Tuesday, August 20, 2019

सांची संग्रहालय- बुद्ध मुस्कुराए

भोपाल में दूसरी बार सांची के लिए चल पड़ा हूं। सन 1995 में सांची यात्रा की यादें धुंधली हो गई हैं। तो सांची जाने का मतलब उन यादों को एक बार फिर ताजा करना है। सांची यूनेस्को की विश्व विरासत की सूची में शुमार है। एक ऐसा बौद्ध स्थल है जहां बार बार आने की इच्छा होती है। भोपाल के हमिदिया रोड के पास नदरा बस स्टैंड से सांची के लिए लोकल बस में बैठ गया हूं। हांलाकि भोपाल से सांची लोकल ट्रेन से भी जाया जा सकता है। पर ट्रेन हर समय नहीं मिलती। बस भोपाल शहर से बाहर निकल रही है। शहर की सीमा में करोंद में कृषि उत्पादन बाजार समिति दिखाई दे रही है। थोड़ी देर में बस शहर से बाहर निकलकर हरे भरे खेतों के बीच से गुजर रही है। 

भोपाल शहर पार करने के बाद सूखी सेवनिया का इलाका आया। दोनों तरफ हरे भरे गेहूं के खेत शुरू हो गए हैं। इन खेतों को देखकर मुझे अपना गांव याद आ रहा है। थोड़ी देर बाद सलामतपुर नामक एक कस्बा आया। सलामतपुर रेलवे स्टेशन भी है। सांची मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में पड़ता है। बस ने हमें सांची चौराहे पर उतार दिया। यहां से बायीं तरफ 300 मीटर आगे सांची रेलवे स्टेशन है। तो दाहिनी तरफ का रास्ता सांची स्तूप की तरफ जा रहा है। 

सांची के स्तूप से पहले हमें मध्य प्रदेश टूरिज्म का रेस्ट हाउस गेटवे रिट्रीट दिखाई दे गया। यहां पर 300 रुपये प्रतिदिन मे रहने के लिए डारमेट्री उपलब्ध है। इसके ठीक आगे सांची पुरातात्विक स्थलों को देखने के लिए टिकट घर है। कुल 40 रुपये के टिकट में संग्रहालय और स्तूप शामिल है। मैं टिकट लेकर पहले संग्रहालय देखने के लिए दाखिल हो गया।

रायसेन जिले में कई बौद्ध स्तूप हुआ करते थे। मौर्य सम्राज्य की विदिशा में रिश्तेदारी थी।  मौर्यकाल में विदिशा के आसपास कई बौद्ध स्तूपों का निर्माण हुआ।
संग्रहालय के प्रांगण में हमें सबसे पहले सती स्तंभ दिखाई देता है। यहां पर पांच अलग अलग आकृतियां अपने मूल स्थान पर हैं। इसमें खास तौर पर पत्नी द्वारा पति के प्रति निष्ठा का चित्रण है।

सीहोर जिले का पानगुरारिया में कभी एक सुंदर बौद्ध स्तूप हुआ करता था। अब उसके अवशेषों को लाकर संग्रहालय में स्थापित किया गया है। यह स्तूप तीसरी सदी ईसा पूर्व में मौर्यकाल में निर्मित हुआ था। इसके अवशेषों को देखकर लगता है कि यह सांची के स्तूप से भी विशाल रहा होगा। सम्राट अशोक ने पानगुरारिया का भ्रमण किया था। बौद्ध साहित्य बताते हैं अशोक ने अपने पिता के शासन काल में वायसराय के तौर पर उज्जैन जाते हुए विदिशा के व्यवसायी की पुत्री देवी से विवाह किया था। विदिशा और आसपास के क्षेत्रों में स्तूप बनवाने में अशोक ने इसलिए रुचि दिखाई क्योंकि यह स्थान ध्यानक्रिया के लिए काफी उपयुक्त था।

अब बात सांची की। सांची प्रचीन काल में काकनाय, काकनाथ, काकनदबोट नाम से जाना जाता था। बेतवा और बेस नदी के तट पर स्थित सांची तब प्रमुख व्यापारिक मार्ग पर था। तीसरी सदी ईपू से 13वीं सदी तक सांची बौद्ध धर्म का प्रमुख स्थल था। पर 13वीं सदीके बाद सांची का पतन हो गया। पर सन 1818 में विलियम टेलर ने घनी झाड़ियों के बीच सांची के स्तूप की खोज की।

सांची के संग्रहालय में सन 1818 के बाद सांची से प्राप्त बहुमूल्य संग्रह है। यह मौर्यकाल और उसके बाद 1000 सालों तक बने बौद्ध दर्शन से जुड़े दौर में आपको ले जाता है। शुंग काल, सातवाहन काल, कुषाण काल, गुप्त काल, उत्तर गुप्त काल की कलाकृतियों से रूबरू कराता है। यहां सातवाहन काल की यक्षी की प्रतिमा तो अदभुत है। यहां तीसरी सदी ईपू का अशोक स्तंभ भी आप देख सकते हैं जो बलुआ पत्थर से बना है।

संग्रहालय देखने के बाद मैं सांची के स्तूप की तरफ बढ़ चला हूं। संयोग से यहां पर मेरी मुलाकात भागलपुर विश्वविद्यालय के इतिहास के प्रोफेसर केके मंडल से हो जाती है। वे अपनी पत्नी और बेटे के साथ सांची घूम रहे हैं। यहीं पर बुजुर्ग इतिहासकार सीपीएन सिन्हा साहब से भी मुलाकात होती है। उन सब लोगों के साथ सांची दूसरी यात्रा यादगार हो गई।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 



8 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में " मंगलवार 20 अगस्त 2019 को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. सांची के बारे में रोचक और मनोरंजक जानकारी युक्त आलेख।

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  3. aapaki post bilkul mukammal post hoti hai .padh kar aanand aa jaataa hai

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  4. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन 24वीं पुण्यतिथि - सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर - ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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