Saturday, August 31, 2019

दिल्ली के कुछ गुमनाम मकबरे


राजधानी दिल्ली में हजारों ऐतिहासिक स्मारक हैं। इनमें कई सौ मकबरे भी शामिल हैं। पर आपको पता है कि इनमें कई मकबरे गुमनाम भी हैं,  यानी ये किसका मकबरा है सही सही नहीं पता चलता। तो आज चलते हैं ऐसे ही एक गुमनाम मकबरे की  ओर। यूं तो साउथ एक्सटेंशन दिल्ली का ग्लैमरस बाजार बन चुका है। पर इस बाजार के पास ही दरिया खान का मकबरा स्थित है। कभी यह इलाका गटो सराय कहलाता था। यह दिल्ली के प्रमुख सराय में से एक था।


अब एनबीसीसी हाउसिंग कांप्लेक्स का हिस्सा बना -  अब दरिया खान का मकबरा पूर्वी किदवई नगर के एनबीसीसी आवासीय कांप्लेकस का हिस्सा बन चुका है। मकबरे के आसपास पार्क और जॉगिंग ट्रैक विकसित कर दिया गया है। आसपास के अपार्टमेंट में रहने वाले लोग रोज इस मकबरे को देखते हैं।

कौन थे दरिया खान लोहानी - पर आखिर ये दरिया खान कौन थे। दरिया खान लोहानी लोदी वंश के शासनकाल में महत्वपूर्ण पदों पर रहे। वे लोदी वंश के राजा बहलोल लोदी के समय प्रमुख वकील ती की भूमिका में थे। सिकंदर लोदी के शासन काल में वे जज यानी न्यायाधीश बने। लोदी वंश के समय उनका रसूख हुआ करता था। वे तत्कालीन कानून के बड़े जानकार थे। उन्हें न्यायप्रिय माना जाता था। बहलोल लोदी 1451 में अप्रैल महीने में दिल्ला के शासक बने थे। इसके बाद उन्होंने दरिया खान को अपने राज्य में महत्वपूर्ण जिम्मेवारी सौंपी थी। 

वास्तुकला का सुंदर नमूना -  उनके मकबरे के निर्माण की सही सही तारीख मालूम नहीं है। पर ये मकबरा वास्तुकला के लिहाज से शानदार है। इसमें रिक्त स्थान का  इस्तेमाल कर इसकी खूबसूरती को निखारने की कोशिश की गई है। मकबरे के आसपास दो एकड़ का हरित क्षेत्र हुआ करता था। हाउसिंग कांप्लेक्स बनने के बाद अब इसे पार्क के रूप में विकसित कर दिया गया है। मकबरे के आसपास सुंदर वृताकार चबूतरा बना हुआ है। इस ऊंचे चबूतरे तक पहुंचने के लिए तीन तरफ से सीढ़िया बनी हुई है। मकबरे की दीवारें ईंट की हैं। ये दीवारें काफी मोटी हैं। दरिया खान का मकबरा सफेद रंग का है। मकबरे के चारों तरफ सुंदर मेहराबों का निर्माण किया गया था। उनमें से कई अब बचे हुए नहीं हैं। पर जितना बचा है सुंदर दिखाई देता है।



कैसे पहुंचे -  दरिया खान के मकबरे तक पहुंचने के लिए तीन रास्ते हो सकते हैं। सुगम रास्ता है कि आप साउथ एक्सटेंशन पार्ट वन से पूर्वी किदवई नगर में प्रवेश करे, आपको जल्द ही दरिया खान का मकबरा नजर आ जाएगा। दूसरा रास्ता है बारापुला फ्लाइओवर वाली सीधी सड़क जो त्यागराज स्टेडियम से होकर गुजरती है, वहां त्यागराज स्टेडियम से पूर्वी किदवई नगर में प्रवेश करे। तीसरा रास्ता हो सकता है आईएनए से एनबीसीसी कांप्लेक्स में प्रवेश करें और दरिया खान के मकबरे तक पहुंच जाएं।

राजधानी दिल्ली में आपको कई और इस तरह के भूले बिसरे मकबरे मिल जाएंगे। खासतौर पर निजामुद्दीन गांव के इलाके में और महरौली इलाके में। जरूरत तो है दिल्ली की अनमोल विरासत को सहेज कर रखने की।  
-        vidyutp@gmail.com
-        ( DELHI, DARIYA KHNA TOMB, EAST KIDWAI NAGAR, SOUTH EXT )  


एनबीसीसी कांप्लेक्स के एक अपार्टमेंट की दीवार पर विशाल बुद्ध प्रतिमा। 

Thursday, August 29, 2019

बाड़ा हिंदुराव अस्पताल और ऐतिहासिक बाउली

उत्तरी दिल्ली के बाड़ा हिंदुराव अस्पताल। यूं तो यह दिल्ली का एक व्यस्त सरकारी अस्पताल और मेडिकल कालेज का कैंपस है। पर इस अस्पताल के कैंपस के अंदर और आसपास कई ऐतिहासिक इमारते हैं। इन इमारतों में प्रमुख है पीर गायब की मजार और एक पुरानी बाउली। ये दोनों स्मारक अस्पताल परिसर के अंदर ही हैं।

