Friday, November 29, 2019

चिड़ियाघर, सन सेट प्वाइंट और बैंगन का पकौड़ा


चिड़िया टापू में हसीन शाम गुजारने के बाद हमलोग सूरज ढलने से पहले सन सेट प्वाइंट तक पहुंच जाना चाहते हैं। तो जल्दी जल्दी आटो में बैठकर अपने अगले पड़ाव की ओर बढ़ चले। चिड़िया टापू से दो किलोमीटर पहले समुद्र के तट पर एक क्षेत्र है जिसे लोग सनसेट प्वाइंट कहते हैं। यहां पर सूरज को डूबते हुए देखना सुंदर अनुभूति है। समंदर के उस पार जंगल में सूरज धीरे धीरे उतरता हुआ कहीं खो जाता है। पर आज बादलों का मौसम है। हम सूरज को डूबते हुए उतरने बेहतर ढंग से नहीं देख पाए जितना आम तौर पर लोग देख पाते हैं।

बहुमूल्य मैंग्रोव – मैंग्रोव क्या हैं। मैंग्रोव ऐसे जंगल को कहते हैं जो नमकीन पानी को सहन कर लेता है। यह हाई टाइड और लो टाइड वाले क्षेत्रों के आसपास पाया जाता है। चिड़िया टापू के आसपास आपको ऐसे मैंग्रोव देखने को मिलते हैं। अंदमान के कुल वन क्षेत्र में 8.6 फीसदी इलाका मैंग्रोव का है। मैंग्रोव क्षेत्र में प्राप्त होने वाली लकड़ी काफी बहुमूल्य होती है। इनका कई तरह का इस्तेमाल है। काफी पहले लोग मैंग्रोव की उपादेयता नहीं समझते थे। पर अब इसकी कीमत का एहसास हो गया है। पारिस्थितिकी संतुलन में भी इनकी बड़ी भूमिका है। अब वन विभाग इनके संरक्षण को लेकर सचेत है।

बोटानिकल गार्डनचिडिया टापू में अंदमान निकोबार का बोटानिकल गार्डन भी बना हुआ है। इस बोटानिकल गार्डन के प्रवेश द्वार पर आपको विशाल ह्वेल मछली की खोपड़ी के दर्शन होते हैं। इसकी खोपड़ी को देखकर आप सहज की अंदाजा लगा सकते हैं कि ह्वेल कितनी विशाल रही होगी। 

घने जंगलों के बीच बायोलॉजिकल पार्क, चिड़िया टापू का प्रवेश द्वार खूबसूरत नजर आ रहा है। इसकी स्थापना एक अक्तूबर 2009 को अंदमान प्रशासन द्वारा की गई थी। अगर आपको चिड़िया घर की सैर करनी है तो आपको इस क्षेत्र में दोपहर तक ही पहुंच जाना चाहिए। 

पहले जैविक उद्यान घूमें उसके बाद शाम को चिड़िया टापू की ओर प्रस्थान करें। पार्क खुलने का समय सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक का है। प्रवेश टिकट बड़ों के लिए 20 रुपये और बच्चों के लिए 10 रुपये का है। पार्क के अंदर घूमने के लिए बैटरी से चलने वाली गोल्फ कार्ट की सेवा उपलब्ध है। इसके लिए आपको महज 20 रुपये अतिरिक्त देने पड़ते हैं। स्टिल फोटोग्राफी के लिए कोई शुल्क नहीं है। वीडियोग्राफी के लिए शुल्क देना होगा।

शाम को आलू बैगन पकौड़ा – चिड़िया टापू से अब वापसी का समय हो गया है। पर सनसेट प्वाइंट के पास कुछ दुकाने हैं। हम वहां पर रुक जाते हैं। थोड़ी भूख लगी है। एक दुकान पर आलू , बैंगन, केला, मिर्च आदि के पकौड़े बनाए जा रहे हैं। आपके आर्डर देने के बाद दुकानदार बैगन और केले को काटकर ताजे पकौड़े बना रहे हैं।

 तो हमलोगों  ने एक प्लेट पकौड़े का आर्डर दे डाला। हालांकि खाने के दौरान उन्होने बताया कि वे तलने के लिए पाम आयल का इस्तेमाल कर रहे हैं। तब थोड़ा दुख हुआ। पर कभी कभी पाम आयल खा लेने में कोई खास दिक्कत नहीं होनी चाहिए। तो अब चलें वापस शहर की ओर।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( MANGROVES , BOTANICAL GARDEN )

