Monday, September 30, 2019

राजपूताना रंग और राजसी वैभव देखें : सिटी पैलेस जयपुर

आभानेरी से चांद बावड़ी देखने के बाद लौट रहा हूं। बावड़ी के बाहर गन्ने का जूस पीया। पर वापस जाने के लिए कोई वाहन नहीं मिला। फिर एक बाइक वाले सज्जन ने लिफ्ट दे दी। गूलर तक पहुंच गया। गूलर से सिकंदरा एक जीप में। जीप पूरी भर गई थी तो छह किलोमीटर का सफर पीछे लटकर खड़े होकर पूरा किया। सिकंदरा से सीधे जयपुर की बस मिल गई है। बस आगे चलकर दौसा में रूकी। बस स्टैंड के पास दौसा के पास के प्रसिद्ध गांव भांद्रेज के आचार की दुकान है। भांद्रेज ऐतिहासिक गांव है। मैं वहां जा नहीं सका तो वहां का अचार ही सही। यहां से डेला (कैर) के अचार की एक बाटल खरीद लेता हूं। ये डेला का अचार मुझे काफी प्रिय है। डेला को राजस्थान में कैर कहते हैं। यह कम पानी में भी उगने वाली झाड़ है।


जयपुर पहुंचकर रेलवे स्टेशन के पास ही उतर गया। यहां पर आज रात्रि विश्राम के लिए मैंने होटल बुक कर रखा है। होटल में चेकइन के बाद घूमने निकल पड़ा। हमारी मंजिल है सिटी पैलेस। तो पहले मेट्रो से चांदपोल तक पहुंचा। चांद पोल से बैटरी रिक्शा मिल गया। यह रिक्शा मुझे मिर्जा इस्माइल रोड (एमआई रोड ) से लेकर चला। मैं बड़ी चौपड़ उतर गया। बड़ी चौपड़ पर कचौड़ी खाई दस रुपये की एक सब्जी के साथ। इसके बाद हवा महल से गुजरता हुआ सिटी पैलेस पहुंच गया। वैसे में कई साल बाद सिटी पैलेस दूसरी बार पहुंच रहा हूं।

सिटी पैलेस में आमेर और जयपुर से सैकड़ो साल राज करने वाले कछवाहा राजाओं का वैभव और ऐश्वर्य को करीब से देखा जा सकता है। सिटी पैलेस के मुख्य द्वार के बाद विशाल मैदान है। इस मैदान में असंख्य कपोतों का डेरा है। इस मैदान में पार्किंग के लिए जगह और खाने पीने की कुछ दुकाने हैं। 

प्रवेश टिकट - सिटी पैलेस का प्रवेश टिकट 200 रुपये का है। बच्चों और छात्रों के लिए 100 रुपये का टिकट है पर आईडी कार्ड होना जरूरी है छात्रों के लिए। सिनियर सिटिजन और रक्षा कर्मियों, सैनिकों के लिए 50 फीसदी रियायत है। सिटी पैलेस के प्रवेश द्वारा पर दो नन्ही तोपें आपका स्वागत करती हैं। किले की सबसे ऊंची मंजिल पर नजर डालें तो जयपुर राजघराने का ध्वज लहराता दिखाई देता है।

जयपुर सिटी पैलेस की खासियत इसका खुलापन है। यह उदयपुर के सिटी पैलेस की तरह अनगढ़ नहीं है। इसके हर भवन में कलात्मकता है। अठारहवीं सदी में महाराजा सवाई जय सिंह ने जयपुर शहर को नई पहचान दिलाई। उनके राज्यकाल में जयपुर में कला-संस्कृति का काफी तरजीह मिली और ये शहर वैभव के चरमोत्कर्ष पर पहुंचा।

चित्रकला और शस्त्रों का अनूठा संग्रह -  पेंटिंग और फोटोग्राफी वाली गैलरी में आप नायाब चित्रों को देख सकते हैं। इसके आंतरिक हिस्से में कई जगह फोटोग्राफी की अनुमति नहीं है। यहां आप जयपुर की महारानी गायत्री देवी और उनके परिवार के दूसरे सदस्यों के कुछ नायाब फोटोग्राफ भी देख सकते हैं। शस्त्र गैलरी में आप राजघराने के अलग अलग कालखंड में इस्तेमाल हुए तलवार समेत अनेक अस्त्र शस्त्रों को देख सकते हैं।

जयपुर के 36 कारखाने -  सिटी पैलेस के अंदर हस्तशिल्प का विशाल बाजार है। इस बाजार में राजपरिवार द्वारा मान्यता प्राप्त शिल्पी अपने नायब उत्पादों के साथ आपके समाने प्रस्तुत होते हैं। आपकी मर्जी इन उत्पादों को खरीदें या फिर देखकर आगे बढ़ जाएं। पर इन उत्पादों को देखने का मौका नहीं चुकें। यहां राजस्थान की कला शिल्प के परंपरा को बहुत करीब से देखा जा सकता है।