दरअसल राजा हिंदूराव ग्वालियर के राजा दौलतराव सिंधिया के साले और मराठा योद्धा थे। बाद में वे दिल्ली में आकर रहने लगे। ब्रिटिश अधिकारियों से उनके रिश्ते अच्छे थे। आज जहां बाड़ा हिंदुराव अस्पताल है वह उनका निवास हुआ करता था। सन 1857 के विद्रोह के दौरान उनके आवास को काफी क्षति पहुंची।

बाद में इस स्थल पर जो एक पहाड़ी जैसी ऊंची जगह है अस्पताल का निर्माण कराया गया। यह उत्तरी दिल्ली का सबसे बड़ा अस्पताल है। इसके एक तरफ कमला नेहरू रिज का क्षेत्र है तो दूसरी तरफ दिल्ली का किशनगंज मुहल्ला। इस अस्पताल की शुरुआत 1911 में 16 बेड के एक छोटे से नर्सिंग होम से हुई थी। सन 1951 में इसे अस्पताल का रूप दिया गया। साल 2013 में इस अस्पताल के साथ मेडिकल कालेज की शुरुआत की गई।

 एक दिन गायब हो गए पीर - पीर गायब 
फिरोज शाह तुगलक वह शासक था, जिसने अपने शासनकाल में कई इमारतें बनवाईं। इन्हीं में से एक है दिल्ली के उत्तरी रिज में स्थित हिंदूराव अस्पताल से लगी एक इमारत। इसका नाम है पीर गायब। इसका निर्माण तुगलक ने अपने शिकारगाह के तौर पर कराया था। पर बाद में यहां एक पीर आकर रहने लगे थे। चौबुर्जी मस्जिद की कुछ दूरी पर ही स्थित यह स्मारक पीर गायब के नाम से लोगों के बीच मशहूर है। इस स्मारक में दो संकरे कमरे बने हुए हैं। इसकी दूसरी मंजिल की दीवारों के पलस्तर पर धार्मिक महत्व की कुछ पंक्तियां लिखी हुई हैं। ऐसा माना जाता है कि फिरोजशाह तुगलक द्वारा बसाया गया शहर फिरोजाबाद, हौज खास से पीर गायब (हिंदूराव हॉस्पीटल तक) तक फैला हुआ था। इतिहासकार फिरोजाबाद को दिल्ली का पांचवां शहर भी मानते हैं। 

आखिर यह मजार किसकी है। इसके बारे में कोई नहीं जानता। ओर ना ही किसी को इसके बारे में कोई पुख्ता जानकारी है। मगर ऐसा भी कहा जाता है। कि एक पीर इस जगह को प्रार्थना स्थल की तरह इस्तेमाल में लाते थे। मगर एक दिन वो पीर अचानक ही यहां से गायब हो गए। इसलिए इस स्मारक को लोगों ने पीर बाबा गायब कहना शुरू कर दिया। यह स्मारक अस्पताल के अहाते में बिना गढे हुए पत्थरों से बनाई गया है। आजकल यहां हर रोज दुआ और मन्नते मांगने आते हैं।

तुगलक काल की बाउली
पीर गायब के बगल में हिंदुराव मेडिकल कालेज के छात्रों का हास्टल बन गया है। इससे थोड़ा आगे चलेंगे तो अस्पताल परिसर में ही एक पुरानी बाउली है। यह बाउली भी तुगलक काल की बताई जाती है।

इस बावली का निर्माण साल 1351 से 1388 के बीच तुगलक वंश के शासक फिरोजशाह तुगलक ने करवाया था।  कभी दिल्ली में कई सौ बाउली हुआ करती थीं, उनमें से यह भी एक हुआ करती थी। कभी हजारों लोगों की प्यास बुझाने वाली यह बाउली बहुत सुंदर रही होगी। ऐसा इसको देखकर लगता है।

सिपाही विद्रोह में प्यास बुझाई
सन 1857 के विद्रोह के समय यह बाउली पानी का बड़ा स्रोत थी। ब्रिटिश फौज की तरफ से लड़ने वाले सैनिक यहां से पानी लिया करते थे। पर आजकल यह तुगलककालीन बाउली बदहाल है। इसमें नीचे उतरने की सीढ़ियां टूट गई हैं। बाउली के पानी में काई जमी है। लोग इसमें कचरा फेंकते हैं। इसके संरक्षण और इसे जिंदा करने की कोशिश किए जाने की जरूरत है।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com
( BARA HINDURAO, HOSPITAL, STEP WELL, PIR GAYAB) 

Tuesday, August 27, 2019

मौलाना आजाद की मजार पर


क्या आपको पता है कि मौलाना अबुल कलाम आजाद की मजार कहां है। स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री, आईआईटी, आईआईएम, यूजीसी जैसी संस्थाओं की शुरुआत करने वाले मौलाना आजाद की मजार दिल्ली के जामा मसजिद के पास मीना बाजार में है। हालांकि आसपास के बहुत कम लोगों को इस मजार के बारे में जानकारी है। मजार के प्रवेश द्वार पर दुकानदारों ने कब्जा जमा रखा है।

