Wednesday, October 30, 2019

शाक्यमुनि की जन्मस्थली लुंबिनी से वापसी - वाया भैरहवा सोनौली बार्डर


लुंबिनी में माया देवी का मंदिर और भगवान बुद्ध की जन्मस्थली देखकर वापस लौट रहा हूं। मन में अदभुत शांति और संतोष की अनुभूति है। पर आपको पता है सातवीं सदी तक प्रमुख स्थल रहा लुंबिनी बाद में लोगों की नजरों से ओझल हो गया था।

एक बार फिर लुंबिनी को 1898 में डाक्टर एलाएस एनंटन फुहर्रर नामक जर्मन पुरातत्वविद ने खोज निकाला। उन्होंने यहां के जंगलों में अशोक के शिलालेख की खोज की। इससे पूर्व अजंता की तरह ही सैकड़ो साल तक लोगों की नजरों से ओझल था। 1899 में लुंबिनी की खुदाई की गई तब स्तूप, विहार और अशोक स्तंभ आदि के लोगों को दर्शन हुए। इसके बाद आधुनिक विश्व को लुंबिनी के बारे में पता चला।

भगवान बुद्ध के जीवन से जुड़े चार प्रमुख तीर्थ हैं। पहला लुंबिनी जहां उनका जन्म हुआ, दूसरा कुशीनगर जहां उनका महापरिनिर्वाण हुआ, तीसरा बोधगया जहां उन्हें संबोधि (ज्ञान) की प्राप्ति हुई, चौथा सारनाथ जहां उन्होंने अपना पहला उपदेश दिया। पर लुंबिनी को पहले तीर्थ होने का गौरव प्राप्त है। अब लुंबिनी में सालों भर दुनिया भर से सैलानी आने लगे हैं।  



रात को मैं लुंबिनी शहर में भोजन की तलाश में हूं। कई सजे संवरे रेस्टोरेंट जरूर हैं, पर कहीं भी दाल रोटी, चावल की थाली नहीं मिल रही है। ज्यादातर जगह अंडा समेत मांसाहारी भोजन मिल रहा है। मैं मजबूरी में एक रेस्टोरेंट में वेज चाउमीन का आर्डर देता हूं। हालांकि चाउमीन का स्वाद अच्छा है।



मुझे लुंबिनी में एक जगह थारू भंसा घर का बोर्ड दिखाई देता है। नेपाल में भोजनालय को भंसा घर कहते हैं। नेपाल की तराई में थारू जनजाति के लोग भी बड़ी संख्या में हैं। लुंबिनी में थारू भंसा घर होने का मतलब है इसे थारु जनजाति के लोग संचालित करते हैं।


लुंबिनी में शापिंग – लुंबिनी आने वाले सैलानी या बुद्ध से जुडे प्रतीकों की खरीददारी करते हैं। आप भी यहां पर जूट के बने हुए बैग, गौतम बुद्ध के चित्र वाले टी शर्ट और अलग अलग मुद्राओं में बुद्ध की मूर्तियां खरीद सकते हैं। स्थानीय शिल्पियों द्वारा निर्मित हस्तशिल्प की वस्तुएं भी यहां से खरीदी जा सकती हैं।



अगली सुबह लुंबिनी से मैं चलने के लिए तैयार हूं। एक बार फिर लीलामणि शर्मा से बातचीत का मौका मिला। वे यहां होटल एसोसिएशन के मंत्री भी हैं। उन्होने बताया कि लुंबिनी में कुल 62 होटल बन चुके हैं। कई और लग्जरी होटल निर्माणाधीन हैं। यहां से 20 किलोमीटर आगे अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट का भी निर्माण कार्य जारी है।

नेपाल सरकार ने लुंबिनी के विकास के लिए काफी काम किया है। इसी क्रम में लुंबिनी नेपाल सरकार ने लुंबिनी बौद्ध विश्वविद्यालय की स्थापना की है। 

लुंबिनी हमारे भारत के सीमा से महज 8 किलोमीटर आगे है। पर नेपाल एक ऐसा देश है जिस पर चीन की भी नजर रहती है। मुझे नेपाल प्रवास के दौरान नेपाल के अखबार अन्नपूर्णा में छपी खबर दिखाई देती है। चीन नेपाल के साथ रेलमार्ग से जोड़ना चाहता है।

सुबह गेट नंबर चार के पास से आगे जाने वाली बसें तैयार हैं। सुबह 5.30 बजे पहली बस भैरहवा, बुटवल होते हुए काठमांडू जाती है। जून महीने मे हल्की बारिश से मौसम ठंडा हो गया है। मैं बस में बैठ गया हूं। ये लग्जरी बस है। तकरीबन एक घंटे में हौले हौले सफर के बाद ये मुझे भैरहवा पहुंचा देती है। 

