Wednesday, July 10, 2019

गुजरात का हडप्पा कालीन बंदरगाह शहर लोथल

लोथल मतलब अतीत से संवाद। तो हमलोग पहुंच गए हैं इस प्राचीन नगर से संवाद करने। यह स्थल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से संरक्षित है। यहां वाहन पार्किंग, पेयजल और शौचालय का इंतजाम है पर कोई कैंटीन नहीं है। यहां देखने के लिए दो आकर्षण है। लोथल का पुरातत्व संग्रहालय और पुराने शहर के अवशेष। देशी विदेशी सैलानी मिलाकर हर रोज औसतन 500 लोग लोथल को देखने पहुंचते हैं। प्रवेश के लिए सिर्फ 5 रुपये का टिकट है। यहां पुरातत्व विभाग का 40 स्टाफ तैनात है। पर रात में सिर्फ सुरक्षा गार्ड रहते हैं।

लोथल प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता के शहरों में से एक बहुत ही महत्वपूर्ण स्थल रहा। लगभग 2400 ईसा पूर्व पुराना लोथल शहर गुजरात के खंभात की खाड़ी और साबरमती नदी के बीच में स्थित है। लंबे समय तक लोथल हमारी नजरों से ओझल था। इसकी खोज सन 1954 में हुई थी। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इस शहर की खुदाई 13 फरवरी 1955 से लेकर 19 मई 1956 के मध्य की थी। इसकी अगुवाई प्रोफेसर एस आर राव ने की थी।

वास्तव में हड़प्पा सभ्यता बेहद विशाल थी। इसका विस्तार भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान तक था। पर भारत विभाजन के बाद हड़प्पा और मोहनजोदड़ो पाकिस्तान के कब्जे में चले गए, फिर भी हड़प्पा सभ्यता के कई स्थान भारत में भी मौजूद हैं। उनमें लोथल और कालीबंगा प्रमुख हैं। तो आइए इस प्राचीन नगर लोथल को करीब से महसूस करने चलते हैं।
हमें सबसे पहले दिखाई देता है एक आयताकार बेसिन, जिसे डॉकयार्ड ( बंदरगाह) कहा जाता था।

लोथल नगर आवासीय क्षेत्र दो हिस्सों में बंटा हुआ था। दुर्ग और नगर क्षेत्र। बाढ़ से बचाव के लिए 13 मीटर मोटी मिट्टी के ईंटों वाली मजबूत दीवार बनाई गई थी। दुर्ग क्षेत्र में समाज के प्रबुद्ध लोग रहते थे। इन लोगों को आवास तीन मीटर ऊंचे चबूतरे पर बने थे। उनके पास सभी तरह की नागरिक सुविधाएं थीं। जैसे स्नानागार, ढकी हुई नालियां, स्वच्छ जल के लिए कुआं आदि।

नगर में व्यापारिक क्षेत्र भी था, जहां सिर्फ कामगार लोग रहते थे। लोथल में आप एक जलाशय नुमा गोदी ( बंदरगाह) और विशाल मालगोदाम के अवशेष देख सकते हैं।
गोदी को पकी ईंटो से बनाया गया है। इसके निर्माण में पूरी वैज्ञानिकता का ख्याल रखा गया है जिससे पानी का बहाव लगातार और सालों भर कायम रहे। यह 214 मीटर लंबा और 36 मीटर चौड़ा था। बेसिन चारों तरफ से पक्की ईंटों से घिरा हुआ है। इसमें जल निकासी के लिए स्लूस गेट बना हुआ है और इनलेट के लिए जगह भी छोड़ी गई है।

थोड़ी दूर आगे चलने पर आपको माल गोदाम दिखाई देता है। इसका निर्माण एक बड़े चबूतरे पर किया गया है। इसका आकार 49 गुणा 40 मीटर है। मूल रूप से इस चबूतरे पर घनाकार मिट्टी के 64 स्तंभ थे, जिसपर लकड़ी की छत हुआ करती थी। यह गोदाम मालवाहक जहाजों से उतरे माल कोर सुरक्षित रखने के लिए बनाई गई थी।

कहा जाता है कि 1900 ईस्वी के आसपास लगातार आई बाढ़ के कारण लोथल नगर का विनाश हो गया। लगभग 1700 ईस्वी के आसपास लोगों ने इस स्थल को पूरी तरह त्याग दिया।

लोथल में बने थे शौचालय
लोथल की नगर व्यवस्था में हमें शौचालय होने का प्रमाण मिलता है। यहां लोटे जैसे जार मिलने से यह पता चलता है कि तब भी यहां के लोगो द्वारा स्वच्छता पर पर्याप्त जोर दिया जाता था। अभी से 4500 वर्षीय पुराना यह शहर गणितीय तरीके से योजनाबद्ध रूप से बना था। इसमें उचित कोणों पर सड़कों को पार करने की व्यवस्था, जल निकासी प्रणालियां और बड़े स्नानागार की व्यवस्था थी।
लोथक के प्राचीन अवशेषों को देखने के लिए आप तकरीबन एक किलोमीटर की ट्रैकिंग कर सकते हैं। धूप तेज लगती है, पानी की बोतल अपने साथ रखें। तो अब वापस चलते हैं, संग्रहालय भी तो देखना है।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य ( LOTHAL , GUJRAT ) 




No comments:

Post a Comment