स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री थे मौलाना अबुल कलाम आजाद। ग्यारह वर्षों तक शिक्षामंत्री रहते हुए उन्होंने शिक्षा और संस्कृति को विकसित करने के लिए उत्कृष्ट संस्थानों की स्थापना में भूमिका निभाई। भारतीय औद्योगिक संस्थानआईआईटी और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की स्थापना का श्रेय उन्ही को जाता है। संगीत नाटक अकादमीसाहित्य अकादमी और ललित कला अकादमी की स्थापना उन्ही के कार्यकाल में हुई। उनके द्वारा स्थापित भारतीय सांस्कृतिक सम्बंध परिषद आज कलासंस्कृति और साहित्य के विकास और संवर्धन के क्षेत्र में एक अग्रणी संस्था है।

 मरणोपरांत भारत रत्न
मौलाना अबुल कलाम आजाद का जन्म 11 नवंबर, 1888 में मक्का में हुआ था। उनका असली नाम अबुल कलाम गुलाम मोहिउद्दीन था । उनके पिता मौलाना खैरुद्दीन ने एक अरब महिला ’आलिया’ से विवाह किया। मौलाना आजाद का निधन 22 फरवरी, 1958 को दिल्ली में हुआ। साल 1992 में उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया। 

 इंडिया विन्स फ्रीडम
 मौलाना आजाद ने कई पुस्तकों की रचना और अनुवाद भी किया । उनके द्वारा रचित पुस्तकों में ‘इंडिया विन्स फ्रीडम’ प्रमुख हैं। इसका प्रकाशन 1957 में हुआ था। मौलाना आजाद ने उर्दूहिन्दीफारसीबंगालीअरबी और अंग्रेजी सहित कई भाषाओँ में महारत हासिल कर ली थी । वे कविलेखकपत्रकार और स्वतंत्रता सेनानी थे। छोटी उम्र में ही उन्होंने कुरान के पाठ में निपुणता हासिल कर ली थी। उन्होंने काहिरा के अल अजहर विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त की थी। साल 1912 में उन्होंने ‘अल हिलाल’ नामक एक उर्दू अखबार का प्रकाशन प्रारंभ किया। इस अखबार ने हिन्दू-मुस्लिम एकता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

महादेव देसाई की पुस्तक
मौलाना आजाद स्वतंत्रता आंदोलन में गांधी और नेहरु के प्रमुख सहयोगी थे। महात्मा गांधी के सहयोगी रहे महादेव देसाई ने मौलाना आज़ाद पर 1940 में अंग्रेजी में एक किताब लिखी थी। किताब का नाम था- ‘मौलाना अबुल कलाम आज़ाद। यह मौलाना आजाद पर एक संस्मरणात्मक जीवनी जैसी थी।  

भारत पाक विभाजन के खिलाफ
मौलाना अबुल कलाम भारत-पाकिस्तान बंटवारे के सख्त ख़िलाफ़ थे। मौलाना आज़ाद कभी भी मुस्लिम लीग की द्विराष्ट्रवादी सिद्धांत के समर्थक नहीं बने। उन्होंने हमेशा इसका खुलकर इसका विरोध किया। भारत विभाजन के समय भड़के हिन्दू-मुस्लिम दंगों के दौरान मौलाना आजाद ने हिंसा प्रभावित बंगालबिहारअसम और पंजाब राज्यों का दौरा किया और वहां शरणार्थी शिविरों में रसद आपूर्ति और सुरक्षा का बंदोबस्त किया।

हिंदू मुस्लिम एकता के पक्षधर
आगरा में 1921 में दिए अपने एक भाषण में उन्होंने कहामैं यह बताना चाहता हूं कि मैंने अपना सबसे पहला लक्ष्य हिंदू-मुस्लिम एकता रखा है। मैं दृढ़ता के साथ मुसलमानों से कहना चाहूंगा कि यह उनका कर्तव्य है कि वे हिंदुओं के साथ प्रेम और भाईचारे का रिश्ता कायम करें जिससे हम एक सफल राष्ट्र का निर्माण कर सकेंगे।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com

Sunday, August 25, 2019

ऐतिहासिक शहर विदिशा और बदहाल सिटी म्युजियम

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हेलियोडोरस स्तंभ देखने के बाद विदिशा शहर में पहुंच गया हूं। आटोरिक्शा ने हमें विदिशा शहर के उत्तरी छोर पर उतार दिया है। यहां पर मेला लगा हुआ है। मैं पैदल चलता हुआ शहर को देखता हुआ आगे बढ़ रहा हूं।

कुशवाहा धर्मशाला से थोड़ा आगे चलने पर मैंने एक दुकानदार से पूछा कि मुझे सिटी म्युजियम देखने जाना है। उन्होंने कहा दूर है बैटरी रिक्शा पर बैठ जाइए। इस के बाद मैं बैटरी रिक्शा पर बैठ गया। पर इस दौरान विदिशा शहर को देखकर बड़ी निराशा हुई।

विदिशा देश के प्राचीनतम ऐतिहासिक शहरों में से एक है। विदिशा लोकसभा क्षेत्र है। यहां से मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज जैसे लोग सांसद रह चुके हैं। पर विदिशा मध्य प्रदेश के सबसे अव्यवस्थित और गंदे शहरों में शुमार है। शहर की सड़के बेतरतीब हैं। शहर को योजनाबद्ध ढंग से विकसित नहीं किया गया है। इतने प्राचीन शहर को हेरिटेज सिटी या अमृत योजना का भी लाभ नहीं मिला है। केंद्र और राज्य दोनों ही सरकारों से ये उपेक्षा का शिकार है।

