Wednesday, February 26, 2020

काशी हिंदू विश्वविद्यालय का ऐतिहासिक सिंह द्वार


रमेश भाई अपनी बाइक से जीटी रोड तक छोड़ने आए हैं। उनके गांव से सात किलोमीटर की दूरी पर दुर्गावती बाइपास पर हमें वाराणसी की बस मिल गई। यह जगह मरहियां मोड कहलाता है। यह निजी बस है जो हमें मुगलसराय शहर के बाहर से बाइपास होते हुए वाराणसी से ले गई। रास्ते में कई जगह थोड़ा जाम मिला। पर इस बस ने बीएचयू के पीछे मारुति नगर इलाके में एक निजी बस अड्डे पर उतार दिया। इस बस अड्डे से बिहार के कई छोटे छोटे शहरों के लिए बसें चलती हैं। इसलिए लोग इसे बिहार बस स्टैंड कहते हैं। पर ऐसा प्रतीत होता है कि यह डग्गामार बसों को स्टैंड है जो बिना परमिट के चलाई जा रही हैं।

खैर इस बस स्टैंड से मुझे बीएचयू गेट यानी लंका के लिए बैटरी रिक्शा मिल गया। रास्ते में राम नगर को जोड़ने वाला नया गंगा पुल नजर आया। हमारे समय में तो यहां पीपे का पुल हुआ करता था। वह पुल बारिश के दिनों में बंद हो जाता था। आगे सड़क पर बहुत जाम है तो मैं बीएचयू गेट से पहले नए बने ट्रोमा सेंटर के पास ही उतर गया। यहां से पैदल चलता हुआ लंका पर पहुंच गया हूं।

एक बार फिर काशी हिंदू विश्वविद्यालय का विशाल सिंह द्वार मेरी नजरों के सामने है।  अपने पांच साल के बीएचयू प्रवास के दौरान इस गेट से अनगिनत बार अंदर और बाहर जाना हुआ होगा। पर यह प्रवेश द्वार हर बार कुछ नया लगता है। शिक्षार्थ आइए और सेवार्थ जाइए का संदेश देता हुआ यह प्रवेश द्वार तनकर खड़ा प्रतीत होता है। इसका निर्माण नागर शैली में कराया गया है। दूर से यह किसी मंदिर जैसा प्रतीत होता है।

जैसा कि आपको मालूम ही है कि काशी हिंदू विश्वविद्यालय के निर्माण में देश के प्रमुख राजा रजवाड़ों की बड़ी भूमिका रही है। तो इस सिंह द्वार का निर्माण उत्तर प्रदेश के बलरामपुर राज घराने के सौजन्य से हुआ था। इसकी जानकारी भी सिंह द्वार के अंदर की तरफ लगे संगमरमर पट्ट पर लिखी गई है। महाराजा पाटेश्वरी प्रसाद सिंह ने अपनी माता देवेंद्र कुंअरी जी की स्मृति में इस गोपुरम का निर्माण कराया था। साल था संवत 1997 यानी सन 1940 ईस्वी में। बीएचयू की स्थापना से कोई 23 साल बाद यह प्रवेश द्वार अस्तित्व में आया था।

आजकल शाम को यह प्रवेश द्वार एलईडी लाइटों से जगमग हो जाता है। आप थोड़ी देर तक इसे देखें तो अलग अलग रंग की रोशनी इसमें बदलती रहती है। यानी सुनहले रंग का यह प्रवेश द्वार कई अलग अलग रंगों में नजर आता है। इस प्रवेश द्वार के ठीक पीछे कतार में आपको हमेशा कई सौ साइकिलें लगी दिखाई दे जाएंगी। 

दरअसल बीएचयू के हास्टल में रहने वाले छात्र यहां अपनी साइकिलें खड़ी करते शहर में घूमने निकल जाते हैं। वापस आने पर अपनी साइकिलें ले जाते हैं। एक बार मेरी साइकिल यहां 24 घंटे से ज्यादा खड़ी रह गई थी। उसका ताला भी खुला रह गया था, पर चोरी नहीं हुई। हालांकि कई दोस्तों की साइकिलें यहां से चोरी भी हो जाती हैं। मेरे पास ज्यादा समय नहीं है इसलिए बीएचयू के सिंह द्वार से ही वापस चल पड़ा हूं। अपने किसी दोस्त को भी वाराणसी आने की सूचना नहीं दे पाया हूं। तो महामना की धरती नमन...

-- विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
( BHU GATE, SINGH DWAR, CONSTRUCTED BY RAJA OF BALRAMPUR ESTATE RAJA PATESWARI PRASAD SINGH IN 1940 )


Tuesday, February 25, 2020

गांव में पीपल, पीपल की छैंया में पानी...

देश दुनिया घूमने की खुशी अलग होती है। अपने गांव में पहुंचने की अलग। चार साल बाद अपने गांव पहुंच रहा हूं। तो मन में एक कौतूहल है। मुझे अपने गांव का वो पीपल का पेड़ याद आ रहा है। और वह पुराना गीत भी... गांव में पीपल.. पीपल की छैंया... छैयां में पानी... 
मुंडेश्वरी, भभुआ, कुदरा से होते हुए दोपहर में मैं अपने गांव सोहवलिया के चल पड़ा हूं। कई सालों बाद इस रास्ते पर हूं। कुदरा जहानाबाद के बाद लालापुर, केवढ़ी, बडरकोना, हलिवंता, फिर आया गंगवलिया। इसके बाद बसहीं में कुदरा नदी का पुल। अब ये पुल काफी ऊंचा बन गया है। उसके बाद वह नहर का पुल, जहां बैठकर बचपन में हम घंटो कुदरा जाने वाले तांगे का इंतजार करते थे। फुली मोड़ से कानडिहरा होते हुए मैं अपने गांव में पहुंच गया हूं।

बस कुछ घंटे में अपने चाचाओं और एक मात्र जीवित दादा भुवनेश्वर सिंह जी से मुलाकात के बाद बारात का हिस्सा बन गया हूं। छोटे भाई संजीव के बारात निकलने की तैयारी चल रही है। दस से ज्यादा बुलेरो में लोग सवार हो गए हैं। अब बारात की संस्कृति बदल गई है। मेरी गांव की बहनें और बहुएं भी बारात में जा रही हैं। 

एक घंटे के सफर के बाद हमलोग बारात वाले गांव में पहुंच गए हैं। ये गांव है अवखरा। भभुआ से पश्चिम चैनपुर से दो किलोमीटर आगे। ये बड़ा गांव है।
यहां खाने-पीने के इंतजाम अब शहरों की तरह बुफे  सिस्टम में हैं। भाई की शादी में मैं सारी रात जाग कर सारे रस्मो रिवाज देखता रहा।

पहले जयमाला हुई, फिर द्वार पूजा, उसके बाद बरनेत यानी गहने आदि चढ़ाने की रस्म। फिर देर रात गए शादी की शुरुआत। तो शादी खत्म होते होते सुबह के चार बज गए। शादी के दौरान ओरतें गारी गा रही हैं- एक नया दू नया गिन लिह पंडीजी, दुल्हा के भाई के दहेज लिह पंडी जी। एक पइसा दू पइसा गिन लिह पंडी जी,  दुल्हा के फुआ के दहेज लिह पंडी जी।  ... बकलोल ससुरा, बकलोल ससुरा... बहु खातिर सारी रात जागा ससुरा...आदि आदि...

विवाह समारोह से निवृत होने के बाद सुबह सुबह मैं करजी गांव के लिए चल पड़ा हूं। अवखरा से थोड़े इंतजार के बाद एक बस मिल गई। इस बस ने मुझे खरिगांवा मोड़ पर उतार दिया। यहां  करजी करजांव के लिए दूसरी बस थोड़े इंतजार पर मिल गई। इस बस में करजी गांव के कुछ लोग हैं। यह मेरे बीएचयू के दिनों के साथी रमेश कुमार का गांव है। वे मेरा इंतजार कर रहे हैं। बस में करजी गांव के जो लोग हैं वे रमेश को जानते हैं। एक सज्जन हैं जो इस गांव के पूर्व मुखिया हैं। उनसे मैंने रमेश की बात कराई। अब मेरा रमेश के घर पहुंचना आसान हो गया। मुखिया जी ने बस से उतरने के बाद मुझे रमेश के घर पहुंचा दिया।


करजी कैमूर जिले के बड़े गांव में से एक है। इस गांव में 3000 के आसपास मतदाता हैं। ऐसे बड़े गांव रोहतास कैमूर जिले में कम ही हैं। गांव में कई बिरादरी के लोग रहते हैं। दलित और मुसलिम आबादी भी है।