महाराजा सवाई मान सिंह म्युजियम – सिटी पैलेस के अंदर स्थित संग्रहालय का नाम सवाई मान सिंह म्युजियम है। यहां आप कछवाहा राजघराने के इतिहास के बारे में करीब से जान सकते हैं। इसके अलावा सिटी पैलेस में मुबारक महल, वस्त्र गैलरी भी देख सकते हैं।

चांदी का सबसे विशाल कलश महल के बारादरी में आप चांदी का विशाल कलश देख सकते हैं। इसका इस्तेमाल गंगाजल रखने के लिए किया जाता था। इसमें भरने के लिए खास तौर पर हरिद्वार से गंगा जल मंगाया जाता था। कुल 345 किलोग्राम के 5 फीट 3 ईंच ऊंचे इस कलश में 4091 लीटर गंगाजल आ जाता था। सन 1894 में इस कलश का निर्माण बड़ी संख्या में चांदी के सिक्कों के पिघलाकर किया गया था। इसे बनाने में दो साल का समय लगा था। इसको इधर उधर ले जाने के लिए इसमें पहियों का आधार लगाया गया था। सन 1902 में सवाई माधो सिंह जब किंग एडवर्ड सप्तम के राज्याभिषेक समारोह में हिस्सा लेने लंदन गए तो अपने धार्मिक कार्यों के लिए इस विशाल कलश को भी साथ लेकर गए थे। दुनिया के सबसे बड़े चांदी के कलश के रूप में इसका नाम गिनिज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( CITY PALACE JAIPUR, SILVER  JAR, SAWAI JAI SINGH ) 
  


Sunday, September 29, 2019

आभानेरी का हर्षद माता मंदिर – खुशी और आनंद की देवी

आभानेरी रोमांचक चांद बावड़ी के अलावा हर्षत माता के मंदिर के लिए भी प्रसिद्ध है। बावड़ी के ठीक पहले माता का प्राचीन मंदिर स्थित है। पहले श्रद्धालु बावड़ी में स्नान करने के बाद माता के दर्शन किया करते थे। आभानेरी गांव स्थित हर्षत माता मंदिर का निर्माण चौहान वंशीय राजा चांद ने आठवीं और नौवीं शताब्दी में कराया था। हर्षद माता का मंदिर पत्थरों पर नक्काशी का एक बेजोड़ नमूना भी है। यह मंदिर एक विशाल चबूतरे पर बना हुआ है।

हर पत्थर बोलता है
इस मंदिर का पत्थरों की इंटरलाकिंग कर निर्माण हुआ है। यहां की भव्यता देखकर ऐसा लगता है कि यहां हर पत्थर बोल रहा है। यह मन्दिर द्रविड़ शैली में बना हुआ है। मुस्लिम आक्रमण में यह मंदिर पूरी तरह तहस नहस हो गया था। बाद में गांव के लोगों ने पत्थरों को जोड़कर मंदिर को व्यवस्थित करने की कोशिश की। कई हमलों के बाद मंदिर बुरी तरह ध्वस्थ हो गया था। जयपुर के राजा ने अठारहवीं शताब्दी में इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया।

संकट की चेतावनी पहले देती हैं
इस सुंदर मंदिर में आज भी उस प्राचीन काल की वास्तुकला और मूर्तिकला के दर्शन होते हैं। माना जाता है कि हर्षत माता खुशी और आनन्द की देवी हैं जो भक्त को हमेशा खुश रखती हैं। वे समूचे गांव को आनन्दमय बनाए रखती हैं। किंवदंती है कि हर्षत माता गांव में आने वाले संकट के बारे में पहले ही चेतावनी दे देती थी जिससे गांव वाले सतर्क हो जाते और माता उनकी हमेशा रक्षा करती थी। इसे समृद्धि की देवी भी कहा जाता है।

33 करोड़ देवी देवताओं की मूर्तियां
कहा जाता है कि इस मंदिर के पत्थरों पर आकर्षक नक्काशी में 33 करोड़ देवी देवताओं के चित्र बनाए गए थे। पर विदेशी आक्रमण के दौरान की इन मूर्तियों को खंडित कर दिया गया। हजारों खंडित मूर्तियां इस मंदिर के परिसर में बिखरी हुई आज भी देखी जा सकती हैं।

नीलम की मूर्ति चोरी हो गई
बताया जाता है कि 1021-26 के काल में मोहम्मद गजनवी ने इस मंदिर को तोड़ दिया और सभी मूर्तियों को खंडित कर दिया था। इनमें से कई खंडित मूर्तियां आज भी मंदिर परिसर तथा चांद बावड़ी में सुरक्षित रखी हुई है। इस मंदिर की कई मूर्तियां अलग अलग संग्रहालयों की शोभा बढ़ा रही हैं। यह भी कहा जाता है कि मंदिर में छह फीट की नीलम के पत्थर की हर्षत माता की मूर्ति 1968  में चोरी हो गई।