Wednesday, November 27, 2019

चिड़िया टापू की ओर- समंदर के संग एक शाम सुहानी


अंदमान में दूसरा दिन है। रॉस से लौटने के बाद हम चिड़िया टापू जाना चाहते हैं। एक आटो रिक्शा वाले से बात की। चिड़िया टापू जाना, वहां इंतजार करना और वापसी। उनसे 1200 रुपये में सौदा तय हुआ। चिड़िया टापू की दूरी पोर्ट ब्लेयर के अबरडीन बाजार से कोई 35 किलोमीटर है। तो सौदा कोई बुरा नहीं था। आटो रिक्शा अंदमान के एयरपोर्ट को पार कर चिड़िया टापू की ओर चल पड़ा है।

अंदमान के कुछ ग्रामीण क्षेत्रों को पार करने के बाद हमलोग चिड़िया टापू के करीब पहुंचने लगे हैं। करीब आते ही ठंड बढ़ने लगी है। आखिरी का दो किलोमीटर का रास्ता जंगलों से होकर गुजरता है।

चिड़िया टापू के स्वागत कक्ष पर हमें अपना नाम पता, फोन नंबर और अपने वाहन के बारे में जानकारी दर्ज करानी पड़ती है। साथ वे हमें ये निर्देश भी देते हैं कि आप यहां क्या क्या न करें। पहली जरूरी बात की चिड़िया टापू के समंदर में नहाने की बिल्कुल मनाही है। किसी भी मृत या जीवित जंतुओं के अंडे संग्रह करने पर रोक है। किसी भी कोरल को यहां से हरगिज नहीं उठाना है। स्वागत पर खाने पीने के नाम पर कच्चा आम, खीरा और झालमुड़ी बिक रहा है। 

नारियल पानी तो जरूर मिलेगा। यहां बड़े आकार का ताजा नारियल पानी 25 रुपये का मिल रहा है। चिड़िया टापू में मुंडा पहाड़ वन क्षेत्र है। यहां लोग जंगलों में ट्रैकिंग करते हुए जाते हैं।  
हमलोग प्रवेश द्वार से अंदर आ गए हैं। यहां पर बैठने के लिए विशाल पेड़ो को काटकर कलात्मक लकड़ी की बेंच बनाई गई है। इन्हीं बेंच पर बैठकर सुस्ताते हुए समंदर को नजारा करना। यही तो यहां काम है और क्या। शाम होने पर यहां काफी सैलानी जुट गए हैं। हमलोग और थोड़ा आगे चल पड़े हैं जंगलों की ओर। एक नहर जैसी जलधारा पर लकड़ी के बने पुल को पार कर हम आगे बढ़ चले हैं।

कुछ विशाल पुराने पेड़ अब ठूंठ बन गए हैं पर उनकी जड़े कलात्मकता लिए हुए दिखाई दे रही हैं। हम कभी समंदर के साथ तो कभी जंगल में तस्वीरें खिंचवाने में जुटे हैं। यहां पर कुछ लकड़ी के सुंदर वाच टावर भी बने हैं। खाली होते ही हम दौड़कर एक वाच टावर पर चढ़ गए। नीचे उतरने पर एक झुले पर बैठकर झुलने लगे।

चिड़िया टापू और मुंडा पहाड़ शाम को समय गुजारने के लिए ही है। यहां शाम को समंदर कई रंग बदलता हुआ दिखाई देता है। अगर आप यहां आते हैं फुरसत में आएं। दो घंटे का समय रखें। अपना सब तनाव भूलकर प्रकृति की निकटता का पूरा आनंद उठाएं। अगर समय है तो मूंडा पहाड़ तक जंगल के रास्ते से ट्रैकिंग करते हुए भी जरूर जाएं।
कैसे पहुंचे – वैसे तो चिड़िया टापू तक बसें भी आती हैं। पर ये बसें समुद्र तट से कई किलोमीटर पहले ही छोड़ देती हैं। बसों की बारंबारता भी काफी कम है। इसलिए सैलानियों को अपना आरक्षित वाहन करके ही आना चाहिए।
इस जगह का नाम चिड़िया टापू इसलिए पड़ा क्योंकि यहां कई किस्म की चिड़िया का डेरा है। बर्ड वाचिंग के शौकीन लोग काफी समय निकालकर यहां पर पहुंचते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( CHIDIA TAPU, MUNDA PAHAD, ANDAMAN ) 

   





