Saturday, July 20, 2019

एक बार फिर भोपाल में – राजा भोज की नगरी

कई साल बाद दिल्ली से भोपाल की राह पर हूं। इस बार एक शादी का न्योता आया है। शादी भोपाल में है इसलिए जाने से इनकार नहीं कर सका। क्योंकि इसी बहाने भोपाल जाने का मौका मिल रहा है। मेरा आरक्षण हरिद्वार एलटीटी सुपर फास्ट एक्सप्रेस ट्रेन में है। यह ट्रेन निजामुद्दीन स्टेशन से रात 12.10 बजे चलती है। हरिद्वार से आकर ये निजामुद्दीन में आधे घंटे रुकने के बाद चलती है। इसलिए यह रात 12.10 में निजामुद्दीन से चल ही पड़ती है। दफ्तर का काम खत्म करके मैंने दफ्तर की कैब से निजामुद्दीन स्टेशन जाना तय किया। पर नोएडा सेक्टर 63 से रात 11 बजे निकलने के बाद एनएच 9 पर रात में भीषण जाम में फंस गया।

एनएच पर भीषण जाम 
जाम से निकलने की ड्राईवर ने पूरी कोशिश कर रहा था पर यूपी गेट तक काफी जाम था। लगा कि अब ट्रेन नहीं पकड़ पाउंगा। फिर क्या 1100 रुपये पानी में चले जाएंगे।

हाईवे पर जाम में धीरे धीरे सरकते हुए यूपी गेट पर 11.40 हो गए। पर यूपी गेट के बाद हमारी गाड़ी बीच में बने सुपरफास्ट लेन में चल पड़ी अब कोई जाम नहीं था। मैं 11.55 बजे निजामुद्दीन स्टेशन पर था। तेजी से दौड़ता अपनी ट्रेन की तरफ भागा। अपने कोच में अपनी सीट पर पहुंचा ही था कि ट्रेन चल पड़ी।

हरिद्वार एलटीटी एक्सप्रेस का के कोच बिल्कुल नए हैं। हमारे कंपार्टमेंट में सिर्फ दो यात्री हैं। ऐसा लग रहा है कि ट्रेन में नहीं बल्कि अपने घर में ही सो रहा हूं। आगरा और झांसी के बाद इस ट्रेन का ठहराव सीधे भोपाल में ही है। ट्रेन अपने नीयत समय पर सुबह 10.30 बजे भोपाल पहुंच गई। भोपाल रेलवे स्टेशन पर 1999 के बाद पहली बार बाहर निकल रहा हूं। वैसे तो इस बीच भोपाल से गुजरना कई बार हुआ है। मैं हमिदिया रोड वाली साइड में बाहर निकला हूं, क्योंकि हमने जो होटल बुक किया वह हमिदिया रोड पर ही है। हमिदिया रोड मतलब पुराने भोपाल का इलाका।


पर स्टेशन से बाहर निकलते ही सबसे पहले नास्ता। नास्ते में क्या। जाहिर है भोपाल में नास्ता तो पोहा ही होगा। दिल्ली की बनिस्पत भोपाल में ठंड कम है। मेरे कई कपड़े यहां के मौसम के लिए बेकार लग रहे हैं। होटल के कमरे में जाकर स्नान करके तैयार हो गया। शाम को मुझे एक शादी में जाना है तो दिन भर समय है भोपाल शहर घूमने के लिए। भोपाल के कई स्थलों को पहले से ही देख चुका हूं तो इस बार कुछ नए स्थलों को सूचीबद्ध किया है। पिछले 20 सालों में भोपाल काफी कुछ बदल चुका है। 

देश की सुंदर राजधानियों में से एक - 
पिछले 15 सालों से शिवराज सिंह चौहान की भाजपा सरकार के बाद अब राज्य में कांग्रेस सरकार की वापसी हो गई है। कमलनाथ मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बन चुके हैं। सुंदरता की बात करें तो भोपाल देश के सुंदर राजधानी शहरों में से एक है। ताल तलैया के इस शहर में मेरी पहली मंजिल है जनजातीय संग्रहालय। इस संग्रहालय की दूरी हमिदिया रोड से पांच किलोमीटर है। मैं एक आटो रिक्शा वाले बात करता हूं। वे वाजिब दाम पर हमें संग्रहालय तक छोड़ने के लिए तैयार हो जाते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( BHOPAL, MP, RAIL, HWR LTT AC EXPRESS ) 


Friday, July 19, 2019

अहमदाबाद में सफल है बीआरटी कॉरीडोर


दिल्ली में बीआरटी कारीडोर को लेकर खूब हो हल्ला हुआ था एक मार्ग पर लागू हुई पर वह सफल नहीं हो सकी। पर अहमदाबाद में ये खूब सफल है। महाराष्ट्र के पुणे शहर में भी बीआरटी सफल है।  बीआरटी मतलब बस रैपिड ट्रांसपोर्ट।
अहमदाबाद शहर में मनपा द्वारा बीआरटीएस को संचालित किया जाता है। इन बसों का किराया भी आम बसों की तरह है। इसकी ज्यादातर बसें एसी (वातानुकूलित) हैं।

