Wednesday, July 31, 2019

भीमबेटका – ये कौन चित्रकार है...कौन चित्रकार है...


हम पहुंच गए विश्व विरासत स्थल भीम बेटका के प्रवेश द्वार पर। यहां पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षेण के सुरक्षा गार्ड लगे हुए हैं। यहां पर हमें एक गाइड भी मिलते हैं जो कुछ सौ रुपये लेकर हमें भीम बेटका दिखाने की बात करते हैं। पर उनकी कोई खास जरूरत नहीं है। यहां पर सभी गुफाओं की ओर जाने के लिए पथ संकेतक लगे हुए हैं जिनकी सहायता से आराम से घूमा जा सकता है। हां मेरी सलाह है कि अगर आप ठीक से भीम बेटका देखना चाहते हैं तो कम से कम तीन घंटे का समय रखें अपने पास।

प्रागैतिहासिक चित्रकला के सजे शैलाश्रय-  भीम बेटका राजा भोज की नगरी भोजपुर के निकटवर्ती इलाके में औबेदुल्लागंज से होशंगाबाद के पहाड़ी क्षेत्र में प्रागैतिहासिक चित्रकला से युक्त शैलाश्रयों की श्रृंखला है। यहां छह सौ से अधिक चित्रित शैलाश्रयों में लघु पाषाण काल से लेकर आरंभिक ऐतिहासिक काल तक के चित्र देखे जा सकते हैं। इनमें आरंभिक (लगभग 10 हजार वर्ष ईसा पूर्व) के चित्रों में आखेट दृश्य, युद्ध, यात्राएं, मधु संचयन, नृत्य-गान और अन्य सामाजिक विषयों का चित्रण देखा जा सकता है।

 रोमांचित कर देती हैं गुफाएं - भीम बेटका की गुफाएं यहां आने वाले सैलानियों को हजारों साल पुराने अतीत में ले जाकर रोमांचित कर देती हैं। में वन्य प्राणियों का अंकन काफी महत्वपूर्ण ढंग से हुआ है। भीम बैठका की सभा गुफा, जू-रॉक और अन्य कुछ गुफाओं में गेरुए, सफेद और हरे रंग से चित्रकारी की गई है। इन चित्रों के अलंकरण से प्राग ऐतिहासिक युग में प्रचलित आभूषण और उस समय के नागरिकों की अलंकरणप्रियता का भी बखूबी एहसास होता है।

हजारों साल नजरों से ओझल रहीं - भीम बेटका की ये गुफाएं हमारी नजरों से हजारों साल तक ओझल थी। पुरातत्तविद डॉक्टर विष्णु श्रीधर वाकणकर ने इन शैलाश्रय की खोज स्वतंत्रता के बाद 1957 में की थी। मध्य प्रदेश सरकार ने डॉक्टर वाकणकर की स्मृति में पुरातत्व के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए राष्ट्रीय सम्मान स्थापित किया है। अगस्त 1990 में भारतीय पुरात्तव सर्वेक्षण ने इसे राष्ट्रीय महत्व का स्थल घोषित किया।

आदि मानवों का निवास - भीमबेटका प्रवेश द्वार से ही आपको अचरज में डालने लगती है। आदि मानव जब घर नहीं बनाते थे इन्ही पत्थरों की गुफाओं में अपना आश्रय बनाते थे। इन्ही गुफाओं में उन्होंने फूलों के रंग से दिल की कलम से कुछ रंग बिरंगे चित्र उकेरे हैं जो आज भी ताजे ताजे नजर आते हैं। ये अपने देश की सबसे प्राचीनतम रचनाओं में से एक है जिनके चित्रकारों के हमें नाम नहीं मालूम। पर इनका सौंदर्य देखकर दिल ये सवाल अनायास ही पूछ बैठता है कि ये कौन चित्रकार है...ये कौन चित्रकार है...


