Friday, August 16, 2019

जरा हल्के गाड़ी हांक रे मेरे राम गाड़ी वाले... भजन की वह शाम

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जनवरी के बाद फरवरी में एक बार फिर भोपाल जाना हुआ। इस बार इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस का सम्मेलन भोपाल में हो रहा है। एक बार फिर शान-ए-भोपाल एक्सप्रेस। सुबह सुबह हमलोग हबीबगंज रेलवे स्टेशन पर हैं। दिल्ली से कई इतिहासकार हमारे साथ इस ट्रेन से उतरे हैं। इसमें दिल्ली विश्वविद्यालय के फारुकी साहब भी हैं। यहां आयोजन समिति की बस आई और हम सब लोगों को लेकर आयोजन स्थल की ओर चल पड़ी। 

सिर्फ कबीर को गाते हैं... 
भोपाल में 26 फरवरी की शाम... आरसीवीपी नोरुन्ना प्रशासनिक अकादमी का आडिटोरियम... मंच पर कबीर का भजन गूंज रहा है... जरा हल्के गाड़ी हांक रे मेरे राम गाड़ी वाला... कबीर के इस भजन में जीवन दर्शन है। जिंदगी जीने के निचोड़ है। यह हमें अंधाधुंध दौड़ के पीछे भागने और लगातार असंतोष के भंवर में जीने को लेकर सावधान करता है। इसके गायक हैं प्रहलाद सिंह टिपण्णियां और उनके साथी। गीत खत्म होने के बाद सुस्वादु डिनर के समय मुझे टिप्पणिया जी से थोड़ी बातें करने का मौका मिल जाता है।

टिप्पणिया जी सिर्फ और सिर्फ कबीर की रचनाएं ही गाते हैं। उज्जैन के पास एक गांव के रहने वाले टिप्पणिया जी कभी स्कूल में मास्टर हुआ करते थे। उनके खानदान में कोई गायक नहीं था। पर 1979 में कबीर को गाना शुरू किया। उसके बाद तो वे ख्याति प्राप्त लोक गायक हो गए। कबीर को गाते हुए वे अमेरिका पहुंच चुके हैं। साल 2011 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया।

कबीर को कुमार गंधर्व ने भी खूब गाया है। पर कुमार गंधर्व कबीर को शास्त्रीय धुन में गाते हैं तो प्रहलाद सिंह टिपण्णिया लोकधुन में गाते हैं। वैसे तो उन्होंने कबीर के बहुत सारे भजन गाए हैं। पर जरा हल्के गाड़ी हांक रे मेरे राम गाड़ी वाला... उनकी पहचान बन गई है। तब वे मंच से इस भजन को अपनी पूरी टीम के साथ गाते हैं तो लोग डूब जाते हैं। इस भजन का संदेश भी जबरदस्त है और टिपण्णिया जी की आवाज में जादू।

विज्ञान के शिक्षक रह चके हैं प्रहलाद टिपानिया
प्रहलाद टिपानिया ने कबीर के भजनों को गाने की शुरुआत अपने पैतृक गांव लूणिया खेड़ी  (मध्य प्रदेश के देवास में) से ही की। प्रहलाद टिपानिया पेशे से गायक होने के अलावा विज्ञान के शिक्षक रहे। कबीर के भजनों के लिए जाने जाने-वाले प्रहलाद टिपानिया अमेरिका समेत विदेशों में भी शो करते हैं। जब वे अमेरिका गए तो उनके शो का ना रखा गया कबीर इन अमेरिका। विदेशों में प्रहलाद टिपानिया के गायन पर मोहित होने वालों की हद यहां तक है कि हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की एक प्रोफेसर सारा भारत आकर उनकी शिष्य बनीं। साथ ही अपना नाम बदलकर अंबा सारा रखा। वे कबीर के भजनों का अंग्रेजी में अनुवाद कर रही हैं।


अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मशहूर कबीर भजन गायक प्रहलाद टिपानिया को 2011 में भारत सरकार ने पद्मश्री से नवाजा था। मैंने फरवरी उन्हें भोपाल में लाइव गाते हुए सुना। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद खाने की टेबल पर उनके साथ थोड़ी देर गुफ्तगू करने का भी मौका मिला। वैसे प्रहलाद टिपानिया बलई समाज से आते हैं। जो मध्य प्रदेश की एक दलित जाति है। कुछ महीने बाद अचानक यह सुनकर आश्चर्य हुआ कि प्रह्लाद टिपणिया जी लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं। दरअसल 2019 के चुनाव में उन्हे कांग्रेस पार्टी ने देवास से टिकट दे दिया। 

जब वे लोकसभा चुनाव के लिए प्रचार करने निकलते हैं तो लोग उनके कबीर के भजन गाने की फरमाईश करते हैं। तो वे बस तंबूरा लेकर तैयार हो जाते हैं – फिर वही भजन – जरा हल्के गाड़ी हांको मेरे राम....

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी जब देवास क्षेत्र में टिपणिया जी का प्रचार करने गए तो वे भाषण देने के बजाय टिपणिया जी से गाने की फरमाइश करने लगे। मंच पर टिपणिया जी गाने लगे और राहुल गांधी अपने मोबाइल फोन से उनका वीडियो बनाने लगे।...गाड़ी मेरी रंग रंगीली पहिया है लालम लाल....

तो आप भी यू ट्यूब पर उनके लोकप्रिय भजन का आनंद लें... जरा हल्के गाड़ी हांको मेरे राम गाड़ी वाले...

-        विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com
-         (PRHLAD SINGH TIPANIIYA, FOLK SINGER, KABIR, DEWAS)

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