जाहिर गांव बड़ा है तो पंचायत चुनाव हो या विधानसभा का चुनाव राजनीति चरम पर होती है। गांव के बीच से सड़क गुजरती है। गांव में छोटा सा बाजार भी है। गांव की गलियां भी पक्की हैं। इस गांव में कुल चार चार तालाब हैं। इसके आसपास पर चार मंदिर भी हैं। गांव में एक मठ भी है। बीएचयू से पढाई के बाद मैं अलग  अलग शहरों में भटकने लगा पर रमेश गांव में आ गए और अपनी पुश्तैनी खेतीबाड़ी देख रहे हैं। कोई 24 साल बाद मिलना हुआ। वैसे ही मस्त हैं। थोड़ी देर आराम के बाद दोपहर का भोजन रमेश के घर में हुआ। उसके बाद रमेश मुझे बस स्टैंड तक छोड़ने के लिए चले। रास्ते में उसने एक छोटी सी नदी दिखाई। इसका नाम गेंहुअनवा नदी है। इसकी खास बात यह है कि अपने छोटे से सफर में यह बहुत तेजी से कई बार मार्ग बदलती है। अपने सर्पिले वलय के कारण ही इसे गेंहुअनवा नाम दिया गया है।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com

-        ( KARJI, KARJAON, AWAKHARA, CHAINPUR, KAIMUR )  

Sunday, February 23, 2020

मोकरी गांव और गोविंद भोग चावल की खुशबू


मुंडेश्वरी देवी से वापस लौटते हुए हमलोगों ने दूसरा रास्ता लिया। यह रास्ता मोकरी बेतरी गांव से होकर आता है। यह भभुआ शहर के आगे चैनपुर रोड में जाकर मिल जाता है। रास्ते में अशोक ने बताया कि मोकरी इस इलाके का बड़ा गांव है। पर यह गांव इन दिनों एक नए कारण से चर्चा में है। वह है इस गांव में उपजने वाला गोविंद भोग चावल।

वैसे तो गोविंद भोग चावल कई जगह उपजाया जाता है। यह धान की एक खुशबूदार किस्म है। बंगाल में भी इसकी खेती होती है। पर बिहार के कैमूर जिले में होने वाला यह धान काफी खास है। मोकरी गांव के खेत में होने वाला गोविंद भोग धान का स्वाद बाकी जगह से अलग होता है। वह इसलिए क्योंकि यहां सालों भर मुंडेश्वरी देवी के पहाड़ से पानी रिसकर खेतों में आता रहता है। जो इस गांव के धान के स्वाद को बाकी जगह से अलग करता है।

 तो आप यों कह सकते हैं कि इस धान से होने वाले चावल को माता मुंडेश्वरी का खास आशीर्वाद मिला हुआ है। यह इसके स्वाद और मिठास को बढा देता है। मोकरी के गोविंद भोग लोकप्रियता कुछ ऐसी है कि बाजार में दुकानदार आसपास के गांव के गोविंद भोग चावल को मोकरी का बताकर बेच डालते हैं।

गोविंद भोग चावल से बनी खीर काफी स्वादिष्ट होती है। अब एक नई बात मोकरी गोविंदभोग चावल के बारे में। पटना के हनुमान मंदिर ट्रस्ट के प्रशासक पूर्व आईपीएस किशोर कुणाल ने कहा कि अयोध्या के राम मंदिर पास बनने वाली सीता की रसोई में प्रसाद में जो खीर मिलेगी, यह खीर मोकरी के गोविंद भोग चावल से ही बनेगी।

तो मोकरी से गोविंद भोग चावल की सप्लाई शुरू हो गई है। चावल की खेप अयोध्या भेजी जा रही है। इस आशय की खबर स्थानीय अखबारों में भी छपी है। वैसे हमारा कैमूर और रोहतास जिला महीन खुशबूदार चावल का बड़ा उत्पादक इलाका है। हमारे कुदरा बाजार में और उसके आसपास कई दशक से कई बड़ी राइस मिले हैं। ये राइस मिल उसना चावल यानी ब्वाएल्ड राइस का निर्माण करते हैं। यह चावल ज्यादा सुपाच्य होता है। आजकल कई नामचीन कंपनियों के ब्रांडेड राइस कुदरा, खुर्माबाद और उसके आसपास के राइस मिलों से लिए जा रहे हैं।