चांद बावड़ी और हर्षद माता मंदिर के बीच में हनुमान जी का एक छोटा सा मंदिर भी है। हर्षद माता का मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन है। इस मंदिर में नियमित पूजा होती है। दूर दूर से श्रद्धालु माता के मंदिर में पहुंचते हैं। माता का मंदिर सुबह से लेकर शाम तक दर्शन के लिए खुला रहता है। मंदिर के आसपास छोटा सा बाजार भी है। यहां पर आप राजस्थान के हस्तशिल्प उत्पाद भी खरीद सकते हैं। गांव में कुछ खाने पीने की दुकानें भी हैं। हालांकि आभानेरी गांव में अब अतीत जैसी चमक नहीं दिखाई देती। पर हर रोज 400-500 विदेशी सैलानी चांद बावड़ी और हर्षद माता का मंदिर देखने के लिए पहुंचते हैं।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( HARSHAD MATA TEMPLE, ABHANERI, DAUSA, RAJSTHAN )



Friday, September 27, 2019

चांद बावड़ी - दुनिया की सबसे बड़ी और कलात्मक बावड़ी

आपको पता दुनिया की सबसे बड़ी बावड़ी कहां है। नहीं तो हमारे साथ चलिए। राजस्थान के दौसा जिले में एक गांव है आभानेरी। आभानेरी जाने के लिए हम जयपुर से चल पड़े हैं दौसा। यह सड़क जयपुर से आगरा की ओर जा रही है। दौसा से आगे सिकंदरा कस्बे में मैं उतर गया। सिकंदरा से आटो रिक्शा या मिनी बस से गूलर पहुंचा। 
गूलर सिकंदरा और बांदीकुई के बीच में छोटा सा बाजार है। गूलर चौराहा पर कांग्रेस के दिवंगत नेता राजेश पायलट की प्रतिमा लगी हुई है। गूलर से तीन किलोमीटर दूरी है आभानेरी की। पर गूलर से आभानेरी जाने के लिए मुझे कोई वाहन नहीं मिलता है। मैंने एक बाइक वाले से लिफ्ट मांगी। नहीं मिली। दूसरी कोशिश भी सफल नहीं रही। पर तीसरे बाइक वाले ने लिफ्ट दे दिया। और मैं पहुंच गया हूं आभानेरी।

आभानेरी मतलब चमकने वाला शहर
आभानेरी राजस्थान में जयपुर से 95 किमी दूरी पर स्थित गांव है। इस गांव में ही विश्व की सबसे बड़ी बावड़ी स्थित है। इसका नाम है चांद बावड़ी। चांद बावड़ी को आपने पहेली समेत कुछ फिल्मों में भी देखा होगा। आभानेरी का शुरुआती नाम था आभा नगरी मतलब चमकने वाला शहर। कालान्तर में भाषा के अपभ्रंश की वजह से इसका नाम धीरे-धीरे आभानेरी बन गया। ऐसी मान्यता है कि आभानेरी को राजा चांद ने बसाया था। चांद बावड़ी और माता के मंदिर की वजह से आभानेरी यह राजस्थान आने वाले पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र बन गया है। गुप्त काल के बाद मध्यकालीन स्मारकों के लिए आभानेरी प्रसिद्ध है।

नौंवी शताब्दी का चमत्कार
नौंवी शताब्दी में चांद बावड़ी का निर्माण नौवीं शताब्दी में राजा चांद ने किया था। यह बावड़ी चारों तरफ से 35 मीटर चौड़ी है। ऊपर से नीचे तक पक्की बनी सीढ़ियों के कारण पानी का स्तर चाहे जो भी हो हमेशा आसानी से पानी भरा जा सकता है। चांद बावड़ी100 फीट गहरी और 13 मंजिला है।

इसमें कुल 3500 सीढ़ियां है। चांद बावड़ी राजस्थान की सभी बावड़ियों में सबसे बड़ी और लोकप्रिय है।  चांद बावड़ी के अंदर बनी सीढि़यां कलात्मक और पुरातत्व कला का बेहतरीन उदाहरण है।

चक्करदार सीढ़ियां और कहावतें
बावड़ी की खासियत होती है कि गर्मी के दिनों में भी इसका पानी ठंडा रहता है। इलाके में ऐसी जनश्रुति है कि इसका निर्माण भूतों ने किया है। यह भी कि जानबूझकर इतनी गहरी और ज्यादा सीढ़ियों वाली बनाई है कि यदि इसमें एक सिक्का उछाला जाए तो उसका वापस आना असम्भव होगा।

भुलभुलैया के रूप में बनी इसकी सीढि़यों के बारे में कहा जाता है कि कोई व्यक्ति जिस सीढ़ी से नीचे उतरता है वह वापस कभी उसी सीढ़ी से ऊपर नहीं आ पाता। इसे अंधेरे उजाले की बावड़ी भी कहा जाता है। चांदनी रात में यह बावड़ी एकदम सफेद दिखाई देती है।

नृत्य कक्ष और गुप्त सुरंग
तीन मंजिली इस बावड़ी में राजा के लिए नृत्य कक्ष और गुप्त सुरंग बनी हुई है। यह वर्गाकार बावड़ी चारों ओर स्तंभयुक्त बरामदों से घिरी हुई है। चांद बावड़ी की सबसे निचली मंजिल पर बने दो ताखों में स्थित गणेश एवं महिषासुर मर्दिनी की भव्य प्रतिमाएं इसकी खूबसूरती में चार चांद लगा देती है। बावड़ी के जीर्णोद्धार के दौरान राजा चांद का एक शिलालेख भी मिला था।