Monday, November 25, 2019

रॉस यानी सुभाष द्वीप में दूसरी बार


पिछली यात्रा में मैं रॉस और नार्थ बे गया था। दरअसल राजीव गांधी स्पोर्ट्स कांप्लेक्स से इन दोनों जगह के लिए लगातार बोट सेवा चलती है। आमतौर पर नार्थ बे और रॉस का संयुक्त पैकेज होता है। पर इस बार हम सिर्फ रॉस जा रहे हैं। भला अंदमान के सबसे खूबसूरत द्वीप पर जाने का मौका अनादि और माधवी क्यों छोड़ें। तीन साल में इन बोट का किराया बढ़ गया है। अब सिर्फ एक द्वीप के लिए 350 रुपये प्रति व्यक्ति लिए जा रहे हैं। एक बोट में हमने तीन सीट बुक कर ली है। हमारे साथ एक स्थानीय परिवार भी है जो रॉस देखने जा रहा है।

बोट पर बैठकर हम सबने लाइफ जैकेट बांध लिया है। पर रॉस तो सिर्फ 800 मीटर की दूरी पर है, नाव तेजी से नीले समंदर के पानी में हिलोरें ले रही है। कुछ मिनटों में ही हमलोग रॉस द्वीप पहुंच गए हैं। पर अब इस द्वीप का नाम बदलकर नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वीप हो गया है। सुंदर हिरण और नारियल पानी ने द्वीप पर हमारा स्वागत किया। अनादि और माधवी लग पड़े हिरणों के साथ तस्वीर खिंचवाने में। तो उस बेजुबान जानवर ने भी आनाकानी नहीं की।

इस बार रॉस में हम कुछ उन इलाकों में जा पहुंचने की कोशिश में हैं जहां पिछली बार मैं नहीं जा सका था। हरे भरे पेड़ों की झुरमुट से होते हुए पगडंडी पकड़ कर हमलोग रॉस द्वीप के आखिरी छोर तक पहुंच गए हैं। रास्ते में रॉस के कमिश्नर का निवास स्थान और सैनिकों की बैरक वाले भवन मिले, जो कभी गुलजार रहे होंगे। आखिरी विंदु जहां तक बैटरी कार्ट वाले लेकर आते हैं, वहां से हमने सीढियां उतरनी शुरू की। ये विंदु है दल लोन सेलर की।


समंदर में उतरने की सीढ़ियां बनी है। पानी के बीच में जाकर एक विशाल समाधि बनी है। समंदर पर लगातार अकेले खड़े होकर निगरानी करने वाले नाविक की समाधि बनी है यहां पर। उनके योगदान को याद किया गया है। हाथों में दूरबीन लिए सिर में हैट लगाए एक नाविक की प्रतिमा है यहां पर। उसकी ड्यूटी होती है पल पल चौकसी रखना। पास में समंदर में बना एक पुराना लाइटहाउस दिखाई दे रहा है।
हम जिस प्वाइंट तक पहुंच गए हैं रॉस आने वाले सारे सैलानी यहां तक नहीं आते। इस स्मारक का निर्माण 2010 में कराया गया है। दोपहर की तीखी धूप है , पर ठंडी ठंडी हवाएं चल रही हैं। लोन सेलर प्वाइंट से रॉस द्वीप कैमरे में मुकम्मल नजर आता है। अब वापस जाने के लिए काफी सीढ़ियां चढ़नी है। उतरना तो आसान था पर चढ़ना थोड़ा मुश्किल।

अब रॉस में आए और समंदर में नहीं उतरें ये तो हो नहीं सकता। तो अगले विंदु पर हम उतर पड़े हैं पानी में थोड़ी जल क्रीड़ा करने के लिए। अब सुभाष द्वीप पर भी विशाल तिरंगा लहराने लगा है। वापसी में थकान हो गई है तो नारियल पानी और उसकी मलाई क्यों न खाई जाए। वैसे यहां पर कुल्फी भी मिल रही है। अब लौटने का समय हो गया है। अगर देर की तो पिछली बार की तरह बोट हमें छोड़ कर चली जाएगी। तो चलें।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-        ( ROSS, NETAJEE SUBHASH DWEEP ) 
आगे पढ़ें :चिड़िया टापू की ओर 

Saturday, November 23, 2019

मिलन रेस्टोरेंट और सरदार जी का ढाबा


अपनी पिछली यात्रा में भी हमने अंदमान के खाने-पीने के लोकप्रिय स्टाल के बारे में चर्चा की थी। अपनी दूसरी यात्रा में हम एक बार फिर काटाबोमान दक्षिण भारतीय रेस्टोरेंट में खाने के लिए गए। यह शुद्ध शाकाहारी रेस्टोरेंट हैं। बैठने की जगह थोड़ी कम है। भीड़ होने पर इंतजार करना पड़ता है। पर खाने का स्वाद और गुणवत्ता तीन साल बाद भी वैसी ही है।