लुंबिनी से भैरहवा के बीच चौड़ी सड़क का निर्माण कार्य जारी है। रास्ते में दाहिनी तरफ मुझे निर्माणाधीन अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट दिखाई देता है। भैरहवा नेपाल का एक सुव्यवस्थित शहर है। यह रुपनदेही जिले का मुख्यालय है। नेपाल सरकार ने इस शहर का नया नाम सिद्धार्थ नगर दिया है। 
कोलिय गणराज्य की राजधानी रहा देवदह जहां गौतम बुद्ध की माता जी मायादेवी का मायका था, भैरहवा से थोड़ी दूर पर ही स्थित है। इसे संभवतः रामग्राम भी कहा जाता था। यहां भी श्रद्धालु घूमने जाते हैं। 

-        विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com
-        ( LUMBINI, BHAIRAHWA, NEPAL, AIRPORT, BUDDHA )



Monday, October 28, 2019

लुंबिनी में सम्राट अशोक का स्तंभ और शिलालेख


दुनिया भर से लोग आएंगे - शाक्यमुनि गौतम बुद्ध ने कहा था, हे आनंद, जब मैं नहीं रहूंगा। मेरे साथ आस्था रखने वाले लोग विश्वास, उत्सुकता और भक्तिभाव के साथ यहां आएंगे। लुंबिनी वह स्थल जहां मेरा जन्म हुआ, आध्यात्मिक भाव और शांति का अन्यतम स्थल बनेगा। यह उस समय का संवाद है जब गौतम बुद्ध अपने जीवन काल में आनंद व दूसरे शिष्यों के साथ यहां पधारे थे।
और ऐसा ही हुआ। लुंबिनी बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद बड़ा बौद्ध तीर्थ बन गया। मौर्य वंश के प्रतापी शासक सम्राट अशोक यहां पहुंचे। उन्होंने यहां पर अशोक स्तंभ का निर्माण कराया। सम्राट अशोक यहां 249 ईसा पूर्व में पहुंचे थे। मायादेवी मंदिर के परिसर में ही अशोक स्तंभ स्थित है। यह भारत के दूसरे अशोक स्तंभ से काफी अलग है। अशोक स्तंभ प्राचीन काल के सबसे बेहतरीन ऐतिहासिक स्मारक में शामिल है, जो लुंबिनी में भगवान बुद्ध के जन्म की पुष्टि करता है।

सम्राट अशोक की लुंबिनी यात्रा -  सम्राट अशोक ने भगवान बुद्ध के जन्म से 318 वर्ष बाद और अपने राज्याभिषेक के 20वें साल में लुंबिनी की यात्रा की। इस दौरान यहां पर एक पाषाण स्तंभ लगवाया। इस पर ब्राह्मी लिपी और पाली में लिखा गया है। इस स्तंभ पर लिखा हुआ है कि देवताओं को प्रिय राजा अशोक ने राज्याभिषेक के 20वें वर्ष में भगवान गौतम बुद्ध के जन्म स्थली का राजशाही यात्रा की। शाक्यमुनि की याद में यहां पाषण स्तंभ का स्थापित कराया जा रहा है। साथ ही लुंबिनी का टैक्स घटाकर सिर्फ आठवां हिस्सा किया जाता है। इस स्तंभ 30 फीट ऊंचा है। इसका निर्माण वाराणसी के पास चुनार से लिए गए बलुआ पत्थर से किया गया है। बताया जाता है कि इसके ऊपर कभी एक घोड़े की आकृति हुआ करती थी, जो अब नहीं है। मूल रूप में यह स्तंभ 40 फीट का हुआ करता था।

शिलालेख पर लिखा गया है - हिता बुद्धे जाते शाक्यमुनिती। जिसका मतलब हुआ शाक्यमुनि बुद्ध का जन्म इसी स्थान पर हुआ था। सम्राट अशोक ने उस साल वृक्ष के चारों तरफ पत्थर की दीवार भी बनवाई जहां तथागत का जन्म हुआ था। सम्राट अशोक ने यहां पर कई स्तूप और विहारों का भी निर्माण कराया था। इनमें से कई विहारों का अस्तित्व आज भी देखा जा सकता है।

