Tuesday, September 10, 2019

और इस तरह गयासपुरा बन गया निजामुद्दीन

दिल्ली की बस्ती निजामुद्दीन। हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन से बाहर निकलकर मुख्य सड़क पर आने के बाद सड़क के उस पार एक बस्ती गुलजार है जिसका नाम है निजामुद्दीन। उसे यह नाम महान सूफी संत हजरत निजामुद्दीन के नाम पर मिला। कौन थे हजरत निजामुद्दीन। महान शायर अमीर खुसरो के गुरू।  


वे चिश्ती घराने के चौथे संत थे। इस सूफी संत ने वैराग्य और सहनशीलता का संदेश दिया। उनके बारे में कहा जाता है कि 1303 में इनके कहने पर बादशाह की सेना ने हमला रोक दिया था। अपने महान संदेशों के कारण वे सभी धर्मों के लोगों के बीच लोकप्रिय बन गए। उनका जन्म 9 अक्तूबर 1228 को उत्तर प्रदेश के बदायूं में हुआ था। पांच साल की उम्र में पिता अहमद बदायूंनी के निधन के बाद वे अपनी मां जुलेखा के साथ दिल्ली आ गए।

बाबा फरीद के शिष्य - 
वे बड़े हुए तो सूफी संत फरीदुद्दीन गंज शक्कर ( बाबा फरीद ) के शिष्य बन गए। शुरुआत में वे पाकिस्तान के अजोधन नामक कस्बे में रहते थे और वहीं अपनी आध्यात्मिक पढ़ाई कर रहे थे। बाद में बाबा फरीद ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया।

हजरत निजामुद्दीन ने दिल्ली के गयासपुरा इलाके को अपना निवास बनाया। तब यह विरान इलाका हुआ करता था। यह यमुना नदी और दक्षिण में बहते एक नहर के बीच का इलाका था। यह शहर के शोर शराबे से दूर शांत इलाका था। यहां उन्होंने एक खानकाह शुरू की जहां गरीबी अमीरी का भेद भुलाकर विभिन्न समुदाय के लोगों को खाना खिलाया जाता था। यह सिलसिला आज भी जारी है। शेख निजामुद्दीन के दो शिष्य प्रसिद्ध हुए शेख नसीरुद्दीन मुहम्मद उर्फ चिरागे दिल्ली और अमीर खुसरो।

चल खुसरो घर आपने – 
हजरत निजामुद्दीन का इंतकाल 3 अप्रैल 1325 को दिल्ली में हुआ। उनके निधन पर उनके शिष्य खुसरो बहुत निराश हुए। उन्हे दुखी होकर लिखा – चल खुसरो घर आपने सांझ भई चहुं देश... जब 92 साल की उम्र में उन्होंने प्राण त्यागे तो उनके मकबरे का निर्माण शुरू हो गया। तकरीबन 1562 तक उनके मकबरे का निर्माण चलता रहा। उनका मकबरा बहुत भव्य नहीं है पर हिंदू और मुसलमान सभी वर्गों के लोग वहां हमेशा से पहुंचते हैं। इसके साथ ही यह जगह दुनिया भर में मशहूर हो गई। यहां सालाना उर्स  लगता है तब लाखों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।

निजामुद्दीन की अनूठी बाउली -
सन 1321-22 में दिल्ली सल्तनत पर गयासुद्दीन तुगलक का शासन था। वह अपनी राजधानी तुगलकाबाद बसाने में व्यस्त था तो निजामुद्दीन में रह रहे सूफी संत गरीबों के लिए खानकाह का इतंजाम कर रहे थे तो पीने के पानी के लिए विशाल बावड़ी खुदवा रहे थे। सुल्तान चाहता था कि दिल्ली के मजदूर कहीं और काम नहीं करें। तो रात की रोशनी में मजदूर आकर निजामुद्दीन में बावड़ी खोद रहे थे। इस बावड़ी में कुल सात जल स्रोत हैं। इनसे हमेशा पानी निकलता रहता है। चौदहवीं सदी में इस बावड़ी के निर्माण के दौरान इसके आधार तल में जामुन लकड़ी लगाई गई थी। पर ये लकड़ी सात सौ साल बाद भी सड़ी नहीं है। 

पानी में चमत्कारी शक्तियां -
कुछ लोग निजामुददीन बावड़ी के पानी को चमत्कारी शक्तिओं वाला मानते हैं। इसकी गहराई 80 फीट तक है। इसके दो हिस्से में मजबूत दीवारें बनाई गई हैं। 2008 में इस बावड़ी की कुछ दीवारें क्षतिग्रस्त हो गईं। बाद में आगा खां ट्रस्ट ने इसके संरक्षण पर काम किया। आज यह बावड़ी निजामुद्दीन दरगाह का खास हिस्सा है।
-- vidyutp@gmail.com  
( NIZAMUDDIN, DELHI ) 

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