तहत इसका अधिग्रहण किया गया। आखिरी दिनों में ये रेलवे लाइन काफी जीर्ण-शीर्ण हालात में पहुंच गई थी। रेलवे ने जहां है जैसे है के हालात में इसका अधिग्रहण किया।

इस लाइन पर ब्राडगेज की पटरियां बिछाई गईं। इसका  मार्ग करीब करीब वही रखा गया जो नैरो गेज लाइन का हुआ करता था। इसके बाद दिल्ली से पटना जाने मगध एक्सप्रेस का विस्तार इस्लामपुर रेलवे स्टेशन तक किया गया। अब यह लाइन विद्युतीकृत भी हो चुकी है। आजकल इस्लामपुर से दिल्ली और इस्लामपुर से झारखंड की राजधानी रांची के लिए सीधी ट्रेनों का संचालन किया जाता है।



 फतुहा इस्लामपुर लाइट रेलवे की सुनहरी यादें -

पटना के निवासी दिलीप आर्य लिखते हैं - ये हमारे घर से 9 किलोमीटर की दूरी पर है। वे कहते हैं कि 1945 से 1975 के दौर में हम शौक से इस पर चढ़ने जाते थे। यह रेल इतनी धीमी चलती थी कि इस पर हम चलते हुए चढ़ और उतर जाते थे। कुल 50 पैसे के टिकट में दनियामा तक जाते थे। वहां से बेटिकट ही वापस चले आते थे।

 एकंगर  सराय के रहने वाले   मनीष कुमार भारद्वाज लिखते हैं – यह रेलवे लाइन हमारे घर से एक किलोमीटर की दूरी पर है। मेरी मां इस ट्रेन की कहानियां सुनाती रहती हैं। उनके पास इस मार्ग पर चलने वाले ट्रेनों का नाम और दूसरी और भी जानकारियां है।


फतुहा इस्लामपुर लाइट रेलवे का सफरनामा 

1915 में मार्टिन ने कंपनी का गठन किया

1922 में शुरू हुई रेल सेवा

1987 में नैरो गेज का सफर रुक गया

-         विद्युत प्रकाश मौर्य -  vidyutp@gmail.com

( FUTWAH ISLAMPUR LIGHT RAILWAY, MANNING WARDLE, LEEDS LOCOMOTIVE, NARROW GAUGE  )

REFERENCE- 

https://economictimes.indiatimes.com/company/futwah-islampur-light-railway-co-ltd-/U45204WB1915PLC002635

https://www.latestlaws.com/bare-acts/hindi-acts/50980/

https://www.jagran.com/bihar/nalanda-railways-big-gift-to-the-people-of-islampur-in-the-new-year-19882424.html


Monday, December 21, 2020

आइए करें महादेव के बारह ज्योतिर्लिंग के दर्शन




शिव महापुराण के कोटि रूद्र संहिता के अन्तर्गत महाशिव के ज्योतिर्लिंग के बारह स्वरूपों का उल्लेख किया गया है, जिन्हें सुनने मात्र से पाप दूर हो जाते हैं। तो आइए करते हैं शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों के दर्शन। 

1 सोमनाथ - ( गुजरात ) - गुजरात के अरब सागर के तट पर स्थित सोमनाथ मंदिर यानी द्वादश ज्योतिर्लिंग में पहला शिवलिंगम। अदभुत मनोरम वातावरण। मानो सागर की लहरें दिन रात शिव का नमन कर रही हों। गुजरात के शहर सोमनाथ में स्थित इस मंदिर के बारे में कहा जाता है सागर की लहरों के किनारे इसका निर्माण स्वयं चंद्रमा ने कराया था। सोमनाथ को सोमेश्वर भी कहते हैं यानी सोम (चंद्र) के नाथ ( ईश्वर)। इतिहास में सोमनाथ मंदिर कई बार बना और कई बार टूटा। आजकल जो भव्य सोमनाथ मंदिर है इसे देश आजाद होने के तुरंत बाद सरदार वल्लभभाई पटेल और अन्य नेताओं ने जन सहयोग से बनवाया।