दूसरी सदी ईसा पूर्व के कई स्तूप - अशोक स्तंभ के पास एक क्रम से छह स्तूप बने हुए हैं। ये सभी दूसरी सदी इसा पूर्व के हैं। यहां पर दूसरी सदी इसा पूर्व का प्रार्थना कक्ष दिखाई देता है। इसके सिर्फ आधार तल की दीवारें बची हुई हैं। इसमें 200 से ज्यादा लोग बैठकर प्रार्थना कर सकते हैं। यहां पर पहली इसा पूर्व से लेकर सातवीं सदी के बीच कई और छोटे छोटे स्तूपों का निर्माण कराया गया। इन स्तूपों में बुद्ध का एक शारीरिक अवशेषों का भी एक स्तूप है। इसे 1975 में पुनर्स्थापित किया गया।

फाहियान और ह्वेनसांग आए थे लुंबिनी - चीनी यात्री फाहियान 399 से 412 ईस्वी के बीच भारत, नेपाल और श्रीलंका की यात्रा पर आए थे। इस दौरान वे कपिलवस्तु और लुंबिनी भी आए थे। वे बौद्ध भिक्षु थे। उनका लक्ष्य बौद्ध ग्रंथ त्रिपिटक और विनपिटक की तलाश करना था। फाहियान ने अपनी यात्रा को लिपिबद्ध किया। उसमें कपिलवस्तु और लुंबिनी की चर्चा की है। उनकी यात्रा के समय गुप्त वंश का शासन था। फाहियान ने उस वृक्ष को देखा जिसके नीचे शाक्यमुनि का जन्म हुआ। उस सरोवर को देखा जिसमें महामाया देवी ने स्नान किया था। 

सातवीं सदी में सम्राट हर्षवर्धन के काल में एक और चीनी यात्री ह्वेनसांग भी भारत आया था। वह 637 ईस्वी में बुद्ध के अवतरण स्थल लुंबिनी तक पहुंचा था। इसी साल उसने कुशीनगर की भी यात्रा की थी। ह्वेनसांग लिखता है कि सरोवर से 24 कदम की दूरी पर वह अशोक का वृक्ष है जिसके नीचे भगवान बुद्ध का जन्म हुआ। 

कपिलवस्तु की सैर - राजा शुद्धोधन की राजधानी कपिलवस्तु लुंबिनी वन से 27 किलोमीटर पश्चिम की तरफ है। लुंबिनी आने वाले सैलानी और बौद्ध श्रद्धालु कपिलवस्तु नगर घूमने भी जाते हैं। आप बाइक रेंटल पर लेकर या फिर टैक्सी बुक करके कपिलवस्तु जा सकते हैं।

आबोहवा का आनंद लें - लुंबिनी वन क्षेत्र में आप प्राकृतिक आबोहवा का भरपूर आनंद ले सकते हैं। यहां पर 250 से ज्यादा पक्षियों की प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें सबसे बड़ा पक्षी सारस भी यहां पर देखा जा सकता है। यहां कई किस्म के सांप और लोमड़ी, बिल्लियां भी पाई जाती हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com
( LUMBINI, NEPAL , FAHIEN, ASHOKA PILLER, STUPA )

Saturday, October 26, 2019

यहां शाक्यमुनि तथागत गौतमबुद्ध का अवतार हुआ


शाम के छह बजे हैं और मैं एक बार होटल से निकल कर अपनी साइकिल लेकर माया देवी मंदिर की ओर चल पड़ा हूं। इस मंदिर का प्रवेश गेट नंबर 4 से है। गेट से करीब एक किलोमीटर अंदर जाने के बाद हरे भरे विशाल परिसर में मायादेवी का मंदिर है। काफी लोग मंदिर की ओर पैदल भी जा रहे हैं। यहां पर प्रवेश के लिए पहले टिकट लेना पड़ता है। भारतीय नागरिकों के लिए 25 रुपये का टिकट है। नेपाली रुपये में 40 रुपये। मैं टिकट लेकर मंदिर परिसर की तरफ बढ़ चला। पर इससे पहले जूते उतारने हैं स्टैंड पर। यहां पर पेयजल का भी बेहतरीन इंतजाम है। विश्व विरासत में शामिल इस मंदिर में प्रवेश से पहले सुरक्षा जांच से गुजरना पड़ता है। लुंबिनी का मायादेवी मंदिर युनेस्को की विश्व विरासत स्थली है। धीरे धीरे शाम ढल रही है। पश्चिम में सूरज डूब रहा है। मेरी तरह सैकड़ो लोग तथागत की जन्म स्थली में प्रवेश कर रहे हैं। मंदिर परिसर में कई जामुन के पेड़ हैं। उनसे पके हुए जामुन गिर रहे हैं।