विश्व विरासत में क्यों नहीं
इतनी खूबसूरत चांद बावड़ी को यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में क्यों नहीं शामिल किया गया है इसको लेकर आश्चर्य होता है। हालांकि गुजरात के पट्टन स्थित रानी का बाव ( बावड़ी ) को विश्व विरासत की सूची में शामिल किया गया है। भले ही यह विश्व विरासत स्थल का दर्जा नहीं पा सकी है पर चांद बावड़ी दुनिया भर के सैलानियों की नजर में है। 


कैसे पहुंचे राजस्थान के दौसा जिला मुख्यालय से करीब आभानेरी 33 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। वहीं बांदीकुई रेलवे स्टेशन से 10 किलोमीटर की दूरी पर है। गूलर से आभानेरी तक पहुंचने के लिए सार्वजनिक वाहन न मिलने से थोड़ी दिक्कत होती है। बावड़ी में प्रवेश के लिए 30 रुपये का टिकट है। यह सुबह से शाम तक सैलानियों के लिए खुली रहती है। रोज सैकड़ो लोग इस बावड़ी को देखने आते हैं। इसमें बड़ी संख्या विदेशी सैलानियों की होती है।

-विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( CHAND STEP WELL, ABHANERI, GULAR, BANDIKUI, DAUSA, RAJSTHAN  )



Wednesday, September 25, 2019

दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे का लोकोमोटिव देहरादून में

अगर आप उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में हैं और रेलवे स्टेशन पहुंचे हैं तो देहरादून रेलवे स्टेशन के बाहर उल्टी तरफ देखिए। आरक्षण भवन के प्रवेश द्वार पर आपको एक छोटा सा लोकोमोटिव मुस्कुराता हुआ नजर आएगा। यह लोकोमोटिव टॉय ट्रेन दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे का है।

किसी जमाने में दो फीट की पटरियों पर दौड़ने वाले इस लोकोमोटिव को देहरादून लाकर स्थापित किया गया है। यह बी क्लास का स्टीम लोकमोटिव है। इसका मेक नंबर नंबर 785 बी है। सौ साल से ज्यादा पुराने इस लोकोमोटिव को बाहर से इस तरह पेंट किया गया है कि यह नया नया सा लगता है। रेलवे स्टेशन से गुजरने वाले आते जाते लोग इसे देखते हैं। उन्हें लगता है कि मानो यह अभी भी चलने के लिए तैयार हो। रात की रोशनी में यह और भी सुंदर दिखाई देता है।

ब्रिटेन में बना लोकोमोटिव - नैरो गेज के इस स्टीम लोकमोटिव (इंजन) का निर्माण 1903 में ब्रिटेन में हुआ था। इसके निर्माता थे शार्प स्टीवार्ट एंड कंपनी। इस कंपनी का पता हुआ करता था एटलस वर्क्स, मैनेचेस्टर, ब्रिटेन। इस कंपनी की स्थापना 1843 में हुई थी। यह कंपनी सन 1888 में यह लंदन के ग्लासगो से रेलवे के लिए लोकोमोटिव का उत्पादन करती थी। सन 1903 तक यह 5000 लोकोमोटिव का निर्माण कर चुकी थी। भारत में नैरो गेज के लिए इस कंपनी से कई लोकोमोटिव मंगाए गए थे। इसी साल इस कंपनी का मर्जर हो गया और यह नार्थ ब्रिटिश लोकोमोटिव कंपनी में समाहित हो गई। शार्प स्टीवार्ट कंपनी के बनाए पांच लोकोमोटिव को भारत में अलग अलग स्थलों पर संरक्षित किया गया था।

डीएचआर में लंबी सेवाएं दी - इस लोकोमोटिव 785 बी ने दार्जिलिंग हिमलायन रेलवे नेटवर्क पर लंबे समय तक अपनी सेवाएं दीं। वहां पर डीएचआर 28 इसका नंबर दिया गया था। यह 0-4 0 एसटी श्रंखला का लोकोमोटिव है। इससे मिलता जुलता इसका पूर्ववर्ती लोकमोटिव 777बी जो शार्प स्टीवर्ट का ही 1889 का बना हुआ है राष्ट्रीय रेल संग्रहालय में संरक्षित करके रखा गया है। लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यह स्टीम इंजन रिटायर नहीं हुआ था बल्कि डीजल इंजन आने के बाद इसे रिटायर कर दिया गया। नीति आयोग के सदस्य विवेक देवराय ने तो एक बार सलाह दी थी कि फेयरी क्वीन तरह ही कई नैरोगेज के बी क्लास लोकोमोटिव को भी फिर से मरम्मत करके पटरियों पर दौड़ने के लिए बहाल किया जाए। इससे स्टीम हेरिटेज पर सफर करने वाली यात्री मिलेंगे और रेलवे की कमाई में इजाफा होगा।