महाभारत के भीम से रिश्ता -  लोग इसका संबंध महाभारत काल के महान वीर भीम से भी जोड़ते हैं। इसी के नाम पर इसको भीम बैठका कहा गया जो कालांतर में भीमबेटका कहलाने लगा। भीमबेटका में कुल 600 शैलाश्रय मिले हैं जिनमें से 275 में चित्र बनाए गए हैं। इनमें से कुछ प्रमुख शैलाश्रयों को आसानी से देखा जा सकता है।
आदि मानवों ने चित्रकारी के लिए प्रमुख रूप से गेरुआ, लाल और सफेद रंगों का चयन किया था। कहीं कहीं पर हरा और पीला रंग भी देखा जा सकता है। पत्थर की गुफाओं में प्यालेनुमा निशान को एक लाख साल पुराना माना गया है। यानी तब यहां मानव जीवन था।


भीम बेटका की गुफाओं में नृत्य-संगीत की तसवीरें, लड़ाई करते हुए जानवर, कई तरह के मुखौटों में उस समय का जीवन देखा समझा जा सकता है। इसके साथ ही बहुत से अलग-अलग जानवरों जैसे, कुत्ते, बन्दर, हाथी, हिरन और मगरमच्छ का सुन्दर चित्रण किया गया है।


कुछ ऐसा है भीमबेटका

10 हजार वर्ष ईसा पूर्व के आदिमानवों के बनाए चित्र हैं यहां।
1893 हेक्टेयर क्षेत्र मे भीमबेटका का विस्तार है
10280 हेक्टेयर में इसका बफर जोन विस्तारित है।
1957 में इन रॉक शेल्टर्स की खोज की गई।
600 शैलाश्रय हैं कुल भीमबेटका क्षेत्र में
275 चित्रित पत्थर मिले हैं इस क्षेत्र में
2003 में यूनेस्को ने इसे विश्व विरासत का दर्जा दिया।



कभी मौका लगे तो आप खुद भीमबेटका पहुंचे और अपने नजरिए से हमारी इस महान विरासत को महसूस करें। अब मेरी वापसी की बारी है। उसी तरह पदयात्रा करते हुए। वापसी में भी कोई लिफ्ट देने वाला नहीं मिला है। तो अब चलें अगले सफर की ओर...
-        विद्युत प्रकाश मौर्य  - vidyutp@gmail.com
( BHIMBETKA, BHOPAL ) 




Monday, July 29, 2019

आदि मानवों की दुनिया - भीम बेटका की ओर


एक दिन पहले की अपेक्षा भोपाल में आज ठंड बढ़ गई है। फरवरी के महीने में इतनी ठंड भोपाल में कभी नहीं पड़ी। सुबह सुबह मैं भीम बेटका के लिए निकल पड़ा हूं। होटल से चेक आउट कर दिया है। हमने रेलवे स्टेशन के पास के बस स्टैंड से इटारसी जाने वाली बस ली है। भीम बेटका भोपाल से होशंगाबाद इटारसी मार्ग पर ओबेदोल्लागंज से थोड़ा आगे है। पहले मैंने ओबदोल्लागंज तक का ही टिकट लिया है। पर जब कंडक्टर को बताया कि मुझे भीम बेटका जाना है तो उन्होंने 10 रुपये का और टिकट लिया और भीम बेटका के स्वागत द्वार पर उतार दिया। वैसे भीम बेटका आने वाले बहुत से सैलानी अपनी आरक्षित गाड़ी लेकर आते हैं। भोपाल से भीम बेटका की दूरी 45 किलोमीटर है। नजदीक के शहर होशंगाबाद और ओबेदुल्लागंज हैं। भीम बेटका से होशंगाबाद 30 किलोमीटर की दूरी पर है।

भोपाल से इटारसी की सड़क को फोर लेन बनाए जाने का काम तेजी से चल रहा है। इससे आवागमन और सुगम हो जाएगा। वैसे भीमबेटका आप रेल से भी पहुंच सकते हैं। भोपाल से इटारसी रेलवे लाइन पर ओबदुल्लागंज और बरखेड़ा रेलवे स्टेशन के बीच भीम बेटका स्थित है।

हाईवे के बगल में भीम बेटका का स्वागत कक्ष बना है। यहां पर होटल, कैफेटेरिया, शौचालय, पेयजल आदि का इंतजाम है। यहां कोई भी सैलानी छोटा सा ब्रेक ले सकता है। पर यहां से भीम बेटका की दूरी तीन किलोमीटर है।



