Tuesday, October 22, 2019

लुंबिनी वन में बौद्ध मंदिरों के बीच तथागत की तलाश


लुंबिनी वन क्षेत्र में मैं साइकिल से गेट नंबर 4 से प्रवेश कर गया हूं। दोनों तरफ हरे भरे जंगल हैं। साल के लंबे वृक्ष के बीच से गुजरते हुए जून के महीने में भीषण गर्मी के बीच राहत का एहसास हो रहा है। आगे नन्ही सी नदी तलार का पुल आया। लुंबिनी के इस वन क्षेत्र में कई पक्षियों का बसेरा है। चलते हुए उनका कलरव सुनाई देता है।  

श्रीलंका का बौद्ध मठ - थोड़ी दूर साइकिल का पैडल मारने के बाद दाहिनी तरफ श्रीलंका का बौद्ध मंदिर दिखाई देता है। साइकिल पार्क करके मैं मंदिर के अंदर प्रवेश कर गया। मंदिर के अंदर सुंदर नहर और क्यारियां बनी हैं। इस मंदिर का उदघाटन 2009 में श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंद राजपक्षे ने किया था। मंदिर में बुद्ध के जीवन की घटनाओं से जुड़े कुछ बेहतरीन भित्ति चित्र बनाए गए हैं।



शांति दीप और नौका विहार - इसके आगे चलने पर लुंबिनी की विजिटर सेंटर आता है। अब मैं शांति दीप के पास पहुंच गया हूं। लुंबिनी वन के बीचों बीचों एक विशाल नहर बनाई गई है। इस नहर के बीच में शांति दीप प्रज्जवलित किया गया है। यह अखंड दीप हमेशा जलता रहता है। एक तरफ लिटिल बुद्ध का विशाल सुनहली प्रतिमा है। शांतिदीप के पास आप नौका विहार का आनंद ले सकते हैं। नहर में चलने वाली मोटर बोट आपको मार्केटिंग कांप्लेक्स तक ले जाती है।  

हमारा अगला पड़ाव है म्यांमार गोल्डेन टेंपल। इस परिसर में सुनहले रंग का विशाल आकार का मंदिर है। इसके ऊपर लोकमनी पैगोडा का बोर्ड लगा दिखाई देता है। इस मंदिर का परिसर काफी बड़ा है। इसमें भिक्षु निवास भी बना हुआ है। इस मंदिर के पास ही एक कॉटेज रेस्टोरेंट है। भरी गर्मी में यहां जूस पीकर मैंने थोड़ी राहत महसूस की। 

यहां पर कुछ आईसक्रीम और चनाजोर गरम बेचने वाले भी मौजूद हैं। म्यामांर के मंदिर के पास ही लुंबिनी का विपस्यना केंद्र भी है। सत्यनारायण गोयनका जी द्वारा इजाद किए गए विपस्यना केंद्र कई शहरों में स्थापित किए गए हैं।


कंबोडिया के मंदिर की कलात्मकता - अब हम कंबोडिया के मंदिर की राह पर हैं। यह लुंबिनी के मंदिरों के तमाम बीच अत्यंत कलात्मक मंदिर है। मंदिर की आंतरिक सज्जा अदभुत है। मंदिर में सूर्य की रोशनी सीधे जाकर बुद्ध की मूर्ति पर पड़ रही है। मंदिर के अंदर बैठकर अदभुत शांति का एहसास हो रहा है। यहां मैंने करीब आधा घंटा वक्त गुजारा। मंदिर की दीवारों पर कई सुंदर और कलात्मक पेटिंग भी लगी हैं।

इसके बाद आगे चलने पर भारत का मंदिर भी दिखाई देता है। इस मंदिर का निर्माण महाबोधि सोसाइटी ऑफ इंडिया द्वारा करवाया गया है। इसके आगे कनाडा का मंदिर दिखाई देता है। यहां पर प्रशिक्षण केंद्र भी चलाया जाता है। इसके आगे चलने पर मुझे थाइलैंड का बौद्ध मठ दिखाई देता है। आसपास में हरे भरे आम के पेड़ हैं। इनपर कच्चे हरे आम झूल रहे हैं।

अब मैं मार्केटिंग कांप्लेक्स के पास पहुंच गया हूं। यहां पर टी शर्ट और तमाम कलात्मक वस्तुओं की दुकाने हैं। पर इन सबके बीच मुझे भूख लगी है। दोपहर का समय है। एक रेस्टोरेंट में खाने के लिए बैठ गया। पेट पूजा के बाद फिर आगे का सफर शुरू हो गया। यहां पर चावल, दाल वाली थाली मिल रही है। 

दोपहर में खाने के बाद थोड़ा सुस्ताने के बाद एक बार फिर साइकिल पर पैडल मारने लगा। मार्केटिंग कांप्लेक्स के पास बसों का पडाव भी है। बाहर से आने वाली बसें यहीं पर रुकती हैं। यहां पर स्थानीय भ्रमण के लिए डिजाइनर साइकिल रिक्शा भी मिल रहे हैं। 


विशाल जापानी शांति स्तूप -  अब हमारी मंजिल है जापान द्वारा बनवाए गए शांति स्तूप की ओर। यह सफेद रंग का विशाल स्तूप है। जापान सरकार द्वारा बनवाए गए स्तूप हर जगह एक ही डिजाइन में हैं। मैंने वैशाली, राजगीर,  दिल्ली से स्तूपों को देखा है। लुंबिनी के जापानी स्तूप के परिसर में हेलीपैड भी बना हुआ है। एक नवविवाहित जोड़ा यहां पर ड्रोन कैमरे के मदद से शूटिंग में लगा हुआ है।
जापानी स्तूप में मैं थोड़ी देर आराम करता हूं। यहां पर स्तूप में काम करने वाले कई मजदूरों से बात हुई। ये सारे लोग तराई के रहने वाले हैं। भारत के उत्तर प्रदेश के रहने वाले लोगों की तरह ही रंग रुप वाले हैं। वह जाति बिरादरी। एक सज्जन अपना नाम बताते हैं राम स्वरूप धवल। धवल हां उनकी जाति धोबी है। इधर तराई के लोगों की रिश्तेदारियां भी यूपी के तमाम जिलों में हैं। रुपनदेही जिले में नेपाली लोगों की आबादी कम है यहां मधेशी लोग ज्यादा हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( NEPAL, BUDDHA MANDIR, SRILANKA, MYANMAR JAPAN, THAILAND, CAMBODIA) 

2 comments:

  1. वाह बहुत बढ़िया लेख...यहां बोध गया जैसे ही हर देश वालो ने अपनी पद्धति से बोध मंदिर बना रखे है... बढ़िया लेख

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  2. पर ये मंदिर बोध गया से ज्यादा विशाल और भव्य हैं।

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