ग्रीन सिटी भबुआ – मोकरी से आगे बढ़कर हमलोग भबुआ बाजार में पहुंच गए हैं। इन दिनों भबुआ शहर की पहचान ग्रीन सिटी के तौर पर होने लगी है। कुछ साल पहले एक जिलाधिकारी आए उन्होने भबुआ शहर में हरियाली बढ़ाने पर जोर दिया। इसके साथ ही लोगों को अपने घर की बाहरी दीवारों को हरे रंग से रंगने की सलाह दी। लोग उनकी सलाह पर अमल भी करने लगे। तो अब आप भबुआ शहर से होकर गुजरेंगे तो आपको ग्रीन सिटी के लुक का फील आएगा। 

जैसे जयपुर शहर की पहचान पिंक सिटी के तौर पर है। जोधपुर शहर की पहचान ब्लू सिटी के तौर पर है, उसी तरह अब भबुआ की पहचान ग्रीन सिटी के तौर पर होने लगी है। इसी ग्रीन सिटी में अशोक से ससुर जी ने सेना से अवकाश प्राप्ति के बाद अपना घर बना लिया है। तो हमलोग थोड़ी देर के लिए उनसे मिलने उनके घर भी पहुंच गए।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmai.com
-        (GOVIND BHOG RICE, MOKARI VILL, KAIMUR GREEN CITY, BHABUA )

Saturday, February 22, 2020

कुदरा से मुंडेश्वरी घाम की ओर

कुदरा में सुबह सुबह कई साल बाद श्याम सुंदर चाचा और उनके परिवार से मिलना हुआ। सुबह का रास्ता उनके घर। कई तरह के फल सब्जियों का सलाद और सिलबट्टे पर पीसी हुई चटनीजिसे हम भोजपुरी में कुछिला कहते हैं। उसके बाद मेथी के पराठे। अब हमारा कार्यक्रम है मुंडेश्वरी घाम जाने का।

तो अशोक भाई की आल्टो निकल पड़ी है। कुदरा बाजार को पार करते हुए हमलोग भभुआ रोड पर चल पड़े हैं। कई सालों बाद मैं कुदरा को देख रहा हूं। यहां बाजार काफी विकसित हो गया है। शहर विस्तार लेता जा रहा है। कुदरा से भभुआ की सड़क काफी अच्छी है। 


हमलोग भभुआ शहर में प्रवेश करने से पहले ही नगर वाले रास्ते से आगे बढ़ गए हैं। अशोक भाई ने कहा कि शहर के ट्रैफिक से बचते हुए हमलोग आगे बढ़ जाएंगे। एक नहर के साथ वाली सड़क पकड़ी है। आगे भगवानपुर बाजार आया। वहां से बायीं तरफ का रास्ता लिया। थोड़ी देर बाद हमलोग माता मुंडेश्वरी के मंदिर के करीब हैं। मंदिर परिसर में जाने वाले वाहनों को पार्किंग फीस चुकानी पड़ती है। मंदिर से ठीक पहले एक छोटा सा बाजार है। यहां पूजा और प्रसाद की दुकाने हैं। ज्यादातर दुकाने महिलाएं और लड़कियां संचालित कर रही हैं।

मुंडेश्वरी देवी का मंदिर कैमूर की पहाड़ की तलहटी में एक छोटी सी पहाड़ी पर स्थित है। तो मंदिर तक जाने के लिए दो रास्ते हैं। या तो आप सीढ़ियों के रास्ते से पैदल चलकर जाएं। ज्यादातर श्रद्धालु ऐसा करते हैं। अगर आपके पास अपना वाहन है और आप निष्णात चालक हैं तो वाहन चलाते हुए घुमावदार रास्ते से मंदिर के मुख्य द्वार तक पहुंच सकते हैं।  


अशोक भाई कार चलाते हुए मंदिर तक पहुंच गए। मंदिर के प्रवेश द्वार पर गाड़ी पार्क करके हमलोग मंदिर में प्रवेश कर गए। दोपहर में मंदिर बंद होने से पहले हमें दर्शन करने का सौभाग्य मिल गया।

मंदिर परिसर में पीछे की ओर हवन कुंड बना है। मुंडेश्वरी मंदिर परिसर में सैकड़ो पुरानी टूटी फूटी मूर्तियों को अवशेष नजर आते हैं। दरअसल यह एक पंचायत शैली का मंदिर था। यहां के कई मंदिर अब नष्ट हो चुके हैं। सिर्फ मुख्य मंदिर बचा है। वह भी पूरी तरह यानी साबुत नहीं बचा है।