2 मल्लिकार्जुन स्वामी - ( आंध्र प्रदेश)  शिव के बारह ज्योतिर्लिंग में दूसरे स्थान पर आते है आंध्र प्रदेश के करनूल जिले में स्थित श्रीशैलम के मल्लिकार्जन स्वामी। इसे दक्षिण में दिव्य क्षेत्रम माना जाता है। यहां पहुंच कर अद्भुत शांति और आनंद की अनुभूति होती है। सालों भर देश दुनिया से बड़ी संख्या में लोग श्रीशैलम पहुंचते हैं। घने जंगल से गुजरने के बाद नल्ला मल्ला के पर्वतों पर शिव विराजते हैं।

3 महाकाल ( उज्जैन ) - मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक शहर उज्जैन में क्षिप्रा नदी के तट पर महाकाल का मंदिर स्थित है। बारह ज्योतिर्लिंग में तीसरे स्थान पर आते हैं महाकाल। देश भर से लोग महाकाल के दर्शन के लिए आते हैं। दक्षिणामुखी होने के कारण महाकाल की पूजा को बड़ा फलदायी माना जाता है।
देश के सभी बारह ज्योतिर्लिंगों में सिर्फ महाकाल की प्रतिमा ही दक्षिणमुखी है। राजनेताफिल्मी सितारे और उद्योगपति सभी महाकाल की कृपा चाहते हैं। यहां आने वाले श्रद्धालु क्षिप्रा नदी में स्नान करने के बाद महाकाल का पूजन करते हैं।


4 ओंकारेश्वर ( खंडवा, मध्य प्रदेश ) - मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में खंडवा जिले में स्थित शिव का ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग देश भर में स्थित 12 ज्योतिर्लिंगों में चौथे स्थान पर आता है। यहां सुरम्य वादियों के बीच नर्मदा नदी के तट पर स्थित है शिव का मंदिर ओंकारेश्रर। ओंकारेश्वर में नर्मदा और कुबेर नदियों के बीच एक विशाल टापू बन गया है। इसी टापू पर बना है ओंकारेश्वर मंदिर। 



5 केदारनाथ ( उत्तराखंड ) - केदारनाथ का मंदिर उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित है। मंदिर तीन तरफ से पहाड़ों से घिरा है। एक तरफ है करीब 22 हजार फीट ऊंचा केदारनाथ शिखरदूसरी तरफ है 21600 फीट ऊंचा खर्चकुंड और तीसरी तरफ है 22700 फुट ऊंचा भरतकुंड। इस ज्योतिर्लिंग  के बारे में कहा जाता है कि हिमालय के केदार श्रृंग पर भगवान विष्णु के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थे।


6 . भीमाशंकर ( महाराष्ट्र)  - शिव का 12ज्योतिर्लिंग में भीमाशंकर छठे नंबर पर है। डाकिन्या भीमाशंकर मतलब डमरू वाले देवता का मंदिर। डमरु वाले तो हैं ही शिव। भीमाशंकर ग्राम पंचायत भोरागिरीतहसील खेड जिला पुणे में पड़ता है। मंदिर इतनी ऊंचाई पर है कि यहां से संपूर्ण कोंकण क्षेत्र का नजारा दिखाई देता है। किसी समय में यहां आना मुश्किल हुआ करता था। जंगली जीव ज्यादा दिखाई देते थे। पर पहाड़ियां वन औषधियों से भरी हुई हैं। 