हमने एक दिन ओधव से कालूपूरा तक बीआरटीएस बस में सफर किया। बीआरटीएस में बैठने के लिए सड़क के बीच में स्टेशन बनाए गए हैं। आने वाली बस का टिकट पहले काउंटर से लेना होता है। बस के दरवाजे काफी चौड़े हैं। ये दरवाजे बस में दाहिनी तरफ हैं। आटोमेटिक दरवाजे खुलने के बाद लोग इसमें प्रवेश कर जाते हैं। यह काफी कुछ मेट्रो रेल की तरह है। डेडिकेटेड बस कारिडोर होने के कारण ये बसें आपको मंजिल तक आटो या टैक्सी की तुलना में जल्दी पहुंचा देती हैं। इसलिए ये स्थानीय लोगों में लोकप्रिय भी हैं।

साल 2017 में यह तय किया गया कि अहमदाबाद बस रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (बीआरटीएस) एवं अहमदाबाद म्युनिसिपल ट्रान्सपोर्ट सर्विस (एएमटीएस) रूटों पर चलने वाली बसों की खेप में अब इलेक्ट्रिक बसों को शामिल किया जाएगा। इससे प्रदूषण का स्तर कम होगा।

अहमदाबाद शहर में चल रहे बीआरटीएस को साल 2013 में दुनिया का सबसे अच्छा सतत परिवहन के रूप में चयन किया गया।  यहां का बीआरटीएस परफेक्ट प्लानिंग की एक बेहतरीन मिसाल है। अहमदाबाद में बीआरटीएस के द्वारा एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए पहले की तरह 40 मिनट के बजाए 11 मिनट में यह दूरी तय की जा सकती है।

एयरपोर्ट पर बापू की जीवन यात्रा - अहमदाबाद से अब चला चली की वेला है। हमारी फ्लाइट अल सुबह 5 बजे है। वैसे कालूपुरा से एयरपोर्ट की दूरी 8 किलोमीटर के आसपास है। हमने रात के ढाई बजे ही ओला कैब बुक कर लिया है। ओला वाले समय पर आ भी गए हैं। रात में सड़क खाली है। हमलोग बमुश्किल 15 मिनट में सरदार बल्लभ भाई पटेल एयरपोर्ट पर हैं। यह अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है। हमारी उड़ान डोमेस्टिक टर्मिनल एक से है। साढ़े तीन बजे हमलोग चेकइन करके वेटिंग लाउंज में इंतजार करने लगे हैं।

एयरपोर्ट पर गुजरात के प्रतीक तस्वीर के तौर पर चंपानेर के सात कमान की विशाल तस्वीर लगी है। इसके साथ ही यहां बापू के जीवन की पूरी विकास यात्रा को चित्रों में दिखाया गया है। हो भी क्यों नहीं हर गुजराती को गर्व है कि बापू उनके हैं। वही बापू जिन्होंने सत्य के प्रयोग से पूरी दुनिया में अपनी पहचान बनाई। एक ऐसा गुजराती जो अपने कार्यों से विश्व नागरिक बना। बापू की जीवन यात्रा देखते हुए हमारी नजर गिर वन के जंगलों पर पड़ती है। एयरपोर्ट पर जंगल का सुंदर नजारा त्रिआयामी तरीके से निर्मित किया गया है। यहां पर गिर वन में गुर्राता हुआ शेर भी है। यहां खादी और गुजराती हस्तशिल्प के लिए गर्वी गुर्जरी की दुकाने भी हैं। पर वे सुबह सुबह होने के कारण बंद हैं। यहां चाय 60 रुपये की और 25 रुपये वाला थेपला 100 रुपये का बिक रहा है।

थोड़ी देर में हमारे विमान में प्रवेश का समय हो गया है। साल 2019 की हमारी पहली उड़ान है जेट एयरवेज से। यह बोइंग 737 विमान है। इसको उड़ा रहे हैं कप्तान सुमित्र अग्री। थोड़ी देर में हम गुजरात के आसमान में हैं। दिल्ली अब एक घंटे दूर है। सुबह 7 बजे विमान दिल्ली के टी-3 पर उतर गया। पर शायद ये हमारी जेट एयरवेज से आखिरी उड़ान साबित हुई। क्योंकि मई 2019 में जेट एयरवेज पूरी तरह जमीन पर आ चुकी थी।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
-        ( BRTS, ADI, SVP AIRPORT, BAPU, JET AIRWAYS )

Thursday, July 18, 2019

अहमदाबाद की पतंगबाजी और जान का खतरा


अहमदाबाद के जिस कालूपुरा इलाके में हम ठहरे हैं वहां पर पतंगों का थोक बाजार है। आपको तो पता होगा कि अहमदाबाद पतंगबाजी के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। दीपावली खत्म होने के बाद गुजराती लोग पतंगबाजी में खो जाते हैं। ये सिलसिला दो महीने तक चलता रहता है। जनवरी में यहां काइट फेस्टिवल का आयोजन होता है।

