Friday, September 6, 2019

चरखा चलता बापू का ... स्वदेशी और स्वावलंबन



चरखा बापू के लिए स्वदेशी और स्वावलंबन का प्रतीक था। बापू और उनसे जुड़े हुए चरखों का संग्रह दिल्ली के राजघाट में और पटना के चरखा संग्रहालय में देखा जा सकता है। पर अब एक नया चरखा संग्रहालय दिल्ली के कनाट प्लेस में भी बन गया है। खादी ग्रामोद्योग भवन के उस पर पालिका मार्केट के उपर ये संग्रहालय 2018 में बनकर तैयार हुआ है। इसमें प्रवेश के लिए 20 रुपये का टिकट भी रखा गया है। दिल के दिल में स्थित इस संग्रहालय को देखने के लिए आते जाते लोग पहुंच जाते हैं।

बुनाई देश की पुरानी पंरपरा
यह संग्रहालय आपको सूत कातने और उससे वस्त्र बनाने की देश की ऐतिहासिक परंपरा से अवगत कराता है। दरअसल घर में सूत कातकर वस्त्र बनाने की परंपरा देश में हजारों साल पुरानी है। हड़प्पा और मोहनजोदाड़ो में भी वस्त्र बनाने के प्रमाण मिलते हैं। ऋगवेद में कताई बुनाई की कई प्रकार की विधियो के बारे में बताया गया है। मौर्य काल में भी देश में वस्त्र निर्माण की परंपरा थी। कौटिल्य ( चाणक्य ) ने अपने ग्रंथ अर्थशास्त्र में इसका उल्लेख किया है। मौर्य काल में सूत्राध्यक्ष यानी बुनाई का निदेशक शासन में महत्वपूर्ण पद हुआ करता था।

घर में बनाए जाते थे कपड़े
परंपरा के अनुसार महिलाएं घर में खाली समय में सूत काता करती थीं। चरखे का इस्तेमाल के अलावा धुनाई, पुनी बनाने, कताई आदि का काम वे घर में किया करती थीं। ऐसे कार्य में बड़ी निपुणता की आवश्यकता होती थी। मार्कोपोलो जब 1288 में भारत आया तो उसने देश में घर घर में वस्त्र बनाने की परंपरा का बड़ा ही रोचक वृतांत पेश किया। उसने लिखा कि यहां लोग मकड़ी के महीन जालों की तरह बेहतरीन वस्त्र बनाने में माहिर हैं। मुगल काल में हाथ से कताई और वस्त्र बनाने की परंपरा का और भी विकास हुआ।

विदेशी बाजार में भारतीय वस्त्रों की मांग
16वीं शताब्दी में विदेशी बाजार में भारत के हस्त निर्मित वस्त्रों की बहुत मांग थी। पुर्तगाली,डच,  फ्रांसिसी और ब्रिटिश ऐसे कपड़ों की तिजारत करते थे। पर ब्रिटिश राज में विदेशी कपड़ों के भारतीय बाजार में आने के बाद इस परंपरा को झटका लगने लगा। महात्मा गांधी ने चरखे की ताकत को समझा और इसे अपने जीवन का हिस्सा बनाया। चरखा स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान स्वदेशी और स्वावलंबन का प्रतीक बन गया।

 किस्म किस्म के चरखे
इस चरखा संग्रहालय में आप कुछ खास किस्म के चरखों से रूबरू हो सकते हैं। इसमें दो तकुए वाला बारदोली चरखा प्रमुख है। बारदोली गुजरात का एक शहर है उसके नाम पर ये चरखा मॉडल लोकप्रिय है। आगे आप पेटी चरखा देख सकते हैं। आगे आप हरियाणा का बंजू चरखा देख सकते हैं। रघुबीर सैनी द्वारा निर्मित यह चरखा 1943 का है। इसके आगे हरियाणा का पंखुड़ी चरखा देख सकते हैं। यहां पर पंजाब का लोहे का बना परंपरागत चरखा भी रखा गया है। बांस का बना हुआ पेटी चरखा देख सकते हैं। इसे यरवदा चरखा भी कहते हैं। बापू यरवदा जेल में इस तरह के चरखे का इस्तेमाल करते थे। आगे आप करघा देख सकते हैं जिससे दरियां बनती हुई दिखाई देती है।

प्रदर्शनी स्थल के बाहर विशाल लॉन में एक बड़े चरखे का माडल स्थापित किया गया है। इसके पास ही बापू की एक विशाल सफेद प्रतिमा भी है। चरखा और प्रतिमा मिलकर राजीव चौक पर बड़ा ही भव्य स्वरूप प्रदान करते हैं। 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com
( CHARKHA, BAPU, GANDHI, DELHI ) 

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