अबरडीन बाजार चौराहा से बस स्टैंड की ओर चलते समय बायीं तरफ मिलन रेस्टोरेंट और मिलन बेकरी है। यह अंदमान का सबसे चलता फिरता रेस्टोरेंट है। यहां शाकाहारी और मांसाहारी दोनों तरह के व्यंजन मिलते हैं। यहां पर अबरडीन बाजार इलाके में आने स्थानीय लोग भी बड़ी संख्या में खाते पीते मिल जाते हैं। मिलन का डायनिंग हॉल बड़ा है। आर्डर के बाद तेजी से सर्विस भी मिल जाती है। इस बार के अंदमान यात्रा में कई बार हमने खाने के लिए मिलन को पसंद किया।

हमारे पूरे परिवार को यहां की वेज बिरयानी और वेज पुलाव जैसे व्यंजन पसंद आए। वैसे यहां थाली भी वाजिब दरों पर उपलब्ध है। मिलन में बैठने का मतलब है कि आप यहां पर लंच, डिनर, सुबह का नास्ता, मिठाइयां, दूध, दही जैसा कोई भी उत्पाद आर्डर कर सकते हैं।

मिलन के बेकरी में चिकन समोसा भी मिलता है। अनादि खाना चाहते थे पर स्टाक खत्म हो गया था। वे कई तरह के पेस्ट्री, नमकीन आदि के भी उत्पादक और विक्रेता हैं। मतलब एक ही जगह पर सब कुछ मिल जाता है। कई किस्म की मिठाइयां भी उपलब्ध हैं यहां पर। इसलिए मिलन रेस्टोरेंट हमारी पसंदीदा जगह बन गई।

सरदार जी का शाकाहारी ढाबा - पर इस बार हमने एक और शाकाहारी भोजनालय ढूंढ निकाला। गुरुद्वारा लाइन में एक पंजाबी ढाबा भी है। यह पंजाबी ढाबा हमारे ब्लेयर होटल वाली सड़क पर ही अंदर की तरफ है। कई दशक से पोर्ट ब्लेयर में संचालित ये ढाबा शुद्ध शाकाहारी है। यहां पर आपको तवे की रोटी, दाल, सब्जियां, चावल, पुलाव आदि सब कुछ मिल जाता है। यह ढाबा खूब चलता है। स्थानीय लोग ज्यादा खाने आते हैं। बैठने की जगह थोड़ी कम है। सुबह के नास्ते में यहां पर पराठे भी मिलते हैं। खाने का स्वाद कम मसालों वाला और घर जैसा है।

दो बार हमलोगों ने पंजाबी ढाबा में इस बार भोजन किया। अगर आप सादा पंजाबी भोजन चाहते हैं तो यहां पहुंच सकते हैं। पर यह आम तौर पर उन पंजाबी ढाबों की तरह नहीं है जहां पर तंदूर होता है और मसालेदार सब्जियां मिलती हैं। सेहत के लिहाज से इस पंजाबी ढाबा का खाना अच्छा है। यह अंदमान की धरती पर उत्तर भारतीय स्वाद की अच्छी जगह है। आप यहां पर गांधी चौक या फिर अबरडीन बाजार से टहलते हुए पहुंच सकते हैं।

गोलगप्पे का भी स्वाद लें - पोर्ट ब्लेयर की सड़कों पर गोलगप्पे भी खूब मिलते हैं। ये गोलगप्पे सस्ते भी हैं। अनादि और माधवी रोज शाम को सेल्युलर जेल से पहले वाले चौराहा पर गोलगप्पा खाने के लिए जरूर पहुंचना चाहते थे। ये गोलगप्पे बेचने वाले पश्चिम बंगाल के लोग हैं जो यहां आकर अपना कारोबार कर रहे हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( PORT BLAIR, VEG FOOD, SARDAR JI KA DHABA ) 






Thursday, November 21, 2019

अंदमान के रंग - सागरिका में शॉपिंग


अंदमान की राजधानी पोर्ट ब्लेयर में अगर आप शॉपिंग करना चाहते हैं तो उसके लिए सागरिका मुफीद जगह हो सकती है। इस बार हमने अपने समय में से कुछ घंटे निकाल रखे हैं खास तौर पर सागरिका के लिए। यहां पर अंदमान के अलग अलग हिस्से के बने हुए कला शिल्प से जुड़ी वस्तुएं वाजिब दाम पर खरीदी जा सकती है।

सबसे पहले तो सवाल है कि अंदमान से क्या खरीदें। तो आप यहां से लकड़ी के बने सामान खरीद सकते हैं। अंदमान पादुक नामक लकड़ी के बने सामान। ये लकड़ी सागवान या सीसम से भी महंगी होती है। आपको इसके बने उत्पाद जरूर थोड़े महंगे मिलेंगे पर इस लकड़ी की चमक सालों साल नहीं जाती है। अंदमान पादुक के बने छोटे छोटे तमाम तरह के सामान खरीदे जा सकते हैं। 