पर इस मंदिर से जुड़ी हुई तमाम मूर्तियां आप पटना के संग्रहालय में देख सकते हैं। छठी सातवीं शताब्दी में बनी मुंडेश्वरी से प्राप्त मूर्तियों को वहां पर संग्रहित किया गया है।
अब हमलोग मंदिर में दर्शन के बाद हमलोग मंदिर के प्रवेश द्वार से बाहर निकलकर पीछे पहाड़ी का नजारा करने चल पड़े। यहां पर एक पहाड़ी का आकर ऐसा है जो किसी दैत्य की जिह्वा जैसा नजर आता है। पहाड़ी से नीचे के आसपास के गांव नजर आते हैं।

हमारे आसपास के गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि चार पांच दशक पहले मुंडेश्वरी मंदिर तक पहुंचने का रास्ता इतना आसान नहीं था। सिढ़ियां भी नहीं थीं। पर अब प्रशासन की ओर से काफी इंतजाम कर दिए गए हैं। रास्ता बेहतर हो गया। मंदिर के आसपास सुरक्षा और खाने पीने का इंतजाम भी है। मंदिर के प्रवेश द्वार के आसपास दिन भर रौनक रहती है। तो कुछ घंटे माता के दरबार में गुजारने के बाद हमलोग वापस लौट चले हैं।
मंदिर के बारे में और पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएं-  मुंडेश्वरी देवी 
मुंडेश्वरी मंदिर समूह के बारे में और जानें - पटना संग्रहालय में मुंडेश्वरी देवी की मूर्तियां। 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com

-        ( MUNDESHWARI DEVI, KAIMUR, BHABUA, BIHAR )  
   


Thursday, February 20, 2020

सितारों को खबर ही नहीं मुसाफिर ने कहां दिन गुजारा कहां रात की...

छोटी सी सूचना पर गांव जाने का कार्यक्रम बन गया। वहां मेरे एक चचेरे भाई की शादी है। मुगलसराय ( दीनदयालनगर ) तक का आरक्षण मिल पाया है 15484 महानंदा एक्सप्रेस में। मैंने समय सारणी में देखा दिल्ली में एक रेलवे स्टेशन है दिल्ली शहादरा। कुछ एक्सप्रेस ट्रेनें यहां भी रुकती हैं। इनमें से महानंदा एक्सप्रेस भी एक है। सुबह 6.50 में शहादरा पहुंचने वाली ट्रेन में मेरा टिकट कनफर्म हो गया है।


तो मैं शहादरा सुबह 6.10 बजे पहुंच गया हूं। मेरे घर से तकरीबन चार किलोमीटर होगा ये रेलवे स्टेशन। इसका स्टेशन कोड है DSA कुछ ही एक्सप्रेस रेलगाड़ियां शहादरा में रुकती हैं। पर ये रेलवे स्टेशन जंक्शन है। यहां से शामली सहारनपुर की लाइन अलग होती है। शहादरा उन रेलवे स्टेशनों से शामिल है जिसके ठीक बगल में मेट्रो रेलवे का स्टेशन भी स्थित है। यानी यहां गाड़ी बदलना सुगम है। सुबह सुबह ही इस स्टेशन पर खूब चहल पहल दिखाई दे रही है। रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर पूड़ी सब्जी और छोले भठूरे की दुकानें गुलजार हैं। यहां 30 रुपये में दो छोला भठूरा मिल रहा है। हमारी ट्रेन महानंदा एक्सप्रेस बिल्कुल समय पर है। सुबह सात बजे मैं अपने कोच में सवार हो गया हूं। कुछ लोग इस ट्रेन की आलोचना करते हैं पर आपको कहीं जाना हो तो जिस ट्रेन में आरक्षण मिल जाए उस समय उसी ट्रेन को अच्छा मानना चाहिए।

कानपुर तक महानंदा का सफर समय पर चलता रहा। कानपुर जंक्शन पर बाहर उतर कर हमने पराठे खाए। इसके बाद ट्रेन थोड़ी थोड़ी लेट होने लगी। मैंने अपनी किताबें निकाल ली है। पढ़ते हुए सफर कट रहा है। इलाहाबाद पहुंचते हुए रात हो गई है। मैं वक्त काटने के लिए यूट्यूब पर गौतम घोष की पार फिल्म देखने लगा। इसकी कहानी बिहार के मुंगेर जिले के कोइरी ग्राम से शुरू होती है। यह मुशहर जाति के लोगों की संघर्ष कथा है। बेहतरीन फिल्म है। 