खतरनाक हुआ पतंगबाजी का शौक - हम जिस मौसम में अहमदाबाद पहुंचे हैं यहां पतंगबाजी जोरों पर हैं। बचपन में थोड़ी बहुत पतंगे हमने भी उड़ाई हैं पर इसमें मुझे कुछ खास रुचि नहीं है। अहमदाबाद की सड़कों पर घूमते हुए हमें कई सारी बाइक या स्कूटी के आगे स्टील की ऊंचे फ्रेम लगवाए हुए लोग दिखाई दिए। कौतूहल वस मैंने एक जगह पूछ लिया कि ये क्यों लगवा रखा है। तो बाइक वाले ने बताया कि ये पतंग की डोर से बचने के लिए है।

 दरअसल पतंग उड़ाने में माझा लगे हुए धागे का इस्तेमाल होता है। इस धागे में सीसा का इस्तेमाल होता है। ऐसा इसलिए की सामने वाली की डोर को काटा जा सके। पर यह डोर लोगों का गरदन काट देती है। पतंग के धागे जब सड़कों पर टूट कर गिर जाते हैं तो ये आते जाते बाइक और साइकिल वालों की गरदन में कई बार फंस जाते हैं। बाइक वाला तेज गति से चलता है जब तक वह रुके तब इस धागे से गरदन कट जाती है। अहमदाबाद में ऐसे कई बाइक चलाने वालों की पतंग के धागे से मौत हो चुकी है। अब लोगों ने इन धागों के वार से बचने के लिए एक देसी तरीका निकाला है। हैंडल में कमान नुमा मोटा तार लगवा लेते हैं। यह तार धागे को गरदन तक आने से रोक लेता है। पर सारे लोगों ने ऐसा उपाय नहीं किया है। तो जान पर खतरा तो अभी भी बरकरार है।

मकर संक्रांति के दिन छह मौत - इस साल सिर्फ मकर सक्रांति के दिन की बात करें तो गुजरात में मकर सक्रांति पर्व के दिन पतंगबाजी का मजा कुछ लोगों के लिए जानलेवा साबित हुआ। प्रदेश में 14 जनवरी के दिन पतंग के मांझे से गला कटने पर छह लोगों की मौत हो गई। वहीं विभिन्न दुर्घटनाओं में प्रदेश में कुल 500 से अधिक लोग घायल हो गये है। जिसमें छत से गिरने के 100 से अधिक मामले शामिल है।

अहमदाबाद में जनवरी में उतरायन महोत्सव के मौके पर हर साल पतंगबाजी की परंपरा की खूब धूम रहती है। राज्य के पर्यटन विभाग ने इस मौके पर खास आयोजन करता है। तब दुनिया भर से लोग यहां पहुंचते हैं। साबरमती नदी के किनारे मेला लग जाता है। इस दौरान सेलिब्रेशन के लिए देश-विदेश में बसे गुजराती यहां आते हैं। पतंग के शौकीनों में इन्हीं मोहल्लों की छत से पतंग उड़ाने का क्रेज रहता है। गुजरात में कई इलाकों में तो लोग पतंगबाजी के लिए अपनी खुली छत को किराये पर भी लगते हैं।

मैं कालूपुरा टावर के पास पतंग बाजार में घूम रहा हूं। दर्जनों दुकानें तीन महीने के लिए पंतग और डोर माझा के दुकान में बदल जाती हैं। पूरे शहर में पतंग      और डोर माझा की सैकड़ो दुकानें गुलजार हो जाती हैं। पर इस पतंगबाजी से हो रही मौत की खबरें सुनकर का कहा जाए...
तुम शौक से मनाओ जश्ने बहार यारों
इस रोशनी में लेकिन कुछ घर जल रहे हैं....
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-        ( KITE FESTIVAL, AHMADABAD, GUJRAT )

Tuesday, July 16, 2019

बापू का कोचरब आश्रम और नन्हा सा चरखा


आटो से अहमदाबाद की सड़कों पर चलते हुए पता चलता है कि हम कोचरब से गुजर रहे हैं। मुझे कुछ याद आता है। मैंने बापू पर पुस्तकें पढ़ते हुए ये जाना था कि कोचरब वही जगह है जहां पर साबरमती से पहले बापू ने आश्रम बनाया था। बस हमने आटो को वहीं थोड़ी देर तक रुकने को कहा। 
आप चाहें तो कोचरब आश्रम को अंदर जाकर घूम सकते हैं। यहां पर वह कमरा देखा जा सकता है जहां पर बापू कस्तूरबा गांधी के साथ दो साल तक रहे। कोचरब आश्रम की देखरेख गुजरात का गांधी विद्यापीठ करता है। गांधीजी ने इस विद्यापीठ की स्थापना 1920 में की थी। गांधी विद्यापीठ कोचरब के पास ही है।