इंजन के बारे में जानकारी नहीं - नैरोगेज के लोकोमोटिव 785बी को जब से देहरादून रेलवे स्टेशन के बाहर स्थापित किया गया है, उत्तराखंड की राजधानी के इस स्टेशन पर आने जाने वाले यात्रियों के बीच ये कौतूहल का विषय बन गई है। स्टेशन पर ट्रेन का इंतजार कर रहे लोग इसके साथ सेल्फी लेने के लिए पहुंचते हैं। हालांकि इस लोकोमोटिव के साथ इसका कोई संक्षिप्त इतिहास लिखकर यहां नहीं लगाया है। लोकोमोटिव के बारे में जानकारी यहां पर लिखे जाने से इसे देखने वाले लोगों की जिज्ञासा भी शांत होती।

रेलवे स्टेशन से चलकर मैं बस स्टैंड आ गया, क्योंकि मेरी दिल्ली की बस यहीं से मिलने वाली है। निजी एसी बस मैंने ऑनलाइन बुक किया है। मेरे पास समय है तो थोड़ी देर देहरादून के सरकारी बस स्टैंड का मुआयना किया। यह काफी सुविधाजनक और साफ सुथरा है। बस स्टैंड में रहने के लिए डारमेटरी भी है। बस स्टैंड के पीछे सुंदर पार्क भी है। यहां से दिल्ली के लिए सरकारी बसें भी लगातार जा रही हैं। पर मेरी तो निजी बस में बुकिंग है। हमारे बस आपरेटर ने जो लोकेशन दिया गया था उस पर काफी तलाश के बाद बस नहीं मिली। हार कर मैंने दिए गए नंबर पर फोन किया। तब उन्होंने एक नए दफ्तर का पता दिया। वहां जाने पर पता चला कि वह बस आ नहीं जा रही है। पर उन्होंने मुझे दूसरे बस में सामंजित कर दिया और मैं दिल्ली की ओर चल पड़ा।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com
( STEAM LOCOMOTIVE, DHR, NARROW GAUGE DEHRADUN RAILWAY STATION ) 




Monday, September 23, 2019

देहरादून में सहस्त्रधारा - जलधाराओं के बीच मौज मस्ती

टपकेश्वर महादेव के दर्शन करके मैं शहर में लौट आया हूं। अब हमारी मंजिल है सहस्त्रधारा। देहरादून के बाहरी इलाके में स्थित है सहस्त्रधारा। यहां जाने के लिए सिटी बसें लैंसडाउन चौक के आसपास से मिलती हैं। एक बस में बैठ कर मैं सहस्त्रधारा की तरफ चल पड़ा। बस नगर के कई आवासीय इलाकों को पार करती हुई शहर के बाहर निकल गई। अब पहाड़ी इलाका आ गया है। पहाड़ियों के बीच से ऊंचे नीचे रास्तों को पार करती हुई बस मंजिल के करीब पहुंच गई है, पर मैं क्या देख रहा हूं। सामने निजी वाहनों की लंबी लाइन लगी है। एक किलोमीटर से ज्यादा लंबा जाम लगा है।

 बस ने हमें बस स्टाप से पहले ही उतर जाने को कहा, आगे का रास्ता पैदल। थोड़ी दूर आगे चलने पर भुट्टा बेचने वाले वाले लकड़ी के  कोयले पर भुट्टा गरम कर रहे थे। मैंने एक भुट्टा खरीदा और खाता हुआ आगे बढ़ चला। सहस्त्रधारा में रहने के लिए कई होटल और गेस्ट हाउस भी बने हुए हैं। खाने पीने के लिए कुछ रेस्टोरेंट और ढाबे भी हैं।


इस जगह का सहस्त्रधारा नाम इसलिए है क्योंकि यहां पर पहाड़ों से सैकड़ों धाराएं जगह-जगह निकलती है। ये सारी धाराएं मिलकर एक तालाब और फिर आगे एक नदी का निर्माण करती हैं। इन धाराओं का पानी अत्यंत निर्मल और मीठा है। यहां पर खास तौर पर एक गंधक झरना है। इसके पानी में स्नान से लोगों का मानना है कि कई तरह की बीमारियां दूर हो जाती हैं। सहस्त्रधारा में आसपास में चूना पत्थर वाली ऊंची पहाड़ियां हैं। इनसे बूंद बूंद जल हमेशा टपकता रहता है। प्रकृति का अनूठा रूप यहां देखने को मिलता है। ये जल की बूंदे प्रकृति का अनुपम आशीर्वाद प्रतीत होती हैं।

तो सहस्त्रधारा के तालाब में हर समय सैकड़ो लोग स्नान करते रहते हैं। कुछ स्थानीय लोग कपड़े और बैग आदि जमा करने के लिए लॉकर की सुविधा उपलब्ध कराते हैं। सहस्त्रधारा पहुंचे और पानी में डुबकी नहीं लगाई तो फिर यहां आने का पूरा मजा आपने नहीं लिया।
सहस्त्रधारा देहरादून के स्थानीय लोगों के लिए लोकप्रिय पिकनिक स्पॉट है। यहां पर खास तौर पर छुट्टी के दिन लोगों की भारी भीड़ उमड़ पड़ती है। गर्मी के दिनों में यहां पर सैलानियों की भीड़ बढ़ जाती है। सहस्त्रधारा में आगे चलने पर कई गुफाएं भी हैं। इन गुफाओं में लगातार  टपकता रहता है। कई लोग टार्च लेकर इन गुफाओं में जाते हैं।  