वैसे तो दीनदयाल नगर में इसका निर्धारित समय रात्रि नौ बजे का है पर यह ट्रेन रात एक बजे के बाद दीन दयालनगर पहुंची है। मुगलसराय का नाम बदलकर दीनदयाल नगर किए जाने के बाद पहली बार मैं यहां उतरा हूं। मेरी अगली ट्रेन सुबह 4 बजे है। यह गया पैसेंजर है जो हमारे गांव के निकटतम स्टेशन कुदरा में रुकती है। इस बीच मेरे पास समय है तो थोड़ा स्टेशन के बाहर घूम आता हूं। बाहर स्टेशन गेट के आसपास दुकानें सारी रात खुली रहती हैं। कुछ मिठाइयों और चाय नास्ते की दुकानें भी खुली हैं। यहां पर मिट्टी की प्याली में चाय मिल रही है। पांच रुपये में। चार बजने से पहले आगे का टिकट खरीदकर मैं प्लेटफार्म नंबर छह सात पर पर पहुंच गया हूं।

मैं देख रहा हूं कि विशाल दीनदयाल नगर रेलवे स्टेशन की साफ सफाई और सौंदर्यीकरण में काफी बेहतर स्थिति हो गई है। हर प्लेटफार्म पर बैठने की पर्याप्त जगह बन गई है। अच्छी कैंटीनें खुल गई हैं। कुछ साल पहले के मुगलसराय स्टेशन और अब के दीनदयाल नगर स्टेशन पर स्वच्छता और सुविधाओं के मामले में काफी अंतर आ गया है।
मेरा ये सफर कुछ इस तरह हो गया है मानो - सितारों को खबर ही नहीं मुसाफिर ने कहां दिन गुजारा कहां रात की...

खैर मेरी ईएमयू ट्रेन सुबह चार बजे नहीं पहुंची। पता चला कि जो ट्रेन इलाहाबाद के सूबेदारगंज स्टेशन से चलती है, वही आगे गया ईएमयू बनकर जाती है। पर ये ट्रेन अभी लेट है। तीन घंटे लेट से वह ट्रेन सुबह 4.45 बजे पहुंची। फिर यहां से सुबह के पांच बजे रवाना हुई। इस बीच वाराणसी आसनसोल पैसेंजर का भी समय हो गया है। पर मैं गया पैसेंजर में ही बैठ गया हूं। एक एक करके छोटे छोटे स्टेशन पार हो रहे हैं। चंदौली मझवार, कर्मनाशा, दुर्गावती, भभुआ रोड आदि। सुबह सात बजे के आसपास मैं कुदरा रेलवे स्टेशन पर उतर गया हूं। प्लेटफार्म पर मेरे भाई अशोक मेरा इंतजार कर रहे हैं। इस सुहानी सुबह में मुझे लता जी का गीत याद आ रहा है - जहां पे सबेरा हो बसेरा वहीं है...     
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( SHAHDARA DELHI , DINDAYAL NAGAR, KUDRA ) 
और कहां, अपने गांव के निकटतम रेलवे स्टेशन पर...



Tuesday, February 18, 2020

बनारस में लिट्टी चोखा का स्वाद

शेरगढ़ से लौटते हुए हमलोग चेनारी में नास्ते के लिए रूके। अब शाम गहरा गई है। हमलोग सासाराम के लिए बेदा नहर वाली सड़क पर चल रहे हैं। अचानक रात के अंधेरे में कब हमने नहर वाला रास्ता छोड़ दिया ये पता ही नहीं चला। तो हमलोग भभासी,  चंद्र कैथी,  बिलासपुर गांव होते हुए आगे बढ़ रहे हैं। अगला गांव है कझांव। हमलोग चोर,  बड्डी,  आलमपुर के आसपास चल रहे हैं। थोड़ी देर में फिर से नहर के साथ चलती हुई सड़क मिल गई। अब इस सड़क पर चलते हुए हमलोग बेलाढ़ी पहुंचे हैं। इसके बाद बेदा में सासाराम के पुराने जीटी रोड पर पहुंचे गए। पर इस रास्ता भटकने के कारण अपने जिले के कई गांवों का भ्रमण हो गया।



वैसे तो खाने पीने और घूमने में बनारस दिल्ली मुंबई तरह महंगा शहर है। पर यहां आपको लिट्टी चोखा खाने में सस्ते में मिल सकता है। वाराणसी कैंट रेलवे स्टेशन के बाहर कई लिट्टी चोखा के स्टाल हैं। अगर किसी दूसरे व्यंजन से तुलना करें तो लिट्टी चोखा बनारस में सबसे सस्ता है।  

