Friday, July 12, 2019

मिस्र और मेसोपोटामिया से कारोबार करता था लोथल


लोथल के प्राचीन नगर का मुआयना करने के बाद हमलोग लोथल के पुरातत्व संग्रहालय में प्रवेश कर गए हैं। इस संग्रहालय में लोथल के बारे में जानकारी देती हुए एक फिल्म दिखाई जाती है। इस फिल्म का शो हर घंटे होता है।

लोथल मतलब मुर्दों का टीला - लोथल का शाब्दिक अर्थ होता है मुर्दो का टीला। संभवत 1700 ईसा पूर्व के बाद जब यहां लगातार बाढ़ के बाद लोग पलायन कर गए तब आसपास के लोगों ने इसे लोथल नाम दिया होगा। पर हड़प्पा सभ्यता का प्रमुख शहर लोथल बंदरगाह शहर होने के साथ ही कपास और धान उत्पादन का प्रमुख केंद्र था।

गुजरात के हड़प्पा कालीन शहर लोथल का कारोबार मिस्र और मेसोपोटामिया के साथ हुआ करता था। लोथल के आवासीय क्षेत्र के पश्चिम में एक नदी बहती थी जो लोथल को खंभात की खाड़ी से जोड़ने का काम करती थी। लोथल की संपन्नता का प्रमुख कारण उसका पश्चिम एशिया के देशों के साथ कारोबार था। लोथल नगर के लोग मनकों का निर्माण किया करते थे। खुदाई में मिले मनकों का संग्रह लोथल के संग्रहालय में देखा जा सकता है।

लोथल के लोग अर्ध निर्मित कीमती पत्थरों, मनके, तांबा, हाथी दांत, शंख और कपास की वस्तुओं की तिजारत दुनिया के दूसरे देशों के साथ किया करते थे। यहां मिले कई प्रकार के पुरावशेषों जैसे फारस की खाड़ी के क्षेत्र की मुद्रा, गोरिल्ला और ममी की मृणमूर्तियां लोथल के बाहरी देशों के साथ कारोबार की पुष्टि करती है।

लोथल में 1976 में संग्रहालय का निर्माम कराया गया जिसमें खुदाई से मिली सामग्री को संरक्षित किया गया है। इस संग्रहालय में तीन दीर्घाएं और प्रदर्शनी कक्ष हैं। प्रवेश करते ही आपको लोथल शहर का एक विशाल चित्र दिखाई देता है जो एक कलाकार की कल्पना है। कुछ ऐसा रहा होगा लोथल शहर।
जब आप बायीं तरफ की दीर्घा का रुख करते हैं तो आप यहां कई किस्म के मनके, मिट्टी के बने आभूषण देख सकते हैं। यहां पर लोथल में इस्तेमाल की जाने वाली मुद्राएं भी देखी जा सकती हैं। वजन करने के लिए मिट्टी के बाट का भी इस्तेमाल हुआ करता था।

आगे बढ़िए तो शंख और हाथी के दांत के बने आभूषण भी दिखाई देंगे। खुदाई से तांबे और कांसे की बनी वस्तुएं भी प्राप्त हुई हैं। इसके आगे बच्चों के खिलौने, मानव और पशुओं की मिट्टी की बनी मूर्तियां देखी जा सकती हैं। मिट्टी के बरतनो पर चित्र भी बनाए गए हैं।


रंग बिरंगे कीमती मनके - लोथल में बने मनकों में काफी कलात्मकता दिखाई देती है। इन मनकों में गोमेद और सुलेमानी जैसे पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है। वहीं मिट्टी के बने मनके भी देखे जा सकते हैं। कुछ सेलखड़ी के बने इतने छोटे मनके हैं कि उन्हें बिना लेंस के कोरी आंखों से देख पाना संभव नहीं है। लोथल में आभूषणों के निर्माण में शंख का भी इस्तेमाल किया गया है।

सिक्के पर पशु आकृतियां - लोथल से जो मुद्राएं मिली हैं उनपर सिंधु कालीन लिपी में लिखा गया है जिन्हें अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है। पर इन मुद्राओं पर पशु की आकृति बनाई गई है। लोथल में तांबे से बने बड़े बड़े मर्तबान भी मिले हैं। ऐसा माना जाता है कि यहां तांबा ओमान से आयात करके मंगाया जाता था। स्थानीय लोग दैनिक इस्तेमाल में तांबे के बरतनों को उपयोग करते थे।


शुक्रवार को बंदी - लोथल का संग्रहालय हर शुक्रवार को बंद रहता है। इसलिए आप जब भी लोथल आने का कार्यक्रम बनाएं तो शुक्रवार के दिन नहीं आएं। संग्रहालय में एएसआई का पुस्तक बिक्रय केंद्र भी है।जहां से काम की किताबें खरीद सकते हैं।


तो अब हमलोग लोथल से वापस चल रहे हैं। वापसी में धींगड़ा गांव में हमलोग रुक गए। स्थानीय लोगों से मुलाकात हुई। गांव के सरपंच से बात हुई। उन्होंने हमें अपने घर चलने को और खाने पीने का आमंत्रण दिया। उनका धन्यवाद। पर हमलोग आगे चलकर बगोदर में हाईवे के किनारे एक ढाबे में दोपहर के खाने के लिए रुके। ढाबे का खाना अच्छा था। बाहर बेर बिक रहे हैं। ये खूब सस्ते भी हैं। खाने के बाद हमलोग एक बार फिर हाईवे पर फर्राटा भर रहे हैं। अहमदाबाद की ओर वापसी।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( LOTHAL, GUJRAT ) 
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