 पैदल चल पड़ा सफर पर - अगर आपके पास अपना वाहन नहीं है तो यह दूरी पैदल ही तय करनी पड़ेगी। यहां अगर साइकिल किराये पर देने का प्रावधान कर दिया जाए तो यात्रा सुगम हो सकती है। मेरे पास कोई विकल्प नहीं है। बहरहाल मैं पैदल ही चल पड़ा हूं। स्वागत कक्ष के बगल में रेलवे फाटक पार करने के बाद सीधी सड़क। सड़क के दोनों तरफ हरे भरे खेत हैं। तकरीबन एक किलोमीटर चलने के बाद रास्ता दो राहा आता है। यहां से बायीं तरफ चलने का संकेतक है। अब रास्ता पथरीला हो गया है। खेत कम हो गए हैं। पर जानवर घास चरते दिखाई दे रहे हैं। 



प्रवेश टिकट 25 रुपये का -  भीम बेटका का टिकट घर आ गया है। यहां पर एक आदमी का प्रवेश टिकट 25 रुपये का है। अगर आपके पास वाहन है तो उसका टिकट अलग से लगता है। हर वाहन के लिए अलग अलग प्रवेश दरे हैं। मुझे उम्मीद थी कोई बाइक वाला या कार वाला लिफ्ट देने वाला मिल जाएगा। पर ऐसा नहीं हुआ। पर सुबह सुबह 3 किलोमीटर की सैर करन में भी क्या बुराई है। वह भी जब हम आदि मानवों यानी अपने पुरखों के आवास गृह को देखने जा रहे हों। तो चलते चलिए ना। रास्ते में पिकनिक मनाने वालों ने कहीं कहीं प्लास्टिक की बोतले फेंक कर गंदगी फैला रखी है। 

तकरीबन एक घंटे में तीन किलोमीटर की मंद गति से पदयात्रा करते हुए हम आखिर पहुंच ही गए हैं भीम बेटका या फिर भीम बैठका। भारत में यूनेस्को विश्व विरासत सूची का एक और स्थल। यूनेस्को ने भीम बेटका रॉक शेल्टर्स को अपनी विश्व विरासत सूची में साल 2003 में शामिल किया। खास तौर पर आदि मानवों द्वारा बनाई गई रॉक पेंटिंग के कारण इसका चयन किया गया। तो यह भी उन स्थलों में है जहां देशी से ज्यादा विदेशी लोग हर रोज घूमने के लिए पहुंचते हैं। तो चलिए अब अंदर चलते हैं। पढ़ते रहिए अगली कड़ी में सैर करेंगे भीम बेटका की...
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
(BHIMBETKA, BHOPAL ) 
  





Sunday, July 28, 2019

भोपाल में पोहा और मावा जलेबी

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जब 1999 में भोपाल जाना हुआ था तो सुबह के नास्ते में वहां पर पोहा मिल रहा था दो रुपये में । वहां नास्ते में आपको अब भी पोहा मिल जाएगा पर अब उसके लिए आपको 10 रुपये चुकाने होंगे। वैसे तो पोहा इंदौर का लोकप्रिय नास्ता है, पर इंदौर से नजदीक होने के कारण भोपाल की सड़कों पर भी पोहा खूब मिलता है।

इस बार भी भोपाल रेलवे स्टेशन पर उतर कर बाहर आते ही हमने नास्ते में सबसे पहले पोहा ही लिया। पर हमने थोड़ी दूर चलने पर देखा कि एक सज्जन ठेले पर हरे चने को भूनकर बेच रहे हैं। मोटे हरे चने को लकड़ी के चुल्हे पर पकाया जा रहा है। तो इसके स्वाद में खासा सोंधापन है। ऐसा देशी नास्ता शहरों में बहुत कम देखने को मिलता है।


भोपाल शहर की दूसरी प्रमुख विशेषता है मावा जलेबी। जलेबी तो आपने हर शहर में खूब खाई होगी पर मावा के साथ जलेबी खाने का मजा भोपाल में ही लिया जा सकता है। यहां के शादी समारोह आदि में भी मावा जलेबी खास तौर पर पेश की जाती है। दरअसल मावा जलेबी मध्य प्रदेश की मशहूर मिठाई है। वैसे तो जलेबी मैदे की बनाई जाती है, पर मध्य प्रदेश के अलग अलग शहरों में मावा जलेबी बनाई जाती है। यह रसीली और कुरकुरी होती है। इसके निर्माण में खास तौर पर मावा (खोवा) और केसर का इस्तेमाल किया जाता है।