मणिदीप का सफर - सहस्त्रधारा से लगभग 3000 फीट की ऊंचाई पर जाने के लिए यहां पर एक रोप वे का निर्माण भी किया गया है। ऊपर मणिदीप नामक स्थल है जहां पर काफी लोग जाते हैं। यहां पर बच्चों के मनोरंजन के लिए ओजोन पार्क , सिल्वर फॉल, कैफेटेरिया आदि का निर्माण किया गया है।
आपको पता है, सहस्त्रधारा देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की पसंदीदा जगहों में शामिल थी। सहस्त्रधारा में एक छोटा सा बौद्ध मठ भी स्थित है।

कैसे पहुंचे – सहस्त्रधारा की दूरी देहरादून शहर से 16 किलोमीटर है। हालांकि इस रोड पर 10 किलोमीटर तक शहर का विस्तार हो चुका है। निजी वाहन या फिर सिटी बस से यहां पहुंचा जा सकता है। आप यहां पर होटल बुक करके ठहर भी सकते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-        ( SAHASTRADHARA, WATER FALL, DEHRADUN )


Sunday, September 22, 2019

पुराना देहरादून शहर और उत्तराखंड के गांधी इंद्रमणि बडोनी


देहरादून के घंटा घर चौराहा पर पहुंच गया हूं। ये शहर का पुराना इलाका है। घंटा घर चौराहा के आसपास अति प्राचीन भवन और दुकाने हैं तो नए नए मॉल और शोरूम नवीनता की खुशबू भी बिखेरते हैं। उत्तर भारत के ज्यादातर पुराने शहरों में घंटाघर जरूर होता है तो देहरादून में भी घंटा घर है। किसी जमाने में लोग घंटाघर की घड़ी से ही समय देखते थे। अब इन घड़ियों का खास मतलब नहीं है, पर ये लैंडमार्क जरूर है।

सबसे पहले मेरी नजर घंटाघर चौराहे पर एक प्रतिमा पर पड़ती है। ये प्रतिमा उत्तराखंड के गांधी कहे जाने वाले इंद्रमणि बडोनी की है।  उत्तराखंड के लोकगायक पंडित इन्द्रमणि बडोनी का जन्म टेहरी जिले के जखोली ब्लॉक के अखोड़ी गांव में सुरेशानन्द बडोनी के यहां पर 24 दिसम्बर, 1925 को हुआ था। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। लोकगायक, प्रयावरणविद, स्वतंत्रता सेनानी, राजनेता उनके व्यक्तित्व के कई आयाम थे। पर राजनीति उन्हें रास नहीं आई। उन्होंने समाजसेवा को अपने जीवन का ध्येय बनाया। वे बचपन से ही प्रकृति प्रेमी थे। नदी, पहाड़, झरने, पेड़ पौधे उन्हे लुभाते थे। उन्होंने गढ़वाल में कई स्कूल खोले।  उनकी मुख्य चिंता इसी बात पर रहती थी कि पहाडों का विकास कैसे हो। वर्ष 1957 में राजपथ पर गणतंत्र दिवस के मौके पर उन्होंने केदार नृत्य का ऐसा समा बॉधा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु भी उनके साथ थिरक उठे। वाशिंगटन पोस्ट ने भी उन्हें पहाड़ का गांधी लिखा था। 18 अगस्त 1999 को उत्तराखण्ड के सपूत श्री इन्द्रमणि बडोनी जी का निधन हो गया।

बैंक की ऐतिहासिक इमारत – आईए देखते हैं इलाहाबाद बैंक की इस विशाल इमारत को। ये इमारत 1918 की बनी हुई। यानी सौ साल बाद बड़े शान से खड़ी है ये इमारत। वैसे नाम इलाहाबाद बैंक है पर इस बैंक का मुख्यालय कोलकाता में है। यह देश के पुराने स्वदेशी बैंकों में से एक है। साल 2018 में देहरादून की इलाहाबाद की मुख्य शाखा ने अपना शताब्दी वर्ष मनाया।  

सन 1890 का चर्च – घंटाघर के पास ही मुझे सन 1890  बने रिफार्म प्रेसबिटिरियन चर्च की इमारत नजर आती है। यह इस क्षेत्र के सबसे पुराने चर्च में शुमार है। मतलब साफ है कि उस समय या ईसाई लोग आ गए थे। ये प्रेसबिटिरयन चर्च है। इसाई धर्म में इस मान्यता के लोग कम हैं। पर भारत में अंग्रेजी सत्ता के साथ प्रेसबिटिरियन लोगों का बड़े पैमाने पर आगमन हुआ था। छोटे से चर्च की इमारत खूबसूरत है। यहां पर नियमित तौर पर सर्विस होती है।

गांधी पार्क – घंटा घर से पैदल चलता हुआ आगे की ओर बढ़ रहा हूं। आगे एक सेंट्रल बैक की शाखा की भी ऐतिहासिक इमारत दिखाई दे जाती है। सामने विशाल गांधी पार्क है। इसमें सुबह से लेकर शाम तक टहलने वालों की भीड़ रहती है। शहर में शॉपिंग करने आने वाले टाइम पास के लिए पार्क में पहुंच जाते हैं।