साल 2018 मे केंद्र सरकार द्वारा लागू की गई अमृत सिटी योजना में विदिशा नगरपालिका को शामिल किया गया है। पर अभी इसका कोई असर दिखाई नहीं देता। अमृत सिटी योजना में भी ग्रीन बेल्ट बढ़ाने और सालिड वेस्ट मटेरियल के निष्पादन का प्रावधान किया गया है। शहर का बस स्टैंड बड़ा ही गंदा और असुविधाजनक है। आसपास की सड़कों पर स्वच्छ भारत अभियान का कोई असर दिखाई नहीं देता।

विदिशा को ऐतिहासिक व पुरातात्विक दृष्टिकोण से क्षेत्र मध्य भारत का महत्वपूर्ण क्षेत्र माना जाता है। आजकल विदिशा से तीन किलोमीटर उत्तर में बेसनगर नामक एक छोटा-सा गांव है, यहां प्राचीन विदिशा नगरी हुआ करती थी। 

विदिशा नगर पहले दो नदियों के संगम पर बसा हुआ था। यह बाद में दक्षिण की ओर बढ़ता जा रहा है। इन प्राचीन नदियों में एक छोटी-सी नदी का नाम वैस है। इसे विदिशा नदी के रूप में भी जाना जाता है। विदिशा के आसपास विंध्य पर्वत की श्रेणियां हैं जो ज्यादा ऊंची नहीं है। इस क्षेत्र को वरदान है कि यहां कभी सूखा नहीं पड़ता। विदिशा के आसपास शहर से 12 किलोमीटर दूर मुरेल खुर्द में बौद्ध स्तूप देखा जा सकता है।

नगर के सरकिट हाउस के सामने विदिशा का जिला संग्रहालय स्थित है। इसका निर्माण 1964 में हुआ था। पर यह आजकल बदहाली का शिकार है। इसका प्रवेश टिकट दस रुपये का है। यह सुबह दस बजे से शाम पांच बजे तक खुला रहता है। संग्रहालय हर सोमवार को बंद रहता है। हालांकि संग्रहालय के अंदर संग्रह काफी अच्छा है। 

पर संग्रहालय की देखभाल बिल्कुल नहीं की जा रही है। तमाम कलाकृतियां और उसके आसपास गंदगी का आलम है। संग्रहालय के अंदर रोशनी का इंतजाम भी अच्छा नहीं है। कई मूर्तियां जिन पैडल स्टल पर रखे हैं, उनको भी दीमक चाट चुके हैं। कई बेशकीमती पुरातत्व महत्व की प्रतिमाएं बाहर खुले में पड़ी हैं। पूरी बिल्डिंग जगह-जगह से दरक रही है। थोड़े से पानी गिरने पर ही उसके अंदर पानी भर जाता है।

संग्रहालय में प्रदर्शित कलाकृतियों में शैव, वैष्णव, शाक्त, जैन एवं अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं और विदिशा उत्खनन से प्राप्त सामग्री है। वर्तमान में इस संग्रहालय में लगभग 1700 पुरावशेष संकलित है। यहां पर दूसरी सदी ईसा पूर्व की यक्ष प्रतिमा खास आकर्षण है।
यक्षराज कुबेर की विशालतम (3.36 गुणा 1.36 मीटर) प्रतिमा भी देखी जा सकती है जो सफेद बलुआ प्रस्तर पर निर्मित है। संग्रहालय में प्रदर्शित प्रतिमाओं में गणेश की नृत्य एवं ललितासीन प्रतिमाएं, शिव नटेश, उमा महेश्वर, भैरव भी काफी महत्वपूर्ण हैं। 


सूर्य की दुर्लभ प्रतिमा - यहां पर ग्यारहवीं सदी की दुर्लभ सूर्य की प्रतिमा है। इसमें सूर्य रथ पर सवार होकर निकलते हुए दिखाए गए हैं। यह सूर्य का भिल्लस्वामिन रूप है जिसके नाम पर विदिशा का नाम भेलसा कहा जाता है। पर यह प्रतिमा भी बड़े खराब हाल में रखी गई है।


विदिशा का संग्रहालय देखने के बाद वापस चल पड़ा। रास्ते में दो जगह रूक कर स्ट्रीट फूड का आनंद लेते हुए थोड़ी से पेट पूजा की। विदिशा के बस स्टैंड से भोपाल के लिए प्राइवेट बस ली। मध्य प्रदेश में सरकारी बसें तो चलती ही नहीं। भोपाल के हमिदिया रोड के पास स्थित नादरा बस स्टैंड पहुंचते हुए शाम गहरा गई है। 

मैं हमिदिया रोड के ही एक होटल में रात्रि भोजन के लिए रुक गया। सुस्वादु भोजन के बाद भोपाल जंक्शन पर पहुंचकर अपनी ट्रेन का इंतजार करने लगा। पर ट्रेन आने में अभी समय है तो भोपाल जंक्शन के प्लेटफार्म नबंर एक वाले हिस्से में बाहर घूमने पहुंचा। स्टेशन के बाहर एक विशाल तिरंगा झंडा लहराने लगा है। मेरा आरक्षण 12713 तेलंगाना एक्सप्रेस में है। टिकट वेटिंग था जो अब कन्फर्म हो चुका है। ट्रेन समय से चल रही है। रात दस बजे ट्रेन प्लेटफार्म पर आकर लग गई है। तो सायोनारा... 