7 काशी विश्वनाथ -  ( वाराणसी) उत्तर प्रदेश में गंगा के तट पर बसी काशी को तीनो लोकों से न्यारी कहा गया है। यहां दशाश्वमेध घाट के पास है काशी विश्वनाथ का मंदिर। काशी विश्वनाथ का स्थान बारह ज्योतिर्लिंग में सातवें स्थान पर आता है। कहा जाता है इस नगरी का प्रलयकाल में भी लोप नहीं होता। उस समय भगवान शिव इस नगरी को अपने त्रिशूल पर धारण कर लेते हैं।

8. त्रयंबकेश्वर - ( नासिक, महाराष्ट्र ) भगवान शंकर के बारह ज्योतिर्लिंग में आठवें स्थान पर आता है त्रयंबकेश्वर। त्रयंबकेश्वर मंदिर महाराष्ट्र में नासिक शहर से 36 किलोमीटर दूर है। त्रि- अंबक यानी तीन नेत्रों वाले शिव। शिव का ये मंदिर समुद्र तल से ढाई हजार फीट की ऊंचाई पर पहाड़ों की तलहटी में बना है। गौतम और गंगा जी की प्रार्थना पर शिव यहां संसार के उपकार के लिए त्रयंबक रूप में विराजते हैं।


9. रावणेश्वर - (झारखंड)   शिव का नौवां ज्योतिर्लिंग मंदिर का देवघर का वैद्यनाथ धाम मंदिर। झारखंड राज्य के देवघर जिले में स्थित ये मंदिर देश भर के करोड़ों श्रद्धालुओं के आस्था का केंद्र है। दिल्ली हावड़ा रेल लाइन पर जैसीडीह स्टेशन से छह किलोमीटर आगे देवघर में ये मंदिर स्थित है। शिव पुराण के मुताबिक इस क्षेत्र को चिताभूमि कहा गया है। शिव सती के शव को लेकर जब उन्मत होकर घूम रहे थे तब सती का ह्रतपिंड यहां गलकर गिर गया था।


10. नागेश्वर (गुजरात ) - गुजरात का नागेश्वर मंदिर भगवान शिव का प्रसिद्ध मंदिर है। द्वारका के पास दारुका वन इलाके में स्थित ये मंदिर द्वादश ज्योतिर्लिंग में 10वें स्थान पर आता है। नागेश्वर यानी नागों के ईश्वर। कहा जाता है कि इस मंदिर में पूजा से सर्प के विष से बचाव होता है। रुद्र संहिता में भगवान शिव को दारुकावनें नागेश कहा गया है। किसी जमाने में इस मंदिर के आसपास घने जंगल थे। आज भी मंदिर के आसपास कोई आबादी नहीं है। इसलिए यहां दिन में ही दर्शन के लिए जा जा सकता है।



11 रामेश्वरम ( तमिलनाडु ) - तमिलनाडु राज्य में स्थित रामेश्वरम का रामनाथ स्वामी मंदिर चार धामों में  से एक है। साथ ही यह बारह ज्योतिर्लिंग में 11वें स्थान पर आता है। भगवान श्रीराम जब श्रीलंका पर विजय के बाद वापस लौटे तब उन्होंने रामेश्वरम में भगवान शिव की पूजा की।  कहा जाता है कि यहां रामचंद्र जी रावण वध के बाद ब्राह्मण हत्या के पाप से मुक्ति के लिए शिव की आराधना की थी।




12 घुश्मेश्वर ( महाराष्ट्र ) महाराष्ट्र में औरंगाबाद शहर के समीप ही प्रसिद्ध घृष्णेश्वर मंदिर स्थित है। महादेव के ज्योर्तिलिंगों की सूची में ये 12वां और आखिरी है। यहां आकर एक विशेष प्रकार के शांत वातावरण का एहसास होता है। यह मंदिर दक्षिण भारत के तमिलनाडु के तंजौर स्थित वृहदेश्वर मंदिर  ( बिग टेंपल) का लघु रूप सा दिखाई देता है। कला शिल्प की दृष्टि से ये अति सुंदर मंदिर है।
- प्रस्तुति - विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( 12 JYOTIRLING DARSHAN, SHIVA )