भोपाल रेलवे स्टेशन के आसपास खाने पीने के लिए बहुत सारे किफायती होटल हैं। इनमें से कई होटलों में आप थाली सिस्टम में भरपेट भोजन कर सकते हैं। साल 1999 में तो यहां 10 से 12 रुपये में भरपेट भोजन मिलता था पर अब इसके लिए आपको 60 से 100 रुपये तक चुकाने पड़ सकते हैं। रेलवे स्टेशन के पास हमिदिया रोड पर खाने पीने के लिए आप कुछ तलास रहे हैं तो मनोहर अच्छा विकल्प हो सकता है। यहां पर नास्ता और मिठाइयां खाई जा सकती हैं।

भोपाल से लौटते हुए हमिदिया रोड के एक होटल में खाने के लिए पहुंचा हूं। वैसे तो मक्की की रोटी पंजाब का प्रसिद्ध खाना है। पर इस होटल में जिसका नाम राज वैष्णव भोजनालय है, मैं दाखिल होता हूं। यहां पर मक्की की रोटी साग और सब्जियों के साथ वाली थाली है। कुल 110 रुपये की थाली में तीन विशाल मक्की की रोटी है। इसके साथ पुलाव भी है। खाने का स्वाद काफी उम्दा है। तीन मक्की की रोटी खाकर ही मैं हाउसफुल हो गया। फिर मैंने उन्हें कहा कि हमारे प्लेट का पुलाव पैक कर दें। बाद में खा लूंगा।

सांची का पेड़ा – सांची मध्य प्रदेश के दूध और दूध के उत्पादों का लोकप्रिय सरकारी ब्रांड है। हमने सांची का छाछ खूब पीया है। पर इस बार सांची का पेड़ा खाने का मौका मिला है। सांची का पेड़ा सिंगल पेड़े की पैकिंग में भी उपलब्ध होता है। इसके बाद ढाई सौ ग्राम और आधा किलो की पैकिंग भी उपलब्ध है। किसी के घर जाना हो तो सांची का पेड़ा लेकर पहुंचे। मध्य प्रदेश के रेलवे स्टेशनों पर इसके स्टाल मिल जाते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com
 ( MP MAWA JALEBI, SANCHI PEDA ) 







Friday, July 26, 2019

मोती मसजिद, पुराना भोपाल और मुसलमान


भोपाल के बड़ी ताल के एक तरफ श्यामला हिल्स है तो दूसरी तरफ पुराना भोपाल। पुराना भोपाल मतलब शहर का मुस्लिम बहुल इलाका। भोजताल के किनारे वीआईपी रोड पर एक कलात्मक मस्जिद नजर आती है। इस मस्जिद का नाम लाल इमली मस्जिद है। इस मसजिद की इमारत लाल जरूर है पर इसे लाल इमली मसजिद नाम क्यों मिला होगा।

यहां से थोड़ी दूर ही चलने पर मोती मसजिद है। भोपाल की इस मस्जिद को कदसिया बेगम की बेटी सिकंदर जहां बेगम ने 1860 ई. में बनवाया था। इस मस्जिद की शैली दिल्‍ली में बनी जामा मस्जिद से मिलती जुलती है। पर आकार में यह उससे छोटी है। मस्जिद की गहरे लाल रंग की दो मीनारें हैं, जो ऊपर नुकीली हैं। यह दूर से देखने में सोने के जैसी प्रतीत होती हैं। मोती मसजिद के आसपास पुराने भोपाल शहर का बाजार है। यह भोपाल शहर का प्रमुख लैंडमार्क भी है। मोती मसजिद के आसपास शहर की पुरानी इमारतें हैं। थोड़ी दूर आगे चलने पर शहर की जीपीओ (मुख्य डाकघर ) और ताजुल मसजिद आ जाता है।

अक्सर मोती मसजिद चौराहा और इसके आसपास ट्रैफिक जाम लगा रहता है। बात ताजुल मसजिद की करें तो ये एशिया की सबसे बड़ी मसजिद मानी जाती है। इस मसजिद में मैं 1995 की भोपाल यात्रा के दौरान भी गया था। पर इतने सालों बाद एक बार फिर इस मसजिद को देखने की इच्छा हुई। सचमुच भव्यता और विशालता में इसका कोई जोड़ नहीं है।

