Wednesday, October 30, 2019

शाक्यमुनि की जन्मस्थली लुंबिनी से वापसी - वाया भैरहवा सोनौली बार्डर


लुंबिनी में माया देवी का मंदिर और भगवान बुद्ध की जन्मस्थली देखकर वापस लौट रहा हूं। मन में अदभुत शांति और संतोष की अनुभूति है। पर आपको पता है सातवीं सदी तक प्रमुख स्थल रहा लुंबिनी बाद में लोगों की नजरों से ओझल हो गया था।

एक बार फिर लुंबिनी को 1898 में डाक्टर एलाएस एनंटन फुहर्रर नामक जर्मन पुरातत्वविद ने खोज निकाला। उन्होंने यहां के जंगलों में अशोक के शिलालेख की खोज की। इससे पूर्व अजंता की तरह ही सैकड़ो साल तक लोगों की नजरों से ओझल था। 1899 में लुंबिनी की खुदाई की गई तब स्तूप, विहार और अशोक स्तंभ आदि के लोगों को दर्शन हुए। इसके बाद आधुनिक विश्व को लुंबिनी के बारे में पता चला।

भगवान बुद्ध के जीवन से जुड़े चार प्रमुख तीर्थ हैं। पहला लुंबिनी जहां उनका जन्म हुआ, दूसरा कुशीनगर जहां उनका महापरिनिर्वाण हुआ, तीसरा बोधगया जहां उन्हें संबोधि (ज्ञान) की प्राप्ति हुई, चौथा सारनाथ जहां उन्होंने अपना पहला उपदेश दिया। पर लुंबिनी को पहले तीर्थ होने का गौरव प्राप्त है। अब लुंबिनी में सालों भर दुनिया भर से सैलानी आने लगे हैं।  



रात को मैं लुंबिनी शहर में भोजन की तलाश में हूं। कई सजे संवरे रेस्टोरेंट जरूर हैं, पर कहीं भी दाल रोटी, चावल की थाली नहीं मिल रही है। ज्यादातर जगह अंडा समेत मांसाहारी भोजन मिल रहा है। मैं मजबूरी में एक रेस्टोरेंट में वेज चाउमीन का आर्डर देता हूं। हालांकि चाउमीन का स्वाद अच्छा है।



मुझे लुंबिनी में एक जगह थारू भंसा घर का बोर्ड दिखाई देता है। नेपाल में भोजनालय को भंसा घर कहते हैं। नेपाल की तराई में थारू जनजाति के लोग भी बड़ी संख्या में हैं। लुंबिनी में थारू भंसा घर होने का मतलब है इसे थारु जनजाति के लोग संचालित करते हैं।


लुंबिनी में शापिंग – लुंबिनी आने वाले सैलानी या बुद्ध से जुडे प्रतीकों की खरीददारी करते हैं। आप भी यहां पर जूट के बने हुए बैग, गौतम बुद्ध के चित्र वाले टी शर्ट और अलग अलग मुद्राओं में बुद्ध की मूर्तियां खरीद सकते हैं। स्थानीय शिल्पियों द्वारा निर्मित हस्तशिल्प की वस्तुएं भी यहां से खरीदी जा सकती हैं।



अगली सुबह लुंबिनी से मैं चलने के लिए तैयार हूं। एक बार फिर लीलामणि शर्मा से बातचीत का मौका मिला। वे यहां होटल एसोसिएशन के मंत्री भी हैं। उन्होने बताया कि लुंबिनी में कुल 62 होटल बन चुके हैं। कई और लग्जरी होटल निर्माणाधीन हैं। यहां से 20 किलोमीटर आगे अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट का भी निर्माण कार्य जारी है।

नेपाल सरकार ने लुंबिनी के विकास के लिए काफी काम किया है। इसी क्रम में लुंबिनी नेपाल सरकार ने लुंबिनी बौद्ध विश्वविद्यालय की स्थापना की है। 

लुंबिनी हमारे भारत के सीमा से महज 8 किलोमीटर आगे है। पर नेपाल एक ऐसा देश है जिस पर चीन की भी नजर रहती है। मुझे नेपाल प्रवास के दौरान नेपाल के अखबार अन्नपूर्णा में छपी खबर दिखाई देती है। चीन नेपाल के साथ रेलमार्ग से जोड़ना चाहता है।

सुबह गेट नंबर चार के पास से आगे जाने वाली बसें तैयार हैं। सुबह 5.30 बजे पहली बस भैरहवा, बुटवल होते हुए काठमांडू जाती है। जून महीने मे हल्की बारिश से मौसम ठंडा हो गया है। मैं बस में बैठ गया हूं। ये लग्जरी बस है। तकरीबन एक घंटे में हौले हौले सफर के बाद ये मुझे भैरहवा पहुंचा देती है। 

लुंबिनी से भैरहवा के बीच चौड़ी सड़क का निर्माण कार्य जारी है। रास्ते में दाहिनी तरफ मुझे निर्माणाधीन अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट दिखाई देता है। भैरहवा नेपाल का एक सुव्यवस्थित शहर है। यह रुपनदेही जिले का मुख्यालय है। नेपाल सरकार ने इस शहर का नया नाम सिद्धार्थ नगर दिया है। 
कोलिय गणराज्य की राजधानी रहा देवदह जहां गौतम बुद्ध की माता जी मायादेवी का मायका था, भैरहवा से थोड़ी दूर पर ही स्थित है। इसे संभवतः रामग्राम भी कहा जाता था। यहां भी श्रद्धालु घूमने जाते हैं। 

-        विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com
-        ( LUMBINI, BHAIRAHWA, NEPAL, AIRPORT, BUDDHA )



4 comments:

  1. 1898 की लुम्बिनी की खोज और थारू भन्सा घर की बढ़िया जानकारी...

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  2. बहुत ही अच्छा यात्रा विवरण, मैं भी एक बार कपिलवस्तु और लुम्बिनी अवश्य जाना चाहूंगा

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