शाक्यमुनि गौतम बुद्ध का जन्म लुंबिनी वन में 563 ईस्वी पूर्व में हुआ था। ऐसा तो हम बचपन से पुस्तकों में पढ़ते आए हैं। वह वैशाख पूर्णिमा का दिन था। अब इस दिन को बुद्ध पूर्णिमा कहा जाता है। राजा शुद्धोधन की पत्नी मायादेवी कपिलवस्तु से अपने मायके देवदह जा रही थीं। वे रामगाम के कोलिय वंश की राजकुमारी थीं। स्थापित परंपरा के मुताबिक वे पुत्र जन्म के लिए अपने मायके जा रही थीं। उनके साथ पूरा लाव लस्कर था। लुंबिनी के वन से गुजरते हुए उन्हें प्रसव वेदना महसूस हुई। इसी स्थली पर एक साल वृक्ष के नीचे उन्होंने तथागत को जन्म दिया। उनका बचपन में नाम सिद्धार्थ रखा गया। पुत्र को जन्म देने के बाद उन्होंने पास के सरोवर में स्नान किया। 

शाक्यमुनि आगे चलकर पूरे विश्व को शांति, मानवतावाद, करुणा, ज्ञान और सौहार्द का महान संदेश दिया। बुद्ध का जन्म, ज्ञान प्राप्ति और उनके महापरिनिर्वाण की तारीखें एक ही हैं यानी वैशाख पूर्णिमा। कहा जाता है कि तथागत अपने जन्म के तुरंत बाद सात कदम चले। उनके जन्म होते ही सरोवर के कमल पुष्प खिल उठे। साथ ही उन्होंने ऐलान किया कि यह उनका आखिरी जन्म है।

मायादेवी मंदिर वास्तव में कोई मंदिर नहीं है, बल्कि बुद्ध के जन्म स्थल को संरक्षित किया गया है। सफेद रंग का सुंदर सा भवन बाहर से दिखाई देता है। पर इसके अंदर जाने पर उस वृक्ष के अवशेष हैं जहां माया देवी ने बुद्ध को जन्म दिया था। साल 2003 में इस स्थल को संरक्षित कर आम लोगों के दर्शन के लिए खोला गया है। इसके आंतरिक हिस्से में फोटोग्राफी की मनाही है।

मंदिर के पृष्ठ भाग में सुंदर सा सरोवर है जहां मायादेवी ने यात्रा के दौरान स्नान किया था। मंदिर के पीछे के हिस्से में विशाल पार्क है। इसमें हरे भरे पेड़ हैं। मंदिर परिसर का वातावरण इतना खूबसूरत है कि यहां आने के बाद जल्दी निकलने की इच्छा नहीं होती। शाम गहराने लगी है। अंधेरा होने के बाद सफेद रंग की इमारत नन्हें नन्हे बल्बों से जगमगा उठी है। इसे देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो तथागत अपने विचारों से पूरे विश्व को आलोकित कर रहे हों।

बाद में  बुद्ध के जन्म स्थली के पास कपिलवस्तु के राजा शुद्धोधन ने बाद में विशाल सरोवर का निर्माण कराया। महात्मा बुद्ध के कुशीनगर में महापरिनिर्वाण के बाद से ही लुंबिनी बौद्ध मतावलंबियों का तीर्थ स्थल बन गया। दूर दूर से लोग तथागत की जन्म स्थली को देखने के लिए यहां पहुंचने लगे। आजकल को विश्व के हर देश से लोग यहां पहुंचते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य- -vidyutp@gmail.com
 ( MAYA DEVI MANDIR, UNESCO WORLD HERITAGE SITE )

Thursday, October 24, 2019

फ्रांस. चीन और कोरिया के मोहक बौद्ध मंदिर


लुंबिनी में अलग अलग देशों के बौद्ध मठ मंदिर वन क्षेत्र के बीच में बने नहर के पूर्व और पश्चिमी किनारे पर बने हैं। अब मैं नहर के पश्चिमी तट पर बने मंदिरों को देखने निकल पड़ा हूं। पर इस भीषण गर्मी में बार बार पानी और जूस का सहारा लेना पड़ रहा है, ताकि कड़ी धूम में साइकिल चलाते हुए शरीर में पानी की कमी न पड़ जाए।

मुझे कुछ लोग किराये पर बैटरी रिक्शा लेकर तो कुछ लोग डिजाइनर रिक्शे में भी घूमते हुए नजर आए। बैटरी रिक्शा वाले दो घंटे में प्रमुख मंदिरों को घुमाने के लिए दो घंटे का 400 रुपये लेते हैं। अगर आपने समय ज्यादा लिया तो वे अतिरिक्त रुपये मांगेंगे। साइकिल बाइक जैसे निजी वाहनों से घूमने वाले लोगों के लिए कई मंदिरों के परिसर में पार्किंग का इंतजाम है। ज्यादातर जगह पार्किंग निःशुल्क है।