1915 में बापू ने शुरू किया सत्याग्रह आश्रम - दरअसल ये अहमदाबाद में गांधी जी और कस्तूरबा का प्रथम निवास है। यहां से सत्याग्रह की शुरुआत हुई और यहीं से साबरमती आश्रम की नीव पड़ी। बापू ने इस पहले आश्रम को नाम दिया था सत्याग्रह आश्रम। जब बापू अफ्रिका से सन 1915 में वापस आए और यहां आकर उन्होंने एक आश्रम की स्थापना की। तब कोचरब ग्रामीण इलाका था। आज व्यस्त शहर का हिस्सा है।

 सन 1915 के मई महीने की 25 तारीख के दिन यहां सत्याग्रह आश्रम की स्थापना हुई। बापू ने जब आश्रम शुरू करना तय किया तो कई मकानों की तलाश करते हुए कोचरब में जीवणलाल बैरिस्टर का मकान किराये पर लेने का निशचय हुआ। पर बापू की इच्छा जानकर बैरिस्टर जीवनलाल देसाई ने अहमदाबाद के कोचरब नामक स्थान में एक सुंदर सा बंगला गांधीजी को उपहार स्वरूप दे दिया था।

दरअसल बापू जब दक्षिण अफ्रिका से भारत आए तो हिंदुस्तान के अलग अलग शहरों में बसने के बारे में सोच रहे थे। स्वामी श्रद्धानंद ने उन्हें हरिद्वार में बसने की सलाह दी। किसी ने देवघर की सलाह दी।

बापू अपनी आत्मकथा में लिखते हैं -  अहमदाबाद पर मेरी नजर टिकी थी। गुजराती होने के कारण मैं मानता था कि गुजराती भाषा द्वारा मैं देश की अधिक से अधिक सेवा कर सकूंगा। यह भी धारणा थी कि चूंकि अहमदाबाद पहले हाथ की बुनाई का केंद्र था, इसलिए चरखे का काम यहीं अधिक अच्छी तरह से हो सकेगा। साथ ही यह आशा भी थी कि गुजरात का मुख्य नगर होने के कारण यहां के धनी लोग धन की अधिक मदद कर सकेंगे। 

इस आश्रम में शुरुआत में 25 लोग रहते थे। गांधीजी अपनी पत्नी कस्तूरबा गांधी के साथ दो साल तक कोचरब के दो मंजिले बंगले में (1915 से 1917 तक) रहे। पर 1917 में इस इलाके में फैली प्लेग की महामारी ने बापू को कोचरब से बाहर जाने के लिए मजबूर कर दिया।

नन्हा सा चरखा कोचरब आश्रम में एक स्टोर है, यहां खादी ग्रामोद्योग से जुड़े हुए तमाम समान बिकते हैं। यहां से आप कपड़े, शहद और खाने पीने की वस्तुएं खरीद सकते हैं। अपनी पिछली यात्रा में हमने साबरमती आश्रम के बाहर लकड़ी का बना हुआ नन्हा चरखा खरीदने का मन बनाया था पर खरीद नहीं पाए थे। पर इस बार हमने ये चरखा खरीद लिया। सन 2013  में ये चरखा 100 रुपये का था अब इसकी कीमती 160 रुपये है। यह बारडोली चरखे का छोटा मॉडल है। इसे घर में सजाने के लिए खरीदा जा सकता है। 

- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( KOCHARAB ASHRAM, CHARKHA, BAPU ) 

Monday, July 15, 2019

सरखेज में शेर अली की दरगाह और चाय वाले पीर

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सरखेज रोजा के पास ही हमें हमारे आटो वाले हजरत ख्वाजा शेर अली बाबा की दरगाह दिखाने ले जाते हैं। वह चिश्ती परंपरा के सूफी संत थे। मुख्य सड़क पर इन महान सूफी संत की दरगाह है। इस दरगाह पर हमेशा स्थानीय लोगों की भीड़ होती है। बड़ी संख्या में लोग मन्नत मांगने पहुंचते हैं। यह दरगाह मुख्य सड़क पर सरखेज पुलिस स्टेशन के सामने स्थित है। परिसर में बाबा शेर अली निजामुद्दीन मगरीबी अल चिश्ती की दरगाह और सुंदर मसजिद है। यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित स्मारक है। इसका प्रबंधन भी सरखेज रोजा कमेटी ही देखता है।

दरगाह का मुख्य गुंबद हरे रंग का है। इसमें कुल तीन गुंबद हैं। दरगाह का निर्माण बलुआ पत्थर से किया गया है। इसके चारों तरफ की दीवारों में जालियों का सुंदर काम है। दरगाह पर आने वाले श्रद्धालु चादर और फूल चढ़ाते हैं। शेर अली के बारे में लोगों की मान्यता है कि वे जागृत संत हैं। उनकी ताकत शेर जैसी थी और वे आज भी रात को जागृत हो जाते हैं।

