Tuesday, July 16, 2019

बापू का कोचरब आश्रम और नन्हा सा चरखा


आटो से अहमदाबाद की सड़कों पर चलते हुए पता चलता है कि हम कोचरब से गुजर रहे हैं। मुझे कुछ याद आता है। मैंने बापू पर पुस्तकें पढ़ते हुए ये जाना था कि कोचरब वही जगह है जहां पर साबरमती से पहले बापू ने आश्रम बनाया था। बस हमने आटो को वहीं थोड़ी देर तक रुकने को कहा। 
आप चाहें तो कोचरब आश्रम को अंदर जाकर घूम सकते हैं। यहां पर वह कमरा देखा जा सकता है जहां पर बापू कस्तूरबा गांधी के साथ दो साल तक रहे। कोचरब आश्रम की देखरेख गुजरात का गांधी विद्यापीठ करता है। गांधीजी ने इस विद्यापीठ की स्थापना 1920 में की थी। गांधी विद्यापीठ कोचरब के पास ही है।

1915 में बापू ने शुरू किया सत्याग्रह आश्रम - दरअसल ये अहमदाबाद में गांधी जी और कस्तूरबा का प्रथम निवास है। यहां से सत्याग्रह की शुरुआत हुई और यहीं से साबरमती आश्रम की नीव पड़ी। बापू ने इस पहले आश्रम को नाम दिया था सत्याग्रह आश्रम। जब बापू अफ्रिका से सन 1915 में वापस आए और यहां आकर उन्होंने एक आश्रम की स्थापना की। तब कोचरब ग्रामीण इलाका था। आज व्यस्त शहर का हिस्सा है।

 सन 1915 के मई महीने की 25 तारीख के दिन यहां सत्याग्रह आश्रम की स्थापना हुई। बापू ने जब आश्रम शुरू करना तय किया तो कई मकानों की तलाश करते हुए कोचरब में जीवणलाल बैरिस्टर का मकान किराये पर लेने का निशचय हुआ। पर बापू की इच्छा जानकर बैरिस्टर जीवनलाल देसाई ने अहमदाबाद के कोचरब नामक स्थान में एक सुंदर सा बंगला गांधीजी को उपहार स्वरूप दे दिया था।

दरअसल बापू जब दक्षिण अफ्रिका से भारत आए तो हिंदुस्तान के अलग अलग शहरों में बसने के बारे में सोच रहे थे। स्वामी श्रद्धानंद ने उन्हें हरिद्वार में बसने की सलाह दी। किसी ने देवघर की सलाह दी।

बापू अपनी आत्मकथा में लिखते हैं -  अहमदाबाद पर मेरी नजर टिकी थी। गुजराती होने के कारण मैं मानता था कि गुजराती भाषा द्वारा मैं देश की अधिक से अधिक सेवा कर सकूंगा। यह भी धारणा थी कि चूंकि अहमदाबाद पहले हाथ की बुनाई का केंद्र था, इसलिए चरखे का काम यहीं अधिक अच्छी तरह से हो सकेगा। साथ ही यह आशा भी थी कि गुजरात का मुख्य नगर होने के कारण यहां के धनी लोग धन की अधिक मदद कर सकेंगे। 

इस आश्रम में शुरुआत में 25 लोग रहते थे। गांधीजी अपनी पत्नी कस्तूरबा गांधी के साथ दो साल तक कोचरब के दो मंजिले बंगले में (1915 से 1917 तक) रहे। पर 1917 में इस इलाके में फैली प्लेग की महामारी ने बापू को कोचरब से बाहर जाने के लिए मजबूर कर दिया।

नन्हा सा चरखा कोचरब आश्रम में एक स्टोर है, यहां खादी ग्रामोद्योग से जुड़े हुए तमाम समान बिकते हैं। यहां से आप कपड़े, शहद और खाने पीने की वस्तुएं खरीद सकते हैं। अपनी पिछली यात्रा में हमने साबरमती आश्रम के बाहर लकड़ी का बना हुआ नन्हा चरखा खरीदने का मन बनाया था पर खरीद नहीं पाए थे। पर इस बार हमने ये चरखा खरीद लिया। सन 2013  में ये चरखा 100 रुपये का था अब इसकी कीमती 160 रुपये है। यह बारडोली चरखे का छोटा मॉडल है। इसे घर में सजाने के लिए खरीदा जा सकता है। 

- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( KOCHARAB ASHRAM, CHARKHA, BAPU ) 

No comments:

Post a Comment