Monday, July 15, 2019

सरखेज में शेर अली की दरगाह और चाय वाले पीर

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सरखेज रोजा के पास ही हमें हमारे आटो वाले हजरत ख्वाजा शेर अली बाबा की दरगाह दिखाने ले जाते हैं। वह चिश्ती परंपरा के सूफी संत थे। मुख्य सड़क पर इन महान सूफी संत की दरगाह है। इस दरगाह पर हमेशा स्थानीय लोगों की भीड़ होती है। बड़ी संख्या में लोग मन्नत मांगने पहुंचते हैं। यह दरगाह मुख्य सड़क पर सरखेज पुलिस स्टेशन के सामने स्थित है। परिसर में बाबा शेर अली निजामुद्दीन मगरीबी अल चिश्ती की दरगाह और सुंदर मसजिद है। यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित स्मारक है। इसका प्रबंधन भी सरखेज रोजा कमेटी ही देखता है।

दरगाह का मुख्य गुंबद हरे रंग का है। इसमें कुल तीन गुंबद हैं। दरगाह का निर्माण बलुआ पत्थर से किया गया है। इसके चारों तरफ की दीवारों में जालियों का सुंदर काम है। दरगाह पर आने वाले श्रद्धालु चादर और फूल चढ़ाते हैं। शेर अली के बारे में लोगों की मान्यता है कि वे जागृत संत हैं। उनकी ताकत शेर जैसी थी और वे आज भी रात को जागृत हो जाते हैं।

हजरत गंज बक्श के समकालीन - बाबा अली शेर सूफी संत होने के साथ महान योद्धा थे। वे हजरत निजामुद्दीन औलिया के वंशज थे। लोगों में उनका सम्मान सरखेज के दूसरे सूफी संत पीर अहमद गट्टू गंज बक्श के बराबर ही है। शेर अली हजरत गंजू बक्श के समकालीन थे। शेर अली इंतकाल हजरत गंजू बक्श से 12 साल पहले हो गया। वे 1434 ईस्वी में अल्लाह के प्यारे गए। कहा जाता है कि वे 140 साल जीये। इस तरह उनका जन्म का साल 1394 माना जाता है। कहा जाता है कि वे सरखेज में मस्त हालत में रहते थे। वे इबादत में इतना खो जाते थे कि उनके शरीर पर कोई कपड़ा नहीं होता था। उनके दरगाह पर हर साल उर्स लगता है। तब यहां दूर-दूर से जायरीन पहुंचते हैं। 

सैय्यद सफी बापू की मजार – चाय वाले पीर
सरखेज में ही सैय्यद सफी बापू की मजार है। यह एक अनूठे पीर की मजार है जहां चाय का लंगर लगता है। इसलिए उन्हें चाय वाले पीर भी कहते हैं। वे ज्यादा पुराने नहीं हैं। उनका इंतकाल 2001 में हुआ था। वे यूपी के प्रतापगढ़ से इधर आए थे। इस मजार की खासियत है कि यहां एक तहखाना बना हुआ है। इसमें दूध और चाय पत्ती डाल दी जाती है। इसे एक साल बाद खोला जाता है तो उसमें चाय तैयार होकर मिलती है। इस दौरान यहां विशाल लंगर लगाया जाता है। ये अहमदाबाद में  चाय वाले पीर के नाम से लोकप्रिय हैं।


सरखेज रोजा के वास्तुकार आजम और मुअज्जम
सरखेज से पलाडी रोड पर चलते हुए सड़क के दाहिनी तरफ हमें दो मकबरे दिखाई देते हैं। वासना में स्थित इस मकबरे के बारे में थोड़ी छानबीन करने पर पता चला कि ये आजम और मुअज्जम के मकबरे हैं। भला कौन थे आजम और मुअज्जम। ये दोनों सरखेज रोजा के वास्तुकार थे। आजम के बारे में कहा जाता है कि वे धनुर्धारी योद्धा थे। तो मुअज्जम कला के पारखी थे। उन दोनों के इंतकाल के बाद सरखेज रोजा से थोड़ी ही दूरी पर उनका भी मकबरा बनवाया गया।
हमलोग अब वापसी की राह पर हैं। रास्ते में हमें अहमदाबाद मेट्रो रेल का काम चलता हुआ नजर आ रहा है। जल्द ही अहमदाबाद शहर भी मेट्रो रेल के मानचित्र पर होगा। शहर का विस्तार इतना ज्यादा हो गया है कि यहां मेट्रो की काफी जरूरत है।

मिट्टी हैं तो पल भर में बिखर जाएंगे हम, खुशबू हैं तो हर दौर को महकाएंगे हम

हम रुहे सफर हैं, हमें नामों से न पहचान, कल किसी और नाम से आ जाएंगे हम।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com
-        ( BABA SHER ALI, SARKHEJ, CHAI WALE PIR, AJAM AND MUAJJAM )  

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