हजरत गंज बक्श के समकालीन - बाबा अली शेर सूफी संत होने के साथ महान योद्धा थे। वे हजरत निजामुद्दीन औलिया के वंशज थे। लोगों में उनका सम्मान सरखेज के दूसरे सूफी संत पीर अहमद गट्टू गंज बक्श के बराबर ही है। शेर अली हजरत गंजू बक्श के समकालीन थे। शेर अली इंतकाल हजरत गंजू बक्श से 12 साल पहले हो गया। वे 1434 ईस्वी में अल्लाह के प्यारे गए। कहा जाता है कि वे 140 साल जीये। इस तरह उनका जन्म का साल 1394 माना जाता है। कहा जाता है कि वे सरखेज में मस्त हालत में रहते थे। वे इबादत में इतना खो जाते थे कि उनके शरीर पर कोई कपड़ा नहीं होता था। उनके दरगाह पर हर साल उर्स लगता है। तब यहां दूर-दूर से जायरीन पहुंचते हैं। 

सैय्यद सफी बापू की मजार – चाय वाले पीर
सरखेज में ही सैय्यद सफी बापू की मजार है। यह एक अनूठे पीर की मजार है जहां चाय का लंगर लगता है। इसलिए उन्हें चाय वाले पीर भी कहते हैं। वे ज्यादा पुराने नहीं हैं। उनका इंतकाल 2001 में हुआ था। वे यूपी के प्रतापगढ़ से इधर आए थे। इस मजार की खासियत है कि यहां एक तहखाना बना हुआ है। इसमें दूध और चाय पत्ती डाल दी जाती है। इसे एक साल बाद खोला जाता है तो उसमें चाय तैयार होकर मिलती है। इस दौरान यहां विशाल लंगर लगाया जाता है। ये अहमदाबाद में  चाय वाले पीर के नाम से लोकप्रिय हैं।


सरखेज रोजा के वास्तुकार आजम और मुअज्जम
सरखेज से पलाडी रोड पर चलते हुए सड़क के दाहिनी तरफ हमें दो मकबरे दिखाई देते हैं। वासना में स्थित इस मकबरे के बारे में थोड़ी छानबीन करने पर पता चला कि ये आजम और मुअज्जम के मकबरे हैं। भला कौन थे आजम और मुअज्जम। ये दोनों सरखेज रोजा के वास्तुकार थे। आजम के बारे में कहा जाता है कि वे धनुर्धारी योद्धा थे। तो मुअज्जम कला के पारखी थे। उन दोनों के इंतकाल के बाद सरखेज रोजा से थोड़ी ही दूरी पर उनका भी मकबरा बनवाया गया।
हमलोग अब वापसी की राह पर हैं। रास्ते में हमें अहमदाबाद मेट्रो रेल का काम चलता हुआ नजर आ रहा है। जल्द ही अहमदाबाद शहर भी मेट्रो रेल के मानचित्र पर होगा। शहर का विस्तार इतना ज्यादा हो गया है कि यहां मेट्रो की काफी जरूरत है।

मिट्टी हैं तो पल भर में बिखर जाएंगे हम, खुशबू हैं तो हर दौर को महकाएंगे हम

हम रुहे सफर हैं, हमें नामों से न पहचान, कल किसी और नाम से आ जाएंगे हम।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com
-        ( BABA SHER ALI, SARKHEJ, CHAI WALE PIR, AJAM AND MUAJJAM )  

Saturday, July 13, 2019

गुजरात का ताजमहल है सरखेज रोजा

लोथल से वापस लौटते समय में हमें बागोदरा में बर्ड सेंक्चुरी का पथ संकेतक नजर आता है। बगोदरा से 28 किलोमीटर की दूरी पर नाल सरोवर बर्ड सेंक्चुरी है जो गुजरात का प्रसिद्ध वेटलैंड है। यहां खास तौर पर दिसंबर से फरवरी के बीच जाकर घूमा जा सकता है। यहां पर बर्ड वाचिंग और बोटिंग का आनंद लिया जा सकता है। नाल सरोवर अहमदाबाद से 64 किलोमीटर दूर साणंद के पास है। पहुंचने का सुगम रास्ता बावला-बगोदरा होकर ही है। तो कभी अगली यात्रा में हम वहां जाने की कोशिश करेंगे।

लोथल से लौटते हुए हमारी अगली मंजिल है सरखेज रोजा। सरखेज रोजा को गुजरात का ताजमहल कहते हैं। यह अहमदाबाद शहर का विशाल और अनूठा स्मारक है।
सरखेज रोजा गुजरात में एक सबसे महत्‍वपूर्ण रोजा समूह है जिसमें कई मस्जिद, मकबरे और महल बनाए गए हैं। इस परिसर में निर्माण कार्य की शुरुआत सुल्तान मोहम्मद शाह ने की थी।

सूफी संत पीर शेख अहमद गट्टू गंज बख्श की मजार 
सुल्तान अहमद शाह, जिनके नाम के उपर से शहर का नाम पडा, के शासन काल के दौरान सरखेज अहमदाबाद के पास एक छोटा सा गांव हुआ करता था। इस गांव में मूल रूप से बुनकर और रंगरेज रहा करते थे। ज्यादा आबादी हिंदू थी। उस गांव में एक मुस्लिम पीर शेख अहमद गट्टु गंज बक्श का आना हुआ। पीर शेख 1398 में गुजरात आए और सरखेज में रहना शुरू किया। उनका समय 1336 से 1446 का था। 