मोती मसजिद के आसपास पुराना भोपाल शहर बसता है। पुराना भोपाल मतलब नवाबों का शहर मुस्लिम बहुल आबादी वाला शहर। स्वतंत्रता के बाद यानी सन 1947 के बाद भोपाल शहर में काफी बदलाव आया है। यूं कहें तो देश के अन्य राज्यों की राजधानियों की तुलना में भोपाल काफी बदला है। जब 1956 में मध्य प्रदेश राज्य का गठन हुआ तो इसकी राजधानी बनाने के लिए भोपाल का चयन किया गया। हालांकि इससे पहले ग्वालियर, इंदौर, जबलपुर को राजधानी बनाने की चर्चा चल रही थी। ये सभी बड़े और पुराने शहर थे। पर भोपाल के पक्ष में इसका राज्य में भौगोलिक दृष्टि से केंद्र में होना और सालों भर सदाबहार मौसम मजबूत आधार बना।

राजधानी बनने के बाद भोपाल शहर के दायरे में खूब विस्तार हुआ। शहर के पुराने मुस्लिम इलाके लोग बड़ी संख्या में दुनिया के कई देशों में रोजी रोजगार के लिए जाने लगे। वहीं भोपाल में 1956 के बाद मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ के अलग अलग शहरों से आकर लोग बसने लगे। इस तरह से भोपाल में एक नई तरह की कास्मोपोलिटन संस्कृति का विकास हुआ। औज भोपाल में प्राचीनता के बीच एक सर्वथा नवीन शहर के रूप में हमारे समाने है।
भोपाल के वीआईपी रोड पर लाल इमली मसजिद। 

साल 1984 में भोपाल शहर दुनिया भर में एक बार फिर चर्चा में आया जब युनियन कार्बाइड गैस कांड हुआ। इसमें बड़ी संख्या में लोगों की मृत्यु और हजारों लोग गैस से पीड़ित हुए जिन्हें लंबे समय तक कई तरह की बीमारियां हुई। पर सब कुछ भुला कर भोपाल शहर कुलांचे भर रहा है। साल 2011 की जनगणना में शहर की आबादी 17 लाख को पार कर गई है। अब शहर में बड़े बड़े मॉल और चौड़ी सड़के बन रही हैं। पर पुराने भोपाल में आकर आप प्राचीन शहर की खुशबू को एक बार फिर महसूस कर सकते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( BHOPAL, MUSALMAN, MOTI MASJID ) 

Wednesday, July 24, 2019

भोपाल की बड़ी ताल और राजा भोज की प्रतिमा



भोपाल का राजकीय संग्रहालय देखने के बाद मानव संग्रहालय चल पड़ा। यह जनजातीय संग्रहालय से आधे किलोमीटर दूर है। मानव संग्रहालय दूसरी बार आया हूं। यहां पर भोपाल दर्शन कराने वाली एक अनूठी बस दिखाई देती है। इसमें बैठ कर धीमी गति के सफर में भोपाल दर्शन का आनंद लिया जा सकता है। इसका किराया भी ज्यादा नहीं है। थोड़ी देर मानव संग्रहालय में घूमने के बाद आगे ...

श्यामला हिल्स में पैदल ही आगे बढ़ चला हूं। रास्ते में भाजपा नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री उमा भारती और कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह के बंगला नजर आया। थोड़ी भूख लगी है तो एक जगह रुक कर कुछ समोसे खाए। एक समोसा 5 रुपये का है। आगे बढ़ चला एक सुंदर सा पार्क नजर आया। तो थोड़ी देर इस पार्क में सुस्ता लिया जाए। पार्क मे रंगबिरंगे फूलों के साथ कुछ वक्त गुजराने के बाद आगे बढ़ चला। मैं बड़ी ताल के पास पहुंच गया हूं। यहां झील के किनारे एक नया सुंदर पुल बन गया है।

बड़ी ताल के पहले कदीमी हमाम दिखाई देता है। इस हमाम का निर्माण शाही लोगों के लिए कराया गया था। यह हमाम दीवाली से लेकर होली तक खुला रहता था।