ये लोग कोयले के चूल्हे पर लिट्टी पकाते हैं। इनकी लिट्टी की दरें हैं दस रुपये में दो। या बीस रुपये में चार। इसके साथ आलू बैगन का चोखा। इस चोखा का आलू बैगन भी इसी कोयले के चूल्हे पर पकता है। हालांकि वे लिट्टी के साथ घी , बटर जैसी कोई चीज नहीं लगाते। वाराणसी से गुजरने के क्रम में मैंने यहां पर लिट्टी चोखा का स्वाद लिया। 

हालांकि इनकी लिट्टी थोड़ी कड़ी होती है। आपको तोड़ने के लिए ताकत लगानी पड़ती है। पर वाराणसी में इससे सस्ता खाने में आपको कुछ और नहीं मिल सकता है। वैसे वाराणसी से आगे चलने पर दक्षिण बिहार के हर शहर में आपको लिट्टी चोखा खाने को मिल ही जाएगा।

इस बार जब सासाराम पहुंचा तो मां ने एक दिन घर में लिट्टी बनाई। पर घर में अब लकड़ी या कोयले का चूल्हा नहीं है पर लिट्टी बनी कैसे। गैस के चुल्हे पर ही बनी। उसके लिए भी तकनीक आ गई है। कई लोग गैस पर लिट्टी बनाने के लिए ओवन खरीदते हैं। यह ओवन एक हजार रुपये या उससे अधिक का आता है। पर उससे भी सस्ता तरीका है अप्पम पर लिट्टी पकाना।

वैसे तो अप्पम दक्षिण भारतीय रसोई घर का यंत्र है। से गैस चूल्हे पर रखकर गुंता या दूसरी चावल की गोल गोल डिश बनाई जाती है। पर उत्तर भारत के लोगों ने अप्पम पर लिट्टी बनाना शुरू कर दिया है। सासाराम के बर्तन दुकानों में यह बिकने लगा है। कुल 12 खाने वाला अप्पम स्टैंड 500 रुपये में मिल जाता है। इसमें हैंडल और ढक्कन भी लगा हुआ है। तो इसकी मदद से आप गैस चूल्हे पर भी बड़े आराम से लिट्टी बना सकते हैं।

इस तरह बनाएं लिट्टी - एक साथ 12 लिट्टी के गोले बनाएं। इन सब में सत्तू का मसाला मतलब मकुनी भरें। इस मकुनी को कैसे बनाते हैं। सरसों तेल, नमक, लहसुन, प्याज, मंगरैला, आजवाइन, धनिया पत्ता आदि को सत्तू में मिलाएं। गैस चूल्हे पर धीमी आंच पर अप्पम के स्टैंड में एक सथ 12 लिट्टी रख दें। इसके बाद ढक्कन से ढक दें। इसे धीमी आंच पर पकने दें। बीच में एक दो बार लिट्टी को उलटना पलटना पड़ता है। पर इस तरह बड़ी आसानी से तीन लोगों के खाने भर लिट्टी तैयार हो जाती है। बिना ज्यादा श्रम के और बिना किसी आवाज के भोजन तैयार।

पकी हुई लिट्टी में उपर से घी लगाकर खाएं। लिट्टी को आप चटनी और चोखा के साथ खा सकते हैं। आपकी मर्जी। शार्ट कट में चटनी बनाने का भी एक तरीका है। प्याज, टमाटर, लहसुन, धनिया पत्ता, सरसों तेल, आमचूर पाउडर मिलाएं। इसे मिक्की में एक मिनट पीस दें। बस चटनी तैयार हो गई।  तो इस तरह आप शहर में बिना धुआं वाले चुल्हे के भी लिट्टी चोखा खाने का मजा ले सकते हैं।     
-        विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com
-        ( LITTI CHOKHA, APPAM STAND ON LPG STOVE )