उनका जन्म राजस्थान का नागौर जिले के खाटू में 1336 ईस्वी में हुआ था। वे खाटू के बाबा इसाक मगरीबी के शिष्य थे। कुल 111 साल की उम्र तक जीने के बाद उनका इंतकाल 13 जनवरी 1446 को हुआ। वे उन चार अहमद में से एक थे जिन्होंने 1411 में अहमदाबाद शहर की बुनियाद रखी। उनके इंतकाल पर उनकी याद में सुल्तान मुह्म्मद शाह ने सरखेज में एक मकबरा और सुंदर मसजिद बनवाई। पीर शेख की मजार की सुंदरता अदभुत है। इसमें कुल 16 स्तंभ हैं। इसकी दीवारों पर जालियों में सुंदर नक्काशी है।


महमूद बेगड़ा का मकबरा - सरखेज में सुल्तान महमूद बेगड़ा और उसके परिवार के सदस्यों का भी मकबरा है। सरखेज के मकबरे के निर्माण में इस्लाम, हिंदू और जैन शैली के अलंकरण का काम बहुत ही दक्षता से हुआ है। बाद में कुतुबद्दीन शाह ने भी सरखेज रोजा कांप्लेक्स के निर्माण में योगदान किया। इस परिसर में सुलतान अहमदशाह का भी मकबरा है। बाद में सुल्तान मुहम्मद बेगड़ा ने भी सरखेज कांप्लेक्स के निर्माण में योगदान किया।

मकबरे से झील की तरफ जाएं तो यहां सुंदर झरोखों को निर्माण किया गया है। सरखेज रोजा के निर्माण में बड़ी संख्या में संगमरमर का इस्तेमाल हुआ है इसलिए इसे गुजरात का ताजमहल भी कहते हैं। रोजा में बनी जालियों में सुंदर नक्काशी देखी जा सकती है। 

सरखेज में विशाल झील - 15वीं शताब्दी में महमूद बेगडा ने इस मकबरे के आसपास निर्माण कार्य को विस्तार दिया। उसने एक समर पैलेस (गर्मियों में रहने के लिए महल ) और बीच में एक विशाल झील का निर्माण करवाया। झील से अतिरिक्त पानी के निकासी के लिए स्युलिस गेट का निर्माण किया गया था। झील के एक कोने पर समर पैलेस का निर्माण कराया गया था। हालांकि इस झील में आजकल पानी बिल्कुल नहीं है। इसलिए झील का सौंदर्य फीका पड़ गया है। वर्षों बाद यह किला और मकबरा जर्जर अवस्था में आ गया था। इसके कई भवनों को क्षति पहुंच रही थी। बाद में गुजरात सरकार और पुरातत्व विभाग ने इस स्थल का रख रखा कर पुनर्निमाण कराया है।

पुस्तकालय और वाचनालाय - सरखेज रोजा कमेटी आजकल सरखेज के इंतजाम देखती है। कमेटी यहां पर एक पुस्तकालय का संचालन करती है। यहां पर दुर्लभ पुस्तकों और चित्रों का संग्रह है। यहां पर पवित्र कुरान की हस्तलिखित प्रति देखी जा सकती है। सरखेज रोजा में होने वाले आयोजनों में पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम समेत कई नामचीन हस्तियां शिरकत कर चुकी हैं। 26 जनवरी 2014 को अमिताभ बच्चन सरखेज रोजा में आए थे।

कैसे पहुंचे - सरखेज, अहमदाबाद में मुख्‍य शहर से 7 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। कभी यह शहर का बाहरी इलाका हुआ करता था, पर अब शहर का हिस्सा है। सरखेज रोजा घूमने के लिए एक अच्छा स्थल है। यहां लोग पिकनिक मनाने भी आते हैं।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( SARKHEJ ROJA, AHMADABAD , MASJID ) 


Friday, July 12, 2019

मिस्र और मेसोपोटामिया से कारोबार करता था लोथल


लोथल के प्राचीन नगर का मुआयना करने के बाद हमलोग लोथल के पुरातत्व संग्रहालय में प्रवेश कर गए हैं। इस संग्रहालय में लोथल के बारे में जानकारी देती हुए एक फिल्म दिखाई जाती है। इस फिल्म का शो हर घंटे होता है।

लोथल मतलब मुर्दों का टीला - लोथल का शाब्दिक अर्थ होता है मुर्दो का टीला। संभवत 1700 ईसा पूर्व के बाद जब यहां लगातार बाढ़ के बाद लोग पलायन कर गए तब आसपास के लोगों ने इसे लोथल नाम दिया होगा। पर हड़प्पा सभ्यता का प्रमुख शहर लोथल बंदरगाह शहर होने के साथ ही कपास और धान उत्पादन का प्रमुख केंद्र था।