तो अब चलते हैं बड़ी ताल की तरफ। बड़ी ताल को भोज ताल भी कहते हैं। यह एक बड़ा तालाब है जो भोपाल वासियों के लिए एकमात्र पीने के पानी का स्रोत है। लगभग 40% आबादी रोजाना 30 मिलियन गैलन पानी इस्तेमाल करती है। बड़ा तलाब छोटा तालाब मिलकर भोज वेटलैंड का निर्माण करते हैं। इन्हें संयुक्त रूप से रामसर साइट के नाम से जाना जाता है।
अब थोड़ा अतीत में चलते हैं। भोज ताल एक मानव निर्मित विशाल झील है। इसकी खुदाई परमार राजा भोज के द्वारा 1005 से 1055 कराई गई। राजा भोज के नाम पर ही शहर का नाम भोजपाल पड़ा। जो बाद में बदल कर भोपाल रह गया।

कहा जाता है कि राजा भोज चर्म रोग से ग्रसित हो गए थे। जिसको कई वैद्य और डॉक्टर ठीक नहीं कर पा रहा था। तब एक संत ने राजा को एक तालाब बनाने का सुझाव दिया जिसमें 365 सहायक नदियों का जल समाहित हो। उसमें नहाने से उनका चर्म रोग दूर हो जाएगा। तब राजा भोज ने अपने दरबारियों और तकनीकी सलाहकारों से तालाब खुदवाने को कहा। राजा भोज के इंजीनियरों ने बेतवा नदी और उसकी 359 सहायक नदियां और कुछ अदृश्य नदियो के पानी को मिलाकर इस विशाल तालाब की खुदाई कराई।

भोपाल में कहावत है – तालों का ताल भोपाल बाकी सब तलैया। बड़ी ताल का कुल क्षेत्रफल 31 वर्ग किलोमीटर है। इसे एशिया की सबसे बड़ी कृत्रिम झील माना जाता है। इसमें लगभग 361 वर्ग किलोमीटर इलाके का बारिश का पानी एकत्रित हो जाता है।

राजा भोज की विशाल प्रतिमा - फरवरी 2011 में भोपाल की बड़ी ताल में वीआईपी रोड पर राजा भोज की 20 फीट ऊंची और दो टन वजन की विशाल प्रतिमा स्थापित की गई। इसके साथ ही बड़ी ताल का सरकार ने नामकरण भोजताल किया। आजकल रात को इस प्रतिमा को एलईडी लाइटों के प्रकाशित किया जाता है। राजा भोज की यह प्रतिमा वास्तव में एक किले के बुर्ज पर स्थापित की गई है। कभी यहां एक किला हुआ करता था जिसकी कई मंजिलें पानी में डूब गईं।

नौका विहार का आनंद लें - भोपाल की बड़ी ताल में नौका विहार का आनंद उठा सकते हैं। झील के किनारे बने पार्क में सूर्यास्त का नजारा कर सकते हैं। इसके साथ ही स्ट्रीट फूड का आनंद भी उठा सकते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-         (BHOPAL, TAL , RAJA BHOJ ) 






Tuesday, July 23, 2019

कलात्मक संग्रह और अलबेले अतीत से साक्षात्कार


मध्य प्रदेश का राजकीय संग्रहालय - भोपाल के श्यामला हिल्स इलाके में ही जनजातीय संग्रहालय के बगल में मध्य प्रदेश का राजकीय संग्रहालय है। इस विशाल संग्रहालय में भी खास तौर पर मूर्तियों का बड़ा संग्रह है। पर सबसे चौंकाने वाली चीज यहां देखी जा सकती है 25 लाख साल पुरानी काष्ठ जीवाष्म का संग्रह। इसे मध्य प्रदेश के मंडला जिले से प्राप्त किया गया है।

इस संग्रहालय में प्रवेश करते ही मेरा पहला साक्षात्कार त्रिमूर्ति से होता है। दसवीं सदी की यह मूर्ति मुरैना जिले के पढ़ावली से लाई गई है। इसके आगे हिंगलाजगढ़ ( मंदसौर ) से प्राप्त गौरी की प्रतिमा के दर्शन होते हैं। दसवीं सदी की इस प्रतिमा में गजब की कलात्मकता है। खास तौर पर गौरी का मुख अत्यंत ममतामयी परिलक्षित होता है। गौरी के बाद गणेश। ये गणेश 11वीं सदी में मंदसौर से प्राप्त हुए हैं। ये नृत्यरत अवस्था में हैं। दसवीं सदी में बनी मां सरस्वती की सुंदर प्रतिमा है। यह मुरैना जिले से मिली थी। जिले के सुहानिया ग्राम से प्राप्त ये प्रतिमा अनूठी है। मां के चार हाथ हैं। उनके दो हाथों में वाद्य यंत्र है। यह सरस्वती की प्राचीनतम प्रतिमाओं में से एक है।