हम पहुंच गए हैं नेपाल के बज्रयान महाविहार में। बौद्ध धर्म में बाद में कई वैचारिक विभाजन हुए इसमें महायान और हीनयान प्रमुख हैं। नेपाल का यह मंदिर बज्रयान शाखा का है। इस मंदिर में लकड़ी का काम प्रमुखता से दिखाई देता है।

फ्रांस का बेहद सुंदर बौद्ध मंदिर - नेपाल के महाविहार के ठीक बगल में फ्रांस का बौद्ध मंदिर स्थित है। इसका परिसर अत्यंत हरा भरा और सुंदर है। फ्रांस का यह मंदिर लोटल ब्लूम स्तूप है। इसका आकार खिलते कमल जैसा है। पास में बने सरोवर में कमल के फूल खिले हैं।

जर्मनी का बेहतरीन बौद्ध मंदिर -  आगे चलकर हम जर्मनी के मंदिर पहुंच गए हैं। इसका प्रवेश द्वार भी बेहद सुंदर है। जर्मनी के बौद्ध मंदिर के परिसर में सुनहले रंग की बुद्ध की कई सुंदर प्रतिमाएं बनी हैं। मंदिर की आंतरिक सजावट बहुत सुंदर है। 



मंदिर का आंतरिक हिस्सा गोलकार है। आंतरिक छत पर बहुत सुंदर पेंटिंग बनी हैं। काफी देर तक मंदिर के अंदर बैठकर हम इन पेंटिंग को निहारते रहे। कई लोगों की नजर में जर्मनी  का ये मंदिर लुंबिनी वन क्षेत्र के सबसे सुंदर मंदिरों में से है। यहां पर विशाल धर्म चक्र भी बने हुए हैं। मंदिर के प्रांगण में बुद्ध के जीवन से जुडी सुंदर झांकियां है।

जर्मनी और फ्रांस के मंदिर के सामने एक विशाल सरोवर है। इस सरोवर के दूसरी तरफ नेपाल का एक और विशाल बौद्ध मंदिर है। इस मंदिर के आंतरिक हिस्से में फोटोग्राफी निषिद्ध है। इसके आगे कनाडा के बौद्ध समुदाय द्वारा बनवाया गया मंदिर है।

जर्मनी के बौद्ध मंदिर में कुछ सैलानी मिले जो गोरखपुर जिले से आए हैं। वे सारे लोग मंदिर के सौंदर्य पर मोहित थे। मंदिर के चारों तरफ सुंदर हरित पार्क है। इस पार्क में बुद्ध की सुनहली मूर्तियां हैं। पर लुंबिनी में अभी बौद्ध मंदिरों की श्रंखला खत्म कहां हुई है। अभी हमें कई मंदिर देखने हैं।

चीन और कोरिया के मंदिर - अब हम चल पड़े चीन के मंदिर की ओर। चीन का मंदिर क्षेत्रफल में काफी बड़ा है। चीन के मंदिर में चीन के कई बौद्ध धर्म गुरुओं की विशाल प्रतिमाएं हैं। इस मंदिर में हाथियों की कई छोटी बड़ी प्रतिमाएं भी हैं। चीन की संस्कृति के अनुरूप यहां सुनहले रंग की लाफिंग बुद्ध की विशाल प्रतिमा भी देखी जा सकती है।



सबसे विशाल कोरिया का मंदिर - विशालता में कोरिया के मंदिर का कोई सानी नहीं है। यह मंदिर सात मंजिला है। इसके परिसर में पहुंचकर मैं इसकी मंजिलें गिन रहा हूं। कोरिया के मंदिर में अतिथि गृह भी बना हुआ है। कई देशों के सैलानी यहां पर आकर ठहरते भी हैं। उनके लिए यहां पर भोजनालय भी बना हुआ है। 

कोरिया और जापान के मंदिर आमने सामने हैं। यहां पर फिर आइसक्रीम की चुस्की लेने के बाद मैं वापस चल पड़ा हूं। कुल कितने किलोमीटर साइकिल चलाई इसकी गिनती नहीं है। पर यह कुल 10 किलोमीटर से ज्यादा हो गया होगा। होटल पहुंचकर एक बार फिर स्नान करके एक घंटे के लिए सो गया। शाम को मायादेवी मंदिर जाना है इसलिए जगने के लिए मोबाइल में अलार्म लगा लिया है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-        ( LUMBINI, NEPAL, BUDDHA, CHINA, CANADA TEMPLE, KORIA, FRANCE, BRAJYANA )  

