Saturday, August 10, 2019

सीहोर – मध्य प्रदेश के प्रथम शहीद कुंअर चैन सिंह

सीहोर का रिश्ता स्वतंत्रता आंदोलन के दमकते इतिहास से है। यहां हम चैन सिंह की छतरी पर पहुंचे हैं। चैन सिंह कौन थे। चैन सिंह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास के भूले बिसरे शहीद हैं। उनकी याद में सीहोर में उनकी छतरी बनाई गई है पर सीहोर के लोगों को भी उनके बारे में ज्यादा नहीं मालूम। इस शहीद की छतरी पर श्रद्धा के फूल चढ़ाने भी कम ही लोग पहुंचते हैं।

यह 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से भी पहले की बात है। सन 1824 में 24 जून को नरसिंहगढ़ के राजकुंअर चैन सिंह अपने विश्वस्त अंगरक्षक जनाब हिम्मत खां बहादुर के साथ साथ ब्रिटिश फौज के संग मुकाबला करते हुए सीहोर में शहीद हो गए थे। उनके साथ कुल 41 सैनिकों ने भी इसी स्थल पर वीरगति को प्राप्त किया। कुंअर चैन सिंह मात्र 24 साल की उम्र में बहादुरी से लड़ते हुए शहीद हो गए थे।


तो अमर शहीद कुंअर चैन सिंह की छतरी और हिम्मत खां बहादुर की मजार सीहोर में अंगरेजों के खिलाफ लड़ी गई पहली लड़ाई की यादगार है। कुंअर चैन सिंह भोपाल के निकट नरसिंहगढ़ में परमार राजपूत रियासत के राजकुमार थे। वे भोपाल अंचल के पहले वीर सेनानी के तौर पर जाने जाते हैं। क्योंकि उन्होंने 1857 के सिपाही विद्रोह से भी 33 साल पहले ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ लड़ते हुए शहादत दी।

ब्रिटिश सरकार के खिलाफ ये लड़ाई कैसे शुरू हुई। दरअसल 1818 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने भोपाल के तत्कालीन नवाब से समझौता कर सीहोर में एक हजार सैनिकों की छावनी बनाई। कंपनी द्वारा नियुक्त पॉलिटिकल एजेंट मैडॉक को इसका प्रभारी बनाया गया। इस फौजी टुकड़ी का वेतन भोपाल रियासत के शाही खजाने से दिया जाता था। समझौते के तहत पॉलिटिकल एजेंट मैडॉक को भोपाल समेत नरसिंहगढ़, खिलचीपुर और राजगढ़ रियासत से संबंधित राजनीतिक अधिकार भी सौंपे गए। पर इस फैसले को नरसिंहगढ़ रियासत के युवराज कुंअर चैन सिंह ने गुलामी मानते हुए स्वीकार नहीं किया।



नरसिंगढ़ रियासत के दीवान आनंदराम बख्शी और मंत्री रूपराम बोहरा अंग्रेजों से मिले हुए थे। यह पता चलने पर चैन सिंह ने इन दोनों की हत्या करवा दी। मंत्री रूपराम के भाई ने इसकी की शिकायत कलकत्ता जाकर गवर्नर जनरल से की। गवर्नर जनरल के निर्देश पर पॉलिटिकल एजेंट मैडॉक ने कुंअर चैन सिंह को भोपाल के निकट बैरसिया में बैठक के लिए बुलाया। बैठक में मैडॉक ने कुंवर चैन सिंह को हत्या के अभियोग से बचाने के लिए शर्तें रखीं। ये शर्तें थी कि नरसिंहगढ़ रियासत, अंग्रेजों की अधीनता स्वीकारे और क्षेत्र में पैदा होनेवाली अफीम की पूरी फसल सिर्फ अंग्रेजों को ही बेची जाए।

चैन सिंह ये दोनों शर्तें नहीं मानी। फिर मैडॉक ने उन्हें 24 जून 1824 को सीहोर पहुंचने का आदेश दिया। चैन सिंह अपने विश्वस्त साथी सारंगपुर निवासी हिम्मत खां और बहादुर खां सहित 43 सैनिकों के साथ सीहोर पहुंचे। वहां पॉलिटिकल एजेंट मैडॉक और अंग्रेज सैनिकों से उनकी मुठभेड़ हुई। कुंवर चैन सिंह और उनके मुट्ठी भर विश्वस्त साथियों ने ब्रिटिश फौज का खूब मुकाबला किया। घंटों चली लड़ाई में अंग्रेजों के तोपखाने ओर बंदूकों के सामने चैन सिंह और उनके जांबाज लड़ाके टिक नहीं सके।

सीहोर के आसपास की लोककथाओं में चैन की वीरता की दास्तां गाई जाती है। मालवा क्षेत्र में विवाह और मंगल गीतों में कुंअर चैन की बहादुरी का बखान किया जाता है। कुंअर चैन सिंह को लोग मालवा का मंगल पांडे कहते हैं। पर उन्होंने तो मंगल पांडे से तीन दशक पहले ही अंग्रेजों को ललकारा था।


ब्रिटिश काल में सीहोर महत्वपूर्ण शहर था। यहां कई ब्रिटिश कालीन इमारतें आज भी देखी जा सकती हैं। साल 1860 का बना हुआ ऑलसेंट चर्च की इमारत रात के अंधेरे में मैं देखने की कोशिश करता हूं। हालांकि आजादी के बाद सीहोर नगर की आबादी में ज्यादा विस्तार नहीं हुआ है। पर हाल के सालों में सीहोर पर फिल्मकारों की नजर पड़ी है। यहां पर सूई धागा और टायलेट एक प्रेमकथा जैसी फिल्मों की शूटिंग हुई है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com

(SHAHEED CHAIN SINGH, SIHORE  ) 

2 comments:

  1. A unique story from the pages of history of Madhya Pradesh. Thank you for bringing the story of Kunwar Chain Singh out to us. Respect to him

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