अगली मूर्ति का शीर्षक है स्खलित वासना। ये कब कहां से प्राप्त हुई है ये स्पष्ट नहीं है। पर वासना का भाव और उसके बाद की स्थिति का चित्रण एक नारी मूर्ति के माध्यम से कलाकार ने कहने की कोशिश की है। मूर्ति थोड़ी खंडित है पर उसका संदेश समझा जा सकता है।

सतना जिले का भरहुत कला का बड़ा केंद्र हुआ करता था। भरहुत की कई कलाकृतियां इंडियन म्युजियम कोलकाता की शोभा बढ़ा रही हैं। पर भोपाल के इस संग्रहालय मेंभरहुत में दूसरी सदी इसा पूर्व की बनी यक्षी की प्रतिमा देखी जा सकती है। ये इस संग्रहालय की प्राचीनतम प्रतिमाओं में से एक है। प्रतिमा में यक्षी का सिर्फ मुख भाग है। इसके चारों तरफ सुंदर चक्र बना हुआ है। हाथ में  पुष्प है। गले में गहने हैं। बालों का श्रंगार मोहक है।

भोपाल के राजकीय संग्रहालय में आप उमा महेश्वर, कल्याण सुंदरम, लक्ष्मी समेत तमाम प्रतिमाओं के दीदार कर सकते हैं। संग्रहालय मेंकुल 17 विथिकाएं हैं। जहां आप अलग अलग विषयों पर संग्रह देख सकते हैं। इनमें टेक्सटाइल, डाक टिकट, अस्त्र शस्त्र की दीर्घाएं भी काफी बेहतरीन संग्रह वाली हैं।

1909 में हुई शुरुआत - भोपाल के इस राजकीय संग्रहालय की शुरुआत 1909 में नवाब सुल्तान जहां बेगम ने की थी। तब इसका नाम एडवर्ड संग्रहालय था। स्वतंत्रता के बाद यह वाणगंगा इलाके में स्थापित किया गया। पर 2005 में यह श्यामला हिल्स इलाके में वर्तमान भवन में आ पहुंचा। राजकीय संग्रहालय का भवन दो मंजिला है। इसमें ऊपरी मंजिल पर सिक्का, पेंटिंग और वाद्य यंत्रों की भी गैलरी है। यहां पर आप एक पुरानी प्रिंटिंग प्रेस भी देख सकते हैं।


संग्रहालय में प्रवेश – राजकीय संग्रहालय भोपाल में प्रवेश का टिकट 20 रुपये का है। कैमरा के लिए 100 रुपये का शुल्क है। पंद्रह साल तक के बच्चों का प्रवेश निःशुल्क है। यह संग्रहालय वर्तमान भवन में नवंबर 2005 में स्थानांतरित हुआ। यहां आप दो से तीन घंटे गुजारकर पूरा संग्रहालय देख सकते हैं। प्रवेश द्वार पर पुस्तकों की दुकान भी है। संग्रहालय सुबह 10.30 बजे से शाम 5 बजे तक खुला रहता है। हर सोमवार और अवकाश के दिन बंद रहता है।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com

( MP STATE MUSEUM, BHOPAL ) 


Sunday, July 21, 2019

जनजातीय जीवन की तिलिस्मी दुनिया

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अपना देश रहन सहन के मामले में कितना अनूठा है। भिन्न भाषा भिन्न देश- भारत अपना एक देश। पर देश के रहन सहन के भिन्नता को देखना और समझना हो तो मध्य प्रदेश के जनजातीय संग्रहालय में पहुंचिए।

मध्य प्रदेश का ये जन जातीय संग्रहालय, भोपाल के श्यामला हिल्स इलाके में स्थित है, इसका लोकार्पण भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने किया था। यह 6 जून 2013 को राजधानी भोपाल का नया आकर्षण बना। संग्रहालय में प्रवेश का टिकट 10 रुपये और फोटोग्राफी के लिए 50 रुपये का शुल्क है। संग्रहालय का प्रवेश द्वार भी जनजातीय समाज की अनूठी आभा लिए हुए प्रतीत होता है।