Tuesday, October 22, 2019

लुंबिनी वन में बौद्ध मंदिरों के बीच तथागत की तलाश


लुंबिनी वन क्षेत्र में मैं साइकिल से गेट नंबर 4 से प्रवेश कर गया हूं। दोनों तरफ हरे भरे जंगल हैं। साल के लंबे वृक्ष के बीच से गुजरते हुए जून के महीने में भीषण गर्मी के बीच राहत का एहसास हो रहा है। आगे नन्ही सी नदी तलार का पुल आया। लुंबिनी के इस वन क्षेत्र में कई पक्षियों का बसेरा है। चलते हुए उनका कलरव सुनाई देता है।  

श्रीलंका का बौद्ध मठ - थोड़ी दूर साइकिल का पैडल मारने के बाद दाहिनी तरफ श्रीलंका का बौद्ध मंदिर दिखाई देता है। साइकिल पार्क करके मैं मंदिर के अंदर प्रवेश कर गया। मंदिर के अंदर सुंदर नहर और क्यारियां बनी हैं। इस मंदिर का उदघाटन 2009 में श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंद राजपक्षे ने किया था। मंदिर में बुद्ध के जीवन की घटनाओं से जुड़े कुछ बेहतरीन भित्ति चित्र बनाए गए हैं।



शांति दीप और नौका विहार - इसके आगे चलने पर लुंबिनी की विजिटर सेंटर आता है। अब मैं शांति दीप के पास पहुंच गया हूं। लुंबिनी वन के बीचों बीचों एक विशाल नहर बनाई गई है। इस नहर के बीच में शांति दीप प्रज्जवलित किया गया है। यह अखंड दीप हमेशा जलता रहता है। एक तरफ लिटिल बुद्ध का विशाल सुनहली प्रतिमा है। शांतिदीप के पास आप नौका विहार का आनंद ले सकते हैं। नहर में चलने वाली मोटर बोट आपको मार्केटिंग कांप्लेक्स तक ले जाती है।  

हमारा अगला पड़ाव है म्यांमार गोल्डेन टेंपल। इस परिसर में सुनहले रंग का विशाल आकार का मंदिर है। इसके ऊपर लोकमनी पैगोडा का बोर्ड लगा दिखाई देता है। इस मंदिर का परिसर काफी बड़ा है। इसमें भिक्षु निवास भी बना हुआ है। इस मंदिर के पास ही एक कॉटेज रेस्टोरेंट है। भरी गर्मी में यहां जूस पीकर मैंने थोड़ी राहत महसूस की। 

यहां पर कुछ आईसक्रीम और चनाजोर गरम बेचने वाले भी मौजूद हैं। म्यामांर के मंदिर के पास ही लुंबिनी का विपस्यना केंद्र भी है। सत्यनारायण गोयनका जी द्वारा इजाद किए गए विपस्यना केंद्र कई शहरों में स्थापित किए गए हैं।


कंबोडिया के मंदिर की कलात्मकता - अब हम कंबोडिया के मंदिर की राह पर हैं। यह लुंबिनी के मंदिरों के तमाम बीच अत्यंत कलात्मक मंदिर है। मंदिर की आंतरिक सज्जा अदभुत है। मंदिर में सूर्य की रोशनी सीधे जाकर बुद्ध की मूर्ति पर पड़ रही है। मंदिर के अंदर बैठकर अदभुत शांति का एहसास हो रहा है। यहां मैंने करीब आधा घंटा वक्त गुजारा। मंदिर की दीवारों पर कई सुंदर और कलात्मक पेटिंग भी लगी हैं।

इसके बाद आगे चलने पर भारत का मंदिर भी दिखाई देता है। इस मंदिर का निर्माण महाबोधि सोसाइटी ऑफ इंडिया द्वारा करवाया गया है। इसके आगे कनाडा का मंदिर दिखाई देता है। यहां पर प्रशिक्षण केंद्र भी चलाया जाता है। इसके आगे चलने पर मुझे थाइलैंड का बौद्ध मठ दिखाई देता है। आसपास में हरे भरे आम के पेड़ हैं। इनपर कच्चे हरे आम झूल रहे हैं।

अब मैं मार्केटिंग कांप्लेक्स के पास पहुंच गया हूं। यहां पर टी शर्ट और तमाम कलात्मक वस्तुओं की दुकाने हैं। पर इन सबके बीच मुझे भूख लगी है। दोपहर का समय है। एक रेस्टोरेंट में खाने के लिए बैठ गया। पेट पूजा के बाद फिर आगे का सफर शुरू हो गया। यहां पर चावल, दाल वाली थाली मिल रही है। 