गुजरात के हड़प्पा कालीन शहर लोथल का कारोबार मिस्र और मेसोपोटामिया के साथ हुआ करता था। लोथल के आवासीय क्षेत्र के पश्चिम में एक नदी बहती थी जो लोथल को खंभात की खाड़ी से जोड़ने का काम करती थी। लोथल की संपन्नता का प्रमुख कारण उसका पश्चिम एशिया के देशों के साथ कारोबार था। लोथल नगर के लोग मनकों का निर्माण किया करते थे। खुदाई में मिले मनकों का संग्रह लोथल के संग्रहालय में देखा जा सकता है।

लोथल के लोग अर्ध निर्मित कीमती पत्थरों, मनके, तांबा, हाथी दांत, शंख और कपास की वस्तुओं की तिजारत दुनिया के दूसरे देशों के साथ किया करते थे। यहां मिले कई प्रकार के पुरावशेषों जैसे फारस की खाड़ी के क्षेत्र की मुद्रा, गोरिल्ला और ममी की मृणमूर्तियां लोथल के बाहरी देशों के साथ कारोबार की पुष्टि करती है।

लोथल में 1976 में संग्रहालय का निर्माम कराया गया जिसमें खुदाई से मिली सामग्री को संरक्षित किया गया है। इस संग्रहालय में तीन दीर्घाएं और प्रदर्शनी कक्ष हैं। प्रवेश करते ही आपको लोथल शहर का एक विशाल चित्र दिखाई देता है जो एक कलाकार की कल्पना है। कुछ ऐसा रहा होगा लोथल शहर।
जब आप बायीं तरफ की दीर्घा का रुख करते हैं तो आप यहां कई किस्म के मनके, मिट्टी के बने आभूषण देख सकते हैं। यहां पर लोथल में इस्तेमाल की जाने वाली मुद्राएं भी देखी जा सकती हैं। वजन करने के लिए मिट्टी के बाट का भी इस्तेमाल हुआ करता था।

आगे बढ़िए तो शंख और हाथी के दांत के बने आभूषण भी दिखाई देंगे। खुदाई से तांबे और कांसे की बनी वस्तुएं भी प्राप्त हुई हैं। इसके आगे बच्चों के खिलौने, मानव और पशुओं की मिट्टी की बनी मूर्तियां देखी जा सकती हैं। मिट्टी के बरतनो पर चित्र भी बनाए गए हैं।


रंग बिरंगे कीमती मनके - लोथल में बने मनकों में काफी कलात्मकता दिखाई देती है। इन मनकों में गोमेद और सुलेमानी जैसे पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है। वहीं मिट्टी के बने मनके भी देखे जा सकते हैं। कुछ सेलखड़ी के बने इतने छोटे मनके हैं कि उन्हें बिना लेंस के कोरी आंखों से देख पाना संभव नहीं है। लोथल में आभूषणों के निर्माण में शंख का भी इस्तेमाल किया गया है।

सिक्के पर पशु आकृतियां - लोथल से जो मुद्राएं मिली हैं उनपर सिंधु कालीन लिपी में लिखा गया है जिन्हें अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है। पर इन मुद्राओं पर पशु की आकृति बनाई गई है। लोथल में तांबे से बने बड़े बड़े मर्तबान भी मिले हैं। ऐसा माना जाता है कि यहां तांबा ओमान से आयात करके मंगाया जाता था। स्थानीय लोग दैनिक इस्तेमाल में तांबे के बरतनों को उपयोग करते थे।


शुक्रवार को बंदी - लोथल का संग्रहालय हर शुक्रवार को बंद रहता है। इसलिए आप जब भी लोथल आने का कार्यक्रम बनाएं तो शुक्रवार के दिन नहीं आएं। संग्रहालय में एएसआई का पुस्तक बिक्रय केंद्र भी है।जहां से काम की किताबें खरीद सकते हैं।


तो अब हमलोग लोथल से वापस चल रहे हैं। वापसी में धींगड़ा गांव में हमलोग रुक गए। स्थानीय लोगों से मुलाकात हुई। गांव के सरपंच से बात हुई। उन्होंने हमें अपने घर चलने को और खाने पीने का आमंत्रण दिया। उनका धन्यवाद। पर हमलोग आगे चलकर बगोदर में हाईवे के किनारे एक ढाबे में दोपहर के खाने के लिए रुके। ढाबे का खाना अच्छा था। बाहर बेर बिक रहे हैं। ये खूब सस्ते भी हैं। खाने के बाद हमलोग एक बार फिर हाईवे पर फर्राटा भर रहे हैं। अहमदाबाद की ओर वापसी।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( LOTHAL, GUJRAT ) 
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Wednesday, July 10, 2019

