Wednesday, December 11, 2019

रंगत के रंग और नींबूडेरा में दोपहर का भोजन


रंगत पोर्ट ब्लेयर और डिगलीपुर के बीच सबसे बड़ा शहर है। पोर्ट ब्लेयर से कुछ बसें रंगत तक के लिए रोज आती हैं। यहां तक पोर्ट ब्लेयर से समंदर के रास्ते से भी पहुंचा जा सकता है। रंगत का बाजार बंगाली बहुल है। सन 2001 में रंगत की आबादी 40 हजार के आसपास थी। यहां हमें गन्ने की जूस वाली दुकान दिखाई दे रही है।

हमारी बस रंगत पुलिस थाना के सामने रुक गई है। पर बस से उतरने वाला कोई नहीं है। हमें थोड़ी उम्मीद जगी थी कि यहां कोई उतर जाए तो हमें आगे की सीट मिल जाएगी। पर ऐसा नहीं हो सका। मतलब पूरा सफर पीछे वाली सीट पर ही करना पड़ेगा। रंगत बाजार में सामने डाकघर का भवन नजर आ रहा है। नन्हा सा लेटर बॉक्स लगा है, पर यहां भी अब चिट्ठी लिखने वाले लोग कम हो गए हैं।

रंगत के आसपास आठ किलोमीटर की दूरी पर आमकुंज बीच है। रंगत में रुकने वाले सैलानी इस समुद्र तट पर समय गुजारने जाते हैं। पर हमने इस बीच का नजारा अपनी बस की खिड़की से ही किया। रंगत के पास टर्टल नेस्टिंग ग्राउंड देखा जा सकता है। पर इसके लिए दिसंबर से फरवरी तक का समय मुफीद है। रंगत में अंदमान का जवाहर नवोदय विद्यालय भी स्थित है।

हमारी बस रंगत से आगे चल पड़ी है। सड़क की हालत इतनी खराब है कि इसे नेशनल हाईवे कहना तौहीन होगी। थोड़ी देर बाद हमारी बस समंदर के किनारे किनारे चल रही है। यानी सड़क मरीन ड्राईव में बदल गई है। नीले समंदर को देखते हुए सफर करते रहना बड़ा आनंददायक है। किनारे के पत्थरों से टकराकर लहरें वापस जा रही हैं। वहां दूर समंदर में एक नाव भी दिखाई दे रही है।

समंदर के साथ चलने का ये नजारा बड़ा मोहक है। समुद्र तट पर कुछ आम के पेड़ दिखाई दे रहे हैं। शायद इसलिए तट का नाम आम्रकुंज बीच रखा गया होगा। इसी बीच हमें समंदर में आकर मिलती हुई एक नदी भी दिखाई देती है।
अब हमलोग रंगत से आगे बकुलतल्ला नामक गांव से गुजर रहे हैं। अब हमें भूख लगने लगी है। जोरों की भूख। हमें इंतजार है कि ड्राईवर महोदय खाने के लिए कब और कहां पर रोकेंगे।

मैं रास्ते में पड़ने वाले छोटे छोटे पड़ाव के नाम पढ़ने की कोशिश कर रहा हूं। हमारी बस बकुलतल्ला के बाद पद्मनाभपुरम, बेटापुर, शिवापुरम से गुजरते हुए बिल्लीग्राउंड पहुंच गई है। बिल्ली ग्राउंड मे थाना है। थाने का भवन हमारी नजरों के सामने है।

बिल्ली ग्राउंड के बाद हम हरिनगर से गुजर रहे हैं। हमारी नजरों के सामने हरिनगर का पंचायत भवन है। पंचायत की इमारत काफी सुंदर है। रास्ते में पड़ने वाले इन ज्यादातर शहरों के नाम देखकर सुनकर लगता है कि ये बाद में बसाए हुए शहर है। ये सही है क्योंकि इनमें ज्यादातर सेटलर्स की आबादी है। 

अब हमारी बस नींबूडेरा पहुंच गई है। दोपहर के सवा बारह बजे हैं। हमें बस में बैठे आठ घंटे हो चुके हैं। चालक महोदय ने लक्ष्मी होटल के सामने बस रोक दी है। होटल के मालिक का नाम केसी ब्यापारी है। यहां शाकाहारी और मांसाहारी दोनो तरह की थाली खाने में उपलब्ध है। हमने शाकाहारी थाली ली। यह थाली 120 रुपये की है। यहां पर समोसा और मिठाइयां भी मिल रही हैं। माधवी और वंश से ज्यादा कुछ नहीं खाया।

उन लोगों ने थाली के बजाय समोसा और मिठाइयां लीं। इस होटल का खाना औसत दर्जे का है। थाली वंश को पसंद नहीं आई। बस में पीछे की सीट होने के कारण भी वे लोग ज्यादा खाने से बचना चाह रहे हैं। दोपहर के खाने के बाद बस एक बार फिर चल पड़ी है। थोड़ी देर में ही हमलोग मायाबंदर पहुंच गए हैं। शहर से पहले हमें एयर स्ट्रीप दिखाई दे जाती है। आपात स्थिति में यहां विमानों की उडा़न होती है। 

मायाबंदर डिगलीपुर से पहले बड़ा बाजार है। रंगत और मायाबंदर तक पोर्ट ब्लेयर से पानी के जहाज के मार्ग से भी पहुंचा जा सकता है। हमारी बस मायाबंदर में 20 मिनट से ज्यादा रुकी। यहां पर बस से कुछ सामान उतारा गया। लंबी दूरी की ये बस यात्रियों के साथ सामान ढोने का भी काम करती है। रंगत से मायाबंदर की दूरी 70 किलोमीटर है। मायाबंदर शहर में डिग्री कॉलेज भी है। यहां से डिगलीपुर दो घंटे से ज्यादा का रास्ता है और हमारी यात्रा अभी जारी है।

( यात्रा मार्ग -  रंगत - बकुलतल्ला – पद्मनाभपुरम-  बेटापुर-  शिवापुरम – बिल्लीग्राउंड – हरिनगर- नींबूडेरा –मायाबंदर )

पोर्ट ब्लेयर से रंगत – 162 किलोमीटर
रंगत से मायाबंदर – 70 किलोमीटर
रंगत से डिगलीपुर – 74 किलोमीटर।
-विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com

2 comments:

  1. रोचक यात्रा वृत्तांत...हाँ, यात्रा में खाने का स्वाद थोड़ा बिगड़ जाये तो दिक़्क़त होती है...मैं तो अक्सर ही हल्का फुलका खाने को तरजीह देता हूँ...पेट ठीक रहे तो यात्रा आसान हो जाती है....

    ReplyDelete