दोपहर में खाने के बाद थोड़ा सुस्ताने के बाद एक बार फिर साइकिल पर पैडल मारने लगा। मार्केटिंग कांप्लेक्स के पास बसों का पडाव भी है। बाहर से आने वाली बसें यहीं पर रुकती हैं। यहां पर स्थानीय भ्रमण के लिए डिजाइनर साइकिल रिक्शा भी मिल रहे हैं। 


विशाल जापानी शांति स्तूप -  अब हमारी मंजिल है जापान द्वारा बनवाए गए शांति स्तूप की ओर। यह सफेद रंग का विशाल स्तूप है। जापान सरकार द्वारा बनवाए गए स्तूप हर जगह एक ही डिजाइन में हैं। मैंने वैशाली, राजगीर,  दिल्ली से स्तूपों को देखा है। लुंबिनी के जापानी स्तूप के परिसर में हेलीपैड भी बना हुआ है। एक नवविवाहित जोड़ा यहां पर ड्रोन कैमरे के मदद से शूटिंग में लगा हुआ है।
जापानी स्तूप में मैं थोड़ी देर आराम करता हूं। यहां पर स्तूप में काम करने वाले कई मजदूरों से बात हुई। ये सारे लोग तराई के रहने वाले हैं। भारत के उत्तर प्रदेश के रहने वाले लोगों की तरह ही रंग रुप वाले हैं। वह जाति बिरादरी। एक सज्जन अपना नाम बताते हैं राम स्वरूप धवल। धवल हां उनकी जाति धोबी है। इधर तराई के लोगों की रिश्तेदारियां भी यूपी के तमाम जिलों में हैं। रुपनदेही जिले में नेपाली लोगों की आबादी कम है यहां मधेशी लोग ज्यादा हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( NEPAL, BUDDHA MANDIR, SRILANKA, MYANMAR JAPAN, THAILAND, CAMBODIA) 

Sunday, October 20, 2019

लुंबिनी विश्वस्तरीय सपनों का नगर


सिद्धार्थ यातायात की मिनी बस में बैठकर मैं लुंबिनी के लिए चल पड़ा हूं। नेपाल में इन सभी जगह पर भारतीय मुद्रा चलती है। इसलिए मैंने एनसी यानी नेपाली करेंसी नहीं ली है। एक भारतीय रुपया 1.60 नेपाली रुपये के बराबर है। इसी तरह से आप हर जगह भारतीय करेंसी भी भुगतान कर सकते हैं। करीब 10 किलोमीटर सफर के बाद बस ने मुझे गेट नंबर 6 के पास उतार दिया। पर यह क्या यहां कोई बाजार नहीं नजर आ रहा। बस कुछ बसें लगी हैं।

मुझे लुंबिनी में अपने होटल की तलाश है जो मैंने ऑनलाइन बुक किया है। तब कुछ लोग बताते हैं कि यहां से आप दूसरी बस लेकर गेट नंबर 4 और 5 के पास उतरें। वहांपर लुंबिनी का बाजार और होटल आदि हैं। मैं एक दूसरी मिनी बस में बैठ गया। उसने मुझे गेट नंबर 4 के पास उतार दिया। यहां दाहिनी तरफ बाजार नजर आ रहा है। अब मैं निकल पड़ा हूं लुंबिनी विलेज लॉज की तलाश में।

लुंबिनी विलेज लॉज में - कुछ दूर पैदल चलने के बाद मैं अपने लॉज पहुंच गया हूं। वहां एक महिला ने मेरा स्वागत किया। बुकिंग स्लिप दिखाने पर मुझे मेरे कमरे में पहुंचा दिया गया। यह लॉज आंगन नुमा है। तीन तरफ कमरे बीच में विशाल आंगन। पहली मंजिल पर एक रेस्टोरेंट भी है। कमरा डबल बेड वाला अटैच टायलेट के साथ है। 

स्नान के बाद रिसेप्शन पर आने पर मेरी मुलाकात होटल के प्रोपराइटर लीलामणि शर्मा से हुई। उनका अंदाज दोस्ताना है। उन्होंने मुझे लुंबिनी घूमने के बारे में सलाह दी। कई तरीके हैं। बैटरी रिक्शा से घूमना। स्कूटी किराये पर लेकर घूमना या फिर साइकिल किराये पर लेकर घूमना। मैं साइकिल का चयन करता हूं। तो डेढ़ सौ नेपाली रुपये या 100 भारतीय रुपये में दिन भर के लिए मेरी पसंद की साइकिल मिल गई। लीलामणि जी ने सलाह दी की लुंबिनी का मुख्य मंदिर माया देवी मंदिर में शाम को 7 बजे तक प्रवेश होता है। बाकी के मंदिर शाम को 5 बजे बंद हो जाते हैं। तो आप दिन भर लुंबिनी कांप्लेक्स के बाकी मंदिर घूमें और शाम को मायादेवी मंदिर जाएं। सुबह के 10 बजे हैं और मैं साइकिल लेकर चल पड़ा हूं लुंबिनी कांप्लेक्स की ओर।

