Monday, October 28, 2019

लुंबिनी में सम्राट अशोक का स्तंभ और शिलालेख


दुनिया भर से लोग आएंगे - शाक्यमुनि गौतम बुद्ध ने कहा था, हे आनंद, जब मैं नहीं रहूंगा। मेरे साथ आस्था रखने वाले लोग विश्वास, उत्सुकता और भक्तिभाव के साथ यहां आएंगे। लुंबिनी वह स्थल जहां मेरा जन्म हुआ, आध्यात्मिक भाव और शांति का अन्यतम स्थल बनेगा। यह उस समय का संवाद है जब गौतम बुद्ध अपने जीवन काल में आनंद व दूसरे शिष्यों के साथ यहां पधारे थे।
और ऐसा ही हुआ। लुंबिनी बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद बड़ा बौद्ध तीर्थ बन गया। मौर्य वंश के प्रतापी शासक सम्राट अशोक यहां पहुंचे। उन्होंने यहां पर अशोक स्तंभ का निर्माण कराया। सम्राट अशोक यहां 249 ईसा पूर्व में पहुंचे थे। मायादेवी मंदिर के परिसर में ही अशोक स्तंभ स्थित है। यह भारत के दूसरे अशोक स्तंभ से काफी अलग है। अशोक स्तंभ प्राचीन काल के सबसे बेहतरीन ऐतिहासिक स्मारक में शामिल है, जो लुंबिनी में भगवान बुद्ध के जन्म की पुष्टि करता है।

सम्राट अशोक की लुंबिनी यात्रा -  सम्राट अशोक ने भगवान बुद्ध के जन्म से 318 वर्ष बाद और अपने राज्याभिषेक के 20वें साल में लुंबिनी की यात्रा की। इस दौरान यहां पर एक पाषाण स्तंभ लगवाया। इस पर ब्राह्मी लिपी और पाली में लिखा गया है। इस स्तंभ पर लिखा हुआ है कि देवताओं को प्रिय राजा अशोक ने राज्याभिषेक के 20वें वर्ष में भगवान गौतम बुद्ध के जन्म स्थली का राजशाही यात्रा की। शाक्यमुनि की याद में यहां पाषण स्तंभ का स्थापित कराया जा रहा है। साथ ही लुंबिनी का टैक्स घटाकर सिर्फ आठवां हिस्सा किया जाता है। इस स्तंभ 30 फीट ऊंचा है। इसका निर्माण वाराणसी के पास चुनार से लिए गए बलुआ पत्थर से किया गया है। बताया जाता है कि इसके ऊपर कभी एक घोड़े की आकृति हुआ करती थी, जो अब नहीं है। मूल रूप में यह स्तंभ 40 फीट का हुआ करता था।

शिलालेख पर लिखा गया है - हिता बुद्धे जाते शाक्यमुनिती। जिसका मतलब हुआ शाक्यमुनि बुद्ध का जन्म इसी स्थान पर हुआ था। सम्राट अशोक ने उस साल वृक्ष के चारों तरफ पत्थर की दीवार भी बनवाई जहां तथागत का जन्म हुआ था। सम्राट अशोक ने यहां पर कई स्तूप और विहारों का भी निर्माण कराया था। इनमें से कई विहारों का अस्तित्व आज भी देखा जा सकता है।

दूसरी सदी ईसा पूर्व के कई स्तूप - अशोक स्तंभ के पास एक क्रम से छह स्तूप बने हुए हैं। ये सभी दूसरी सदी इसा पूर्व के हैं। यहां पर दूसरी सदी इसा पूर्व का प्रार्थना कक्ष दिखाई देता है। इसके सिर्फ आधार तल की दीवारें बची हुई हैं। इसमें 200 से ज्यादा लोग बैठकर प्रार्थना कर सकते हैं। यहां पर पहली इसा पूर्व से लेकर सातवीं सदी के बीच कई और छोटे छोटे स्तूपों का निर्माण कराया गया। इन स्तूपों में बुद्ध का एक शारीरिक अवशेषों का भी एक स्तूप है। इसे 1975 में पुनर्स्थापित किया गया।

फाहियान और ह्वेनसांग आए थे लुंबिनी - चीनी यात्री फाहियान 399 से 412 ईस्वी के बीच भारत, नेपाल और श्रीलंका की यात्रा पर आए थे। इस दौरान वे कपिलवस्तु और लुंबिनी भी आए थे। वे बौद्ध भिक्षु थे। उनका लक्ष्य बौद्ध ग्रंथ त्रिपिटक और विनपिटक की तलाश करना था। फाहियान ने अपनी यात्रा को लिपिबद्ध किया। उसमें कपिलवस्तु और लुंबिनी की चर्चा की है। उनकी यात्रा के समय गुप्त वंश का शासन था। फाहियान ने उस वृक्ष को देखा जिसके नीचे शाक्यमुनि का जन्म हुआ। उस सरोवर को देखा जिसमें महामाया देवी ने स्नान किया था। 

सातवीं सदी में सम्राट हर्षवर्धन के काल में एक और चीनी यात्री ह्वेनसांग भी भारत आया था। वह 637 ईस्वी में बुद्ध के अवतरण स्थल लुंबिनी तक पहुंचा था। इसी साल उसने कुशीनगर की भी यात्रा की थी। ह्वेनसांग लिखता है कि सरोवर से 24 कदम की दूरी पर वह अशोक का वृक्ष है जिसके नीचे भगवान बुद्ध का जन्म हुआ। 

कपिलवस्तु की सैर - राजा शुद्धोधन की राजधानी कपिलवस्तु लुंबिनी वन से 27 किलोमीटर पश्चिम की तरफ है। लुंबिनी आने वाले सैलानी और बौद्ध श्रद्धालु कपिलवस्तु नगर घूमने भी जाते हैं। आप बाइक रेंटल पर लेकर या फिर टैक्सी बुक करके कपिलवस्तु जा सकते हैं।

आबोहवा का आनंद लें - लुंबिनी वन क्षेत्र में आप प्राकृतिक आबोहवा का भरपूर आनंद ले सकते हैं। यहां पर 250 से ज्यादा पक्षियों की प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें सबसे बड़ा पक्षी सारस भी यहां पर देखा जा सकता है। यहां कई किस्म के सांप और लोमड़ी, बिल्लियां भी पाई जाती हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com
( LUMBINI, NEPAL , FAHIEN, ASHOKA PILLER, STUPA )

2 comments:

  1. बेहतरीन से भी बेहतरीन लेख और जानकारी...त्रिपिटक और विनिपटक मिला क्या फाहियान को....फाहियान और ह्वेन सांग अशोक तथागत शाक्यमुनि सम्राट आनंद...वाकई बहुत अच्छा लगा सुबह सुबह यह पढ़कर....अगर आप कपिलवस्तु घूमे है तो यह भी बताए कि आपने कपिल वस्तु में क्या देखा ?

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