इस संग्रहालय में मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में निवास करने वाले जनजातीय समूहों की कला संस्कृति परंपरा को देख सकते हैं। यहां उनके जीवन से जुड़े शिल्प चित्रों रहन सहन, रीति रिवाज रिवाजों को चित्रों मूर्तियों एवं प्रदर्शनों के माध्यम से समझा जा सकता है। यहां पर कई तमाम ऐसी वस्तुएं मूल अवस्था में देखी जा सकती हैं जो मूल रूप से आदिवासी संस्कृति में लोगों द्वारा उपयोग किए जाते हैं। खासत तौर पर ये जगह बच्चों और स्कूली छात्रों के देखने के लिए तो लाजवाब है।

यहां पर समय-समय पर यहां पर कई सांस्कृतिक आयोजन, कार्यशालाएं आदि आयोजित की जाती हैं। इसमें लोगों को आदिवासी समाज की मान्यताओं कला संस्कृति के बारे में ज्ञान मिलता है।

यहां पर मध्य प्रदेश की प्रमुख जनजातियां गोंड, भील, कोरकू, बैगा, कोल, भारिया, सहरिया आदि आदिवासियों के जीवन के बारे में जान समझ सकते हैं।
गोंड की बात करें तो उनका मुख्यता निवास बैतूल होशंगाबाद मंडला सागर छिंदवाड़ा बालाघाट और शहडोल जिले में है।

भील आदिवासियों का निवास मुख्यता झाबुआ, अलीराजपुर, धार, बड़वानी खरगोन और रतलाम जिले में है। भील अपने आपको वाल्मीकि और एवं एकलव्य का वंशज मानते हैं। इनकी कई उप जातियां जैसे भिलाला पट्टी लिया बारेला एवं राठिया आदि हैं। वहीं टंट्या भील देश के स्वतंत्रता संग्राम की प्रमुख सेनानी हुए हैं जो की इसी जनजाति से आते हैं। उन पर भील समाज गर्व करता है।

राज्य में कोरकू जनजाति सतपुड़ा पर्वतमाला क्षेत्र के छिंदवाड़ा बैतूल होशंगाबाद जिले के गांवों में निवास करते हैं। वहीं बैगा जनजाति मंडला, डिंडोरी, शहडोल, उमरिया, बालाघाट एवं अमरकंटक के वन प्रदेशों में रहते हैं। वे लोग छत्तीसगढ़ के भी कई जिलों  हैं। बैगा जनजाति को छोटा नागपुर क्षेत्र की भूमियां जनजाति से निकली एक शाखा माना जाता है।

 कोल मध्य प्रदेश की दूसरी सबसे बड़ी जनजाति है। इसकी कुल 22 उपशाखाएं हैं। वहीं भारिया लोग मुख्यतः जबलपुर एवं छिंदवाड़ा जिले में रहते हैं। अब सहरिया जनजाति की करें तो यह मध्य प्रदेश के शिवपुरी, गुना, ग्वालियर, मुरैना, भिंड विदिशा, रायसेन, सीहोर जिलों में निवास करती हैं।

आप संग्रहालय में इन जाजातियों के आवास उनके द्वारा इस्तेमाल में लाए जाने वाले उपकरण, उनके खेल तमाशे आदि के बारे में जान सकते हैं। यह सब कुछ यहां पर बड़े रोचक ढंग से पेश किया गया है।

संग्रहालय में प्रवेश करने के बाद प्रतीत होता है मानो आप किसी तिलस्मी दुनिया में पहुंच गए हों। शहरी लोगों को यह किसी कल्पना लोक सा प्रतीत होता है। कई लोगों को यहां आकर लगता है कि हम अपने ही देश की सांस्कृतिक के बारे में कितना कम जानते हैं।

अब आपने पूरा संग्रहालय घूम लिया है तो चलते चलते आप यहां से कुछ खरीददारी भी कर सकते हैं। यहां पर चिन्हारी नामक एक सोवनियर शॉप भी है जहां आप कई तरह के आदिवासी प्रतीक और वस्त्र आदि खरीद सकते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com
( TRIBAL MUSEUM, BHOPAL )