तिब्बती मार्केट – गांधी पार्क के पास ही विशाल तिब्बती मार्केट है। यहां पर आप नए फैशन के अनुरूप कपड़े खरीद सकते हैं। तिब्बती बाजार में ज्यादातर दुकानदार तिब्बती महिलाएं हैं जो सुर्ख लिपिस्टक लगाकर सामान बेचती नजर आती हैं। हालांकि इस बाजार में सस्ती चीजें नहीं मिलतीं। मोलभाव भी नहीं है।

अनानास का काकटेल – गांधी पार्क के पास एक स्टाल पर खूब भीड़ दिखी। एक सज्जन यहां नींबू पानी में अनानास मिलाकर कॉकटेल बनाकर बेच रहे हैं। 20 रुपये का छोटा गिलास तो 30 रुपये का बड़ा लोग खूब पी भी रहे हैं। इस तरह का पेय मैंने पहली बार देखा।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gamil.com
-        ( DEHRADUN, GANDHI PARK, INDRAMANI BADONI, OLD BUILDING )


Friday, September 20, 2019

टपकेश्वर महादेव – जहां शिव का अनवरत होता है जलाभिषेक


महादेव शिव के देश के अलग अलग हिस्सों में अनूठे मंदिर हैं। उनमें से एक है देहरादून शहर का टपकेश्वर महादेव मंदिर। यह महादेव शिव का अनूठा मंदिर है। गुफा में स्थित इस मंदिर में शिवलिंग पर लगातार गुफा से चल टपकता रहता है। इस तरह शिव का अनवरत जलाभिषेक होता रहता है।

दरअसल टपकेश्वर मंदिर एक प्राकृतिक गुफा में स्थित है। इस गुफा के अन्दर एक शिवलिंग विराजमान है। इस शिवलिंग पर चट्टानों से लगातार पानी की बूंदे टपकती रहती है। ये पानी की बूंदे स्वाभाविक तरीके से शिवलिंग पर गिरती हैं। इस कारण ही इस मंदिर का नाम टपकेश्वर मंदिर पड़ गया है।

मंदिर को लेकर कई रहस्य-  मंदिर को लेकर कई रहस्य हैं। कुछ लोग कहते हैं कि यहां मौजूद शिवलिंग स्वयं से प्रकट हुआ है , तो कई लोग बताते हैं कि पूरा मंदिर ही स्वर्ग से उतरा है। यह माना जाता है कि मंदिर अनादि काल से इस स्थान पर विराजित है।

टपकेश्वर मंदिर में दो शिवलिंगम हैं। जिसमे से प्रमुख शिवलिंग स्वयम्भू है अर्थात शिवलिंग को किसी ने बनाया नहीं। मंदिर में दूसरा शिवलिंग पूरी तरह रुद्राक्ष से जड़ा हुआ है। भक्तगण मुख्य शिवलिंग के साथ-साथ दूसरे शिवलिंग के भी दर्शन करते हैं।

महाभारत कालीन मंदिर - यह मंदिर महाभारतकालीन बताया जाता है। कहा जाता है कि गुरु द्रोणाचार्य को इसी स्थान पर भगवान शंकर से आशीर्वाद प्राप्त हुआ था। यह भी कि स्वयं महादेव ने आचार्य को धनुर्विद्या और शस्त्र विद्या का ज्ञान दिया था। इस स्थल को महाभारत के पात्र अश्वथामा की जन्म स्थली और तप स्थली भी माना जाता है।  

वैष्णो गुफा मंदिर - टपकेश्वर मंदिर में सभी देवी देवताओं की प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं। मंदिर परिसर में मां वैष्णो का भी मंदिर बनाया गया है जिसमें एक प्राकृतिक गुफा है जो कि कटरा स्थित मां वैष्णो देवी के मंदिर जैसा ही है।  इस मंदिर परिसर में हनुमान जी की भी एक विशाल मूर्ति स्थापित की गई है।

तमसा नदी का किनारा - टपकेश्वर मंदिर परिसर से मुख्य द्वार से जब आप आगे बढ़ते हैं तो आपको सैकड़ो सीढ़ियां उतरनी पड़ती है। इसके बाद आप एक मनोरम तमसा नदी के तट पर पहुंच जाते हैं। इसी नदी के किनारे गुफा में टपकेश्वर महादेव का मंदिर है। तमसा नदी में पानी ज्यादा नहीं है पर यहां का नजारा मनोरम है। नदी को पार करने के लिए पुल बना है। नदी के उस पार माता वैष्णो का गुफा मंदिर और दूसरे देवी देवता विराजते हैं। पर यह देखकर दुख होता है कि यहां आने वाले श्रद्धालु तमसा नदी के पानी को गंदा कर रहे हैं। प्रशासन की ओर से एक बोर्ड भी लगा है कि तमसा नदी को स्वच्छ रखने में सहयोग करें। 