Sunday, February 16, 2020

दुर्गावती जलाशय परियोजना - बन गई हकीकत


शेरगढ़ किले से उतरने के बाद हमलोग दुर्गावती जलाशय की ओर चल पड़े हैं। यह शेरगढ़ किले की तलहटी यानी राजघाट से कोई एक किलोमीटर आगे है। यह रोहतास और कैमूर जिले के बहुप्रतिक्षित जलाशय परियोजना है जो कई दशकों बाद जाकर पूरी हो सकी है। जलाशय परियोजना पर जो शिलापट्ट लगा है उसके मुताबिक यह 2014 में पूरी हुई। तब इसका उदघाटन तत्कालीन मुख्यमंत्री जीतन राम माझी ने किया था। हालांकि आसपास का नजारा देखकर लग रहा है कि यहां अभी भी काम चल रहा है।

इस परियोजना का निर्माण बिहार सरकार के सिंचाई विभाग ने किया है। सत्तर के दशक में दुर्गावती नदी में बांध बनाकर नहर निकालने पर विचार हुआ था। इस बांध की जद में करमचट नामक गांव आ गया। इसलिए आसपास के लोग इसे करमचट डैम भी कहते हैं। दुर्गावती जलाशय परियोजना के पूरा हो जाने से कैमूर और रोहतास जिले के काफी गांव को लाभ हुआ है। इससे निकाली गई  नहरों से भभुआ और चेनारी के आसपास के गांव में पानी पहुंचने लगा है। इससे खेती बाड़ी सहज हो गई है।

हमलोग दुर्गावती जलाशय के मुख्य बांध पर चल रहे हैं। यह करीब डेढ़ किलोमीटर से भी ज्यादा लंबा है। इसके दूसरे कोने पर पहुंचने पर एक पहाड दिखाई देता है। इस पहाड़ की लंबाई चौड़ाई ज्यादा नहीं है पर यह ऊंचाई में कई मंजिले मकान की तरह तनकर खडा है। इसे देखकर किसी दैत्य जैसा अनुभव होता है। कई लोग इस पहाड़ के साथ तस्वीरें निकालने में व्यस्त हैं।


दुर्गावती जलाशय परियोजना के बारे में हम बचपन से सुनते आए हैं। हमारे कई रिश्तेदार इस परियोजना में नौकरी करते थे। पर सरकारी लालफीताशाही के कारण ये परियोजना कई दशकों तक लटकी रही। इसका काम कछुए की गति से चल रहा था। कई सालों तक तो इसमें कर्मचारी बिना काम किए वेतन उठाते रहे। इस बीच कई सरकारें आई और गईं। इलाके की जनता मांग करती रही पर जन प्रतिनिधि अनसुना करते रहे। पर सन 2010 के बाद इसके काम में तेजी आई। तत्कालीन सांसद मीरा कुमार ने इसमें रुचि ली। राज्य सरकार ने भी सहयोग किया फिर जाकर ये परियोजना हकीकत बन सकी। 

इस परियोजना के पूरा होने में कुल 38 साल लगे। इस परियोजना की आधारशिला 1976 मे तत्कालीन केंद्रीय मंत्री जगजीवन राम ने रखी थी। दुर्गावती नदी बिहार उत्तर प्रदेश की सीमा कर्मनाशा के आसपास से निकलती है। आगे इसमें और कई छोटी छोटी नदियां समाहित हो जाती हैं।


दुर्गावती जलाशय परियोजना के बांध की ऊंचाई 90 मीटर है। इससे पानी छोड़े जाने पर आसपास का 40 हजार हेक्टेयर जमीन सींचित हो सकता है। जब इस परियोजना की शुरुआत हुई तो इसकी लागात का आकलन 25 करोड़ रुपये किया गया था। पर अब तक इसमें एक हजार करोड रुपये से ज्यादा खर्च किया जा चुका है। 

अतीत में जाएं तो इस परियोजना की मांग 1951-52 में स्थानीय लोगों ने तत्कालीन वित्त मंत्री अनुग्रह नारायण सिंह से की थी। तब इस क्षेत्र में अकाल पड़ा था। एक बार फिर 1966 के अकाल के बाद इस परियोजना की मांग की गई। पर इस पर काम की शुरुआत इसके दस साल बाद हो सकी।  
दुर्गावती जलाशय के पास से ही गुप्ता बाबा के धाम जाने का रास्ता है। यहां से धाम की दूरी 12 किलोमीटर है। आप पैदल,  बाइक या फिर ट्रैक्टर से जा सकते हैं। स्थानीय लोग सुगवा घाट और पनेरिया घाट से पदयात्रा करते हुए धाम तक जाते हैं। 


- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( DURGAWATI DAM PROJECT, KARAMCHAT DAM, ROHTAS, KAIMUR, JAGJEEVAN RAM, MIRA KUMAR)