हमारी मध्य प्रदेश की यात्रा में फिलहाल इतना ही। फिर किसी और यात्रा पर चलेंगे । पढ़ते रहिए, दानापानी।

कभी ख्वाबों में कभी तेरे दर पे,  कभी दर बदर,
ऐ गमे जिंदगी तुझे ढूंढते ढूंढते हम कहां भटक गए।

   - विद्युत प्रकाश मौर्य - हमें लिखें - vidyutp@gmail.com
( BHOPAL, VIDISHA, HISTORIC CITY ) 

Friday, August 23, 2019

ईसा पूर्व दूसरी सदी का है विदिशा का हेलियोडोरस स्तंभ

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उदयगिरी से हमलोग विदिशा की राह पर हैं। पर हमारी उत्सुकता पहले हेलियोडोरस स्तंभ देखने की है। खास तौर पर विदिशा का रहा हमने इसी स्तंभ को देखने के लिए पकड़ी है। तो हमारा आटो रिक्शा विदिशा शहर में नहीं प्रवेश करता है। दरअसल यह स्तंभ विदिशा शहर से चार किलोमीटर बाहर स्थित है। विदिशा शहर के बाहर विदिशा अशोक नगर हाईवे पर हलाली नदी का पुल पार करने के बाद हमारा आटो एक जगह दाहिनी तरफ जाने वाली एक सड़क पर मुड़ गया। हलाली बेतवा की सहायक नदी है। यहां ग्रामीण क्षेत्र में एक किलोमीटर जाने के बाद सड़क के दाहिनी तरफ हेलियोडोरस स्तंभ हमारी नजरों के सामने था। इसे देखकर हमारी खुशियां दोगुनी हो उठी। तकरीबन 2100 साल से ज्यादा पुराना ये स्तंभ आज भी नया नया सा ही प्रतीत होता है।  


हेलिओडोरस स्तम्भ पूर्वी मालवा के बेसनगर (वर्तमान विदिशा) के बाहरी इलाके में स्थित है। इसे स्थानीय भाषा में खाम बाबा के नाम से भी पुकारते हैं। इस स्तंभ की सबसे बड़ी विशेषता है कि इसे एक ही पत्थर को काटकर बनाया गया है। यह स्तम्भ ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। क्योंकि देश बहुत ही कम ऐतिहासिक स्तंभ है जो ईसा पूर्व के हों। अशोक द्वारा बनवाए गए स्तंभों के बाद हेलियोडोरस का यह स्तंभ हमारे देश के प्राचीनतम ऐतिहासिक निधियों में से एक है।
इसका निर्माण 110 ईसा पूर्व यूनानी राजदूत हेलिओडोरस ने कराया था। इसलिए स्तंभ को उसके नाम पर ही जाना जाता है। आखिर ये हेलियोडोरस कौन था। वह यूनानी राजा अंतलिखित का शुंग राजा भागभद्र के दरबार में दूत बनकर आया था। उसके बारे में कहा जाता है कि वह वैदिक धर्म से काफी प्रभावित था। अपनी धर्मपरायणता की वजह से ही उसने इस स्तंभ का निर्माण कराया।

इस स्तंभ पर पाली भाषा में ब्राम्ही लिपि का प्रयोग करते हुए एक अभिलेख उत्कीर्ण कराया गया है। यह अभिलेख स्तंभ इतिहास बताता है। इस अभिलेख से पता चलता है कि नवें शुंग शासक महाराज भागभद्र के दरबार में तक्षशिला के यवन राजा अंतलिखित की ओर से दूसरी सदी ईसा पूर्व हेलिओडोरस नाम का राजदूत नियुक्त हुआ। इस राजदूत ने वैदिक धर्म की व्यापकता से प्रभावित होकर भागवत धर्म स्वीकार कर लिया। तब हिंदू धर्म ऐसे ही नामों से जाना जाता था। इस राजदूत ने भक्तिभाव से ओत प्रोत होकर एक विष्णु मंदिर का निर्माण करवाया और उसके सामने गरुड़ ध्वज स्तंभ बनवाया। हालांकि अब उस विष्णु मंदिर का कोई अवशेष यहां पर नहीं मिलता है। पर यह स्तंभ बड़े शान से यहां पर खड़ा है।

पुरातात्विक अभिलेखों से पता चलता हैं कि प्राचीन काल में यहां एक वृत्ताकार मंदिर था, जिसकी नींव 22 सेंटीमीटर चौड़ी तथा 15 से 20 सेंटीमीटर गहरी मिली है। गर्भगृह का क्षेत्रफल 8.13 मीटर का था। प्रदक्षिणा पथ की चौड़ाई 2.5 मीटर थी। इसकी बाहरी दीवार भी वृत्ताकार थी। पूर्व की ओर एक सभामंडप का भी निर्माण कराया गया था।
आज हेलियोडोरस स्तंभ को देखने दिन भर में गिने चुने सैलानी ही आते हैं। आसपास लोग इस स्तंभ के ऐतिहासिक महत्व को लेकर ज्यादा जागरूरत भी नहीं है।