इसमें देवी देवताओं की मूर्तियां, चूड़ी स्टैंड, छोटे छोटे बॉक्स, वॉल हैंगिंग और दूसरे कई तरह के उत्पाद प्रमुख है। ब्रिटिश काल में इस बेशकीमती लकड़ी के बने उत्पादों की दुनिया भर में खूब तिजारत हुई। आज भी यहां के लकड़ी के बने हुए सामान उम्दा किस्म के हैं। इस बार हमने एक लकड़ी का बना हुआ गणपति की प्रतिमा खरीदी है। ये उत्पाद आप सागरिका, चाथम शॉ मिल के बने शोरुम के अलावा बाजार में दूसरी दुकानों से भी खरीद सकते हैं।

काफी लोग यहां से लकड़ी के बने छोटे छोटे जारवा की मूर्तियां भी खरीदते हैं। समुद्रिका म्यूजियम के परिसर में भी अंदमान में बने उत्पादों का एक शोरूम है।
अंदमान में समुद्र के सीप से बने उत्पाद भी खरीद सकते हैं। कई आकार के शंख समेत कई तरह के उत्पाद शो रूम में बिक्री के लिए उपलब्ध हैं। पर ऐसा कोई उत्पाद खरीदते समय उसका बिल जरूर साथ रखें। दरअसल अंदमान में समंदर के किनारे रेत से चुनकर कोई भी समुद्री वस्तु लाना सख्त मना है। ऐसा करके आप एयरपोर्ट पर पकड़े जा सकते हैं। इसलिए किसी समुद्री उत्पाद की खरीददारी करें तो पक्का बिल साथ लेकर चलें तो अच्छा रहेगा।

स्थानीय उत्पादों की बात करें तो आप यहां के काली मिर्च भी खरीद सकते हैं। अंदमान में उत्पादित काली मिर्च की दरें कम हैं। यहां के काली मिर्च की गुणवत्ता भी उम्दा किस्म की है। अगर आप नार्थ बे जा रहे हैं तो वहां से काली मिर्च जरूर खरीदें। आप चाहें तो अंदमान से नारियल तेल भी खरीद सकते हैं। कुछ स्थानीय ब्रांड नारियल के तेल का उत्पादन करते हैं। इनमें से एक ब्रांड है नसीम। इसका नारियल तेल भी बेहतरीन गुणवत्ता वाला है।

सागरिका के शो रूम में दिन भर ग्राहकों की भीड रहती है। इसके ठीक बगल में खादी भंडार का भी बिक्री केंद्र है। यहां भी बड़ी संख्या में स्थानीय उत्पाद मिलते हैं। सागरिका का एक छोटा सा शो रूम पोर्ट ब्लेयर एयरपोर्ट पर भी मौजूद है। पर यहां पर उत्पादों की कीमतें कुछ ज्यादा हैं।

दैनिक उपयोग की तमाम तरह की वस्तुओं के लिए अंदमान भारत की मुख्य भूमि के राज्यों पर ही निर्भर है। पर कुछ उत्पाद अंदमान को विशिष्ट बनाते हैं। तो आप कभी अंदमान जाएं तो वहां के स्थानीय उत्पाद ही खरीदें। अंदमान की छपाई वाले टी शर्ट भी यहां खूब मिलते हैं और सस्ते भी मिलते हैं। तो इन्हें खरीदकर इतराने में कोई बुराई नहीं है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
(SAGRIKA, KHADI, SHOPPING, ANDAMAN ) 

Tuesday, November 19, 2019

चाथम शॉ मिल – अंदमान पादुक लकड़ी की चिराई


मैं दूसरी बार पोर्ट ब्लेयर के चाथम शॉ मिल में पहुंचा हूं।  पर अपनी पिछली यात्रा में इस एशिया के सबसे बड़े और सबसे पुराने आरा मशीन वाले मिल को अंदर घूम कर नहीं देख पाया था। पर इस बार हमलोग इसके वर्कशॉप में घुस गए हैं।
 यहां है नैरो गेज रेलवे लाइन - जैसा की सभी जानते हैं कि अंदमान में कोई रेल नेटवर्क नहीं है। पर पोर्ट ब्लेयर के चाथम शॉ मिल में लकड़ी की ढुलाई के लिए रेल की पटरियां बिछाई गई हैं। वर्कशॉप के अंदर की लकड़ी को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने के लिए दो फीट की चौड़ाई वाली नैरो गेज लाइन वाली पटरियां यहां बिछाई गई हैं। इन पटरियों को बिछाने के लिए लकड़ी की फिश प्लेटों का सहारा लिया गया है। हालांकि इन पटरियों पर रेलगाड़ी के बजाय ट्राली चलाई जाती है। इस ट्रॉली को धक्का देकर ले जाया जाता है। ब्रिटिश काल में इस शॉ मिल में रेल की पटरियां बिछाने की योजना बनी थी जिससे की कामकाज आसान हो सके।
 हमें शॉ मिल के अंदर रेल पटरियों का अस्तित्व आज भी दिखाई देता है। कारखाने में इन पटरियों इस्तेमाल इन दिनों भी किया जा रहा है। कारखाने में रेल की पटरियां लकड़ियों के स्टॉक से लेकर वर्कशॉप के बीच बिछाई गई हैं। येेआज भी उपयोगी है। 
हमने छोटी मोटी आरा मशीन पर लकड़ी चिराई का काम देखा है। पर इतनी विशाल मशीनों को मैं भी पहली बार ही देख रहा हूं।



