Monday, November 11, 2019

कुशीनगर से गोपालगंज वाया तमकुही राज


कुशीनगर हाईवे पर पहुंच कर आगे के लिए वाहन का इंतजार कर रहा हूं। एक आटो रिक्शा मिला जिसने मुझे कसेया बाजार के बस स्टैंड तक छोड़ दिया। लोगों ने सलाह दी कि यहां से सीधे गोपालगंज की बस का इंतजार करने के बजाय तमकुही राज तक चले जाएं। वहां से दूसरी बस मिल जाएगी। पांच मिनट में कसेया से मुझे तमकुही जाने वाली बस मिल गई। 

अब हम एनएच 27 पर चल रहे हैं। यहा नया नंबर है। यह एनएच 27 सड़क गुजरात के पोरबंदर से शुरू होकर असम से सिलचर तक जाती है। इसकी कुल लंबाई 3507 किलोमीटर है। नए नबंर संयोजन में एनएच 27 देश के सबसे लंबे नेशनल हाईवे में से एक हो गया है। 
एक घंटे से कम समय में बस ने हमें तमकुही राज पहुंचा दिया। मुझे तमकुही पहुंच कर केदारनाथ मिश्र जी की याद आई। एक गांधीवादी शिक्षक जो 1993 में सदभावना रेल यात्रा में हमारे साथ हुआ करते थे। वे इसी तमकुही के रहने वाले थे। ब्रिटिश काल में तमकुही एक छोटा सा राजघराना था। अब यह कुशीनगर जिले का छोटा सा बाजार है। गोरखपुर से पडरौना होकर थावे सीवान जाने वाले रेल मार्ग पर तमकुही रेलवे स्टेशन भी है।

भारी बारिश से तमकुही की सड़क पर जल जमाव हो गया है। पर इसी जल जमाव में छाता लेकर एक सज्जन गोपालगंज -गोपालगंज की आवाज लगा रहे हैं। तो मुझे इंतजार नहीं करना पड़ा। मैं फटाफट बस में जाकर बैठ गया। थोड़ी देर में आवाज लगाने वाले सज्जन आए। वे दरअसल इस बस से ड्राईवर ही थे। और बस फिर एक बार एनएच 27 पर चल पड़ी है। रास्ते में छोटे छोटे पड़ाव पर सवारियां उतारती जा रही है। सलेमगढ़ उत्तर प्रदेश का आखिरी कस्बा है इस मार्ग पर। 

इसके बाद बस बिहार राज्य में प्रवेश कर गई है। बिहार का पहला कस्बा आया कुचायकोट। यह गोपालगंज जिले का एक छोटा सा बाजार और विधानसभा क्षेत्र भी है। इसके बाद आया फुलवरिया। वही फुलवरिया जो बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव का गांव है। इसके बाद बस सासामूसा बाजार के बाहरी इलाके से होकर गुजरी। कोन्हवा के बाद गोपालगंज शहर के करीब हमलोग पहुंच रहे हैं। पर मुझे गोपालगंज बाजार में नहीं जाना, बल्कि उससे पहले ही बसडीला में उतर जाना है जो गांव बिल्कुल हाईवे पर ही है। 

चाचाजी ने जो मुझे लैंडमार्क बताया था मैं बस के चालक महोदय से आग्रह करके वहीं उतर गया। यह संयोग रहा कि मैं रामचंद्र सिंह अंकल के घर के ठीक सामने उतरा हूं। वे बाहर खड़े मेरा ही इंतजार कर रहे थे। कई सालों बाद उनसे मिलना हुआ है। सन 1999 में सीवोटर के लिए बिहार में चुनावी सर्वेक्षण के कार्य के दौरान मैं इधर आया था।

आपको बता दूं कि रामचंद्र सिंह अंकल और मेरे पिता जी दोनों ही उत्तर बिहार ग्रामीण बैंक में मैनेजर रहे। मुझे कई साल रामचंद्र अंकल के साथ रहने का मौका मिला है। सातवीं आठवीं कक्षा में पढ़ाई के दौरान शरतचंद्र, चतुरसेन शास्त्री जैसे उपन्यासकारों को पढ़ने की प्रेरणा मुझे उनसे ही मिली। हिंद पाकेट बुक्स की घरेलू लाइब्रेरी योजना का सदस्य मैं उनकी प्रेरणा से बना। बारहवीं कक्षा में आते आते में  उनकी सलाह पर काफी साहित्यिक पुस्तकें पढ़ चुका था। इस साहित्यिक रुझान के कारण ही शायद मैं पत्रकारिता जैसे पेशे में आ गया। चाचा जी की प्रेरणा से स्कूली जीवन में मैंने शरतचंद्र की श्रीकांत पढ़ी। उस श्रीकांत के कारण ही खूब घूमने की प्रेरणा मिली।

चाचाजी की तीनों बेटियों का विवाह हो चुका है। दोनों बेटे भी बाहर रहकर नौकरी कर रहे हैं। अब चाचा और चाची दोनों गोपालगंज के पास बसडीला में अपने विशाल घर में रह रहे हैं। तो रामचंद्र चाचाजी अब काफी बुजुर्ग हो चुके हैं। इधर के कई सालों में लगातार कई बीमारियों के इलाज के कारण सेहत पहले जैसी नहीं रही। पर उनकी जीजिविषा गजब की है। वही उमंग और उत्साह आज भी चेहरे पर दिखाई देता है। मेरे लिए खासतौर पर सफेद मालदह आम जो पेड़ के पके हुए हैं उन्होंने मंगवाकर रखा है। तो आज की शाम चाचाजी के नाम।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-        ( KASEYA, KUSHINAGAR, TAMKUHI RAJ, GOPALGANJ, NH 27  )

6 comments:

  1. सुन्दर विवरण। बहुत दिनों बाद परिचित से मिलना सचमुच सुखमय होता है। रामचंद्र सिंह जी जैसा हाल मेरे माता पिता का भी है। मैं और मेरी बहन बाहर रहते हैं और वो अकेले घर में। हमारी पीढ़ी के कई लोगों के यही हाल हैं।

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  2. वाह चाचाजी के बारे में पढ़कर अच्छा लगा...आप cvoter के सर्वेक्षण के लिए भटके हो यह भी बढ़िया है.......तमकुही रॉज के बारे में कल पहली बार पढ़ा और आज आपके लेख में वापस से पढ़ने को मिल गया....

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    1. वे हमारी प्रेरणा हैं

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  4. बहुत अच्छा लगा की आप आये. मैं भी अगर वहां तो काफी आनंद आता,

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