शाक्यमुनि गौतम बुद्ध के जन्म स्थल लुंबिनी को नेपाल सरकार ने यूनेस्को की सलाह पर कायाकल्प करके के अतीव सुंदर रूप प्रदान कर दिया है। तीन वर्ग किलोमीटर में वन क्षेत्र को पुनर्जीवित करके इसे स्वर्ग सा सुंदर बना दिया गया है। काठमांडू जाने वाले महेंद्र हाईवे से लगते हुए लुंबिनी वन लगभग 5 किलोमीटर लंबा और डेढ़ किलोमीटर चौड़ा वन क्षेत्र है। इसमें दुनिया के कई देशों द्वारा बनवाए गए 20 से ज्यादा विशाल बौद्ध मंदिर हैं। पर इस परिसर में घूमते हुए आपको हमेशा एहसास होता कि आप किसी हरित वन में घूम रहे हैं। इन्ही जंगलों में हर थोड़ी दूर पर एक नया मंदिर बना है।

लुंबिनी का हुआ कायाकल्प - साल 1978 से पहले मायादेवी मंदिर के आसपास गांव बसे हुए थे। पर नेपाल सरकार ने सार लोगों को यहां से हटाकर नई जगह न्यू लुंबिनी में बसाया। पांच किलोमीटर लंबे और डेढ़ किलोमीटर चौड़े क्षेत्र की बाउंड्री की गई। इसमें प्रवेश के लिए थोड़ी दूर पर प्रवेश के लिए गेट बनाए गए। लुंबिनी वन क्षेत्र की आंतरिक डिजाइन के लिए दुनिया के जाने माने वास्तुविद प्रोफेसर केंजो टांगे  (Pro. KENZO TANGE ) की सेवाएं ली गईं। उन्होंने कई साल में लुंबिनी वन का मास्टर प्लान तैयार किया। उन्होंने 1972 से 1978 तक छह साल तक लुंबिनी का डिजाइन करने में समय लगाया।



सन  1978 में लुंबिनी वन को सुंदर बनाने का कार्य शुरू हुआ जो 1985 में पूरा हुआ। हालांकि तमाम मंदिरों को निर्माण कार्य उसके बाद भी चलता रहा।
नेपाल सरकार ने लुंबिनी डेवलपेंट ट्रस्ट बनाकर क्षेत्र का विकास कराया है। लुंबिनी वन क्षेत्र में चार प्रमुख हिस्से हैं – पवित्र उद्यान, बौद्ध मठ क्षेत्र, मार्केटिंग कांप्लेक्स और न्यू लुंबिनी विलेज।

महान वास्तुविद प्रोफेसर केंजो टांगे को वास्तुकला के क्षेत्र में 1987 में प्रित्जर पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। वास्तु के क्षेत्र में यह नोबेल पुरस्कार के बराबर माना जाता है। चार सितंबर 1913 को जापान के ओसाका में जन्में प्रोफेसर टांगे का 22 मार्च 2005 को निधन हो गया। पर उनके द्वारा डिजाइन किए गए दुनिया के उत्कृष्ट स्मारक हमेशा उनकी दास्तां सुनाते रहेंगे। 

प्रोफेसर टांगे ने दूसरे विश्वयुद्ध के बार तबाह हुए हिरोसीमा को डिजाइन किया। सन 1969 में उनका टोकियो प्लान दुनिया भर में चर्चित हुआ। उन्होंने इटली के शहर बोलगेना को डिजाइन किया। 

वे पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट बिल्डिंग के भी डिजाइनर रहे। प्रोफेसर टांगे ने लुंबिनी को विश्व में सुंदरतम स्थलों में विकसित कर दिया है, जहां आकर मन प्रफुल्लित हो उठता है। भले टांगे  अब इस दुनिया में नहीं हैं पर उनकी डिजाइन की गई आलीशान इमारतें और स्मारकों में उनकी बेहतरीन कलात्मकता आज भी जिंदा है। 
--- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( LUMBINI, NEPAL, BUDDHA, Pro. KENZO TANGE )