 तो यह आरा मिल तीन मंजिला है। भवन के निर्माण में भी ज्यादातर लकड़ी का ही इस्तेमाल हुआ है। जंगल से आने वाले विशाल लकड़ी के पेड़ों को मांग के अनुसार चिराई कर अलग अलग आकार दिया जाता है।

हम 72 इंच के वर्टिकल शॉ मशीन को देख रहे हैं। इसका निर्माण 1984 में ब्रिटेन में हुआ है। तब इसे 40 लाख की लागात से यहां लाकर स्थापित किया गया था। इस मशीन को 100 हार्स पावर के मोटर से चलाया जाता है। इसमें 10 इंच चौड़ाई वाली आरी लगाई गई है। इसकी ब्लेड 9000 फीट प्रति मिनट की गति से चलती है।

आगे हमें  48 इंच बैंड वाली री-शॉ मशीन दिखाई देती है। यह मशीन 1955-56 में ब्रिटेन से आई थी। कुल 40 हार्स पावर के मोटर से चलने वाली यह मशीन लकड़ी के बड़े टुकड़ों को छोटा टुकड़ा बनाने का कार्य करती है। इसके ब्लेड की चौड़ाई 5 ईंच है।

इस आरा मिल में कई पुरानी मशीने ऐसी हैं जो न्यूयार्क अमेरिका से आई हैं। सैकड़ो साल पुरानी मशीने आज भी चालू हालत में हैं। आरा मिल के अंदर विशाल आरा को धार देने के काम भी किया जाता है। मिल के सारे कर्मचारी बड़े मनोयोग से लगातार काम करते हुए दिखाई दे रहे हैं।
आरा मिल में अंत में जाकर ग्रेडिंग की इकाई है। यहां पर कटी हुई लकड़ियों को ग्रेड प्रदान किया जाता है। यहां इस बात की भी जांच की जाती है कि लकड़ी में किसी तरह का नुक्श तो नहीं रह गया। आरा मिल के वर्कशॉप में सैलानियों को आने की इजाजत है।

विश्वकर्मा का मंदिर - लकड़ी के इस मिल के अंदर तीसरी मंजिल पर एक मंदिर भी बना है। इस मंदिर के अंदर जो भगवान की विशाल मूर्ति है, वह भी अंदमान पादुक लकड़ी से बनी हुई है। लकड़ी की बनी विश्वकर्मा की आदमकद प्रतिमा है। उनके हाथों में लकड़ी काटने वाली कुल्हाड़ी है।
आप चाहें तो चाथम शॉ मिल परिसर  से लकड़ी के बने कलात्मक उत्पाद खरीद सकते हैं। हमने इस बार यहां से एक गणपति की प्रतिमा ले ली है।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com 



Sunday, November 17, 2019

अंदमान के ब्लेयर होटल में चार दिन


अंदमान में पहले दिन हमारा ठिकाना बना ओम गेस्ट हाउस। यह होटल मिडल प्वाइंट में सागरिका से थोड़ा पहले ही है। यहां हमने कमरा 800 रुपये प्रतिदिन पर बुक किया है। हालांकि कमरे का आकार छोटा है। यह तीन व्यक्तियों के लिए मुफीद नहीं है। यहां हमारी एक दिन की ही बुकिंग है। इसलिए वक्त काट लेंगे। पर हमें अगले दिन डिगलीपुर वाली बस में टिकट नहीं मिला। तो हमें एक दिन और पोर्ट ब्लेयर रुकना पड़ेगा। 