स्थानीय लोग हेलियोडोरस स्तंभ को खंभा बाबा के नाम से जानते हैं। खास तौर पर आसपास का मछुआरा समाज की इसकी सदियों से पूजा करता आ रहा है। 

सन 1921 में ग्वालियर रियासत के पुरातत्व विभाग ने इस स्तंभ का जीर्णोद्धार कराया। तब माधव राव सिंधिया अलीराज बहादुर इसके शासक थे। यहां पर ग्वालियर स्टेट की ओर से एक पट्टिका लगातर इसकी जानकारी दी गई है। 

कैसे पहुंचे – विदिशा रेलवे स्टेशन से हेलियोडोरस स्तंभ की दूरी 5 किलोमीटर है। यह अशोक नगर हाईवे पर स्थित है। शहर से कोई भी बैटरी रिक्शा वाला आपको इस स्तंभ तक पहुंचा देगा। स्तंभ देखने के लिए आप सूर्योदय से सूर्यास्त तक पहुंच सकते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
(HELIODORUS PILLER, VIDISHA, MP ) 

Thursday, August 22, 2019

यहां हैं सबसे प्राचीन हिंदू मूर्तियां - उदयगिरी की गुफाएं

सांची से अब उदयगिरी की गुफाओं की ओर। एक उदयगिरी ओडिशा में है तो दूसरा मध्य प्रदेश में विदिशा के पास। इस बार उदयगिरी की गुफाओं को देखना हमारी सूची में है। उदयगिरी सांची से नौ किलोमीटर की दूरी पर है। यह विदिशा शहर से पांच किलोमीटर की दूरी पर है। सांची से उदयगिरी जाने के लिए आरक्षित वाहन से जाना सुविधाजनक है।

 सांची के स्तूप में मेरी मुलाकात तालबेहट के राजीव योगी से हुई। उन्हें भी उदयगिरी जाना है। हमने साझे तौर पर एक आटोरिक्शा बुक कर लिया जो हमें उदयगिरी घुमाने के बाद विदिशा शहर के पास हेलियोडोर स्तंभ भी दिखाएगा। तो हम चल पड़े हैं उदयगिरी की ओर। वैसे उदयगिरि विदिशा शहर से वैसनगर होते हुए पहुंचा जा सकता है। नदी से यह गिरि लगभग डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर है। यह बेतवा और वैस नदी के बीच की पहाड़ी है।

उदयगिरी में पहाड़ी के पूरब की तरफ पत्थरों को काटकर गुफाएं बनाई गई हैं। इन गुफाओं में प्रस्तर- मूर्तियों के प्रमाण मिलते हैं, जो भारतीय मूर्तिकला के इतिहास में मील का पत्थर माना जाता है।  

गुप्त काल की मूर्तियां - 
उदयगिरि पांचवीं शताब्दी में गुप्त साम्राज्य के दौरान चंद्रगुप्त द्वितीय के शासन काल में इन गुफाओं पर फिर से काम किया गया। की गुफाओं में बेहद जटिल नक्काशी की गई है। यह भारत की सबसे प्राचीन हिंदू देवी देवताओं पर आधारित मूर्तियों और चित्रों वाली गुफा है। इसका स्थान विश्व प्रसिद्ध हिंदू गुफा मंदिरों में आता है। इसमें हिंदू इतिहास, संस्कृति और आध्यात्मिकता के दर्शन होते हैं।  

इस गुफा में पाए जाने वाली अधिकांश मूर्ति भगवान शिव और उनके अवतार को समर्पित है। ये गुफाएं गुप्त काल की सबसे प्रमुख पुरातात्विक क्षेत्र है और भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण द्वारा इसे सुरक्षित कर लिया गया है।

विष्णु की लेटी हुई प्रतिमा - गुफा में भगवान विष्णु के लेटे हुए मुद्रा में एक विशाल प्रतिमा है। इसकी सुंदरता देखते ही बनती है। पत्थरों को काट कर बनाई ये गुफाएं गुप्त काल के कारीगरों के कौशल और कल्पनाशीलता का का अदभुत नमूना है। गुफा का प्रवेश द्वार भी लोगों को अचरज में डाल देता है।

वराह अवतार - मूर्तिकला की दृष्टि से पांचवीं गुफा सबसे महत्त्वपूर्ण मानी जाती है। इसमें वराह अवतार का दृश्य अंकित किया गया है। यहां वराह भगवान का बांया पांव नाग राजा के सिर पर दिखलाया गया है। यहां वराह को मानव और पशु संयुक्त रूप में दिखाया गया है।

इसी तरह छठी गुफा में दो द्वारपालोंविष्णु महिष-मर्दिनी एवं गणेश की मूर्तियां बनाई हैं। गुफा संख्या छह से प्राप्त लेख से ज्ञात होता है कि उस क्षेत्र पर सनकानियों का अधिकार था।

उदयगिरि के द्वितीय गुफा के लेख में चन्द्रगुप्त के सचिव पाटलिपुत्र निवासी वीरसेन उर्फ शाव द्वारा शिव मन्दिर के रूप में गुफा निर्माण कराने का उल्लेख मिलता है। उदयगिरी की गुफाएं दरअसल उस दौर की बनी हिंदू मूर्तियां जब हिंदू धर्म में मूर्ति पूजा की शुरुआत हो रही है। छठी शताब्दी से पहले की हिंदू देवी देवताओं की मूर्तियां हमें नहीं मिलती हैं।