गुजरात का हडप्पा कालीन बंदरगाह शहर लोथल

लोथल मतलब अतीत से संवाद। तो हमलोग पहुंच गए हैं इस प्राचीन नगर से संवाद करने। यह स्थल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से संरक्षित है। यहां वाहन पार्किंग, पेयजल और शौचालय का इंतजाम है पर कोई कैंटीन नहीं है। यहां देखने के लिए दो आकर्षण है। लोथल का पुरातत्व संग्रहालय और पुराने शहर के अवशेष। देशी विदेशी सैलानी मिलाकर हर रोज औसतन 500 लोग लोथल को देखने पहुंचते हैं। प्रवेश के लिए सिर्फ 5 रुपये का टिकट है। यहां पुरातत्व विभाग का 40 स्टाफ तैनात है। पर रात में सिर्फ सुरक्षा गार्ड रहते हैं।

लोथल प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता के शहरों में से एक बहुत ही महत्वपूर्ण स्थल रहा। लगभग 2400 ईसा पूर्व पुराना लोथल शहर गुजरात के खंभात की खाड़ी और साबरमती नदी के बीच में स्थित है। लंबे समय तक लोथल हमारी नजरों से ओझल था। इसकी खोज सन 1954 में हुई थी। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इस शहर की खुदाई 13 फरवरी 1955 से लेकर 19 मई 1956 के मध्य की थी। इसकी अगुवाई प्रोफेसर एस आर राव ने की थी।

वास्तव में हड़प्पा सभ्यता बेहद विशाल थी। इसका विस्तार भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान तक था। पर भारत विभाजन के बाद हड़प्पा और मोहनजोदड़ो पाकिस्तान के कब्जे में चले गए, फिर भी हड़प्पा सभ्यता के कई स्थान भारत में भी मौजूद हैं। उनमें लोथल और कालीबंगा प्रमुख हैं। तो आइए इस प्राचीन नगर लोथल को करीब से महसूस करने चलते हैं।
हमें सबसे पहले दिखाई देता है एक आयताकार बेसिन, जिसे डॉकयार्ड ( बंदरगाह) कहा जाता था।

लोथल नगर आवासीय क्षेत्र दो हिस्सों में बंटा हुआ था। दुर्ग और नगर क्षेत्र। बाढ़ से बचाव के लिए 13 मीटर मोटी मिट्टी के ईंटों वाली मजबूत दीवार बनाई गई थी। दुर्ग क्षेत्र में समाज के प्रबुद्ध लोग रहते थे। इन लोगों को आवास तीन मीटर ऊंचे चबूतरे पर बने थे। उनके पास सभी तरह की नागरिक सुविधाएं थीं। जैसे स्नानागार, ढकी हुई नालियां, स्वच्छ जल के लिए कुआं आदि।

नगर में व्यापारिक क्षेत्र भी था, जहां सिर्फ कामगार लोग रहते थे। लोथल में आप एक जलाशय नुमा गोदी ( बंदरगाह) और विशाल मालगोदाम के अवशेष देख सकते हैं।
गोदी को पकी ईंटो से बनाया गया है। इसके निर्माण में पूरी वैज्ञानिकता का ख्याल रखा गया है जिससे पानी का बहाव लगातार और सालों भर कायम रहे। यह 214 मीटर लंबा और 36 मीटर चौड़ा था। बेसिन चारों तरफ से पक्की ईंटों से घिरा हुआ है। इसमें जल निकासी के लिए स्लूस गेट बना हुआ है और इनलेट के लिए जगह भी छोड़ी गई है।

थोड़ी दूर आगे चलने पर आपको माल गोदाम दिखाई देता है। इसका निर्माण एक बड़े चबूतरे पर किया गया है। इसका आकार 49 गुणा 40 मीटर है। मूल रूप से इस चबूतरे पर घनाकार मिट्टी के 64 स्तंभ थे, जिसपर लकड़ी की छत हुआ करती थी। यह गोदाम मालवाहक जहाजों से उतरे माल कोर सुरक्षित रखने के लिए बनाई गई थी।

कहा जाता है कि 1900 ईस्वी के आसपास लगातार आई बाढ़ के कारण लोथल नगर का विनाश हो गया। लगभग 1700 ईस्वी के आसपास लोगों ने इस स्थल को पूरी तरह त्याग दिया।

लोथल में बने थे शौचालय
लोथल की नगर व्यवस्था में हमें शौचालय होने का प्रमाण मिलता है। यहां लोटे जैसे जार मिलने से यह पता चलता है कि तब भी यहां के लोगो द्वारा स्वच्छता पर पर्याप्त जोर दिया जाता था। अभी से 4500 वर्षीय पुराना यह शहर गणितीय तरीके से योजनाबद्ध रूप से बना था। इसमें उचित कोणों पर सड़कों को पार करने की व्यवस्था, जल निकासी प्रणालियां और बड़े स्नानागार की व्यवस्था थी।
लोथक के प्राचीन अवशेषों को देखने के लिए आप तकरीबन एक किलोमीटर की ट्रैकिंग कर सकते हैं। धूप तेज लगती है, पानी की बोतल अपने साथ रखें। तो अब वापस चलते हैं, संग्रहालय भी तो देखना है।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य ( LOTHAL , GUJRAT )