होटल की तलाश - मैंने मोहनपुरा बस स्टैंड के पास तीन होटलों में जाकर कमरा देखा। एक में 1000 रुपये का कमरा था तो दूसरे में 1250 का पर दोनो के कमरे पसंद नहीं आए। ये कमरे नॉन एसी थे। एक होटल वाले ने पहले कमरे का किराया तो 800 बताया पर उसने जब जाना कि मैं आइलैंड का नहीं हूं बल्कि मेनलैंड से आया हूं तो बोला 1000 रुपया लगेगा। यानी मेनलैंड और आइलैंड वालों के लिए अलग अलग रेट हैं कई होटलों में भी। यह सुनकर थोड़ा अचरज जरूर हुआ। 


कोई ठिकाना नहीं मिलने पर फिर मैं उस ब्लेयर होटल में गया जहां मैंने आखिरी दिन 28 से 30 तक कमरा बुक कर रखा है। यह होटल मोहनपुरा बस स्टैंड के पास ही है। वे हमें 1500 में एसी रूम देने को तैयार हो गए। ब्लेयर होटल मोहनपुरा बस स्टैंड के पास गांधी सर्किल से 200 मीटर की दूरी पर गुरुद्वारा लाइन के तिराहे पर है। उसके बगल में हिंदी भवन है। यहां आप मिडल प्वाइंट के चौराहे से उतर रही सड़क से पहुंच सकते हैं। होटल की लोकेशन अबरडीन बाजार के भी पास है।

लंबे चौड़े भवन वाले होटल में दूसरी मंजिल पर 24 कमरे हैं। सभी कमरे बड़े और दोनों तरफ से हवादार हैं। होटल की लॉबी इतनी विशाल और लंबी है कि इसी में आप सुबह की सैर कर सकते हैं। तो हमने अगले दिन के लिए ब्लेयर होटल में कमरा ले लिया। उन्होंने हमें 215 नंबर कमरा दिया। होटल आरओ पानी भी निःशुल्क उपलब्ध कराता है। यह बहुत अच्छी सुविधा है वरना सफर में हर रोज काफी पैसा पानी खरीदकर पीने में ही खर्च हो जाता है। होटल स्टाफ का व्यवहार काफी अच्छा है। हालांकि होटल का कोई अपना रेस्टोरेंट नहीं है, पर आसपास में खाने के कई विकल्प मौजूद हैं।

ब्लेयर होटल के बगल में गुरु इंटरनेशनल नामक होटल है। हमारे एक रिश्तेदार जब अपने हनीमून ट्रिप पर आए थे इसी होटल में ठहरे थे। यह भी अंदमान का अच्छा होटल है।

लगेज छोड़कर यूं ही चल पड़े  – डिगलीपुर जाने से पहले हमने तय किया सारा लगेज लेकर वहां नहीं जाएंगे बल्कि अपने तीन बड़े लगेज अंदमान के होटल में ही छोड़ देंगे, सिर्फ तीन पिट्ठू बैग लेकर ही आगे का सफर करेंगे। फिर तीन दिन बाद तो यहां वापस लौटना ही है। होटल ब्लेयर वाले हमारा लगेज रखने को तैयार हो गए। हमें जब सुबह 4 बजे बस पकड़नी थी तो होटल के रिसेप्सन पर कोई स्टाफ मौजूद नहीं था। हमने उपलब्ध मोबाइल नंबर पर फोन किया। उधर से जवाब आया अपना लगेज रिसेप्शन पर छोड़कर आप निश्चिंत होकर चले जाइए। और हमने यही किया। तीन दिन बाद लौटे तो हमारा लगेज सलामत मिला।

विशाल फेमिली रूम: डिगलीपुर से वापसी पर ब्लयेर होटल ने जो हमें कमरा दिया वह चार बिस्तरों वाला विशाल कमरा है। इसका आकार दिल्ली के किसी एचआईजी फ्लैट जितना बड़ा है। बड़ी अलमारियां, सोफा और विशाल टीवी सेट के साथ वास्तव में यह फेमिली रूम है। हालांकि हमारी बुकिंग छोटे कमरे की ही थी पर उन्होंने हमें यह विशाल एसी रूम प्रदान कर दिया। इस विशाल कमरे में हमने मजे से कुछ दिन गुजारे।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyup@gmail.com 
( BLAIR HOTEL, PORT BLAIR, HINDI BHAWAN ) 
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Friday, November 15, 2019

एक बार फिर अदभुत अंदमान की ओर


तीन साल बाद यानी साल 2016 के बाद 2019 में एक बार फिर अंदमान जाने का कार्यक्रम बन गया। इस बार बेटे अनादि और उनकी मां माधवी भी साथ हैं। 23 मई की रात को 17वीं लोकसभा चुनाव के नतीजे आए जिसमें मोदी सरकार प्रचंड बहुमत से जीती। रात 1.30 बजे तक दफ्तर में सुबह का अखबार निकालने में अपनी भूमिका निभाने के बाद घर आया। अनादि और माधवी पैकिंग करके तैयार थे, मैंने भी अपनी पैकिंग पूरी की। मुझे किसी भी यात्रा के लिए पैकिंग करने में महज आधे घंटे का वक्त लगता है। 