मंदिर परिसर में प्रसाद और धार्मिक साहित्य की दुकाने हैं। मंदिर में हर रोज दिन भर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। पर सोमवार के दिन, सावन के महीने में और शिवरात्रि के दिन ज्यादा भीड़ रहती है। मंदिर सुबह से लेकर रात्रि नौ बजे तक खुला रहता है।

कैसे पहुंचे – देहरादून के घंटाघर चौक से गढ़ी कैंट के लिए शेयरिंग आटो रिक्शा मिल जाते हैं। गढ़ी कैंट इलाके में पहुंच कर आप किसी से भी टपकेश्वर महादेव का रास्ता पूछ सकते हैं। अब यह इलाका देहरादून के मुख्य शहरी क्षेत्र में आ गया है। देहरादून बस स्टैंड से मंदिर की दूरी 6 किलोमीटर है।
- vidyutp@gmail.com 
( TAPKESHWAR MAHADEV TEMPLE, DEHRADUN, GARHI CANT ) 



Wednesday, September 18, 2019

देहरादून का रोवर्स केव – डाकुओं की गुफा - गुचू पानी


लैंसडाउन चौक से चली सिटी बस पैवेलियन ग्रांउड, कर्जन रोड, राजापुर रोड होते हुए देहरादून के  कैंटोनमेंट इलाके से गुजरने लगी। इस क्षेत्र में उत्तरखंड सरकार के कई मंत्रियों के निवास हैं। आगे साफ सुथरा कैंट का इलाका आ गया। इस इलाके में ही उत्तराखंड सरकार का स्टेट गेस्ट हाउस बाजपुर हाउस दिखाई दिया। इसी क्षेत्र में मुख्यमंत्री का आवास भी है। ये देहरादून का हरा भरा प्रदूषण मुक्त इलाका है। संभवत इस इलाके को छोड़ कर राजनेता और अधिकारी जाना नहीं चाहते इसलिए देहरादून में ही बने रहना चाहते हैं।

और हम पहुंच गए गुचू पानी - हमें आगे केंद्रीय विद्यालय और मिलिट्री हास्पीटल दिखाई देता है। पर सिटी बस आगे गुचू पानी नामक जगह पर जाकर रुक जाती है। ये गुचू पानी क्या है। हमने यहां आने से पहले गुचू पानी का नाम कभी नहीं सुना था। लेकिन यहां उतरने पर देखा कि काफी लोगों की भीड़ लगी है जो आगे जा रहे हैं। पार्किंग में दर्जनों वाहन लगे हैं। तो हम भी उनके पीछे हो लिए।


मतलब की डाकुओं की गुफा - गुच्चु पानी को राबर्स केव यानी डाकुओं की गुफा भी कहते हैं। इस गुफा की लंबाई 650 मीटर है जिसमें हमेशा घुटने भर पानी रहता है। यह अद्भुत गुफा है जिसके अंदर कई रहस्यपूर्ण रास्ते बताए जाते हैं। इसमें अंदर जाकर काफी रोमांच का अनुभव होता है। इसमें आम तौर पर सालों भर पानी रहता है।

अनूठी और डरावनी गुफा - अद्भुत गुफा डरावनी के साथ-साथ रहस्यपूर्ण भी है। कहने वालों का तो यह भी कहना है की अंग्रेजी शासन में जब डकैत डकैती करने जाते थे तो उसके बाद इसी गुफा में आकर छुप जाते थे।

ब्रिटिश काल में डकैत छुपते थे यहां - यहां पर अंग्रेजी सेना पहुंच नहीं पाती थी क्योंकि इसके रहस्यपूर्ण रास्ते भी थे। जिसकी वजह से डकैत डकैती का सामान और खुद यहां से बच निकलने में कामयाब भी हो जाते थे। पर आज यह रहस्यमयी गुफा यहां आने वाले लोगों के लिए कौतूहल का विषय बनी रहती है।

झरने के नीचे स्नान का मजा – गुफा के अंदर कई झरने हैं। गुफा का सबसे ऊंचे झरने में 10 मीटर की ऊंचाई से पानी गिरता है। लोग इसमें देर तक नहाने का भी मजा लेते हैं। देहरादून शहर के लोग तो यहां अक्सर आते रहते हैं। वहीं काफी संख्या में दूर-दूर से यहां पर पर्यटक आते हैं और इस गुफा में बहते झरने घुटनों से नीचे तक के पानी में अपना समय का आनंद ही नहीं बल्कि गर्मी से राहत भी पाते हैं।

इस गुफा के चारों तरफ से पानी की धाराएं निकलती है और यह पानी इतना साफ और स्वच्छ है कि चांदी की तरह इस पानी में पत्थर भी चमकते रहते हैं। ये जल धाराएं आगे जाकर नदी में समाहित हो जाती हैं।

कैसे पहुंचे - गुचू पानी के रूप में जानी जाने वाली यह डाकू गुफा देहरादून शहर के केंद्र से 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह जगह देहरादून के सबसे लोकप्रिय पिकनिक स्पॉट में से एक है। आप यहां सिटी बस या फिर अपने निजी वाहन से पहुंच सकते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com
-        (GUCHU PANI, ROBERS CAVE, DEHRADUN )