उदयगिरी की गुफाओं को देखने के लिए आपके पास कम से कम दो घंटे का समय होना चाहिए। उदयगिरी में देवी देवताओं के दर्शन के बाद हमलोग अब चल पड़े हैं प्राचीन विदिशा नगरी की ओर।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
(UDAIGIRI, CAVES, VIDISHA, MP) 

Tuesday, August 20, 2019

सांची संग्रहालय- बुद्ध मुस्कुराए

भोपाल में दूसरी बार सांची के लिए चल पड़ा हूं। सन 1995 में सांची यात्रा की यादें धुंधली हो गई हैं। तो सांची जाने का मतलब उन यादों को एक बार फिर ताजा करना है। सांची यूनेस्को की विश्व विरासत की सूची में शुमार है। एक ऐसा बौद्ध स्थल है जहां बार बार आने की इच्छा होती है। भोपाल के हमिदिया रोड के पास नदरा बस स्टैंड से सांची के लिए लोकल बस में बैठ गया हूं। हांलाकि भोपाल से सांची लोकल ट्रेन से भी जाया जा सकता है। पर ट्रेन हर समय नहीं मिलती। बस भोपाल शहर से बाहर निकल रही है। शहर की सीमा में करोंद में कृषि उत्पादन बाजार समिति दिखाई दे रही है। थोड़ी देर में बस शहर से बाहर निकलकर हरे भरे खेतों के बीच से गुजर रही है। 

भोपाल शहर पार करने के बाद सूखी सेवनिया का इलाका आया। दोनों तरफ हरे भरे गेहूं के खेत शुरू हो गए हैं। इन खेतों को देखकर मुझे अपना गांव याद आ रहा है। थोड़ी देर बाद सलामतपुर नामक एक कस्बा आया। सलामतपुर रेलवे स्टेशन भी है। सांची मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में पड़ता है। बस ने हमें सांची चौराहे पर उतार दिया। यहां से बायीं तरफ 300 मीटर आगे सांची रेलवे स्टेशन है। तो दाहिनी तरफ का रास्ता सांची स्तूप की तरफ जा रहा है। 

सांची के स्तूप से पहले हमें मध्य प्रदेश टूरिज्म का रेस्ट हाउस गेटवे रिट्रीट दिखाई दे गया। यहां पर 300 रुपये प्रतिदिन मे रहने के लिए डारमेट्री उपलब्ध है। इसके ठीक आगे सांची पुरातात्विक स्थलों को देखने के लिए टिकट घर है। कुल 40 रुपये के टिकट में संग्रहालय और स्तूप शामिल है। मैं टिकट लेकर पहले संग्रहालय देखने के लिए दाखिल हो गया।

रायसेन जिले में कई बौद्ध स्तूप हुआ करते थे। मौर्य सम्राज्य की विदिशा में रिश्तेदारी थी।  मौर्यकाल में विदिशा के आसपास कई बौद्ध स्तूपों का निर्माण हुआ।
संग्रहालय के प्रांगण में हमें सबसे पहले सती स्तंभ दिखाई देता है। यहां पर पांच अलग अलग आकृतियां अपने मूल स्थान पर हैं। इसमें खास तौर पर पत्नी द्वारा पति के प्रति निष्ठा का चित्रण है।

सीहोर जिले का पानगुरारिया में कभी एक सुंदर बौद्ध स्तूप हुआ करता था। अब उसके अवशेषों को लाकर संग्रहालय में स्थापित किया गया है। यह स्तूप तीसरी सदी ईसा पूर्व में मौर्यकाल में निर्मित हुआ था। इसके अवशेषों को देखकर लगता है कि यह सांची के स्तूप से भी विशाल रहा होगा। सम्राट अशोक ने पानगुरारिया का भ्रमण किया था। बौद्ध साहित्य बताते हैं अशोक ने अपने पिता के शासन काल में वायसराय के तौर पर उज्जैन जाते हुए विदिशा के व्यवसायी की पुत्री देवी से विवाह किया था। विदिशा और आसपास के क्षेत्रों में स्तूप बनवाने में अशोक ने इसलिए रुचि दिखाई क्योंकि यह स्थान ध्यानक्रिया के लिए काफी उपयुक्त था।

अब बात सांची की। सांची प्रचीन काल में काकनाय, काकनाथ, काकनदबोट नाम से जाना जाता था। बेतवा और बेस नदी के तट पर स्थित सांची तब प्रमुख व्यापारिक मार्ग पर था। तीसरी सदी ईपू से 13वीं सदी तक सांची बौद्ध धर्म का प्रमुख स्थल था। पर 13वीं सदीके बाद सांची का पतन हो गया। पर सन 1818 में विलियम टेलर ने घनी झाड़ियों के बीच सांची के स्तूप की खोज की।

सांची के संग्रहालय में सन 1818 के बाद सांची से प्राप्त बहुमूल्य संग्रह है। यह मौर्यकाल और उसके बाद 1000 सालों तक बने बौद्ध दर्शन से जुड़े दौर में आपको ले जाता है। शुंग काल, सातवाहन काल, कुषाण काल, गुप्त काल, उत्तर गुप्त काल की कलाकृतियों से रूबरू कराता है। यहां सातवाहन काल की यक्षी की प्रतिमा तो अदभुत है। यहां तीसरी सदी ईपू का अशोक स्तंभ भी आप देख सकते हैं जो बलुआ पत्थर से बना है।