रात 2.30 बजे टैक्सी बुक कर हम दिल्ली एयरपोर्ट के टर्मिनल दो (टी2) के लिए चल पड़े। इस बार हमने में  गो एयर के विमान की सेवाएं ली है। उड़ान का समय सुबह 5.45 बजे का है। सुबह 4 बजे के आसपास चेकइन की प्रक्रिया पूरी कर हम विमान का इंतजार करने लगे। सुबह 5.05 बजे प्रवेश आरंभ हुआ। एयरब्रिज के बजाए हमें विमान तक बस से ले जाया गया। गोएयर के ए 320 विमान में हमें 30 ए, बी, सी सीट मिली है। यानी सबसे आखिरी सीट। सुबह 5.30 के बाद उजाला होने लगा है और हम आसमान में हैं। लगभग ढाई घंटे बाद विमान कोलकाता एयरपोर्ट पर उतर गया। यहां विमान का 35 मिनट का ठहराव है। काफी यात्री कोलकाता में उतर गए। आसपास में कुछ नए चेहरे अवतरित हो गए हैं। पर पायलट और परिचारिकाएं वही रहीं।

जहाज को उड़ा रही हैं कैप्टन अर्शदीप कौर, उनके साथ है कैप्टन ध्रुव आर्य। परिचारिकाएं हैं शहनाज और उनकी साथी। जहाज 850 किलोमीटर प्रतिघंटा की गति से 33 हजार फीट की ऊंचाई तक उड़ान भर रहा है। कोलकाता के बाद हमलोग समंदर के ऊपर यानी पानी के ऊपर उड़ान भर रहे हैं। मौसम अच्छा है। मेरी पिछली यात्रा की तरह इस बार पानी के ऊपर हम खराब मौसम से गुजर रहे हैं... जैसी कोई चेतावनी जारी नहीं हुई। कोलकाता से पोर्ट ब्लेयर की दूरी विमान ने दो घंटे में तय कर ली है। अनादि आसमान से पोर्ट ब्लेयर की धरती को देखकर रोमांचित हो रहे हैं। पिछली बार मैं उन्हें छोड़कर अकेला ही अंदमान की यात्रा पर आया था। पर इस बार वे अपनी सूची बनाकर लाए हैं कि अंदमान में उन्हें क्या क्या देखना है।

हम पोर्ट ब्लेयर में उतर गए हैं। मेरे लिए तो ये छोटा सा एयरपोर्ट जाना पहचाना सा है। विमान से आगमन टर्मिनल महज 200 मीटर है, पर इतनी छोटी दूरी के लिए बस में बिठाया गया। पर पोर्ट ब्लेयर छोटा हवाई अड्डा है। पर अब इसके नए कलात्मक भवन का निर्माण हो रहा है। बाहर निकलते ही आटो रिक्शा वाले हमारे पीछे पड़ गए है। पर मैं सामान के साथ लांबा लाइन की सड़क पर आ गया। यहां से अबरडीन बाजार की ओर जाने वाली सिटी बस में बैठ गया। दस रुपये प्रति सवारी टिकट है। हमलोग मिडल प्वाइंट पर सागरिका शोरुम के पास उतर गए। थोड़े पूछताछ में ओम गोस्ट हाउस मिल गया। 

हमारा कमरा हमारा इंतजार कर रहा था। हालांकि कमरे का आकार थोड़ा छोटा है, पर एडजस्ट कर लेंगे। सामान रखने के बाद मैं निकल पड़ा डिगलीपुर जाने वाली बस का टिकट पता करने के लिए। इस बार की हमारी यात्रा की प्राथमिकता है डिगलीपुर जाना। पर सरकारी या निजी बस में कल का डिगलीपुर का टिकट नहीं मिला। तो हमें अपने यात्रा कार्यक्रम को थोड़ा बदलना पड़ा। अब हम 25 तारीख को डिगलीपुर जाएंगे। थोड़ी देर में अपना काम निपटाकर मैं वापस लौट आया। अब हम सब निकल पड़े हैं पोर्ट ब्लेयर की सड़कों पर। अब सबसे पहले कहां जाएं तो चलते हैं चाथम शॉ मिल की ओर। लेकिन उससे पहले थोड़ी सी बात अंदमान के होटलों पर।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com
-        (ANDAMAN, PORT BLAIR, GOAIR, OM GUEST HOUSE, MIDDLE POINT)