संग्रहालय देखने के बाद मैं सांची के स्तूप की तरफ बढ़ चला हूं। संयोग से यहां पर मेरी मुलाकात भागलपुर विश्वविद्यालय के इतिहास के प्रोफेसर केके मंडल से हो जाती है। वे अपनी पत्नी और बेटे के साथ सांची घूम रहे हैं। यहीं पर बुजुर्ग इतिहासकार सीपीएन सिन्हा साहब से भी मुलाकात होती है। उन सब लोगों के साथ सांची दूसरी यात्रा यादगार हो गई।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 



Monday, August 19, 2019

हल्की बारिश और सीएपीटी भोपाल का कैंपस



भोपाल में इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस के सत्र में रजिस्ट्रेशन कराने के बाद जब आवासीय व्यवस्था की बात आई तो हमारी पर्ची पर लिखा था सीएपीटी भोपाल। ये सीएपीटी कहां है। जवाब मिला- आपको बस लेकर जाएगी। थोड़ी देर बाद आरसीवीपी नरोन्हा अकादमी के गेट से एक बस लेकर हमलोगों को चल पड़ी। 
भोपाल शहर में हबीबगंज, बीएचईएल आदि को पार करती हुई बस शहर के बाहर निकल कर हरे भरे खेतों से गुजरने लगी। आखिर ये सीएपीटी कहां है। करीब 25 किलोमीटर चलने के बाद हमलोग सीएपीटी की प्रवेश द्वार पर थे। 

अपनी पहचान बताने के बाद हमें प्रवेश मिला। तो सीएपीटी का मतलब है सेंट्रल एकेडमी ऑफ पुलिस ट्रेनिंग। दो प्रवेश द्वार और पार करने के बाद हमलोग मालवा मेस पहुंचे। अगले तीन दिन हमारा यही ठिकाना होगा। मालवा मेस में 100 कमरे बुक हैं हमारे लिए। हर कमरे में एक व्यक्ति। ये हमारे बीएचयू के हास्टल जैसा है। हमारे कमरे में एक बिस्तर, दो अलमारी, बैठने के लिए कुर्सी टेबल, एक ब्लैंकेट आदि रखा है। पीने के पानी का इंतजाम है। सुबह स्नान करने के लिए गर्म पानी चाहिए था तो ड्यूटी पर तैनात सीआरपीएफ के जवान ने मुझे इमरसन रॉड उपलब्ध कराया। उनका बहुत बहुत धन्यवाद।

सीएपीटी भारत सरकार के गृह मंत्रालय के तहत आता है। इसकी स्थापना पुलिस और पारा मिलिट्री फोर्स के उच्चाधिकारियों के प्रशिक्षण रिफ्रेशर कोर्स आदि के लिए किया गया है। जब हम पहुंचे हैं तो देश भर के जेलों के उच्चाधिकारियों का प्रशिक्षण चल रहा है। सीएपीटी हाई सिक्युरिटी जोन में आता है। यहां कोई मोबाइल नेटवर्क नहीं चलता। यहां आने वाले प्रशिक्षुओं को वाईफाई नेटवर्क उपलब्ध कराया जाता है।

सीएपीटी भोपाल शहर के किसी भी बाजार से 17 किलोमीटर दूर है। यहां तैनात बीएसएफ के एक जवान बताते हैं कि कुछ भी खरीददारी करनी हो तो 17 किलोमीटर आनंद नगर जाना पड़ता है। आपके पास अपना वाहन नहीं हो तो यहां पहुंचना मुश्किल है।

देश में आईपीएस उत्तीर्ण करने वाले लोगों का प्रशिक्षण सरदार वल्लभ भाई पटेल पुलिस एकेडमी हैदराबाद में होता है। पर सीएपीटी ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट के तहत आता है। यहां पुलिस और अर्धसैनिक बल के अफसरों को नए शोध और तकनीक का प्रशिक्षण समय समय पर दिया जाता है। सीएपीटी की स्थापना भारत सरकार ने 2009 में की थी। पर सीएपीटी का यह परिसर 2014 में अस्तित्व में आया। यह परिसर कान्हासिया में 401 एकड़ में फैला हुआ है। यह भोपाल के हुजुर तहसील में आता है। यह विदिशा बाईपास रोड पर भोपाल रेलवे स्टेशन से 20 किलोमीटर की दूरी पर है। साल 2016 से यहां नियमित तौर पर प्रशिक्षण कार्यक्रमों का संचालन किया जाता है। यहां देश भर में सीधे नियुक्त हुए डीवाईएसपी को प्रशिक्षण दिया जाता है।

मालवा मेस की इमारत दो मंजिला है। अगली सुबह हल्की बारिश में सीएपीटी का परिसर और सुंदर हो गया है। यहां तैनात जवान हमें मुख्य प्रशासनिक भवन को बाहर से देखने की सलाह देते हैं। हल्की बारिश में यहां चहलकदमी करते बहुत मजा आया। पर अब यहां जाने का वक्त आ गया। बस वाले आ गए हैं और वे सिटी बजा रहे हैं, तो चलें।     
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
(CENTRAL ACADEMY OF POLICE TRAINING, BHOPAL )